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'एचआईवी प्रभावित बच्चों से दुर्व्यवहार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने भारत में एचआईवी और एड्स से प्रभावित होने वाले बच्चों के साथ सामाजिक दुर्व्यवहार पर चिंता प्रकट की है. संगठन ने भारत पर आरोप लगाया है कि वह इन बच्चों के साथ भेदभाव और बुरे बर्ताव को रोकने में नाकाम रहा है. ह्यूमन राइट्स वाच नाम के इस संगठन का कहना है कि भारत में लगभग दस लाख ऐसे बच्चे हैं जिनके एक या दोनों अभिभावक एड्स के कारण मौत में मुँह में जा चुके हैं. ये बच्चे ख़ुद भी एचआईवी से प्रभावित हो या नहीं लेकिन भारतीय समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता. संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बच्चों को स्कूलों, अस्पतालों और यहाँ तक कि कई अनाथलायों में भी प्रवेश नहीं मिल पाता. ह्यूमन राइट्स वाच के मुताबिक़, उन्हें जहाँ प्रवेश मिल भी जाता है वहाँ भी उनके साथ भेदभाव होता है और उन्हें बाक़ी लोगों से अलग रखा जाता है. इस संगठन ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस भेदभाव को रोकने के लिए क़ानून बनाए. ह्यूमन राइट्स वाच का यह भी कहना है कि भारत में उन लाखों बच्चों को एड्स के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है जो स्कूल नहीं जा पाते. एक अनुमान के मुताबिक़, भारत में लगभग पचास लाख लोग एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हैं, इस आंकड़े में वे बच्चे शामिल नहीं हैं जिन्हें एचआईवी संक्रमण माँ के गर्भ से ही मिला है. रिपोर्ट तैयार करने वालों का यह भी कहना है कि एचआईवी से ग्रस्त लड़कियों की हालत और भी बदतर है और उनके साथ लड़की होने के कारण और अधिक भेदभाव होता है. भारत के एड्स नियंत्रण संगठन की प्रमुख मीनाक्षी दत्ता-घोष का कहना है कि यह बात सही है कि पहले एचआईवी पीड़ित बच्चों के साथ अन्याय होता था लेकिन अब सरकार ने उनकी तरफ़ ध्यान देना शुरू किया है. संगठन की प्रमुख का कहना है कि स्कूल न जा पाने वाले बच्चों को तक पहुँचने के प्रयास भी ग़ैर-सरकारी संगठनों की मदद से किए जा रहे हैं. |
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