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एचआईवी की सस्ती दवाओं की कमी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एचआईवी के शिकार लोगों को अगर समुचित रूप से सस्ती दवा उपलब्ध नहीं कराई गई तो दुनिया में लाखों लोग मारे जा सकते हैं. ये चेतावनी विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों ने एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के मौक़े पर दी है. संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन या डब्ल्युएचओ ने वर्ष 2005 की समाप्ति तक विकासशील देशों में 30 लाख लोगों को एचआईवी के लिए बनी दवा एंटीरिट्रोवायरल या एआरवी दिलवाने का लक्ष्य रखा है. वैसे जिन लोगों को ये दवा चाहिए उनकी संख्या लगभग 60 लाख है. मगर अभी तक केवल चार लाख 40 हज़ार लोगों को ही ये दवा मिल पा रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एचआईवी विभाग के निदेशक डॉक्टर जिम किम कहते हैं,"हमें पता है कि एचआईवी ग्रस्त लोगों को आवश्यक दवाएँ उपलब्ध करवाना हमारे अभियान का एक अहम हिस्सा है". दवा एआरवी एचआईवी का इलाज़ तो नहीं है मगर इससे एचआईवी वायरस के प्रसार को रोका जा सकता है. इसतरह इनकी सहायता से एचआईवी ग्रस्त व्यक्ति की प्रतिरोधी क्षमता के क्षय को धीमा बनाया जा सकता है. ऐसे में उस व्यक्ति के एड्स रोग की अवस्था में पहुँचने के समय को लंबा बनाया जा सकता है. देरी का कारण एचआईवी ग्रस्त लोगों को सस्ती दवा मिल तो सकती है मगर उसमें तक देरी का एक बड़ा कारण ये है कि डब्ल्युएचओ कड़ी जाँच प्रक्रिया के बाद ही दवाओं को मान्यता देता है. ये जाँच इतनी कड़ी होती है कि पाँच में से चार एआरवी दवाओं को मंज़ूरी नहीं मिल पाती है. जेनेरिक दवाएँ सस्ती होती हैं और ये ब्रांड नाम वाली असल दवाओं की तरह की दवाएँ होती हैं मगर इनकी बिक्री असल दवाओं के पेटेंट की अवधि के बीत जाने के बाद ही की जा सकती है. अभी डब्ल्युएचओ की सूची में जिन दवाओं के नाम हैं उनमें भारतीय कंपनी सिप्ला की बनाई हुई दो दवाएँ भी शामिल की गई हैं. इन दवाओं को छह महीने पहले सूची से हटा लिया गया था मगर दोबारा परीक्षण के बाद उनको फिर सूची में शामिल कर लिया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारतीय कंपनी की दो दवाओं की मंज़ूरी के बाद अब उन 16 और दवाओं की दोबारा जाँच की प्रक्रिया में तेज़ी लाई जाएगी जिनको सूची से बाहर किया गया था. |
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