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बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय एड्स सम्मेलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बैंकॉक में रविवार से एड्स पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है. हालांकि इस सम्मेलन से पहले ही विकासशील देशों में एड्स से निपटने के सबसे कारगर तरीक़े को लेकर बहस शुरु हो चुकी है. इस समय दुनिया में चार करोड़ से भी अधिक लोग एड्स से पीड़ित हैं और इनमें से आठ हज़ार लोगों की हर दिन मौत हो रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन को अपने उस फ़ैसले को सही ठहराना पड़ा है जिसमें उसने एचआईवी से प्रभावित लोगों का इलाज दवाओं से करने को प्राथमिकता दी थी. दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को भी प्राथमिकता देनी चाहिए. लक्ष्य का विवाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विकासशील देशों के लिए जिस तरह के महत्वाकाँक्षी लक्ष्य निर्धारित किए थे उसकी सम्मेलन के आयोजकों में से एक ने आलोचना की है. प्रोफ़ेसर जोएप लैंग ने शंका ज़ाहिर की है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इस साल के अंत तक ग़रीब देशों के तीस लाख एचआईवी से प्रभावित लोगों तक दवा पहुँचाने का लक्ष्य हासिल कर पाएगा. वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह असंभव है. कोई ढाँचा बनाने से पहले इतनी बड़ी संख्या में लोगों तक जितनी जल्दी हो सके दवा पहुँचाने की कोशिश कोई बहुत अच्छा तरीक़ा नहीं है." दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वीकार किया है कि अभी बहुत कुछ करना होगा. फ़िलहाल विकासशील देशों के सिर्फ़ पाँच लाख एचआईवी प्रभावित लोगों तक दवा पहुँच पा रही है. लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि निश्चित समयावधि में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक दवाइयाँ पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित करना सरकारों और स्वयंसेवी संगठनों पर दबाव डालने की दृष्टि से कारगर तरीक़ा है. एक अनुमान है कि दुनिया भर में एचआईवी से प्रभावित लोगों तक दवाइयाँ पहुँचाने के लिए एक लाख स्वास्थ्यकर्मियों और कार्यकर्ताओं की ज़रुरत और होगी. |
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