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नीम के पेटेंट का फ़ैसला भारत के पक्ष में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत ने 10 साल के संघर्ष के बाद नीम के पेटेंट को वापिस हासिल कर लिया है. यूरोपीय पेटेंट ऑफिस ने भारत के पक्ष में यह फ़ैसला दिया. यूरोपीय पेटेंट ऑफिस ने 1995 में कृषि की बहुराष्ट्रीय कंपनी डब्ल्यू आर ग्रेस को नीम का फफूंदनाशक के रूप में पेटेंट दे दिया था. भारत की अपील पर इसे सन् 2000 में वापस कर दिया. पर बहुराष्ट्रीय कंपनी ने इसके ख़िलाफ़ अपील कर दी और इस बार भी उनकी अपील ठुकरा दी गई. भारत की ओर से पेटेंट ऑफिस के सामने तथ्य रखे गए कि 1995 से पहले भी भारत में नीम का फफूंदनाशक और दवा के रूप में इस्तेमाल होता था. इस मामले में प्रमुख भूमिका निभानेवाली वंदना शिवा ने बीबीसी को बताया कि पिछले 10 वर्षों से इसको लेकर अभियान चलाया जा रहा था. उनका कहना था कि यह फ़ैसला बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि अमरीकी कंपनी नीम से जुड़े सभी उत्पादों को इसमें शामिल करना चाहती थी. लंबा संघर्ष वंदना शिवा का कहना था कि कड़े संघर्ष के बाद यह लड़ाई जीती गई. पेटेंट ऑफिस को एक लाख लोगों के हस्ताक्षरवाली अपील सौंपी गई. उनका कहना था कि ज्ञान के आधार पर नहीं बल्कि चोरी के आधार पर पेटेंट हासिल करने की कोशिश की गई. भारत में जिन परंपरागत पद्धतियों का सदियों से इस्तेमाल किया जाता रहा है उन पर विदेशों में पेटेंट लेना अब एक आम बात हो गई है. सन् 1996 में एक अमरीकी कंपनी ने हल्दी को घाव भरने की एक अचूक दवा कह कर पेटेंट कराने की कोशिश की थी. एक अन्य अमरीकी कंपनी ने ऐसी ही कोशिश बासमती चावल की खूबियों को लेकर की थी. प्रेक्षकों का कहना है कि भारत की ओर से सदियों पुरानी जानकारी को बचाने की कोई ठोस कोशिश नहीं की जा रही है. |
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