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पेटेंट मामले पर बुनियादी सवाल अभी भी क़ायम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक असरदार फफूँदनाशक के रूप में नीम के पौधे के इस्तेमाल को लेकर जारी पेटेंट विवाद में अब नया मोड़ आ गया है. आठ मार्च को यूरोपीय पेटेंट कार्यालय के वर्ष 2000 के उस फ़ैसले को यूरोपीय संघ के अपील प्राधिकरण ने सही ठहराया जिसमें कहा गया था कि अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी डब्लू आर ग्रेस और अमरीकी कृषि विभाग को नीम का पेटेंट प्रदान नहीं किया जा सकता है. इसी अमरीकी कंपनी ने यूरोपीय पेटेंट कार्यालय के उस फ़ैसले के विरूद्ध अपील की थी, लेकिन कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणवादी संगठनों समेत भारतीय पर्यावरणविद वंदना शिवा की संस्था रिसर्च फाउंडेशन फॉर साइंस, टेक्नॉलाजी एंड इकॉलॉजी ने इस अपील का विरोध किया था. अपील प्राधिकरण के समक्ष नए साक्ष्य प्रस्तुत किए थे जिनसे यह सिद्ध होता है कि नीम के फफूँदनाशी और कीटनाशी गुण भारत के परंपरागत ज्ञान भंडार के धरोहर हैं. 'दावा रद्द' इस महत्वपूर्ण फ़ैसले के बाद बीबीसी के साथ एक बातचीत में डॉ.वंदना शिवा ने कहा, "अपील बोर्ड ने एक बार फिर हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया है और इसका मतलब ये है कि यह जो जैवविविधता और पारंपरिक ज्ञान की चोरी है, इसको चोरी माना गया है और इन अमरीकी कंपनियों के दावे रद्द कर दिए गए हैं." उन्होंने बताया कि जब उन्हें इसके बारे में ख़बर मिली थी तब इसके ख़िलाफ़ बड़ा अभियान शुरू किया था. वंदना शिवा ने बताया, "एक लाख हस्ताक्षरों के साथ हमने अंतरराष्ट्रीय साथी ढूँढे और ख़ुशी की बात यह भी है कि जिस दिन यह फ़ैसला आया उस दिन यानी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस था और हम तीन महिलाओं ने ही यूरोपीय प्राधिकरण में यह लड़ाई लड़ी थी." वंदना शिवा ने कहा कि इस महत्वपूर्ण फ़ैसले के बाद, परंपरागत ज्ञान पर आधारित प्राकृतिक संसाधनों और अन्य वस्तुओं का पेटेंट प्रदान करते समय यूरोपीय पेटेंट कार्यालय पूरी सावधानी बरतेगा. डॉ शिवा ने कहा, " मेरा तो यही मानना है कि आख़िर में जीत नैतिकता की होगी, जनता की होगी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हार होगी. जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान की चोरी अब आसानी से नहीं की जा सकेगी." सवाल क़ायम लेकिन ग़ैर सरकारी संस्था जीन कैंपेन की संयोजक और भारत की राष्ट्रीय जैव विविधता बोर्ड की सदस्य डॉ. सुमन सहाय का कहना है कि पेटेंट से जुड़े ऐसे कई बुनियादी सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने के लिए अदालत का यह फ़ैसला क़ाफी नहीं होगा. सुमन सहाय ने कहा, "यह तो अच्छी बात है कि वर्ष 2000 के यूरोपीय पेटेंट कार्यालय के फ़ैसले के विरूद्ध जो अपील हुई थी, उसको भी रद्द करा दिया गया है, लेकिन बुनियादी मसला ये है कि कहाँ तक, आप किन-किन देशों में, कितने-कितने अपील के पीछे दौड़ते फिरेंगे और कहाँ-कहाँ चुनौती देंगे?" उन्होंने बताया कि बुनियादी मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक समझौता है जिसके अनुसार किसी भी देश में इस तरह के नाजायज़ पेटेंट प्रदान करना संभव नहीं हो और इस दिशा में क़दम उठाए जा चुके हैं. विश्व व्यापार संगठन के दोहा घोषणापत्र के लंबित मसौदे में इस तरह के समझौते की पहल की चर्चा थी और भारत ने इसके लिए अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर पेटेंट के आवेदनपत्र में ही इस बात को स्पष्ट करने की माँग की थी कि जिस वस्तु के पेटेंट के लिए आवेदन किया जा रहा है उसका किसी देश के परंपरागत ज्ञान भंडार से संबंध है या नहीं. ऐसी स्थिति में आवेदन के समय ही पेटेंट प्रदान नहीं करने का फ़ैसला आसानी से लिया जा सकेगा. अगर ऐसा नहीं किया जाता तो फिर पेटेंट से जुड़े मामलों पर अदालतों की शरण लेना आसान नहीं होगा. 'ठोस क़दम' जहाँ तक नीम के पेटेंट का प्रश्न है, तो अमरीका की ही दो कंपनियों ने नीम पर आधारित कीटनाशक और निम्बोली से फफूँदनाशक तैयार करने की विधि का पेटेंट प्राप्त कर लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि स्थितियों से बचने से लिए एक अंतरराष्ट्रीय समझौता अनिवार्य है. इसके अलावा भारत में भी ऐसे पेटेंट कानून बनाने की ज़रूरत है जिनके तहत अमरीका नहीं बल्कि भारत में ही यह तय किया जा सके कि नीम जैसी वस्तुओं पर पेटेंट प्रदान किया जा सकता है या नहीं. सुमन सहाय का कहना है, "हमें अपने राष्ट्रहित और आम जनता के हित में क़ानून बनाने होंगे नहीं तो छोटा आदमी, आम आदमी, ग़रीब किसान मारा जाएगा, राष्ट्रहित तो मारा जाएगा ही. यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि हमारे देश के क़ानूनों के तहत इस तरह के पेटेंट प्रदान नहीं किए जा सकें." कुल मिलाकर स्थिति बहुत गंभीर है. जैवविविधता और परंपरागत ज्ञान की धरोहर को अगर सुरक्षित रखना है तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर ठोस क़दम उठाने होंगे और नए क़ानून बनाने होंगे जिन्हें अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत लागू करा पाना संभव हो. |
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