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पेटेंट विधेयक पारित, एनडीए का वॉकआउट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोक सभा में चली लंबी बहस के बाद पेटेंट विधेयक पारित हो गया है. मगर राष्ट्रीय जनताँत्रिक गठबंधन ने इसके पारित होते समय सदन से बहिष्कार किया. हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए ने ही वर्ष 2003 में असल पेटेंट बिल को संसद में रखा था. और तब इस विधेयक का विरोध करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अब इस विधेयक का समर्थन किया. लोक सभा में पेटेंट विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि बदलते विश्व में यह विधेयक आवश्यक हो गया था. भारत ने 1994 में विश्व व्यापार संगठन से पेटेंट संबंधी क़ानून बनाने का प्रस्ताव किया था. खींचतान पेटेंट विधेयक पर दो सप्ताह से अधिक चली खींचतान के बाद सीपीएम ने इस विधेयक का समर्थन कर दिया. जिसके इसके साथ ही पेटेंट विधेयक के पारित होने का रास्ता साफ़ हो गया था. कमलनाथ ने कहा कि विधेयक से चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है और इससे भारतीय कंपनियों को फ़ायदा होगा. उनका कहना था कि उन्होंने कुछ ऐसे समाचार देखें हैं जिनमें इस विधेयक के पारित होने पर अमरीकी कंपनियों ने चिंता जताई है क्योंकि अब उन्हें भारतीय कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी. सीपीएम ने विधेयक का समर्थन देने की घोषणा करते हुए कहा कि उसकी 12 आपत्तियों में से सरकार ने 10 मान ली हैं. इसमें दवा उद्योग के लिए लाइसेंस को ज़रूरी बनाने और पेटेंट देने से पहले उसे चुनौती जैसे प्रावधान शामिल हैं. सरकार वामपंथियों के दो आपत्तियों पर विधेयक पारित होने के बाद विचार करेगी. समर्थन सीपीएम के नेता नीलोत्पल बसु और रूपचंद पाल ने कहा कि पेटेंट विधेयक से विकासशील देशों को फ़ायदा होगा. दूसरी ओर राष्ट्रीय जनताँत्रिक गठबंधन ने इस विधेयक का विरोध किया. काँग्रेस ने भाजपा के इस फ़ैसले की आलोचना की है. उसका कहना था कि भाजपा ने हमेशा सहयोग के बजाए टकराव की राजनीति की है. काँग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा का कहना था कि इस विधेयक को एनडीए ने पेश किया था और इसमें काफ़ी सुधार कर दिए गए हैं. उनका कहना था कि भाजपा से समर्थन की अपील की गई थी लेकिन उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. एनडीए इस विधेयक को स्थाई समिति को भेजे जाने की माँग कर रहा था. इस संबंध में काँग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी और एनडीए नेताओं की बातचीत हुई थी लेकिन उसका कोई नतीज़ा नहीं निकला. सरकार इस विधेयक को स्थाई समिति के पास भेजने पर सहमत नहीं थी. |
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