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रैनबैक्सी की 'एड्स दवा' अमरीका पहुँची | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की शीर्ष दवा निर्माता कंपनी, रेनबैक्सी ने एड्स से लड़ने वाली एंटी-रेट्रोवाइरल दवाएँ तैयार की हैं और इन दवाओं को स्वीकृति के लिए के अमरीकी प्रशासन के पास भेजा है. अमरीका में फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़डीए) बाज़ार में आने से पहले दवाओं को स्वीकृति देता है. कंपनी ने इसके लिए कुल तीन एंटी-रेट्रोवाइरल दवाओं को स्वीकृति देने का प्रस्ताव अमरीका के सामने रखा है. कंपनी को आशा है कि स्वीकृति मिलने के बाद इन दवाओं को अमरीका के एड्स राहत कार्यक्रमों में शामिल किया जा सकता है. एंटीरेट्रोवायरल दवाएँ एड्स का इलाज तो नहीं करती लेकिन वे एचआईवी को बढ़ने से रोकती हैं. कंपनी के सूत्रों के मुताबिक इस स्वीकृति के बाद कंपनी की इन दवाओं का कैरेबियन और अफ़्रीकी देशों में चल रहे एड्स राहत कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जा सकेगा. अमरीका की अंतरराष्ट्रीय विकास संस्था (यूएसएड्स) के मुताबिक इन देशों में दुनिया के लगभग आधे एड्स रोगी हैं. मानकीकरण की ज़रूरत वर्ष 2004 में रेनबैक्सी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में शामिल अपनी सभी एंटी-रेट्रोवाइरल दवाओं के नाम वापस ले लिए थे. रैनबैक्सी के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट में कई ख़ामिया गिनाने के बाद एहतियात के तौर पर इन्हें वापस लिया गया था. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रेनबैक्सी, रीवल्स हेटेरो और सिप्ला जैसी भारत की कई नामी दवा कंपनियों की दवाओं को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मानने से इंकार कर दिया था. रेनबैक्सी के प्रवक्ता ने बताया, "हम अब अपनी दवाओं के स्तर का खुद ही अध्ययन कर रहे हैं और संभावना है कि हम इस साल मार्च महीने के अंत तक विश्व स्वास्थ्य संगठन में नए सिरे से आवेदन करें." रैनबैक्सी भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी है और इनकी दवाएँ सौ से अधिक देशों में बिकती हैं. इस कंपनी ने सात देशों में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर रखी हैं. |
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