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बिहार में अभिशप्त कृषि और किसान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसे विडम्बना ही कहेंगे कि भारत के जिस बिहार राज्य में भूमि-सुधार क़ानून सबसे पहले बना, उसे आज भी देश का आर्थिक रूप से सर्वाधिक पिछड़ा राज्य माना जाता है. यहाँ भूमि-विवादों से उपजे ख़ूनी संघर्षों में कृषि और किसान दोनों की दुर्गति हो रही है. उद्योग-धंधों से लगभग विहीन हो चुके बिहार में खेती-बाड़ी को एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ़ सूख़े ने राहु और केतु की तरह ग्रसित कर रखा है. लेकिन इस सालाना मौसम के कहर से भी ज़्यादा गहरी दिखाई दे रही हैं यहाँ भूमि-समस्याओं की जड़ें. ज़मीन नहीं बँटी भू-हदबंदी(लैण्ड सीलिंग) से अधिक ज़मीन रखने वाले भू-पतियों से अतिरिक्त ज़मीन लेकर उसे भूमिहीनों के बीच बाँटने वाला जो क़ानून यहाँ सन् 1961 में बना, चार दशक बाद भी उस पर कारगर अमल का इन्तजार ही है. इस संबंध में बिहार विधानसभा की लोकलेखा समिति के सभापति रामदेव वर्मा ने बीबीसी से कहा, ‘‘आश्चर्य है कि राज्य की तमाम ‘ग़ैरमजरूआ ख़ास’ ज़मीनों का पता लगाकर उन्हें ग़रीबों के बीच बाँटने का जो आदेश राज्य सरकार ने सन् 1954 में दिया था, आज पचास साल बाद भी उस पर अमल नहीं हो सका है.’'
विगत पन्द्रह वर्षों की ऑडिट बताती है कि विभागीय निष्क्रियता के कारण लगान या भू-राजस्व मद में बिहार को ढाई हजार करोड़ रूपए की हानि हो चुकी है. उधर भू-हदबंदी से प्राप्त 80 हजार एकड़ ज़मीन ग़रीबों में नहीं बँट सकी क्योंकि इससे जुड़े मामले पिछले चौदह सालों से विभिन्न अदालतों में लंबित हैं. बिहार में भूमि दखल आन्दोलन चला रहे एक वामपंथी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के राज्य सचिव रामजतन शर्मा मानते हैं कि राज्य में भूमि-सुधार संबंधी सरकारी विफलता ही कृषि बदहाली का मूल कारण है. वे कहते हैं, ‘‘यहाँ ज़्यादातर ज़मीनों पर उन बड़े भू-सामंतों का क़ब्ज़ा है, जो ख़ुद खेती नहीं करते. दूसरी तरफ़ खेती कर सकने वाले मेहनतकश खेत मज़दूर या छोटे किसान साधनविहीन होकर बेरोज़गार बैठे हैं. ऐसे में कृषि-उत्पादन ही अवरूद्ध-सा हो चला है और राजनीति में भी जो उथल-पुथल दिखती है, वह कृषि-संकट की ही देन है.’’ मार किसानों पर बाढ़ की विनाशलीला हो या सूखे का संकट, भूमि-संघर्ष हो या जाति-संघर्ष, जल प्रबंधन की विफलता हो या अवैध भूमि-कब्ज़ा-हर हाल में मार पड़ती है किसानों पर और माला-माल होती जा रहे हैं राजनीतिज्ञ. अब तो ‘ज़मीन किस की, जो जोते उसकी’ जैसा नारा लगा रहे लाल झंडे वालों की ताक़त भी यहाँ क्षीण पड़ती हुई दिख रही है. बँटाएदारों को हक़ दिलाने के लिए बने क़ानून को भी ठेंगा दिखाया जा चुका है. वर्ग संघर्ष को बिहार में हाशिए पर पहुँचा देने वाले जाति-संघर्ष को ताक़त कहाँ से मिल रही है? इस सवाल का जवाब बड़ी तल्खी के साथ दिया मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक रामदेव वर्मा ने, ‘‘जातिवाद और आरक्षण वाली राजनीति को हथियार बनाकर दलितों या ग़रीबों को छला जा रहा है. समाज के कमज़ोर वर्गों की रोज़ी-रोटी संबंधी माँग वाले रोषपूर्ण एकता-बल को तोड़ने वालों ने भूमि-सुधार को दफ़नाकर वोट, नोट और जाति-सम्प्रदाय वाली राजनीति को चमकाया है.’’ तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके डॉ. जगन्नाथ मिश्र इस राज्य में भूमि-समस्या के उस पहलू को नक्सलवाद या उग्रवाद के लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार मानते हैं, जो न्यूनतम मज़दूरी और बँटाएदारी क़ानून से जुड़ा हुआ है. डॉ. मिश्र ने कहा, ‘‘मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि विगत चौदह वर्षों के लालू-राबड़ी शासन काल में मुख्यमंत्री स्तर पर ऐसी एक भी बैठक नहीं हुई होगी, जिसमें भूमि-सुधार कानून के कार्यान्वयन संबंधी मसले पर कोई समीक्षा या चर्चा हुई हो.’’ पलायन की मजबूरी बेरोज़गार खेत मजदूरों का राज्य से लगातार पलायन बिहार की बदहाल कृषि का सबसे मार्मिक सबूत बन चुका है.
आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक दो दशक पहले इस राज्य से प्रतिवर्ष लगभग पाँच लाख कृषि मजदूर रोज़ी-रोटी के लिए अन्य राज्यों में जाते थे लेकिन विगत पन्द्रह वर्षों के दौरान साल भर में बीस लाख से भी ज़्यादा खेत मजदूरों के पलायन की सूचना है. ज़ाहिर है कि भूमि-सुधार का भ्रमजाल उन्हे रोक नहीं पा रहा है. बिहार के राजस्व एवं भूमि-सुधार विभाग के मंत्री रमई राम बड़े निरीह भाव से यह कबूल करते हैं कि यहाँ भूमि-सुधार क़ानून को लागू करा पाना उनकी सरकार के बस की बात नहीं रही. बाहुबल और जातिबल वाले ज़मीन-हड़पो-जमात के ख़िलाफ़ कारगर कार्रवाई मौजूदा दीवानी मुकदमों के ज़रिये बिल्कुल नहीं हो सकती, ऐसा रमई राम मानते हैं. उन्होंने कहा भी- "ज़मीन-चोरों के विरूद्ध फ़ौजदारी मुक़दमा करके और फिर से राज्य की तमाम वैध-अवैध कब्ज़े वाली ज़मीनों की पहचान कराके ही इस समस्या का हल ढूंढ़ा जा सकता है. लेकिन मैं ये भी स्वीकार करता हूँ कि मेरी इस सलाह को मेरा विभाग भी गंभीरता से नहीं ले रहा." मंत्री की इस साफ़गोई से ज़ाहिर है कि बिहार में कृषि और किसान- दोनों कितने अभिशप्त हैं. |
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