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'दूसरी हरित क्रांति होनी चाहिए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय उद्योग एवं वाणिज्य महासंघ (फ़िक्की) के महासचिव अमित मित्रा का कहना है कि भारत में अब दूसरी हरित क्रांति होनी चाहिए और चुनावों के बाद नई सरकार को इसे प्राथमिकता देनी चाहिए. उनका कहना है कि किसानों के हितों को ध्यान में रखने के साथ-साथ कृषि संबंधित उद्योग को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि लाखों लोगों को रोज़गार मिल सके. अर्थशास्त्री और पूर्व मंत्री योगेंद्र कुमार अलघ का मानना है कि कृषि क्षेत्र में विविधता लाने में पिछले चार-पाँच साल में काफ़ी मुश्किलें आई हैं और इस क्षेत्र में सुधारों पर ध्यान देना चाहिए. फ़िक्की के अमित मित्रा और अर्थशास्त्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री योगेंद्र अलघ ने ये विचार बीबीसी हिंदी सेवा के कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब में व्यक्त किए. चर्चा का विषय था - 'भारत के आर्थिक विकास से आम आदमी का क्या फ़ायदा हो रहा है?' फ़िक्की महासचिव अमित मित्रा ने कहा,"ये मानना पड़ेगा कि दूसरी हरित क्रांति हुई ही नहीं और कृषि क्षेत्र में जो महत्वपूर्ण सुधार होने चाहिए थे, वे नहीं किए जा सके." उनका कहना था कि आर्थिक सुधारों के समय की सरकारें शायद लाइसेंस-पर्मिट राज और वित्तीय घाटे की समस्याओं से ही जूझती रहीं. अमित मित्रा का मानना था कि आर्थिक सुधारों के कारण ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को कोई ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ. उनका कहना था, "काँग्रेस की सरकार ने 1991 में बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधार शुरु किए और बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने इन नीतियों को जारी रखा." योगेंद्र अलघ का कहना था, "1980 के दशक में ग़रीबी रेखा से नीचे बसने वालों की संख्या काफ़ी घटी लेकिन 1990 के दशक में उतना असर नहीं दिखा." उनका कहना था कि यदि कृषि क्षेत्र में रोज़गार बढ़ सकते हैं और उत्तर प्रदेश व बीहार जैसे राज्यों में छोटे उद्योगों के ज़रिए विकास होता है. अमित मित्रा का कहना था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बीहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में विकास नहीं हुआ है. उनका कहना था कि इन क्षेत्रों के औद्योगिकरण से विकास हो सकता है लेकिन बिजली की कमी ऐसा करने में बड़ी बाधा है. |
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