आप और कांग्रेस के लिए हरियाणा में गठबंधन कितना आसान, साथ आए तो चुनाव पर क्या होगा असर?

मल्लिकार्जुन खड़गे और केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी गठबंधन के लिए बातचीत कर रही है.

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने कथित तौर पर इस गठबंधन के लिए सहमति दे दी है, लेकिन इस रास्ते में कई मुश्किलें भी हैं. दोनों ही दल विपक्ष के 'इंडिया गठबंधन' का हिस्सा भी हैं.

हरियाणा की 90 सीटों वाली विधानसभा के लिए ठीक एक महीने बाद वोटिंग होने जा रही है. विधानसभा में कम सीटें होने की वजह से राज्य की हर सीट पर जीत काफ़ी अहम है.

इन चुनावों में बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत अन्य छोटे दल भी चुनाव मैदान में हैं.

चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर क़ब्ज़ा करने के लिए राज्य में सियासी दल अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं.

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राज्य में कांग्रेस और आप के गठबंधन पर कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ वोटों के बंटवारे के लिए उनकी आप समेत अन्य कुछ दलों से बातचीत हो रही है.

समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में प्रमोद तिवारी ने कहा है, "हमने लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को एक सीट दी थी. हमारी उनसे बात चल रही है और एक-दो दल हैं उनसे भी बातचीत चल रही है."

"हमें पूरी उम्मीद है कि हम हरियाणा में वोटों के बंटवारे को रोकेंगे और रिकॉर्ड वोट से जीतेंगे."

हरियाणा में इसी साल 5 अक्टूबर को वोटिंग होनी है, जबकि इसके नतीजे 8 अक्टूबर को घोषित होंगे.

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कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन पर हो रही बातचीत पर हरियाणा बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अनिल विज ने तंज कसा है कि "राज्य में कांग्रेस बहुत कमज़ोर है इसलिए अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं है."

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कांग्रेस-आप गठबंधन की मुश्किलें

माना जाता है कि हरियाणा के स्थानीय कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी से गठबंधन के बहुत ज़्यादा पक्ष में नहीं हैं. यह ठीक दिल्ली जैसे स्थिति है, जहाँ लोकसभा चुनावों के पहले कांग्रेस के कई स्थानीय नेता आप से गठबंधन नहीं चाहते थे.

इसमें एक व्यावहारिक समस्या और भी है कि लोकसभा चुनावों के बाद अगर किसी राज्य की विधानसभा चुनावों में दोनों दलों के बीच गठबंधन होता है तो अगले साल दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में क्या होगा?

दिल्ली में एक तरफ़ आम आदमी पार्टी विधानसभा में काफ़ी ताक़तवर है तो वहीं कांग्रेस के पास दिल्ली में एक भी विधायक नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, "हरियाणा में कांग्रेस को लड़ाई बहुत आसान भी नहीं दिखती है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस बराबरी पर रहे थे, इसलिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विधानसभा चुनाव में जीत को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं दिखता है."

हरियाणा विधानसभा चुनावों पर बैठक के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे

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इमेज कैप्शन, चुनावी आंकड़े बताते हैं कि आम आदमी पार्टी की वजह से कांग्रेस को बड़ा नुक़सान हुआ है
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लोकसभा चुनावों में हरियाणा में कांग्रेस को 43 फ़ीसदी वोट मिले थे जबकि बीजेपी ने 46 फ़ीसदी वोट हासिल किए थे. यानी दोनों प्रमुख दलों के बीच वोटों का अंतर काफ़ी कम रहा था.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य की 44 विधानसभा सीटों पर सबसे ज़्यादा वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस 42 विधानसभा में आगे रही थी. इस लिहाज़ से भी दोनों दलों के बीच अंतर काफ़ी छोटा रहा था.

प्रमोद जोशी मानते हैं कि हरियाणा में कई बार विधायक जीतने के बाद पार्टी छोड़ देते हैं और इसलिए भी कांग्रेस यहाँ थोड़ी बड़ी जीत चाहती है, ताकि भविष्य में सरकार के सामने कोई समस्या न हो.

हालाँकि माना जाता है कि हरियाणा में सीटों का बंटवारा भी दोनों दलों के बीच आड़े आ सकता है. ख़बरों के मुताबिक़ आप हरियाणा में 10 से ज़्यादा सीटों की मांग कर सकती है, लेकिन कांग्रेस 4 से ज़्यादा सीट छोड़ने को तैयार नहीं है.

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा है, "निश्चित रूप से बीजेपी को हराना हमारी प्राथमिकता है, इस पर अंतिम फ़ैसला हरियाणा से जुड़े नेता और पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल करेंगे."

इस मामले पर संजय सिंह ने सीटों के बंटवारे और अन्य मुद्दों के बारे में कुछ नहीं कहा.

बीएसपी और आईएनएलडी का गठबंधन

बीएसपी प्रमुख मायावती हरियाणा और पंजाब के बीएसपी यूनिट की बैठक में

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इमेज कैप्शन, बीएसपी का हरियाणा में अपना वोट बैंक माना जाता है

हरियाणा में साल 2019 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 40 सीटें मिली थीं और उसने 10 सीटें जीतने वाली दुष्यंत चौटाला की जन नायक जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी.

हालाँकि इसी साल मार्च महीने में मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद यह गठबंधन टूट गया.

राज्य के पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 31 सीटों पर ही जीत मिल पाई थी. लेकिन इस साल हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने राज्य की बराबर पांच-पांच सीटों पर जीत हासिल की है.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को दक्षिणी हरियाणा में सफलता ज़रूर मिली थी और उत्तर की तरफ़ भी वो करनाल और कुरुक्षेत्र की सीटें जीतने में सफल रही थी. लेकिन मध्य हरियाणा में बीजेपी को कोई सफलता नहीं मिली.

बीजेपी और कांग्रेस के बीच पिछले चुनावों में बराबरी की लड़ाई में कांग्रेस को अपने लिए एक उम्मीद दिख सकती है, और चुनावी समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए गठबंधन की ज़रूरत भी.

इस बीच हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए बीएसपी और इंडियन नेशलन लोकदल के बीच पहले ही समझौता हो चुका है.

विनेश फोगाट को लेकर अटकलें

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ भारतीय पहलवान विनेश फोगाट और बजरंग पुनिया

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इमेज कैप्शन, अटकलें लगाई जा रही हैं कि भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट कांग्रेस में शामिल हो सकती हैं

इसी साल हुए लोकसभा चुनावों की बात करें तो इन दोनों ही दलों (आईएनएलडी और बीएसपी) ने कुल क़रीब 3 फ़ीसदी वोट हासिल किए थे. हालांकि राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में अकेले बीएसपी को ही 4 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे.

इस तरह से छोटे दलों का गठबंधन भी हरियाणा के चुनाव परिणाम में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

इसलिए कांग्रेस को वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए गठबंधन की ज़्यादा ज़रूरत दिखती है.

हरियाणा चुनावों के ठीक पहले बुधवार को भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट और बजरंग पुनिया ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाक़ात की है. इनका ताल्लुक हरियाणा से ही है.

अटकलें लगाई जा रही हैं कि विनेश फोगाट कांग्रेस में शामिल हो सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस विनेश फोगाट की लोकप्रियता से बड़े चुनावी फ़ायदे की उम्मीद कर सकती है.

हालांकि कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने दावा किया है कि दोनों पहलवानों का राहुल गांधी से मिलने का हरियाणा में चुनाव लड़ने से कोई ताल्लुक नहीं है.

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लेकिन प्रमोद जोशी मानते हैं, "आप देखिएगा ये दोनों ही हरियाणा में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. इससे कांग्रेस को बड़ी ताक़त भी मिल सकती है क्योंकि विनेश फोगाट को ओलंपिक की वजह से काफ़ी सहानुभूति मिली है."

विनश फोगाट पिछले दिनों पेरिस ओलंपिक के फ़ाइनल में पहुंचने के बाद प्रतियोगिता के लिए अयोग्य क़रार दी गई थीं क्योंकि उनका वज़न तय सीमा से थोड़ा अधिक पाया गया था.

विनेश फोगाट फ़ाइनल मुक़ाबला जीत जातीं तो उन्हें गोल्ड मेडल मिलता और हारने पर भी सिल्वर उनके हाथ में था. लेकिन मुक़ाबले के दिन ही उन्हें सुबह के समय प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा था.

इससे देशभर में विनेश फोगाट को लेकर बड़ी सहानुभूति देखी गई थी.

इससे पहले पिछले साल भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में विनेश फोगाट एक चेहरा बनकर सामने आई थीं.

बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे. हालांकि, बृजभूषण इन आरोपों से इनकार करते हैं.

साल 2023 में पूरे साल बृजभूषण सिंह के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन चलता रहा. इस दौरान ऐसे दृश्य भी देखने को मिले जो खेल के इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए थे.

पहलवान बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट ने अपने सरकारी सम्मान 'खेल रत्न' और 'अर्जुन पुरस्कार' दिल्ली में फुटपाथ पर छोड़ दिए थे. दोनों पहलवानों ने पुलिस से इसे प्रधानमंत्री को सौंपने का अनुरोध किया था.

इसके अलावा दोनों ही पहलवान किसान आंदोलनों में भी जाते रहे हैं और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ खड़े चेहरों के तौर पर देखे जाते हैं.

कांग्रेस को आप से हो चुका है बड़ा नुक़सान

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और दिल्ली के सीएम केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, आम आदमी पार्टी से लड़कर कांग्रेस दो राज्यों में अपनी सरकार गंवा चुकी है

आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाकर उसे कई राज्यों में बड़ा नुक़सान पहुँचाया है.

साल 2022 में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस महज़ 28 फ़ीसद वोट और 17 सीटों पर सिमट गई थी. इसमें बड़ी भूमिका आम आदमी पार्टी की रही थी, जिसने क़रीब 13 फ़ीसद वोट के साथ 5 सीटें हासिल की थीं.

जबकि इससे पहले साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य में क़रीब 43 फ़ीसद वोट और 77 सीटें मिली थीं.

इससे पहले आम आदमी पार्टी कांग्रेस से दिल्ली और पंजाब की उसकी सरकार छीन चुकी है. इन दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनावों में बीजेपी ख़ुद कांग्रेस को पराजित नहीं कर पा रही थी.

ऐसे में जिस राज्य में बीजेपी ख़ुद एक ताक़त है वहाँ कांग्रेस के सामने आम आदमी पार्टी भी खड़ी हो तो उसके लिए मुक़ाबला करना, कम से कम चुनावी आंकड़ों के लिहाज़ से आसान नहीं दिखता है.

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