बीजेपी और दुष्यंत चौटाला क्या 'सेट गेम' के तहत अलग हुए हैं, क्या है पर्दे के पीछे की कहानी?

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- Author, स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लोकसभा चुनाव 2024 से पहले नए गठबंधन बन रहे हैं तो कई पुराने गठबंधन टूट भी रहे हैं.
ताज़ा मामला हरियाणा का है, जहाँ 2019 के विधानसभा चुनाव में जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) प्रमुख दुष्यंत चौटाला बीजेपी के लिए सत्ता की चाबी लेकर आए थे लेकिन अब दोनों के रास्ते अलग हो गए हैं.
हालांकि अब भी गठबंधन टूटने के बारे में दोनों ही पार्टी बहुत ज़्यादा बात करने से परहेज़ कर रहे हैं.
12 मार्च को हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर के साथ ही पूरे मंत्रिमंडल ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद नायब सैनी ने सीएम पद की शपथ ली.
राज्य में इस घटनाक्रम के बाद दुष्यंत चौटाला के अगले कदमों पर चर्चा हो रही है कि वो लोकसभा चुनाव 2024 के लिए क्या रणनीति अपनाएंगे.
राज्य में लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव भी है.

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बीजेपी और जेजेपी दोनों ही पार्टियों के नेता गठबंधन टूटने पर एक तरह की चुप्पी साधे हुए हैं.
इससे पहले राज्य से ऐसी ख़बरें आ रही थी कि लोकसभा चुनाव साथ लड़ने पर दोनों ही पार्टियों में सीट बँटवारे पर सहमति नहीं बनी थी.
अगर 2019 लोकसभा चुनाव की बात करें तो दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी ने आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा लेकिन ये गठबंधन एक भी सीट नहीं जीत सका था. यहाँ तक कि दुष्यंत चौटाला ख़ुद हिसार सीट से हार गए.
हरियाणा की सभी 10 सीटों पर लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जीत मिली थी.

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'बीजेपी-जेजेपी-मजबूरी में बना गठबंधन'
हरियाणा की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल बीजेपी-जेजेपी को मजबूरी में बना गठबंधन मानते हैं. वो कहते हैं कि ये गठबंधन टूटा नहीं है बल्कि दोनों सोच समझकर इस गठबंधन से बाहर निकले हैं.
2019 विधानसभा चुनाव में बीजेपी और जेजेपी के बीच हुए गठबंधन का हवाला देते हुए वो कहते हैं, "दोनों की ही मजबूरी थी कि वो सरकार बनाएं लेकिन दोनों के वोट बैंक एक-दूसरे से अलग हैं. जेजेपी एक जाट पार्टी है और बीजेपी हरियाणा में ग़ैर जाट पार्टी है. बीजेपी ने 2014 में ग़ैर जाट मुख्यमंत्री बनाया.''
''इसका स्पष्ट मतलब था कि बीजेपी क़रीब 10 साल के भूपेंद्र हुड्डा के शासन, 6 साल ओमप्रकाश चौटाला और दो साल बंसीलाल के यानी 18 साल के जाट मुख्यमंत्री होने के ख़िलाफ़ बीजेपी ने ग़ैर जाट मुख्यमंत्री दिया."
वहीं, इस पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री का कहना है, "पिछले दो दिनों से हरियाणा में जो कुछ हो रहा है, वो सुनियोजित है और उसकी पटकथा पहले से तय है. राज्य में क़रीब 24.5 फ़ीसदी जाट हैं और 75.5 फ़ीसदी गैर जाट हैं. बीजेपी की चिंता ये रहती है कि अगर जाटों का वोट किसी एक पार्टी को मिल गया तो उन्हें नुकसान होगा.''
''हरियाणा में जाट वोट के तीन दावेदार हैं, सबसे पहले तो कांग्रेस, इसके बाद दुष्यंत चौटाला की पार्टी और नंबर तीन पर अभय सिंह चौटाला हैं. बीजेपी एक तरह से लोकसभा चुनाव में दुष्यंत का इस्तेमाल कर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाना चाहती है."
वो कहते हैं, ''दुष्यंत चौटाला इस बात को समझते हैं कि उनका वोट बैंक और बीजेपी का वोट बैंक न सिर्फ़ अलग है बल्कि 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों ने अपना मत दिया था और वर्तमान स्थितियां उनके पक्ष में नहीं हैं.''

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किसान आंदोलन और पहलवानों का प्रदर्शन
राज्य में पिछले कुछ वर्षों में किसानों का मुद्दा छाया रहा है. चौटाला के कोर मतदाता में किसान भी शामिल हैं.
2020-21 में तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान दुष्यंत चौटाला को भी किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा. यहाँ तक कि पार्टी के भीतर भी बीजेपी के साथ गठबंधन के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगीं.
चौटाला उस दौरान ये कहते रहे थे कि कृषि विधेयकों में संशोधन की ज़रूरत है लेकिन उनका कहना था कि किसान आंदोलन में कुछ ऐसे नेता हैं जो बातचीत सफल होने देना नहीं चाहते हैं.
वहीं, भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर उन पर भी ज़ुबानी हमले हो रहे थे.
आठ महीने पहले टाइम्स नाऊ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "आज हरियाणा सभी प्रदर्शनों का केंद्र हो गया है. पहलवानों की एफ़आईआर दिल्ली में दर्ज होती है, दिल्ली पुलिस जांच कर रही है और उसका मुवमेंट हरियाणा में शुरू किया जा रहा है. कृषि बिल दिल्ली ने तैयार किया और आंदोलन हरियाणा के बॉर्डर पर हुआ. पहलवानों के मामले में अगर जांच में कोई दोषी साबित होता है तो उसको सज़ा हो. ये तो क़ानून भी कहता है कि जब तक कोई दोषी साबित न हो जाए वो तब तक निर्दोष होता है."
इस पर पत्रकार आदेश रावल कहते हैं कि दुष्यंत चौटाला को भी ये बात समझ में आ रही थी कि किसानों और पहलवानों का मुद्दा ऐसा है, जिससे उनके कोर वोटर नाराज़ हो रहे हैं.
रावल कहते हैं, "बृजभूषण शरण सिंह ने आरोप लगाया कि कुछ चुनिंदा जाट परिवार हैं और कुछ चुनिंदा जाट नेता हैं, बीजेपी ने यहाँ भी जाट बनाम ग़ैर जाट का कार्ड खेला. वो ये कहते रहे कि जाटों के अलावा बाकी पहलवान कुछ नहीं बोलते हैं. इसी तरह की चीज़ें किसान आंदोलन में भी हुई. बीजेपी की हमेशा कोशिश होती है कि कैसे मुद्दों को हम अपने एजेंडे में बदलकर रखें."
जेजेपी के भीतर की सुगबुगाहट
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जेजेपी के सामने चुनौतियां सिर्फ़ बीजेपी से अलग होने की नहीं है. पार्टी के भीतर जो बगावती सुर उभर रहे हैं, वो भी दुष्यंत चौटाला के लिए चुनाव से पहले बड़ी दिक्कत है.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुष्यंत चौटाला की मौज़ूदगी में दिल्ली में हुई बैठक में पार्टी के 10 में से 6 विधायक अनुपस्थित रहे, जो कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं होने की ओर इशारा करते हैं.
इस बीच, हरियाणा में नायब सिंह सैनी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने 13 मार्च को विधानसभा में ध्वनिमत से विश्वास मत जीत लिया है.
जेजेपी ने अपने 10 विधायकों को व्हिप जारी कर विश्वासमत की प्रक्रिया से अलग रहने के लिए कहा था लेकिन फिर भी पांच विधायक सदन पहुंचे थे. हालांकि, जेजेपी के अनुसार, उन्होंने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.
जेजेपी के प्रदेश कार्यालय प्रभारी रणधीर सिंह बताते हैं, "आज अजय सिंह चौटाला के जन्मदिन के अवसर पर हमारी हिसार में रैली हुई. हमारा सारा सिस्टम वहां लगा हुआ था. आधे विधायक रैली में शामिल हुए. दुष्यंत सिंह चौटाला, नैना सिंह चौटाला, अनूप धानक, रामकरन काला, अमरजीत ढांडा रैली में थे. जबकि पांच विधायक देवेंद्र बबली, राम कुमार गौतम, ईश्वर सिंह, राम निवास और जोगी राम सिहाग सदन में गए लेकिन वोटिंग में शामिल नहीं हुए."
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इस पर कहते हैं, "जेजेपी अब भी बीजेपी को लाभ पहुंचाने की ही कोशिश में है. अगर गठबंधन टूट गया है, सरकार से बाहर हो गए हैं, ऐसे में विपक्ष तो विश्वासमत के ख़िलाफ़ वोट करता है. व्हिप जारी किया कि वोटिंग में शामिल नहीं होना है, इसका मतलब तो आप मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. आप जब अनुपस्थित रहेंगे तो 90 सीटों वाला सदन 80 का रह जाएगा."
90 सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा में बीजेपी के पास 41 विधायक हैं और उसे सात में से छह निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन मिला हुआ है. इसके अलावा हरियाणा लोकहित पार्टी के विधायक गोपाल कांडा भी बीजेपी के पक्ष में हैं.
जेजेपी के सदन में 10 विधायक हैं. मुख्य विपक्षी कांग्रेस पार्टी के 30 विधायक और इंडियन नेशनल लोक दल का एक विधायक है.

दुष्यंत चौटाला का सफर
जेजेपी 2018 में बनी थी जब अजय चौटाला अपने पिता और इंडियन नेशनल लोकदल के सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला से अलग होने का फ़ैसला किया था. जेजेपी ने 2019 का विधानसभा चुनाव अलग लड़ा.
2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में आईएनएलडी एक सीट ही जीत पाई थी जबकि जेजेपी 10 सीट जीतकर किंगमेकर बन गई थी.
इसका श्रेय दुष्यंत चौटाला को ही दिया जाता था कि सिर्फ़ 10 सीटें जीतकर भी वो ख़ुद को इतना साबित कर पाए कि बीजेपी ने उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद दे दिया.
दुष्यंत पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के पोते और अजय सिंह चौटाला के बेटे हैं. 2019 विधानसभा चुनाव से पहले वो बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर हमलावर थे.
2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बीजेपी पर ज़ुबानी हमला बोलते हुए कहा था, "इस देश में एक चीज चल पड़ी है कि मोदी के नाम पर वोट है. अगर मोदी के नाम पर वोट है तो बीजेपी बताए पिछले पांच साल में मोदी हिसार में कितना आए. उन्होंने हिसार के लिए कितना काम किया."
दुष्यंत चौटाला ने संसद टीवी से बातचीत में कहा था कि वो कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे. चौटाला का जन्म तीन अप्रैल 1988 को हिसार में हुआ. उनकी स्कूलिंग हिमाचल प्रदेश के लॉरेंस स्कूल से हुई है.
उनके पास कैलिफ़ोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन एंड मैनेजमेंट में बैचलर की डिग्री है.
संसद टीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैंने अपनी पढ़ाई विदेश में की. मैं एक बिज़नेस मैनेजमेंट स्टूडेंट था. इसके बाद मेरा मन नहीं था कि मैं राजनीति में आऊं. मैं सोच रहा था कि मैं अपना कोई काम करूं. या अच्छी तरह सेटल होऊंगा. लेकिन फिर मैं राजनीति में आ गया और लोगों के बीच में हूं."
2014 में इंडियन नेशनल लोक दल के टिकट पर चुनाव जीतकर वो लोकसभा पहुंचने वाले सबसे कम उम्र (26 साल) के सांसद थे. उन्होंने हिसार से पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को हराया था.
हालांकि ये सीट वो 2019 के चुनाव में हार गए.
हेमंत अत्री कहते हैं, "आनेवाला चुनाव उनके लिए सर्वाइवल का चुनाव होने जा रहा है. उनके पक्ष में ये बात है कि वो युवा हैं और उनमें संगठन की क्षमता है. वो जनता के बीच में जाएंगे लेकिन अपने कोर वोटर का विश्वास जीत पाना मुश्किल है. यहां से रास्ता उनके लिए कठिन होता जा रहा है."
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