नाइजीरिया: 'सांप की तरह रेंगकर' डकैतों के चंगुल से भागे एक बच्चे की कहानी

- Author, क्रिस इवोकोर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, कुरीगा
17 साल के मूसा गरबा को डकैतों ने अगवा कर लिया था. उन्हें उत्तरी नाइजीरिया की जंगली झाड़ियों के बीच रखा गया था, जहां से भागकर उन्होंने अपनी जान बचाई.
अपनी जान बचाने के लिए उन्हें ज़मीन पर एक सांप की तरह रेंगकर चलना पड़ा, ताकि अगवा करने वालों को उनका सुराग न मिल सके.
इससे पहले किशोर मूसा गरबा (पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) और उनके साथ अगवा किए गए दूसरे बच्चों को डकैत जबरन पैदल चलाकर ले जा रहे थे. जब उन्हें रास्ते में थोड़ा आराम करने का मौक़ा दिया गया तो उस वक़्त अपनी स्कूल ड्रेस को आड़ बनाकर, किशोर मूसा कटी हुई घास के ढेर में छुप गए थे.
बीते सप्ताह गुरुवार को नाइजीरिया के कदुना सूबे के कुरीगा क़स्बे से 280 से ज़्यादा स्कूली बच्चों को अगवा कर लिया गया था. इस वजह से बच्चों के माता-पिता बेहद सदमे में हैं.
गुरुवार सुबह की उस घटना को याद करते हुए मूसा ने बीबीसी को बताया, "हमने सड़क पर मोटरसाइकिलें चलती देखीं, हमें लगा कि वो सैनिक थे. लेकिन बाद में उन्होंने स्कूल की इमारत पर क़ब्ज़ा कर लिया और गोलियां चलाने लगे."
मूसा और उनके साथ अगवा किए गए जिन बच्चों का ज़िक्र इस कहानी में है, उनकी सुरक्षा के लिए उनके नाम बदल दिए हैं.
डकैत क्यों करते हैं लोगों को अगवा?

मूसा ने बीबीसी को बताया, "हमने भागने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमारा पीछा किया और हमें पकड़ लिया. उन्होंने हमें उसी तरह झाड़ियों में इकट्ठा कर लिया जैसे गायों का झुंड जमा किया जाता है."
मोटरसाइकिलों पर सवार इन हथियारबंद लोगों को स्थानीय लोग डकैत कहकर बुलाते हैं. काफ़ी समय से यहां के स्थायीन समुदायों पर उनका ख़ौफ़ जारी है. यहां तक कि सुरक्षाकर्मी भी उनके ख़तरे से पूरी तरह निपटने में क़ामयाब नहीं हो सके हैं.
कुरीगा में बहुत दिनों से ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो लोगों को अगवा कर उनकी रिहाई के बदले में पैसे वसूलते हैं.
मगर इस बार जितनी बड़ी तादाद में लोगों का अपहरण किया गया है और उसमें सात साल की उम्र तक के बच्चों के शामिल होने की वजह से बहुत से लोग इसे लेकर अब नाराज़गी जता रहे हैं.
हथियारबंद डकैतों ने हाजिया हुआवा के बच्चे को भी अगवा किया है. आंखों में आंसू लिए उन्होंने कहा, "यही वो जगह है जहां से हमने उन्हें अपने बच्चों को ले जाते हुए देखा, हम कुछ नहीं कर सके, बेबस खड़े रह गए. हमारे पास सेना नहीं है, हमारे समुदाय में पुलिस नाम की चीज़ नहीं है."
बच्चों में डकैतों का डर

मूसा ने हमें बताया, "हम झाड़ियों के बीच से गुज़र रहे थे. एक जगह हम सभी को बहुत तेज़ प्यास लगी. लेकिन वहां पानी नहीं था. चलते-चलते कुछ लड़के और लड़कियां थकान से गिरते जा रहे थे."
वो कहते हैं कि "अगवा किए गए बच्चों में से कुछ को डकैतों को अपनी बाइक पर बिठाकर आगे ले जाना पड़ा था."
घनी झाड़ियों से गुज़रते हुए एक जगह पर बच्चों को एक नदी मिली, उस वक्त उन्हें वहां पानी पीने का मौक़ा मिला.
इससे बच्चों को बड़ी राहत मिली क्योंकि उन्होंने सवेरे से नाश्ता तक नहीं किया था. भयंकर गर्मी और तपते सूरज के बीच बच्चों को घंटों तक पैदल चलने को मजबूर किया गया था.
पैदल चलते हुए मूसा, लगातार डकैतों के शिकंजे से भाग निकलने का रास्ता देख रहे थे. उन्होंने दूसरे बच्चों को भी अपने साथ वहां सके भाग निकलने के लिए कहा, लेकिन, वो बहुत डरे हुए थे.
मूसा को भाग निकलने का मौक़ा उस वक़्त नज़र आया, जब सूरज ढलने लगा था. मूसा ने अपने चारों तरफ़ नज़र घुमाकर देखा कि कहीं किसी की नज़र तो उस पर नहीं है. इसके बाद वो घास के एक ढेर में छुप गए और बिना हिले-डुले वहीं लेटे रहे.
मूसा ने बताया, "जब बाहर का माहौल एकदम शांत हो गया (ताकि छिपे होने की किसी को ख़बर न हो) तब मैं ज़मीन पर सांप की तरह रेंगकर आगे बढ़ने लगा."
जब चारों तक घुप्प अंधेरा हो गया, तब जाकर मूसा ने खड़े होकर चलना शुरू किया. वो तब तक पैदल चलते रहे, जब तक वो एक गांव नहीं पहुंच गए, जाकर उन्हें मदद मिली.
मूसा ने डकैतों के शिकंजे से निकल भागने के लिए बहुत बड़ा जोखिम उठाया था. इसमें अगर एक मामूली-सी भी ग़लती हो जाती, तो उनकी जान जा सकती थी. लेकिन, कुछ लोगों का कहना है कि ईश्वर ने मूसा की हिफ़ाज़त की.
अगले दिन जब मूसा अपने गांव कुरीगा पहुंचे, तो उनके माता-पिता ख़ुशी से उछल पड़े. लेकिन, मूसा अपने साथ अगवा किए गए बच्चों की दर्दनाक कहानी ले कर आए थे जिससे लोगों की ख़ुशी काफ़ूर हो गई. बच्चे अभी भी डकैतों की गिरफ़्त में थे.
परिवारों को है बच्चों का इंतजार

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दस बरस के सादिक़ उस्मान अब्दुल्लाही के माता-पिता अभी भी अपने बच्चे की ख़बर मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने हंसते खेलते बच्चे को उस वक़्त देखा था, जब गुरुवार की सुबह वो स्कूल जाते हुए अचानक घर लौटा था.
सादिक़ अपनी पेंसिल ले जाना भूल गया था और वही लेने आया था. पेंसिल लेकर जब वो दोबारा स्कूल गया, तो डकैतों ने क़स्बे पर धावा बोल दिया था.
सादिक़ के 21 साल के भाई हसन उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "वो रास्ते से घर लौटा था. उसने मुझसे आकर पूछा कि हसन, क्या तुम्हारे पास एक पेंसिल है. मैंने उससे कहा कि वो मेरे बैग में देख ले. सादिक़ हड़बड़ी में था, तो उसने मेरे बैग का सामान बिखेर दिया था. उसे पेंसिल मिल गई तो वो उसे लेकर भाग गया. मैंने उससे कहा भी कि मेरा बैग फिर से संभालकर रख दे. लेकिन उसने अपने मोज़े उठाए और भाग गया."
सादिक़ की मां रहमतु उस्मान अब्दुल्लाही कहती हैं कि जिस दिन से सादिक़ को अगवा किया गया, उस दिन से वो सो नहीं सकी हैं.
वो कहती हैं, "मैं हर वक़्त अपने बेटे के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे नींद नहीं आती. मुझे नींद आ भी कैसे सकती है. ईश्वर हमारी मदद करे."
डकैतों की विचारधारा क्या है?
मूसा और सादिक़ उन चार हज़ार लोगों में से दो मिसालें हैं, जिन्हें एक अनुमान के मुताबिक़ पिछले आठ महीनों के दौरान नाइजीरिया में अगवा किया जा चुका है.
पिछले 15 सालों में उत्तरी नाइजीरिया में लोग संगठित और हथियारबंद आतंकियों के हमलों का सामना कर रहे हैं.
शुरू में ऐसी घटनाएं उत्तरपूर्वी नाइजीरिया के बोर्नो, अदामावा और योबे सूबों में होती थीं, जहां बोको हराम (जिसका मतलब है पश्चिमी शिक्षा हराम है) नाम का इस्लामिक चरमपंथी संगठन सक्रिय है.
अब इस इलाक़े में एक और संगठन तेज़ी से उभरा है, जिसका ताल्लुक़ कथित चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट से है.
जिहादियों के ये दोनों संगठन, इलाक़े के लोगों को अगवा करने की घटनाओं में शामिल रहे हैं. इनके लड़ाके किसानों और यात्रियों को निशाना बनाकर हमले करते हैं, और कई बार इन्होंने गांव के गांव तबाह किए हैं.
ये जिहादी संगठन स्कूलों को पश्चिमी शिक्षा का गढ़ मानते हैं और इसीलिए उन्हें बार-बार निशाना बनाते हैं. दस साल पहले चिबोक में लड़कियों के स्कूल पर हुआ हमला इन संगठनों के हरकतों की एक मिसाल है.
कदुना सूबे के पूर्व सीनेटर शेहू सानी कहते हैं, "उत्तरी नाइजीरिया में स्कूलों पर आतंकी हमले बढ़ गए हैं. यहां प्राइमरी स्कूल, माध्यमिक स्कूल और यहां तक कि विश्वविद्यालयों पर भी आतंकी हमले हो रहे हैं."
शेहू सानी कहते हैं कि इन संगठनों का मक़सद है कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल न भेजें.
वो कहते हैं, "इसके साथ-साथ जब वो हमला करके बच्चों को अगवा करते हैं, तो उनका मक़सद अपने लिए पैसे जुटाना भी होता है. वो इससे और हथियार ख़रीद तक अपनी आपराधिक गतिविधियां जारी रख सकते हैं."
लेकिन, अब उत्तरी नाइजीरिया के दूसरे इलाक़ों में डकैत कहे जाने वाले अपराधी भी उनके तौर-तरीक़े अपना रहे हैं. वो अक्सर स्कूली बच्चों को अगवा करते हैं, जिससे सरकार का ध्यान उनकी तरफ़ जाता है. बाद में वो बच्चों की रिहाई के एवज़ में पैसे भी वसूलते हैं.
शेहू सानी कहते हैं, "उनका मक़सद पैसे कमाना होता है. वो बस लोगों को अगवा कर उन्हें बंधक बना लेते हैं और जब पैसे अदा कर दिए कर दिए जाते हैं, तो वो बंधकों को रिहा कर देते हैं. उनका कोई सियासी एजेंडा नहीं होता न ही उनका नेतृत्व किसी एक इंसान के हाथ में होता है."
सुरक्षा व्यवस्था का क्या है हाल?

सरकार ने इस चुनौती से निपटने की कोशिशों में काफ़ी निवेश किया है और वक़्त लगाया है. लेकिन, अभी भी देश में ऐसे कई समुदाय हैं, जो खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं.
कुरीगा उन्हीं में से एक है.
एक स्थानीय क़बीले के मुखिया जिब्रील ग्वादाबे कहते हैं कि इस इलाक़े में सुरक्षाबलों की तैनाती कम है, यही बड़ी वजह है कि इस इलाक़े में डकैतों की भरमार है.
64 बरस के जिब्रील कहते हैं, "मैं ख़ुद इसका शिकार रह चुका हूं. दो साल पहले एक दिन जब मैं अपने खेतों की तरफ़ जा रहा था, डकैतों ने मुझे रोक लिया था. मैं उनसे बहस करने लगा और उनमें से एक ने मेरे पेट में गोली मार दी. गोली मेरे शरीर को पार करके पीठ की तरफ़ से निकल गई. मैं कदुना में लगभग एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहा. शुक्र है कि मेरी जान बच गई."
कुरीगा में अधिकारियों ने लोगों को भरोसा दिया है कि वो बहुत जल्द सभी बच्चों को सुरक्षित वापस ले आएंगे. लेकिन, कुरीगा के लोग अभी भी फ़िक्रमंद हैं.
जिब्रील ग्वादाबे कहते हैं, "हमें अब तक अपने बच्चों की कोई ख़बर नहीं मिल सकी है. हमें नहीं पता कि वो किस हाल में हैं और कहां हैं."
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