ज़्यादा ग़रीब कहां- भारत और नाइजीरिया में टक्कर

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- Author, पाबलो ओचोआ
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
विश्व बैंक के अनुसार, एक पीढ़ी से भी कम में 110 करोड़ लोगों को 'ग़रीबी से निकाला गया है.'
इसमें कोई शक नहीं कि यह संपन्न होती दुनिया को लेकर एक अच्छी ख़बर है.
1990 से लेकर 2015 तक अंतरराष्ट्रीय ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 190 करोड़ से घटकर 73 करोड़ 50 लाख रह गई.
इसका मतलब है कि दुनिया की आबादी के जिस हिस्से को परिभाषा ((1.90 अमरीकी डॉलर या इससे कम प्रतिदिन में गुज़ारा करना) के अनुसार ग़रीब माना जाता था, वह इस दौरान 36 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत रह गया.
मगर ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई की कहानी आसान नहीं है और ग़रीबी रेखा का मानक तय करने वाले अर्थशास्त्रियों ने बीबीसी को बताया कि अभी विकास को लेकर जो नीतियां हैं, 'वे सही ढंग से बेहद ग़रीब लोगों तक नहीं पहुंच पा रहीं हैं या उनके काम नहीं आ रहीं.'
विश्व बैंक के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट रहे मार्टिन रवालियन कहते हैं, "बढ़ती असमानता हमारे लिए ग़रीबी मिटाने और व्यापक सामाजिक प्रगति की राह में चुनौतियां पैदा कर रही है."

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'दो अलग रफ़्तारें'
विश्व बैंक के अनुसार समग्र विकास के अभाव, आर्थिक सुस्ती और हाल ही में हुए संघर्षों ने कुछ देशों की प्रगति की रफ़्तार में बाधा पैदा की है.
चीन और भारत में जहां कुल एक अरब लोगों को अब ग़रीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, वहीं कुछ सब-सहारन अफ़्रीका में बेहद ग़रीबी में रह रहे लोगों की संख्या आज से 25 साल पहले के मुक़ाबले बढ़ गई है.
विश्व बैंक में पोवर्टी एंड इक्विटी ग्लोबल प्रैक्टिस की वैश्विक निदेशक कैरोलिना सांचेज़-पारामो कहती हैं, "पिछले क़रीब एक दशक में हम दुनिया में तरक्क़ी की दो अलग-अलग रफ़्तारें देख रहे हैं."
उन्होंने बीबीसी को बताया कि इसके लिए चार कारण ज़िम्मेदार हैं.
1. आर्थिक प्रगति की अलग-अलग रफ़्तार
कैरोलिना सांचेज़-पारामो कहती हैं, "एक दशक में बुनियादी स्तर पर सब सहारान अफ़्रीका और लातिन अमरीका में पूर्वी या दक्षिण एशिया की तुलना में ग्रोथ कम रही है. अगर आप कई देशों में बहुत तेज़ी से बढ़ती आबादी को मिला दें तो आपको प्रति व्यक्ति ग्रोथ और भी कम मिलेगी."
"जब देश ही प्रगति नहीं कर रहे, तब ग़रीबी हटाने की दिशा में आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है. यहां ग़रीबी पुनर्वितरण के माध्यम से हटाई जा सकती है जो कि बहुत मुश्किल है."
2. सबका विकास
ग़रीबी हटाने के लिए लगातार आर्थिक प्रगति करना एक 'ज़रूरी शर्त' बेशक है लेकिन कैरोलिना सांचेज़-पारामो कहती हैं यह 'एकमात्र शर्त' नहीं है.
कई देशों की ग्रोथ "पर्याप्त रूप से समावेशी" नहीं रही है क्योंकि वहां पर पूंजी पर ज़्यादा ज़ोर देने वाले उद्योग हैं जो कि अपेक्षाकृत कम नौकरियां पैदा करते हैं. उदाहरण के लिए सब-सहारन अफ़्रीका में ऐसी स्थिति है.
सांचेज़-पारामो कहती हैं, "ग़रीबों के लिए श्रम ही आय का मुख्य स्रोत है. तो अगर श्रमिकों को अवसर ही नहीं मिलेंगे तो ग़रीबी में कमी भी कम ही देखने को मिलेगी.

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3. आधारभूत सुविधाएं
अर्थव्यवस्था तब संपन्न होती है जब लोगों के पास न सिर्फ़ अच्छी आमदनी हो बल्कि उन्हें शिक्षा, फ़ाइनैंस और अच्छे आधारभूत ढांचे की सुविधा मिले.
कैरोलिना सांचेज़-पारामो कहती हैं, "इससे भी ग्रोथ मे सभी के शामिल होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं."
वह दक्षिण और पूर्व एशिया में मलेशिया का उदाहरण देते हुए कहती हैं, "यहां एक ही साथ कई चीज़ें हो रही हैं." अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से 2013 से ही मलेशिया में ग़रीबी शून्य है मगर देशक मानकों के हिसाब से नहीं.
ब्राज़ील में क़ामयाब कैश ट्रांसफ़र कार्यक्रम के कारण ग़रीबी को पहले घटाया गया मगर फिर यह बढ़ गई. 1990 में 21.6 प्रतिशत थी, 2014 में 2.8 प्रतिशत रह गई लेकिन 2017 में 4.8 फ़ीसदी हो गई.
4. संघर्ष
कुछ देशों ने पहले जो सफलता हासिल की थी, वह हाल के सालों में राजनीतिक और हिंसक संघर्षों से फिर ख़त्म हो गई.
कैरोलिना सांचेज़-पारामो के मुताबिक, 'इसी समय, उन देशों में ग़रीबी और बढ़ती जा रही है जो संघर्षों में उलझे हैं जबकि अन्य देश तरक्की कर रहे हैं.'
2015 में दुनिया के आधे ग़रीब पांच ही देशों में थे- भारत, नाइजीरिया, डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो, इथियोपिया और बांग्लादेश.
ताज़ा अनुमानों के अनुसार नाइजीरिया ने सबसे ज़्यादा ग़रीब नागरिकों के मामले में भारत को या तो पीछे छोड़ दिया है या फिर पीछे छोड़ने ही वाला है.
कई अफ़्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाएं ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ने की दिशा में अच्छा काम कर रही हैं, फिर भी 2030 तक $1.90 डॉलर या इससे कम में गुज़ारा करने वाले 10 में लगभग नौ लोग सब-सहारन अफ़्रीका के होंगे.
ग़रीबों की मदद
2030 तक ग़रीबी मिटाना संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य है मगर जुलाई में आई इसकी रिपोर्ट बताती है कि उस समय दुनिया की छह फ़ीसदी आबादी ग़रीब होगी.
ऐसे में वर्ल्ड बैंक का एक और लक्ष्य है कि इस संख्या को कम से कम 3 प्रतिशत से नीचे ले आएं. मगर चीज़ों को देखकर लगता है कि यह अनुमान भी शायद ही पूरा हो.
रवालियन कहते हैं कि अभी की विकास नीतियां उनके लिए तो कारगर हैं जो ग़रीब हैं मगर उतने नहीं. लेकिन वो मानते हैं कि जो बहुत ग़रीब हैं, उन तक नीतियां सही से पहुंच नहीं पा रहीं.
वो कहते हैं, "अगर आप थोड़ा पहले की बात करें तो आज के अमीर देश 200 साल पहले उतने ही ग़रीब थे, जितने ग़रीब आज अफ़्रीकी देश हैं. वे धीरे-धीरे मगर प्रभावी तरीक़े से ग़रीबों को आगे बढ़ाने में सफल रहे. आज की विकासशील दुनिया में इसका उल्टा हो रहा है. अमीर देशों ने सभी के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी नीतियों के माध्यम से यह काम किया."
रवालियन कहते हैं, "इसी मामले में आज की दुनिया पिछड़ रही है. यह ग़रीबों की संख्या तो तेज़ी से कम कर रही है मगर सबसे ग़रीब लोगों को आगे बढ़ाने में उतनी प्रभावी साबित नहीं हो रही."

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असमानता की चुनौती
रवालियन बताते हैं कि प्रतिदिन 1.90 डॉलर या इससे कम में गुज़ारा करने का मानक बेहद ग़रीब समाज में होने वाली प्रगति को मॉनिटर करने के लिए बनाया गया है.
मगर जैसे-जैसे कम आमदनी वाले देश अमीर होकर मध्यम आय वाले वर्ग में आ रहे हैं, बढ़ती असमानता सबसे ग़रीब लोगों को उभरने में मुश्किलें पैदा कर देती है.
वो कहते हैं, "हम 1.90 डॉलर प्रतिदिन या इससे कम खर्च वाले वैश्विक मानक के आधार पर ग़रीबों की संख्या घटती हुई देख रहे हैं मगर अपने देश के मानक के आधार पर वे ग़रीब ही रहते हैं."
सांचेज़-परामो कहती हैं कि असमानता का मतलब सिर्फ़ आमदनी में असमानता नहीं है. वो कहती हैं, "सबसे महत्वपूर्ण है समान मौक़े मिलना. यानी आप ग़रीब हों या न हों, नई नौकरियों और निवेश का लाभ उठाने का मौक़ा आपको भी मिलना चाहिए."
वह कहती हैं, "हमारा मानना है कि समान अवसर न मिल पाने के कारण ही ग़रीबी घटाने की कोशिशों को झटका लग रहा है."
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