किसान आंदोलन का लोकसभा चुनाव पर कितना होगा असर

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में आम चुनाव बहुत दूर नहीं हैं. चुनाव की तारीख़ों का एलान भले नहीं हुआ हो, लेकिन माना जा रहा है कि तीन महीने के अंदर देश में नई सरकार का गठन हो जाएगा.
इन सबके बीच किसानों ने एक बार फिर अपना आंदोलन तेज़ कर दिया है.
राजनीतिक हलकों में इस पर चर्चा तेज़ है कि क्या चुनावों से पहले शुरू हुआ ये आंदोलन बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती पेश करेगा?
इन चर्चाओं के बीच ये बात भी सामने आ रही है कि वर्ष 2020 में जो किसानों का आंदोलन हुआ था और उसका नेतृत्व जो संगठन कर रहे थे, इस बार के आंदोलन में वो संगठन शामिल नहीं हैं.
इनमें राकेश टिकैत वाले भारतीय किसान यूनियन और अखिल भारतीय किसान सभा जैसे संगठन हैं. भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) का कहना है कि वो इस बार हो रहे आंदोलन में शामिल तो नहीं है, लेकिन वो इसका विरोध भी नहीं कर रहे हैं.
आंदोलन से दूरी

बीबीसी से बातचीत के दौरान राकेश टिकैत ने कहा कि उनके संगठन का इस बात से लेना देना नहीं है कि चुनाव कब हो रहे हैं और किस दल का समर्थन करना है या विरोध.
वो कहते हैं कि उनका संगठन सिर्फ़ किसानों की बात करता रहा है और इसका चुनावों से कोई लेना देना नहीं है.
बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत में उन्होंने कहा, "हम किसानों की मांगों को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं. पहले तीन काले क़ानूनों का विरोध किया और सरकार को उन्हें वापस लेने पर मजबूर किया. अब हमारी लड़ाई दूसरी लंबित मांगों को लेकर है."
इस बार के आंदोलन में लगभग 50 संगठन शामिल हैं, जैसे संयुक्त किसान मोर्चा (ग़ैर राजनीतिक), बीकेयू (शहीद भगत सिंह), बीकेयू (एकता सिद्धुपुर), किसान मज़दूर मोर्चा, भारतीय किसान नौजवान यूनियन और अन्य संगठन.
बलबीर सिंह राजेवाल और जगजीत सिंह डल्लेवाल के बीकेयू के गुटों ने ख़ुद को इस आंदोलन से दूर रखा है.
इस बार का आंदोलन कितना अलग

जाने माने लेखक और संघ विचारक राजीव तुली का कहना है कि इस बार जो आंदोलन हो रहा है, उसमें पंजाब के किसान संगठन ही शामिल हैं और वो भी सारे नहीं.
वो कहते हैं कि जो गुट आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें पंजाब की राज्य सरकार का समर्थन मिला हुआ है.
लेकिन क्या इस आंदोलन का बीजेपी पर असर पड़ेगा?
इस पर वो कहते हैं कि जो गुट इसमें शामिल हैं, उनके निशाने पर केंद्र की सरकार ज़रूर है, लेकिन इससे कोई ख़ास असर नहीं पड़ता दिख रहा है.
वहीं, केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में आरोप लगाया है कि मौजूदा आंदोलन को कांग्रेस हवा दे रही है, जिससे माहौल ख़राब हो रहा है.

उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 से पहले कांग्रेस की सरकार में किसानों के लिए बजट में 27 हज़ार करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया था, जिसे मौजूदा सरकार ने पाँच गुना बढ़ा कर एक लाख 24 हज़ार करोड़ रुपए कर दिया है.
उन्होंने आरोप लगाया कि 'इस बार जो आंदोलन हो रहा है वो ‘राजनीति से प्रेरित’ है और ‘लोकसभा चुनावों को देखते हुए’ किया गया है.'
उन्होंने कांग्रेस पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया है.
अखिल भारतीय किसान सभा के विजू कृष्णन का संगठन आंदोलन का हिस्सा नहीं है.
लेकिन वो कहते हैं कि 13 महीनों पहले जब केंद्र सरकार ने और ख़ास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी, तो उस समय केंद्र ने किसानों को ये भी आश्वासन दिया था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर क़ानून बनाया जाएगा और जिन किसानों पर आंदोलन के दौरान आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं उन्हें हटा लिया जाएगा.
वादाख़िलाफ़ी से नाराज़गी

विजू कृष्णन ये भी कहते हैं कि एमएस स्वामीनाथन की रिपोर्ट को लागू करने के वादे के साथ-साथ सरकार ने पिछले किसान आंदोलन में मारे गए किसानों के परिवारों को मुआवज़ा देने की बात भी कही थी. जो नहीं किया गया.
विजू कृष्णन कहते हैं, "हम 13 महीनों से इंतज़ार कर रहे हैं कि सरकार अपना वादा पूरा करे. लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं. इसलिए पिछले कुछ महीनों से किसान फिर से संघर्ष कर रहे हैं. इसमें चुनाव और नहीं चुनाव का कोई मतलब नहीं है. किसानों के मुद्दे राजनीति से अलग हैं."
हालाँकि पिछली बार के किसान आंदोलन से जुड़े सभी बड़े संगठन मौजूदा 'दिल्ली चलो' आंदोलन में शामिल नहीं हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जयशंकर गुप्त को ऐसा लगता है कि जो संगठन इस समय आंदोलन कर रहे हैं उन्हें 'केंद्र सरकार की शह' मिली हुई नज़र आती है.
उनका दावा है कि 'दिल्ली चलो' आंदोलन में जितने संगठन शामिल हैं, उनकी बीजेपी से क़रीबी कोई छिपी हुई बात नहीं है.
16 फ़रवरी को ग्रामीण भारत बंद

वो ये भी आशंका जता रहे हैं कि शायद इस आंदोलन के दौरान ही बीजेपी किसानों के लिए किसी तरह की घोषणा कर 'मास्टर स्ट्रोक' भी चल सकती है.
उनका तर्क है कि ठीक चुनावों से पहले चौधरी चरण सिंह और एमएस स्वामीनाथन को मरणोपरांत भारत रत्न देना भी इसी की कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए.
जयशंकर गुप्त कहते हैं चूँकि सभी किसान संगठन साथ नहीं हैं इस बार, इसलिए इस आंदोलन का चुनावों पर कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा है.
उनका ये भी कहना है कि आंदोलन एक राज्य के सिर्फ़ गिने चुने संगठन कर रहे है तो दूसरे राज्यों में इसका कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ेगा.
लोकसभा के चुनावों में ये बीजेपी के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं है.

लेकिन संघ विचारक राजीव तुली इस आशंका से इनकार करते हैं और कहते हैं कि किसानों की मांगें अव्यावहारिक हैं क्योंकि 60 साल से ज़्यादा उम्र के किसानों को 10 हज़ार रुपए पेंशन देना, किसी भी सरकार के बस की बात नहीं है.
वो कहते हैं कि किसान किसे माना जाए ये भी बड़ा सवाल है, क्योंकि बड़े पूँजीपति या रसूखदार लोग कृषि भूमि ख़रीद रहे हैं.
वो पूछते हैं, "तो क्या इन सबको भी किसान ही माना जाए? इसका क्या पैमाना होगा? ये कुछ स्पष्ट नहीं है. कहने को तो सुप्रिया सुले और पी चिदंबरम भी किसान ही हैं. इसलिए ये कहना कि ये सरकार द्वारा प्रायोजित आंदोलन है, तथ्यों से परे है."
16 फरवरी को किसान और मज़दूर संगठनों की ओर से बुलाए गए 'ग्रामीण भारत बंद' में सभी किसान संगठनों ने शामिल होने की घोषणा की है.
साथ ही इस आंदोलन को विपक्षी राजनीतिक दलों ने भी समर्थन देने की बात कही है.
किसान आंदोलन का असर

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हालाँकि पुराने किसान संगठन इस बार के आंदोलन में शामिल नहीं हैं, लेकिन राकेश टिकैत का कहना है कि वो बेंगलुरु से दिल्ली आने के बाद सभी किसान संगठनों से चर्चा करेंगे.
उन्होंने कहा कि हरियाणा में जिस तरह किसानों पर आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियाँ दागी गईं और जिस तरह से कीलें और बैरियर लगाए गए हैं उस पर अब सारे संगठन विचार करने पर मजबूर हो जाएँगे.
गुरुवार को बीकेयू (उगरहां) ने चार घंटों तक रेल चक्का जाम करने की घोषणा की है जबकि प्रोफ़ेसर दर्शनपाल के नेतृत्व वाली क्रांतिकारी किसान यूनियन ने भी हरियाणा में किसानों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद आपातकालीन बैठक बुलाई है, जिसमें आगे की रणनीति की घोषणा की जाएगी.
गुरनाम सिंह चढ़ूनी का संगठन आंदोलन में शामिल तो नहीं था, लेकिन अब उन्होंने भी हालात का जायज़ा लेने और अपने संगठन की आगे की रणनीति तय करने के लिए बैठक बुला ली है.
चंडीगढ़ में मौजूद राजनीतिक टिप्पणीकार विपिन पब्बी को लगता है किसान संगठनों का जो अभी आंदोलन चल रहा है उसका असर सिर्फ़ एक नज़र आता है और वो है शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन की संभावना पर अब बादल छा गए हैं.
वो कहते हैं कि पिछले किसान आंदोलन में शिरोमणि अकाली दल को एनडीए से निकलने पर मजबूर होना पड़ा था क्योंकि पंजाब के किसानों का काफ़ी विरोध था.
हालांकि वो ये भी कहते हैं कि बीजेपी का पंजाब में उतना प्रभाव नहीं है और मौजूदा किसान आंदोलन का उतना प्रभाव ना तो हरियाणा में है और ना ही उत्तरी भारत के किसी दूसरे राज्य में.
विपिन पब्बी का कहना है कि किसानों ने लोकसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार और बीजेपी पर दबाव डालने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि इस समय बीजेपी अपने 'सबसे अच्छे फ़ॉर्म' में है और आत्मविश्वास से भरी हुई है.
लेकिन दो साल पहले भी दिल्ली के बॉर्डर पर किसानों का ज़ोरदार आंदोलन चला था, उस समय उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भी होने वाले थे.
इस आंदोलन में राकेश टिकैत के भारतीय किसान यूनियन ने अग्रणी भूमिका भी निभाई थी.
विश्लेषक कहते हैं कि उस समय भी ये कयास लगाए जा रहे थे कि इस आंदोलन का नुक़सान बीजेपी को उत्तर प्रदेश के चुनावों में उठाना पड़ेगा.
वो कहते हैं कि न सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश बल्कि लखीमपुर खीरी में किसानों को गाड़ी से कुचलने की घटना के बावजूद बीजेपी को राज्य में अच्छी सफलता मिली.
लेकिन यूपी विधानसभा के लिए मतदान से पहले केंद्र की मोदी सरकार को कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) क़ानून -2020, कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार क़ानून 2020 और आवश्यक वस्तुएँ संशोधन अधिनियम 2020 को रद्द करने की घोषणा करनी पड़ी.
पहले सरकार और किसानों के बीच संवादहीनता ज़रूर थी, लेकिन इस बार किसानों से बातचीत करने के लिए के लिए कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय दो चरणों में किसानों के प्रतिनिधियों से बात कर चुके हैं.
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