भारत में अमीर-ग़रीब के बीच बढ़ रही है खाई, 10% अमीरों के हाथ में 57% कमाई - रिपोर्टः प्रेस रिव्यू

An Indian bank teller counts old notes

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दुनिया में असमानता को लेकर जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत एक ग़रीब और असमानता वाला देश है और यहाँ रईसों के हाथ में बहुत पैसा है.

भारत के सभी समाचारपत्रों और मीडिया समूहों में इस रिपोर्ट का ज़िक्र है.

अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि देश की कुल कमाई का 57 फ़ीसदी हिस्सा ऊपर के 10 फ़ीसदी तबक़े के हाथों में है.

वहीं देश की कुल कमाई में 50 फ़ीसदी यानी देश में नीचे की आधी आबादी का हिस्सा मात्र 13 फ़ीसदी है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि 2020 में दुनिया की कुल कमाई में गिरावट हुई. इनमें से आधी गिरावट अमीर देशों में हुई है.

अख़बार लिखता है कि बाक़ी की आधी गिरावट कम आय वाले और उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों में हुई है. और इसके लिए सबसे बड़ी वजह दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया और ख़ास तौर पर भारत को बताया गया है.

वर्ल्ड इनिक्वैलिटी लैब की रिपोर्ट में लिखा है - "विश्लेषण से यदि भारत को हटा देते हैं, तो ऐसा लगता है कि दुनिया में नीचे से 50 फ़ीसदी देशों की कमाई का हिस्सा दरअसल 2020 में बढ़ा है."

रिपोर्ट में लिखा है - भारत एक ग़रीब और बेहद असमान देश है, जहाँ रईसों के हाथ में काफ़ी दौलत है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत का मध्य वर्ग ऊपर के तबके की तुलना में ग़रीब है.

देश की कुल कमाई में मध्य वर्ग का हिस्सा 29.5 प्रतिशत है.

वहीं सबसे अमीर 10 फ़ीसदी लोगों के हाथों में 33 प्रतिशत दौलत है.

कमाई में सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों का हिस्सा 65 प्रतिशत है.

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राकेश टिकैत

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किसान संगठन आंदोलन ख़त्म करेंगे या नहीं फ़ैसला आज

पिछले एक सालों से कई किसान संगठनों के साझा मंच संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले आंदोलनरत किसान आंदोलन ख़त्म करने पर आज फ़ैसला करेंगे.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने पहले पन्ने की दूसरी लीड ख़बर लगाई है- किसान संगठनों का आंदोलन ख़त्म करने पर फ़ैसला आज.

गृह मंत्रालय ने किसान संगठनों को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें कहा गया है कि उनकी लंबित मांगों का समाधान हो गया है. अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त किसान मोर्चा कुछ मुद्दों पर स्पष्टीकरण चाहता है, जिनमें प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ 'फ़र्ज़ी' मुक़दमों को वापस लेना शामिल है.

गृह मंत्रालय के प्रस्ताव को लेकर सिंघु बॉर्डर पर किसान संगठनों की मंगलवार को एक बैठक हुई थी. इस बैठक में बुधवार को दोपहर बाद दो बजे फिर बैठक करने का फ़ैसला हुआ है और इसी बैठक में आंदोलन ख़त्म करने पर अंतिम निर्णय होगा.

गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर किसान संगठनों को कुछ मामलों में स्पष्टीकरण चाहिए. इनमें प्रदर्शनकारी किसानों पर 'फ़र्ज़ी' मुक़दमों को वापस लेना और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर बात करने के लिए एक कमिटी बनाने की बात शामिल है.

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ किसानों का कहना है कि गृह मंत्रालय के प्रस्ताव की भाषा को ठीक कर दिया जाए तो वे आंदोलन ख़त्म करने को तैयार हैं. भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार को किसान नेताओं के सामने वार्ता के लिए बैठना चाहिए.

राकेश टिकैत

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों का अभियान शुरू हो गया है, ऐसे में किसान आंदोलन और उनसे जुड़े मुद्दों का ज़िंदा रहना सरकार के लिए भी चुनौती है.

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि एमएसपी गारंटी को क़ानूनी कवच देना, टिकैत के समर्थकों के लिए अब भी एक बड़ा मुद्दा है. देश के दूसरे हिस्सों में हरियाणा और पंजाब की तरह मौजूदा एमसएपी सिस्टम प्रभावी नहीं है. दूसरी तरफ़ गृह मंत्रालय ने अपने प्रस्ताव में एमएसपी गारंटी को लेकर महज़ कमिटी बनाने की बात कही है और इस कमिटी में संयुक्त किसान मोर्चा के लोगों को भी शामिल किया जा सकता है. इस कमिटी में एमएसपी के साथ अन्य मुद्दों पर भी बात होगी.

अख़बार से ऑल इंडिया किसान सभा के नेता अशोक धावले ने कहा, ''कमिटी गठित करने के प्रस्ताव में ये विकल्प खुला है कि जिन कथित किसान संगठनों ने तीनों विवादित कृषि क़ानूनों का समर्थन किया था और एमएसपी की जगह वे वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन के साथ थे, उन्हें भी शामिल किया जा सकता है.'' उन्होंने कहा कि कमिटी ऐसी होनी चाहिए, जिसमें एमएसपी अहम मुद्दा हो और उसमें हमारी बात सुनी जाए.

गृह मंत्रालय के प्रस्ताव में एक और बात को लेकर किसान संगठनों का मतभेद है. ख़ास कर पंजाब के किसान नेता इस पर सरकार से स्पष्टीकरण चाहते हैं. जिन आंदोलनकारी किसानों पर मुक़दमे दर्ज हैं, उनसे मुक़दमों को वापस लेने के लिए सरकार तैयार है लेकिन शर्तों के साथ. इनमें वे मुक़दमें भी शामिल हैं, जब पिछले साल गणतंत्र दिवस के मौक़े पर किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान दिल्ली में काफ़ी हंगामा और विवाद हुआ था.

मोदी

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किसानों की मांग है कि आंदोलन ख़त्म होते ही किसानों पर लगे मुक़दमे वापस हो जाने चाहिए. ये मुक़दमे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली पुलिस के हैं. पंजाब में भारतीय किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, ''आंदोलन तभी ख़त्म होगा जब मुक़दमे वापस होंगे और इसमें कोई शर्त नहीं होनी चाहिए.''

बीकेयू के दूसरे धड़े के नेतृत्व करने वाले हरियाणा के किसान नेता गुरुनाम सिंह चढूनी ने कहा कि समय सीमा के भीतर किसानों पर दर्ज मुक़दमें वापस होने चाहिए और जिन आंदोलनकारी किसानों की मौत हुई है, उनके परिजनों को आर्थिक मुआवजा भी दिया जाए. गुरुनाम सिंह ने कहा कि सभी राज्य पंजाब की तर्ज़ पर मुआवजा दें. पंजाब ने मृतक किसानों के परिजनों को पाँच-पाँच लाख रुपए का मुआवजा दिया है.

अखिलेश यादव

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मोदी का अखिलेश पर निशाना तो अखिलेश बीजेपी पर बरसे

हिन्दी दैनिक अमर उजाला ने पहले पन्ने की लीड ख़बर गोरखपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए बयान को बनाई है. इस ख़बर का शीर्षक है- गोरखपुर से मोदी का सपा पर निशाना- लाल टोपी वाले यूपी के लिए ख़तरे, इनसे सावधान रहे जनता.

प्रधानमंत्री ने लाल टोपी के ज़रिए अखिलेश यादव और उनकी पार्टी पर निशाना साधा है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, यूपी विधानसभा चुनाव से पहले डेढ़ महीने में तीसरी बार पूर्वांचल पहुँचे प्रधानमंत्री मोदी ने 9600 करोड़ की तीन परियोजनाओं का लोकार्पण करते हुए समाजवादी पार्टी पर जमकर निशाना साधा.

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उन्होंने कहा कि लाल टोपी यूपी के लिए ख़तरे की घंटी है और इससे सावधान रहने की ज़रूरत है. पीएम मोदी ने कहा कि लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आदर्शों को ये पहले ही छोड़ चुके हैं. मोदी ने कहा, ''पूरा उत्तर प्रदेश जानता है कि लाल टोपी वालों को लाल बत्ती से मतलब रहा है न कि उत्तर प्रदेश की जनता के दुख से. पीएम ने कहा कि लाल टोपी सत्ता भोगने के लिए चाहिए न कि सेवा के लिए.

प्रधानमंत्री के बयान वाली ख़बर के बगल में ही अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की मेरठ में हुई रैली की ख़बर है. इस रैली में अखिलेश यादव ने भी बीजेपी पर जमकर निशाना साधा है. इस ख़बर की हेडिंग है- हमारे-आपके बीच जो पैदा करे खाई...वही भाजपाई: अखिलेश. मंगलवार को लोकदल नेता जयंत चौधरी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में साझा रैली की थी.

अभिषेक बनर्जी

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टीएमसी विस्तार जारी रखेगी, चाहे कोई पसंद करे या ना करे: अभिषेक बनर्जी

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने द हिन्दू को दिए इंटरव्यू में कहा है कि टीएमसी अपना विस्तार करेगी, चाहे इसे कोई पार्टी पसंद करे या ना करे. अभिषेक बनर्जी ने कहा कि उनकी पार्टी का वोट शेयर लगातार बढ़ रहा है और दूसरे दल के नेता भी टीएमसी की ओर आकर्षित हो रहे हैं.

द हिन्दू ने सवाल किया कि क्या टीएमसी संसद के शीत सत्र में विपक्ष से अलग राह चल रही है? इस सवाल के जवाब में अभिषेक ने कहा, ''हम विपक्ष के प्रमुख बिन्दू हैं, चाहे कोई पसंद करे या ना करे. ये लोगों को फ़ैसला करने दीजिए कि क्या कब होगा. हम देश भर में पार्टी का विस्तार कर रहे हैं. हम त्रिपुरा, गोवा, मेघालय और हरियाणा भी पहुँच चुके हैं. हमारी पार्टी अपना विस्तार जारी रखेगी, ये एक पार्टी को पसंद आए या नहीं. एक स्वस्थ लोकतंत्र में इस पर लोगों को फ़ैसला करना है.''

ममता

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कांग्रेस के सवाल पर अभिषेक बनर्जी ने कहा, ''पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हटाने के लिए कांग्रेस ने लेफ़्ट के साथ गठबंधन किया है. क्या यह विपक्ष की एकता को तोड़ने की कोशिश नहीं है? जब कांग्रेस पंजाब में आम आदमी पार्टी के विधायक को ख़ुद में मिलाती है तो यह विपक्ष की एकता को तोड़ना नहीं हुआ? टीएमसी किसी को तोड़ नहीं रही है जबकि हम दूसरे दलों के नेताओं को अच्छे लग रहे हैं. इन दोनों में फ़र्क़ है. उदाहरण के लिए त्रिपुरा ही देखें, जहाँ कांग्रेस का वोट शेयर पाँच फ़ीसदी भी नहीं है. यहाँ तक कि त्रिपुरा के पिछले नगर निकाय चुनाव की तुलना में इस बार एक फ़ीसदी कम वोट शेयर है. त्रिपुरा में हमने तीन महीने पहले ही अभियान शुरू किया और 24 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ हम मुख्य विपक्षी पार्टी हैं.''

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