मार्च के महीने में ओले गिरना कितना ख़तरनाक है?

किसान

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इमेज कैप्शन, अपनी टूटी हुई गेहूं की फसल के साथ एक किसान
    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में मार्च के पहले 15 दिनों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश और ओलावृष्टि हुई है.

भारत जहां एक ओर कोरोना वायरस की मार झेल रहा है. वहीं, दूसरी ओर इतनी तेज बारिश और ओला वृष्टि की वजह से भारत के किसानों और आम लोगों पर दोहरी मार पड़ी है.

बीबीसी ने किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, मौसम वैज्ञानिकों और कई अन्य विशेषज्ञों से बात करके नीचे दिए गए सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है.

ये सवाल हैं -

  • ओले गिरने से किसानों को कितना नुकसान हुआ है?
  • मार्च के महीने में लगातार होती बारिश से सब्जियों और दूसरी फसलों के दामों पर क्या असर पड़ेगा?
  • क्या आने वाले दिनों में भी ऐसी ही मौसमी घटनाएं ज़ारी रह सकती हैं?

आंकड़ों की बात करें तो मार्च के महीने में पूरे उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ बारिश हुई है.

दिल्ली में मार्च के महीने में बारिश ने 101.9 एमएम बारिश हुई है.

दिल्ली में बारिश के बाद का हाल

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में बारिश के बाद का हाल

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक के जे रमेश के मुताबिक़, "ये भारत के मैदानी भागों में होने वाली सबसे भीषण ओलावृष्टि थी जो कि एक असामान्य घटना थी. ये पश्चिमी विक्षोभ का सबसे भयानक रूप देखा गया है."

ये ख़बर लिखे जाने तक मौसम विभाग की ओर से बारिश की चेतावनी आना जारी है.

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लेकिन इस बारिश और ओले गिरना किसानों के लिए कितना भयावह साबित हुआ है, ये जानने के लिए हमने कुछ किसानों से बात की है.

किसानों पर क्या बीती?

उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब और राजस्थान में तेज बारिश और ओले गिरने से खेती को भारी नुकसान पहुंचा है.

उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में सब्जियां उगाने वाले किसान नंद पांडेय बताते हैं, "मैंने बीते बीस सालों में मार्च के महीने में इतनी बारिश और ओले कभी नहीं देखे हैं. हमारी शिमला मिर्च, टमाटर और तमाम दूसरी फसलें पूरी तरह तबाह हो गई हैं. उम्मीद थी कि ये फसल लगभग 12 लाख रुपये का फ़ायदा देकर जाएगी लेकिन अब जो लगभग छह लाख रुपये लागत लगाई थी, वो भी नहीं निकलेगी. ऐसे ही चलता रहा तो पता नहीं है कि अगले दो तीन साल सरवाइव भी नहीं कर पाएंगे या नहीं."

उत्तर प्रदेश में ओला वृष्टि का बाद खेतों का हाल

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इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश में ओला वृष्टि का बाद खेतों का हाल

ओला वृष्टि ने हाल ही में कर्ज लेकर अपनी बेटी की शादी करने वाले किसान कन्हैया लाल की कमर तोड़कर रख दी है.

बीबीसी को अपनी व्यथा बताते हुए कन्हैया लाल भावुक हो उठते हैं.

वे कहते हैं, "ओले गिरने के बाद जब खेत देखा तो अब लगा कुछ नहीं बचा. आपको कैसे बताएं कि कितना नुकसान हुआ है. गेहूँ की फसल थी, वो भी बर्बाद हो गई. जो कुछ था, सब ख़त्म हो गया. कर्जा लेकर बिटिया की शादी की थी, अब हालत ये है कि फसल से कुछ निकला नहीं. न जाने अब आगे क्या होगा."

दो जून की रोटी

एक अन्य भूमिहीन किसान वीरेंद्र की फसल को भी ऐसा नुकसान हुआ है कि उन्हें इससे उबरने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है.

ओला वृष्टि

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इमेज कैप्शन, ओलावृष्टि के बाद अपने टूटे हुई पौधों के साथ किसान

उनके साथ काम करने वाले एक किसान अपनी बर्बाद फसल को देखने के बाद सीधे लखनऊ चले गए ताकि कुछ मजदूरी करके घरवालों को दो जून की रोटी खिला सकें.

वीरेंद्र बताते हैं, "मेरे मन में क्या है, ये सिर्फ मैं ही जानता हूं. जब ओले गिर रहे थे तो मेरे दस साल के बच्चे ने कहा कि पापा आप चिंता मत करो, मैं बड़ा होकर खूब पढ़ाई करूंगा. अब मैं अपनी व्यथा न बच्चे को बता सकता हूँ और न ही अपनी पत्नी को. क्योंकि वे मानसिक रूप से बीमार हैं. जो है सब कुछ मेरे दिल में है."

"मैं एक भूमिहीन किसान हूं, मेरे ऊपर पहले से दो लाख रुपये का कर्जा है जो कि साहूकार से 2 परसेंट पर लिया था. ये जिस खेत पर मैं किसानी कर रहा था, उसके जमीन मालिक को दस हज़ार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से साठ हज़ार रुपये किराया देना है, चाहें कुछ हो या न हो. 68 हज़ार रुपये के बीज लिए थे, तीस हज़ार रुपये के कीटनाशक और खाद ली थी. अब एक बार फिर सब कुछ फिर से शुरू करना पड़ेगा."

किसान वीरेंद्र कुमार

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इमेज कैप्शन, किसान वीरेंद्र कुमार के साथ कन्हैया लाल

खेती को कितना नुकसान हुआ?

बीबीसी ने कृषि क्षेत्र के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से बात करके इस बारिश और ओलावृष्टि के खेती पर पड़ने वाले व्यापक और दूरगामी असर को समझने की कोशिश की है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े कृषि वैज्ञानिक अनूप तिवारी बताते हैं, "इस मौसम में सामान्यत: एक दो बार बारिश होती है. लेकिन इस दफ़े कई बार बारिश होने से उन फसलों को नुकसान हो रहा है जो खेतों में पकी हुई खड़ी हैं."

"इस बारिश से सीधे-सीधे सरसों, गेहूं, सब्जियों, और आम-किनू जैसे फल उगाने वाले किसानों को भारी नुक़सान हुआ है. उदाहरण के लिए उत्तर भारत में इस समय आलू की खुदाई का सीज़न है. इस समय ज़्यादा बारिश की वजह से खेत में आलू की खुदाई नहीं हो पाती है. और बार-बार पानी गिरने की वजह से आलू सड़ने लगता है."

"बारिश के साथ-साथ तेज हवा चलने से गेहूं की फसल को नुकसान हुआ है. क्योंकि तेज हवा में गेहूं के तने टूट जाते हैं जिससे अनाज़ का ठीक से विकास नहीं हो पाता है. और इस वजह से किसान की पैदावार घट जाती है."

वहीं, इस मौसमी घटना का दूरगामी परिणाम सब्जियां उगाने वाले किसानों और आम के बागानों पर पड़ेगा क्योंकि ओले गिरने से खेतों में बोई हुई सब्जियों की पौध खराब हो गई है. वहीं, आम के बगीचों में ओले गिरने से उन्हें भी नुकसान पहुंचा है.

ओला वृष्टि

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45 लाख करोड़ का नुक़सान

ओले गिरने की वजह से खेतों को जो नुकसान पहुंचा है, इसके बाद किसान एक नई शुरुआत करने की कोशिश कर रहे हैं.

नंद पांडेय बताते हैं, "किसान की हालत ये है कि चाहें कुछ भी हो, हमें साहूकारों से कर्ज लेना ही पड़ता है. किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएं किसानों को एक बार कर्ज दे देती हैं जिसे साल भर में वापस करना पड़ता है. लेकिन अब जब ऐसी घटनाएं हो जाती हैं तो हमें नयी शुरुआत करने के लिए साहूकारों से कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है."

अंतरराष्ट्रीय संस्था ओईसीडी की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि साल 2000-01 से लेकर 2016-17 के बीच भारतीय किसानों को 45 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है.

ओला वृष्टि

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कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा मानते हैं कि इस मौसम में हो रही ओला वृष्टि ने किसानों को तबाह कर दिया है.

वे कहते हैं, "इस मौसम में ओले गिरने, तेज हवाएं चलने और तेज बारिश से इतनी तबाही हुई है अकेले पंजाब में ही पहली बारिश में पांच लाख एकड़ की कृषि को नुकसान हुआ है. इसके बाद दूसरी बारिश में ढाई लाख एकड़ की फसल को नुकसान हुआ है."

बढ़ेंगे सब्जियों के दाम

इस बारिश से सब्जियों और फलों की तैयार खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचने से एक बड़ा सवाल पैदा हुआ है कि क्या आने वाले दिनों में सब्जियों के दामों पर इसका असर दिखाई देगा.

देवेंद्र शर्मा मानते हैं कि स्वाभाविक रूप से इसका असर आने वाले दिनों में नज़र आएगा.

वे कहते हैं, "टमाटर, गोभी, मिर्च, लहसुन, भिंडी, लौकी, तरोई, खरबूजा और तरबूज जैसी फसलों को नुकसान हुआ है. इससे आने वाले दिनों में इन सब्जियों के दाम ऊपर जाते हुए नज़र आएंगे.

"वहीं, आम की फसल की बात करें तो तेज हवाओं की वजह से कई जगहों पर पेड़ तक उखड़ गए हैं. ओला वृष्टि का असर तो पड़ा ही है."

नंद पांडेय

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इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के किसान नंद पांडेय

किसान बीमा योजना

लेकिन जब किसानों को हुए नुकसान की बात आती है तो अक्सर किसान बीमा योजना का ज़िक्र किया जाता है.

देवेंद्र शर्मा मानते हैं कि इस तरह की मौसमी घटनाएं को लेकर किसानों को बीमा मिलना चाहिए लेकिन ऐसा होता नज़र नहीं आता है.

वे कहते हैं, "जब-जब हम किसान बीमा की बात करते हैं तो हमें एक हालिया रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिए. ये रिपोर्ट बताती है कि किसानों के तीन हज़ार करोड़ रुपये के क्लेम दस महीने बाद भी किसानों तक नहीं पहुंचे हैं. जबकि कंपनियों को ये बोला गया है कि अगर क्लेम दो महीने भी लेट होता है तो 12 फीसदी ब्याज दर के साथ बीमा राशि किसान को दी जाएगी. लेकिन ऐसा कभी हुआ ही नहीं है. अब किसान को आज मौसम की मार पड़ी है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दस महीने बाद भी उसे बीमे की रकम मिल जाएगी."

ओला वृष्टि

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ज़मीनी हकीक़त की बात की जाए तो भूमिहीन किसानों पर ऐसी मौसमी घटनाओं की मार सबसे ज़्यादा पड़ती है.

भारत जैसे देश में जहां चालीस फीसदी किसान भूमिहीन हैं, ऐसे में वीरेंद्र जैसे किसानों को बीमे की रकम की मिलने की जगह खेत का किराया जुगाड़ने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है.

ऐसे ही किसानों के बारे में बात करते हुए देवेंद्र शर्मा बताते हैं, "ऐसी मौसमी घटनाओं से राहत नहीं मिलने के साथ साथ कृषि को लेकर चलाई जा रही दूसरी तमाम योजनाओं का लाभ भूमिहीन किसानों को नहीं मिलता है. इनमें सब्सिडी देने की योजनाएं शामिल हैं. ये एक बड़ी समस्या है. और मैं देख रहा हूँ कि सरकार की नीतियां डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की ओर बढ़ रही हैं. ऐसे में ये बात समझ से बाहर है कि ये नीतियां किसके लिए बनाई जा रही हैं जब आपकी कृषक आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस सुरक्षा कवच से बाहर है."

ओला वृष्टि

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मार्च में महीने में क्यों गिरे ओले?

लेकिन सवाल ये उठता है कि मार्च के महीने में बारिश के इतने तेज होने की वजह क्या है. बीबीसी ने इन वजहों को समझने के लिए मौसम विज्ञानियों से बात की है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक कुलदीप श्रीवास्तव बताते हैं, "मार्च के महीने में ये जो बारिश और ओला वृष्टि हो रही है, ये पश्चिमी विक्षोभ की वजह से हो रही है. एक तरह से तो ये एक सामान्य घटना है. लेकिन इसका संबंध कहीं न कहीं जलवायु परिवर्तन से भी है. क्योंकि बीती सर्दियों में 15 से 20 दिनों का तीव्र सर्दी का समय आया था वो भी बहुत सालों के बाद आया था. इसके साथ ही पांच और छह तारीख़ को जो बारिश हुई है. वो भी काफ़ी समय बाद देखने में आया है."

"ऐसे में ये निश्चित है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव किसी न किसी तरह बारिश और ओला वृष्टि पर पड़ रहा है. अगर पिछले सालों की तुलना की जाए तो सामान्यत: बारिश पांच या छह मिलीमीटर तक ही होती है. लेकिन इस बार 20 - 20 मिलीमीटर की दो या तीन बार बारिश हो चुकी है. ऐसे में ये बारिश कुछ ज़्यादा ही है."

ओला वृष्टि के बाद खेत की हालत

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इमेज कैप्शन, ओला वृष्टि के बाद खेत की हालत

ऐसे में एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि गर्मियों से पहले इतनी ज़्यादा बारिश का असर क्या आने वाले दिनों में मॉनसून पर दिखाई देगा.

कुलदीप श्रीवास्तव बताते हैं, "जब बार बार पश्चिमी विक्षोभ आता है तो मॉनसून देर होने की आशंका पैदा होती है. फिलहाल ऐसी स्थितियां नज़र नहीं आ रही हैं. लेकिन अगर ये पश्चिमी विक्षोभ अप्रैल तक जारी रहता है तो ऐसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं. लेकिन अगर खेती की बात की जाए तो आने वाले दिनों में बदलते मौसम की वजह से खेती के समय में परिवर्तन किया जाना चाहिए."

मौसम

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लेकिन क्या ऐसी घटनाएं आने वाले समय में भी जारी रहेंगी.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मीटियरोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक आर कृष्णन ने अंग्रेजी अख़बार लाइव मिंट से बात करते हुए इस बारे में जानकारी दी है.

वे कहते हैं, "हमने बीते चालीस सालों के डेटा सेट्स का अध्ययन किया है. इसके बाद हमें पता चला है कि पश्चिमी विक्षोभों की संख्या बढ़ रही है. सर्दियों में ठंडी हवाएं और कुछ दिनों में निम्नतम तापमान से तापमान नीचे रहना आम बात है. लेकिन हम अब ऐसे दिनों की संख्या बढ़ते देख रहे हैं. सर्दियों में भीषण मौसमी घटनाएं का स्तर और उनकी संख्या बढ़ेगी. और ये सब जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है."

मौसम का हाल

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इमेज कैप्शन, भारत के नक्शे में बारिश का हाल बता रहा है कि जहां इलाहाबाद में बारिश सामान्य 2.1 मिलीमीटर से कम 0.9 मिलीमीटर हुई है. वहीं पड़ोसी ज़िले प्रतापगढ़ में सामान्य 1.3 मिलीमीटर से ज़्यादा 10.3 मिलीमीटर हुई है.

क्या जलवायु परिवर्तन से है संबंध?

ऐसे में एक सवाल ये खड़ा होता है कि जलवायु परिवर्तन भारत को किस तरह प्रभावित कर रही है और पश्चिमी विक्षोभ से इसका क्या संबंध है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए मौसम वैज्ञानिक आर के जेनामनी बताते हैं, "मजबूत पोलर वॉर्टेक्स और कई अन्य वैश्विक कारकों की वजह से उत्तर भारत में एक जनवरी के बाद से 20 पश्चिमी विक्षोभों का असर देखने में आया है जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

ओला वृष्टि के बाद खेत की हालत

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इमेज कैप्शन, ओला वृष्टि के बाद केले की फसल की हालत

ईरान से होते हुए भारत में आने वाली कम दबाव की हवा भारतीय मौसम व्यवस्था पर नकारात्मक असर डालती है, इसी वजह से इसे पश्चिमी विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कहते हैं क्योंकि ये भारत की पश्चिमी दिशा से होते हुए उत्तर भारत में अपना असर छोड़ता है.

ये अपने साथ नमी वाला मौसम लेकर आता है. सामान्यत: भारत में जनवरी फरवरी के महीने में 12 वेस्टर्न डिस्टर्बेंस आते हैं. लेकिन इस साल में हर तीन चार दिनों के अंतराल में एक वेस्टर्न डिस्टर्बेंस आ रहा है.

फरवरी की 29 तारीख़ के बाद मात्र पांच दिनों के अंतर पर पांच - छह मार्च को वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ने अपना असर छोड़ा था जिसकी वजह से उत्तर भारत में कई जगह भारी बारिश हुई थी.

पोलर वॉर्टेक्स

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इमेज कैप्शन, पोलर वॉर्टेक्स की वजह से अमरीका में बर्फीली हवाओं का असर

आर्कटिक पर पोलर वोर्टेक्स का भारत पर असर

आर्कटिक महासागर में बीते दस सालों की अपेक्षा इस साल सबसे ज़्यादा बर्फ जमी हुई है. लेकिन इतनी ज़्यादा सर्द मौसम की वजह पोलर वॉर्टेक्स है जो कि आर्किटक महासागर के ऊपर बना हुआ है. पोलर वोर्टेक्स एक तरह की गोल गोल क्रम में घूमती हवाएं हैं जो कि आर्कटिक की ठंड को आर्कटिक से बाहर नहीं जाने दे रही हैं.

जब जब ये पोलर वोर्टेक्स कमजोर पड़ता है तो अमरीका और कनाडा जैसे देशों में सर्दी का भारी प्रकोप देखने में आता है. वहीं, भारत जैसे देशों में नमी के मौसम के रूप में इसका असर देखने में आता है. इस तरह के मौसमी परिवर्तन मौसम वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती पैदा कर रहे हैं.

स्काइमेट नामक संस्था से जुड़े मौसम वैज्ञानिक महेश पालावत बताते हैं, "पश्चिमी विक्षोभ की संभावना जताना एक आसान काम है. लेकिन इन पश्चिमी विक्षोभों का असर कितना भयावह होगा, इसकी संभावना जताना मुश्किल होता जा रहा है. ये संभावना जताई जा सकती है कि बारिश होगी या ओले गिरेंगे लेकिन ओले कितने गिरेंगे और किस जगह कितने बड़े आकार में गिरेंगे, ये अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है. और तीन चार दिन पहले तक ये बताना मुश्किल है."

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क्या है आगे का रास्ता?

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरनमेंट से जुड़े क्लाइमेट चेंज साइंटिस्ट कपिल सुब्रमण्यन मानते हैं कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन के असर सामने आएंगे.

वे कहते हैं, "ये बात सच है कि जलवायु परिवर्तन का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. लेकिन जलवायु परिवर्तन से किसानों और अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सरकार और बीमा करने वाली कंपनियों को एक विशेष रिस्क असेसमेंट यानी जोख़िम का आकलन करना होगा."

जलवायु परिवर्तन और इसके असर जहां एक ओर दुनिया भर में बहस का विषय बने हुए हैं.

लेकिन इसके दूरगामी परिणाम तेज बारिश और ओलावृष्टि ने भारत में किसानों की कमर तोड़ दी है.

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