राजनीति में कितना प्रभाव रखते हैं पंजाब और हरियाणा के डेरे

2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब और हरियाणा के कई डेरों को बड़ा वोट बैंक माना जा रहा है.

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    • Author, अवतार सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुरु रविदास की जयंती से एक दिन पहले 23 फरवरी, 2024 को वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "ऐसा लगता है कि वाराणसी एक मिनी पंजाब बन गया है."

इससे पहले पांच नवंबर 2022 को प्रधानमंत्री मोदी डेरा 'राधा स्वामी सत्संग ब्यास' पहुंचे थे. उन्होंने डेरा प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात कर डेरे की गतिविधियों की जानकारी ली थी.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब और हरियाणा के कई डेरों को बड़ा वोट बैंक माना जा रहा है.

पंजाब से सटे हरियाणा में उम्रकैद की सज़ा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम को जनवरी 2024 तक नौ बार पैरोल दी जा चुकी है.

रेप और हत्या के मामले में गुरमीत राम रहीम उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं.

पंजाब में जिन का असर है उनमें हरियाणा का डेरा सच्चा सौदा सिरसा, अमृतसर का राधा स्वामी सत्संग ब्यास, डेरा नूरमहल, डेरा निरंकारी जालंधर, डेरा सचखंड बल्लां (जालंधर) और डेरा नामधारी लुधियाना और डेरा निरंकारी शामिल हैं.

इसके साथ ही कई सिख संप्रदायों के डेरे भी अपना अच्छा प्रभाव बनाए रखते हैं. जिसका उदाहरण निर्मले एवं उदासी संतों से संबंधित शिविर हैं.

पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर 1 जून को मतदान होगा. इस चुनाव के बीच राजनीतिक दलों के नेता राज्य के अलग-अलग डेरों में जा रहे हैं.

सबसे ज़्यादा चर्चा 'डेरा सचखंड बल्लां' की है, जो पंजाब के दोआब क्षेत्र में जालंधर के पास स्थित है.

पंजाब में कितने डेरे हैं?

हरियाणा के सिरसा के डेरा सच्चा सौदा का एक कार्यक्रम
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पंजाब में डेरा कोई नई चीज़ नहीं है. ये सिख धर्म से भी पहले के हैं, जैसे नाथों, सिद्धों और योगियों के डेरे.

सिख धर्म के अस्तित्व में आने के साथ ही नए डेरों के अस्तित्व में आने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है. इनमें उदासी, निर्मले, निरंकारी, नामधारी आदि उल्लेखनीय हैं.

पंजाब में डेरों की सही संख्या का कोई रिकॉर्ड नहीं है. लेकिन यह दावा ज़रूर किया जा सकता है कि इनकी संख्या सैकड़ों में है.

पंजाब के 12 हज़ार से ज़्यादा गांवों में से शायद ही कोई ऐसा गांव हो जहां कोई छोटा-मोटा डेरा न हो. लेकिन जानकारों का मानना ​​है कि करीब 300 बड़े डेरे हैं.

इनमें सिख, हिंदू, सूफी और ईसाई पुजारियों के निजी डेरे भी शामिल हैं.

ऐसे करीब एक दर्जन डेरे ही हैं, जिनके अनुयायियों की संख्या हज़ारों से लाखों के आंकड़े तक पहुंच सकती है.

चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के शोध के मुताबिक़, पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से 56 सीटों पर इन डेरों का प्रभाव है. ये डेरे चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं.

लोकसभा सीटों के लिहाज़ से वे 6 सीटों पर असर डाल सकते हैं.

ज़ाहिर है यही वजह है कि चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के नेताओं में इन खेमों का समर्थन पाने की होड़ मच जाती है.

पंजाब में डेरे कैसे फैले?

पंजाब की आबादी का करीब 32 फीसदी दलित हैं

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माना जाता है कि पंजाब में डेरों की स्थापना का मुख्य कारण सामाजिक भेदभाव है. यही कारण है कि इन डेरों के अधिकांश समर्थक समाज के निचले तबके से आते हैं.

ये डेरे लोगों को भजन-कीर्तन करने, शराब छोड़ने, नशे से दूर रहने और महिलाओं का सम्मान करने जैसे संदेश देते हैं.

डेरा और धर्म का 'बहुत गहरा संबंध' है. बेशक डेरे धर्मों की तरह व्यवस्थित नहीं होते पर यह उसी तरह काम करते हैं.

लेखक और पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में पत्रकारिता के पूर्व प्रोफेसर नरेंद्र कपूर का मानना ​​है कि सामाजिक भेदभाव के कारण कुछ समुदायों के लोगों को डेरों का सहारा लेना पड़ा.

नरेंद्र कपूर कहते हैं, ''दलित खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं. इसलिए उन्होंने अपने डेरे बनाने शुरू कर दिए. डेरा न केवल धर्मस्थल है बल्कि संस्कृति का केंद्र भी है. गुरुद्वारों की तरह यहां भी लड़के और लड़कियों की शादी से पहले देखने की रस्में निभाई जाती हैं.''

प्रोफ़ेसर नरेंद्र कपूर के अनुसार, ''ये डेरे लोगों की आदतों को सुधारने का भी काम करते हैं. महिलाएं अपने पतियों के साथ शिविर में जाती हैं. वे वह सब कुछ करते हैं जो डेरे वाले कहते हैं. अधिकतर महिलाएं न तो शराब पीती हैं और न ही मांस खाती हैं. वे अपने भटके हुए पतियों को इन जगहों पर ले जाती हैं.''

संत राम रहीम के अनुयायी

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पंजाब में करीब 32 फीसदी दलित आबादी है. डेरों से जुड़े ज़्यादातर लोग दलित समुदाय से हैं. इन डेरों द्वारा कई समाज सुधार के काम किए जाते हैं. डेरों से जुड़े लोग एक-दूसरे की मदद भी करते हैं.

दोआब से संबंध रखने वाले दलित लेखक बलबीर माधोपुरी कहते हैं, ''सभी डेरे गुरु ग्रंथ साहिब के बारे में बात करते हैं लेकिन डेरे अलग-अलग हैं, चाहे वे किसी भी समुदाय से हों. मैंने अपनी आत्मकथा 'छांगया रुख' में लिखा है कि हमें गुरुद्वारों में जाने की इजाज़त नहीं थी. इसीलिए 1920 के दशक में होशियारपुर और जालंधर इलाके में कई डेरे बनाए गए.''

इन डेरों की आय का स्रोत उनकी ज़मीन, उनके द्वारा तैयार की गई खाद्य सामग्री जो भक्तों द्वारा खरीदी जाती है और भक्तों द्वारा दिया गया दान है.

राजनीतिक प्रभाव वाले मुख्य डेरे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में गुरु रविदास मंदिर में मत्था टेका था

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डेरे का अर्थ है एक स्थान पर रहना शुरू कर देना. इसके साथ ही यह एक धार्मिक सभा से भी जुड़ा होता है और डेरे के प्रमुख को डेरादार कहा जाता है.

इतिहास में सिख धर्म के साथ-साथ नानकपंथी, सेवापंथी, उदासिये आदि गुट उभरते रहे हैं.

लेकिन सिखों के पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से जुड़े कई डेरों के साथ तीखे मतभेद रहे हैं.

साल 1978 में निरंकारियों, 2001 में भनियावाला, 2002 में डेरा नूरमाहिल, 2008-2009 में डेरा सच्चा सौदा समर्थकों के साथ सिखों की हिंसक झड़पें हुईं.

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. प्रमोद ने बीबीसी से कहा कि नई उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के साथ डेरों ने अपना स्वरूप बदल लिया है. डेरों ने अपनी एक कॉर्पोरेट पहचान बनाई है.

''पंजाब में 6-7 डेरे हैं, जो एक तरह के कॉर्पोरेट हैं. जब डेरे कॉर्पोरेट हो गए तो सत्ता की राजनीति शुरू हो गई. उन्होंने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में भाग लेना शुरू कर दिया, बाज़ार से जुड़ना शुरू कर दिया और अपने उत्पाद खुद बनाने शुरू कर दिए.''

इस समय पंजाब और हरियाणा में निम्नलिखित डेरे सक्रिय हैं.

डेरा सच्चा सौदा सिरसा (हरियाणा)

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम

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डेरा सच्चा सौदा पंजाब के साथ लगते हरियाणा के सिरसा में है. इस डेरे के मुखिया गुरमीत सिंह राम रहीम रेप और हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं.

साल 2017 में जब राम रहीम को सज़ा सुनाई गई तो उसके अनुयायियों ने पंजाब और हरियाणा में बड़े पैमाने पर हिंसा की थी. इसमें 38 लोगों की मौत हो गई थी.

साल 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब के कथित अपमान के मामले में इस डेरे के अनुयायियों का नाम सामने आया था.

डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव पंजाब के मालवा क्षेत्र के संगरूर, मनसा, बठिंडा, फिरोज़पुर और फाज़िल्का आदि ज़िलों में है.

लेकिन पिछले दिनों हुई इन घटनाओं के बाद डेरे के कई अनुयायियों ने वहां जाना बंद कर दिया था.

इस बार डेरे की राजनीतिक शाखा को भंग कर दिया गया है. यही विंग तय करता था कि डेरा प्रेमी (समर्थक) किस पार्टी को वोट देंगे.

डेरे के नाम काफी ज़मीन है. डेरे में खाने-पीने का काफी सामान भी बिकता है, जिसे अनुयायी खरीदते हैं.

कांग्रेस, अकाली दल और बीजेपी नेताओं को अक्सर डेरे में आते देखा गया.

2002 के विधानसभा चुनाव में डेरा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह का समर्थन किया था. उस साल कांग्रेस सत्ता में आई थी.

साल 2007 में भी डेरा ने कांग्रेस को समर्थन दिया था, लेकिन कांग्रेस हार गई थी.

डेरा राधा स्वामी ब्यास

डेरा राधा स्वामी ब्यास की स्थापना 1891 में हुई थी

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डेरा राधा स्वामी ब्यास की वेबसाइट के अनुसार, इसकी स्थापना 1891 में हुई थी. आज 90 देशों में इसके अनुयायी हैं.

डेरा का दावा है कि उसका किसी भी राजनीतिक दल से कोई राजनीतिक या व्यापारिक संबंध नहीं है.

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और अन्य राजनीतिक नेता अक्सर डेरे में आते रहते हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी डेरे में आए हैं.

डेरा ने कभी भी किसी पार्टी से चुनाव में वोट देने के लिए नहीं कहा.

लेकिन हर चुनाव के दौरान इस डेरे का एक खास पार्टी के प्रति झुकाव होने की चर्चा होती रहती है, लेकिन इस तरह के दावों की कभी भी डेरे की ओर से सार्वजनिक तौर पर पुष्टि नहीं की गई है.

इस डेरे के पंजाब और हरियाणा सहित भारत के लगभग हर शहर और कस्बे में सत्संग घर हैं, जहां साप्ताहिक सभाएं आयोजित की जाती हैं.

डेरा सचखंड बल्लां

डेरा सचखंड बलां के अनुयायियों में बड़ी संख्या दलितों की है

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डेरा सचखंड बल्लां पंजाब के दोआब क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक डेरों में से एक है. इसका मुख्य असर जालंधर और होशियारपुर लोकसभा सीटों पर है.

चूंकि इसका उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक बड़ा डेरा है, इसलिए इसका प्रभाव पंजाब के बाहर रविदासी समुदाय में भी देखा जा सकता है.

यह डेरा जालंधर शहर से 13 कि.मी. बाहर पठानकोट रोड पर गांव बल्लां में नहर के किनारे स्थित है.

इस डेरे में बड़ी संख्या में दलित समुदाय और खासकर रविदासिया समुदाय के लोग धार्मिक आस्था रखते हैं.

इस डेरे की पहचान का अंदाज़ा डेरे में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या से लगाया जा सकता है.

इसके साथ ही खासकर चुनाव के करीब बड़े नेताओं के डेरे में पहुंचने से सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी इसका महत्व समझ में आता है.

डेरा सचखंड बल्लां का संबंध समाज सुधारक बाबू मंगूराम मुगोवालिया से भी रहा है. मंगूराम की पृष्ठभूमि होशियापुर ज़िले के माहिलपुर कस्बे की थी. वह 1909 में पढ़ाई करने अमेरिका गए थे.

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही इस डेरे में नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है.

डेरा निरंकारी

पंजाब में निरंकारी और सिखों में हिंसक झड़पें होती रही हैं

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संत निरंकारी मिशन पिछले 90 सालों से चल रहा है. निरंकारी मिशन एकता, प्रेम, शांति, सहिष्णुता और निस्वार्थ की बात करता है.

इस संस्था की वर्तमान प्रमुख सुदीक्षा हैं. इस डेरे के अनुयायी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हैं.

निरंकारियों और सिखों के बीच काफ़ी विवाद रहा है.

साल 1978 में अमृतसर में एक कार्यक्रम के दौरान 16 लोगों की मौत हो गई थी.

मृतकों में 13 सिख और तीन निरंकारी थे. यह घटना राज्य में विद्रोह का शुरुआती बिंदु थी. इसके कारण 1980 और 90 के दशक में राज्य में हज़ारों मौतें हुईं.

डेरे की राजनीतिक गतिविधियां बहुत प्रभावी नहीं हैं, लेकिन इन का आंतरिक काफी प्रभाव है.

नूर महल डेरा- दिव्य ज्योति जागृति संस्थान

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के प्रमुख आशुतोष 'महाराज' को डॉक्टरों ने चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिया है, लेकिन उनका शव अभी भी डेरे में पड़ा हुआ है.

जनवरी 2014 में डॉक्टरों ने आशुतोष को चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिया था.

यह डेरा जालंधर से करीब 34 कि.मी. दूर नूरमहल में है. इस डेरे का काफी प्रभाव है.

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी प्रणीत कौर डेरे में जाते रहे हैं.

इस डेरे का प्रभाव जालंधर और पटियाला की सीटों पर देखा जा सकता है

क्या डेरे चुनाव को प्रभावित करते हैं?

डेरा सचखंड बलां के प्रमुख के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान

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डेरा सच्चा सौदा ने 2002 और 2007 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का समर्थन किया. इसके अलावा कई बार व्यक्तिगत तौर पर भी उम्मीदवार का समर्थन किया जाता रहा है.

डेरा सचखंड बल्लां ने कभी सीधे तौर पर किसी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा नहीं की है, लेकिन दोआब इलाके की दलित आबादी को देखते हुए राजनीतिक दलों के नेता अक्सर डेरे का दौरा करते रहते हैं.

जानकारों का कहना है कि इन खेमों का चुनाव पर खासा असर पड़ता है, लेकिन इसके अलावा भी कई चीजें हैं जो वोटर को प्रभावित करती हैं.

वरिष्ठ पत्रकार जसपाल सिद्धू का मानना ​​है कि धर्म और डेरा एक ही चीज़ हैं.

JASPAL SINGH
कई डेरे काफी बड़े हो गए हैं. इसलिए वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं. पिछले दिनों कई डेरा मुखी प्रधानमंत्री से मुलाकात करते नज़र आए थे.
जसपाल सिंह
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार

वो कहते हैं, ''कई डेरे काफी बड़े हो गए हैं. इसलिए वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं. पिछले दिनों कई डेरा मुखी प्रधानमंत्री से मुलाकात करते नज़र आए थे.''

सिद्धू का मानना ​​है कि जेल जाने के बाद भी गुरमीत राम रहीम का प्रभाव कम नहीं हुआ. इसके चलते सरकार ने उन्हें पैरोल दे दी.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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प्रोफ़ेसर नरेंद्र कपूर कहते हैं, ''डेरे के लोगों का अपने भक्तों पर प्रभाव होता है. लेकिन ऐसा भी नहीं होता कि कोई नेता डेरे में जाएगा तो उसे समर्थकों का वोट मिल जाएगा. लोग स्थानीय उम्मीदवार को उसके काम के आधार पर भी वोट देते हैं."

पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के राजनीति विभाग के पूर्व सहायक प्रोफेसर डॉक्टर जतिंदर सिंह कहते हैं कि सिर्फ डेरा ही नहीं बल्कि कई तत्व वोटों को प्रभावित करते हैं.

JATINDER SINGH
कांग्रेस और अकाली दल का अपना कैडर है. कभी-कभी लोग किसी विशेष घटना के कारण उम्मीदवार से जुड़ते हैं. अगर मतदाता दुविधा में है तो कई बार उसे जहां भरोसा होगा, उनकी बात मान भी लेते हैं.
डॉक्टर जतिंदर सिंह
पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के पूर्व सहायक प्रोफेसर

उनके मुताबिक, ''कांग्रेस और अकाली दल का अपना कैडर है. कभी-कभी लोग किसी विशेष घटना के कारण उम्मीदवार से जुड़ते हैं. अगर मतदाता दुविधा में है तो कई बार उसे जहां भरोसा होगा, उनकी बात मान भी लेते हैं.''

वो कहते हैं, ''इसे लोकतंत्र के लिए अच्छा या बुरा नहीं कहा जा सकता. मतदान करना और डेरे जाना दोनों मानव जीवन का हिस्सा हैं. डेरे की अपनी राजनीति हो सकती है लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि डेरा जो कहे, अनुयायी उसी पर वोट करें.''

(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)

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