अफ़ग़ान नागरिकों को जबरन वापस भेज रहा है पाकिस्तान, क्या कह रहे हैं अफ़ग़ान

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    • Author, अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, पेशावर

"अचानक अब बहुत डर बढ़ गया है. मुझे अपने भविष्य का डर तो है ही, साथ में मुझे अपनी शिक्षा की चिंता है क्योंकि मैं अगर वापस अफ़ग़ानिस्तान चली गई तो अपनी शिक्षा जारी नहीं रख सकूंगी."

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान आने वाली सादिया (बदला हुआ नाम) इस समय मानसिक तनाव में हैं.

जब से पाकिस्तान सरकार ने यह घोषणा की है कि पाकिस्तान में रह रहे उन अफ़ग़ान नागरिकों को उनके देश वापस भेज दिया जाएगा, जिनके पास पाकिस्तान में रहने के दस्तावेज़ नहीं हैं, तब से सादिया समेत कई अफ़ग़ान नागरिक डर में जीवन बिता रहे हैं.

सादिया कहती हैं, "रात की नींद उड़ गई है और एक डर मेरे इर्द-गिर्द मंडराता रहता है. मेरे और मेरे घर वालों के वीज़ों की अवधि ख़त्म हो रही है. मालूम नहीं वीज़ा का विस्तार होगा या नहीं और यह सोचकर भी डर लगता है कि एक नवंबर के बाद हमारे साथ क्या कुछ हो सकता है."

पाकिस्तान में रह रहे अफ़ग़ान नागरिक इन दिनों एक अविश्वास की स्थिति में जी रहे हैं और उन्हें नहीं मालूम कि सरकार एक नवंबर के बाद उनके साथ क्या सलूक करेगी.

पाकिस्तान सरकार ने ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे विदेशियों को 31 अक्टूबर तक देश छोड़ने की मोहलत दे रखी है और एक नवंबर से उन्हें बाहर करने के लिए देशव्यापी ऑपरेशन की चेतावनी दी है.

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पाकिस्तान ने अफ़ग़ान नागरिकों को वापस भेजने का निर्णय क्यों किया?

प्रभारी केंद्रीय गृह मंत्री सरफराज़ बुगती के अनुसार, पाकिस्तान में लगभग 17 लाख अफ़ग़ान ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे हैं और उनके पास पाकिस्तान में रहने के काग़ज़ात नहीं हैं.

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों की संस्था के अनुसार, पाकिस्तान में विभिन्न संस्थाओं से रजिस्टर्ड अफ़ग़ान नागरिकों की संख्या लगभग 31 लाख तक है.

पाकिस्तान में हिंसा की घटनाओं और अपराध की दर में वृद्धि, डॉलर्स की स्मगलिंग और दूसरी घटनाओं में कुछ अफ़ग़ान नागरिकों के कथित तौर पर शामिल होने की सूचना मिली हुई थी.

ध्यान रहे कि सरकार की ओर से अब तक इस बारे में पुख़्ता सबूत आम लोगों के बीच नहीं लाए गए हैं. लेकिन केंद्र और राज्य के स्तर पर ऐक्शन कमिटी की बैठकों में अफ़ग़ान नागरिकों की वापसी से संबंधित कई फ़ैसले किए गए थे.

उनमें एक फ़ैसला यह था कि पाकिस्तान में ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों को उनके देश वापस भेजा जाएगा और उसके लिए 31 अक्टूबर की तारीख़ तय की गई थी, जिसके बाद उन अफ़ग़ान नागरिकों के ख़िलाफ़ फ़ॉरेन ऐक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी.

इसके लिए केंद्र सरकार ने एक नवंबर 2023 से ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे अफ़ग़ान शरणार्थियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की घोषणा की है और यह कार्रवाई फ़ॉरेन ऐक्ट 1946 के सेक्शन तीन के तहत की जाएगी.

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अफ़ग़ान सरकार का रुख़

अफ़ग़ानिस्तान में प्रभारी सरकार के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा था कि अफ़ग़ान शरणार्थियों को पाकिस्तान से निकालने का फ़ैसला स्वीकार्य नहीं है.

उनका कहना था कि पाकिस्तान का यह स्टैंड भी सही नहीं है कि पाकिस्तान में रह रहे अफ़ग़ान ग़ैर क़ानूनी गतिविधियों में शामिल हैं. उन्होंने कहा कि अफ़ग़ान नागरिकों की वापसी पूरी तरह ऐच्छिक होनी चाहिए.

अफ़ग़ानिस्तान की प्रभारी सरकार के क़तर में पॉलिटिकल ऑफ़िस के इंचार्ज सुहैल शाहीन ने बीबीसी को बताया कि अफ़ग़ान सरकार देश वापस आने वाले नागरिकों का अफ़ग़ानिस्तान में स्वागत करेगी.

उन्होंने कहा, "संबंधित अधिकारियों ने इस बारे में विभिन्न कमिटियां बना दी हैं ताकि वापस आने वाले अफ़ग़ान नागरिकों को बसाया जाए और उनकी ज़रूरतों का ध्यान रखा जाए."

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"मुझे अपने परिवार के साथ अपनी शिक्षा की चिंता"

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पेशावर के एक ऐसे इलाक़े में जहाँ, अधिकतर अफ़ग़ान परिवार रहते हैं, वहां गली कूचों से होते हुए हम एक मकान के बाहर पहुंचे.

यहाँ छह लोगों का एक अफ़ग़ान परिवार रह रहा है जो एक साल के वीज़े पर लगभग एक साल पहले पाकिस्तान आया था.

सादिया (बदला हुआ नाम) बड़ी बेटी हैं जो एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ रही हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि उनके लिए पाकिस्तान में रहने की एक बड़ी वजह शिक्षा प्राप्त करना है.

वह बताती हैं, "मेरी शादी अफ़ग़ानिस्तान में हुई है लेकिन मैं वहाँ ख़ुश नहीं थी इसलिए अपने माता पिता के घर वापस आ गई."

"अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने के बाद हम अपने घरों तक सीमित होकर रह गए थे. रोज़मर्रा का सामान लेने भी घर से बाहर नहीं जा सकते थे. मजबूरी की हालत में भाई या पिता के साथ बाहर निकल सकते थे."

वह कहती हैं, "हमारा स्कूल बंद हो गया था. लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी गई. काबुल में इस पर प्रदर्शन हुए लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. बस लड़कियों को शिक्षा की इजाज़त नहीं दी जा रही थी."

सादिया ने बताया, "हमारे हालात हर आने वाले दिन के साथ बदतर होते जा रहे थे. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. बहुत कोशिश की कि किसी तरह अफ़ग़ानिस्तान में हालात बेहतर हों और बाहर किसी देश जाना न पड़े लेकिन ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा था."

फिर उनके अब्बू और भाई ने पाकिस्तान जाने के लिए कोशिशें शुरू कीं और उनका परिवार पाकिस्तान आ गया.

यह परिवार पहले इस्लामाबाद गया और फिर पेशावर आकर बस गया. "यहाँ हमें जानने वाला कोई नहीं है. शुरू में मुश्किल थी, लेकिन लगातार कोशिशों से हालात कुछ बेहतर हो गए थे. जीवन की गाड़ी चल निकली थी. मेरी शिक्षा का सिलसिला शुरू हो गया था और भाई भी कारोबार शुरू करने की तैयारी कर रहे थे कि इतने में पाकिस्तान सरकार की घोषणा हुई कि ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे विदेशियों को एक नवंबर से वापस भेजा जाएगा."

वह बताती हैं, "वह दिन है और आज का दिन है कि मैं मानसिक तनाव का शिकार हूं और इसी सोच में डूबी रहती हूं कि अब क्या होगा? क्या हमें वापस अफ़ग़ानिस्तान भेज दिया जाएगा, जहाँ हमें ख़तरों का सामना होगा? और दूसरी बात यह कि मेरी शिक्षा का सिलसिला टूट जाएगा."

वह कहती हैं, "अब घर वाले सब परेशान हैं कि क्या करें. हम किसी और देश नहीं जा सकते, वापस अफ़ग़ानिस्तान जाने में ख़तरे हैं और पाकिस्तान में अब सरकार हमें रहने नहीं देगी."

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कहानी घर-घर की

पाकिस्तान में ग़ैर क़ानूनी ढंग से रह रहे विदेशी लोग इन दिनों इस कश्मकश में हैं कि अब वह क्या करें. सरकार की ओर से ज़ाहिर तौर पर यह कार्रवाई विदेशियों के बारे में बताई जा रही है लेकिन असल में यह कार्रवाई ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों के ख़िलाफ़ नज़र आती है.

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से पहले भी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में ऐसे अफ़ग़ान शरणार्थी मौजूद थे, जिनके पास यात्रा के सभी काग़ज़ात या पाकिस्तान में रहने के ज़रूरी दस्तावेज़ नहीं थे.

इस समय वह अफ़ग़ान, जिनके पास पाकिस्तान में रहने के दस्तावेज़ नहीं हैं, उनके लिए हालात मुश्किल हैं. सज्जाद (बदला हुआ नाम) भी ऐसी ही मुश्किलों का शिकार हैं.

सन 2017 में जब संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों की संस्था की ओर से एक मुहिम शुरू की गई थी, जिसमें अपनी मर्ज़ी से वापस जाने वाले शरणार्थियों को दोगुनी सहायता दी जा रही थी तो वह वापस अफ़ग़ानिस्तान चले गए थे.

उनका कहना था कि वह यह सोचकर गए थे कि अब अफ़ग़ानिस्तान में शांति रहेगी और राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार वापस आने वाले अफ़ग़ान नागरिकों को सुविधाएं भी दे रही है तो हम वापस अफ़ग़ानिस्तान चले गए थे.

उन्होंने बताया कि इसके लिए उनके पाकिस्तान में रहने के दस्तावेज़ ख़त्म कर दिए गए थे यानी उनका पीओआर (प्रूफ़ ऑफ़ रजिस्ट्रेशन) कार्ड कैंसिल कर दिया गया था.

वह बताते हैं, "शुरुआत में मैं अपने बच्चों को साथ नहीं लेकर गया था, वो पाकिस्तान में थे. अफ़ग़ानिस्तान पहुंचकर मालूम हुआ कि वहां न कारोबार था, और न ही कोई काम था बल्कि हालात बहुत ख़राब थे.

"मुझे अहसास हुआ कि यह ग़लती हो गई है, अब वापस पाकिस्तान कैसे जाऊं. यह भी एक मुश्किल स्थिति थी."

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सज्जाद ने बताया कि वह बड़ी मुश्किल से वापस पाकिस्तान पहुँचे और यहाँ आकर संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों की संस्था में दोबारा आवेदन दिया जिस पर उन्हें सारी जानकारी दर्ज करके एक टोकन दे दिया गया.

"अब मेरे पास वह टोकन है लेकिन कोई कार्ड नहीं है जबकि मेरे बच्चों के पास यहां रहने का कार्ड है."

सज्जाद इस समय इस कश्मकश में है कि उनके साथ क्या होगा. इसलिए वह घर और घर से अपने काम की जगह तक ही जाते हैं और सौदा लाने और दूसरे कामों के लिए बच्चों को बाहर भेजते हैं

केवल सज्जाद ही नहीं, उनके काम की जगह पर उनके अलावा भी ऐसे अफ़ग़ान काम करते हैं जिनके पास पाकिस्तान में रहने के दस्तावेज़ नहीं हैं.

अब्दुस्सलाम (बदला हुआ नाम) एक युवा अफ़ग़ान हैं. वह घर-घर जाकर कबाड़ का सामान ख़रीद कर बेचते हैं.

अब्दुस्सलाम ने बताया कि उनके पास पीओआर कार्ड है. उनकी पैदाईश पाकिस्तान की है. उनके पिता छोटी उम्र में पाकिस्तान आए थे और उन्होंने यहीं शादी की थी.

वह कहते हैं कि अब इलाक़े में डर है कि क्या जिनके पास कार्ड है वह भी वापस भेजे जाएंगे?

उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया है कि जिनके पास पाकिस्तान में रहने के कार्ड हैं उन्हें शुरुआती तौर पर नहीं भेजा जाएगा लेकिन बाद में उनके बारे में भी कोई फ़ैसला होगा.

इस वजह से वह सब परेशान है कि अगर उनके खिलाफ कार्रवाई हुई तो वह क्या करेंगे? वह तो अफ़ग़ानिस्तान में भी किसी को नहीं जानते.

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अफ़ग़ान कलाकारों का क्या होगा?

अफ़ग़ानिस्तान में दो साल पहले तालिबान ने अपनी प्रभारी सरकार बनाई तो उस समय अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने वालों में वैचारिक विरोधी या पिछली सरकार के साथ और विदेशियों के साथ काम करने वालों के साथ-साथ बड़ी संख्या में संगीत से जुड़े लोग भी अफ़ग़ानिस्तान से निकल गए थे.

उनमें अधिकतर लोग पाकिस्तान पहुंचे थे. उन कलाकारों के अनुसार, केवल पेशावर और उसके आसपास में लगभग 800 अफ़ग़ान कलाकार रह रहे हैं, जिनमें से अधिकतर के पास यहाँ रहने के दस्तावेज़ नहीं हैं.

सोहैल (बदला हुआ नाम) एक अफ़ग़ान गायक हैं जो फ़ारसी और पश्तो में गाने गाते हैं. उनके भाई भी एक नामी गायक हैं.

वह अफ़ग़ानिस्तान में दो साल पहले तालिबान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान आ गए थे.

काबुल से इस्लामाबाद तक उनकी यात्रा किसी एडवेंचर से काम नहीं थी. यह वह समय था जब काबुल के महल में तालिबान आ गए थे और हर ओर डर का माहौल था, और लोग भाग रहे थे. जिन जहाज़ों पर विदेशी सवार हो रहे थे उनके साथ स्थानीय लोग भी दौड़ लगा रहे थे.

सोहैल घर वालों के साथ बड़ी मुश्किल से इस्लामाबाद पहुंचे थे. अभी उनके पास भी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था का एक परवाना है लेकिन उन्हें अब तक पूरे दस्तावेज़ या कार्ड नहीं दिया गया है।

सोहैल ने बीबीसी को बताया कि इस समय एक अविश्वास का माहौल है. वह कहते हैं, "हम कलाकार तो यह सोचते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में इन हालात में हमारे लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि हम संगीत से जुड़े हुए लोग हैं और अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान संगीत की इजाज़त नहीं देते तो ऐसे में वहां जाकर क्या करेंगे क्योंकि हमें तो और कोई काम भी नहीं आता."

वह कहते हैं, "हम यहां अपने घर से अधिक दूर नहीं जाते हैं, बस रोज़मर्रा का सामान यहां पास से ही ले लेते हैं. इसी तरह गुज़ारा करते हैं. हालांकि हमें अब तक पुलिस या किसी संस्था की ओर से कुछ नहीं कहा गया और ज़ाहिर तौर पर ऐसा लगता है कि यह अभियान अधिकतर सोशल मीडिया की वजह से है जिससे यहां लोगों में डर पाया जाता है."

उनका कहना था, "हम अब जाकर कुछ काम शुरू कर सकते थे. हमें यहां संगीत के प्रोग्राम में बुलाया जा रहा था और शादी ब्याह के उत्सव में शामिल बुलाते थे लेकिन अब इस नई घोषणा के बाद हमारे लिए हालात वैसे अच्छे नहीं रहे."

पेशावर सदर, तहकाल और क़िस्साख़्वानी के इलाक़ों में ऐसे अफ़ग़ान कलाकार हैं जो किराए पर मकान लेकर रह रहे हैं. इनमें अधिकतर संगीत से जुड़े हुए लोग हैं.

उन लोगों में डर और अविश्वास की स्थिति इस हद तक थी कि वो मीडिया से बात करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. इसके अलावा उनका कहना था कि हालात ऐसे नहीं है कि वह मीडिया से बात करें. "बस हम हालात का जायज़ा ले रहे हैं, देखते हैं कि क्या होता है?"

इस तरह इस्लामाबाद, क्वेटा और कराची में भी संगीत या कला से जुड़े लोग इन दोनों सामने नहीं आ रहे लेकिन उनमें डर पाया जाता है.

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संयुक्त राष्ट्र क्या कर रहा है?

इस समय अफ़ग़ान शरणार्थी की बड़ी संख्या ने रजिस्ट्रेशन के लिए अपने काग़ज़ात संयुक्त राष्ट्र की संस्था में जमा करवाए हैं लेकिन अब तक उन्हें कोई साफ़ आदेश नहीं दिया जा रहा.

पेशावर में रहने वाले अफ़ग़ान नागरिकों ने बताया कि उनके पास केवल टोकन है जो उन्हें यूएनएचसीआर (यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फ़ॉर रिफ़्यूजीज़) की ओर से दिया गया है लेकिन उनके पास कोई कार्ड नहीं है.

यूएनएचसीआर की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार ने चार दशकों से अधिक समय तक अफ़ग़ान शरणार्थियों को अपने यहां रखा है और विश्व स्तर पर इसको अच्छी निगाह से देखा जाता है लेकिन इसमें और कोशिशों की ज़रूरत है.

इस बयान में कहा गया है कि शरणार्थियों की वापसी ऐच्छिक तौर पर होनी चाहिए और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान सरकार के साथ प्रक्रिया तय कर सकता है.

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क्या यही बेहतर फ़ैसला है?

पाकिस्तान की ओर से ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे अफ़ग़ान शरणार्थियों के ख़िलाफ़ अचानक इस तरह की कार्रवाई के बाद विश्लेषकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है.

विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की प्रभारी सरकार को मान्यता नहीं मिली है लेकिन इसके बावजूद इससे कूटनीतिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं और इससे दोनों देशों के बीच तनाव में इज़ाफ़ा हो सकता है.

पेशावर में उद्यमी मोहम्मद इसहाक़ ने बताया कि हालांकि किसी हद तक इस फ़ैसले से कारोबार पर असर पड़ेगा लेकिन इतना अधिक नहीं होगा क्योंकि 2017 में जब ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में कार्रवाई की गई थी तो उस समय अधिकतर ने अपने कारोबार को अफ़ग़ानिस्तान स्थानांतरित कर दिया था.

पाकिस्तान में अफ़ग़ान शरणार्थियों के लिए बने कार्यालय के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि पाकिस्तान सरकार के लिए इस योजना पर अमल करना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि उन अफ़ग़ान नागरिकों को वापस भेजने के लिए पैसों की ज़रूरत होगी, और इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और दूसरी व्यवस्था करनी होगी. दूसरी ओर इसकी प्रतिक्रिया भी कड़ी हो सकती है.

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सरकार के इस फ़ैसले का समर्थन करते हुए कहा कि क़ानून पर अमल होना चाहिए और जो भी ग़ैर क़ानूनी तौर पर यहां रह रहे हैं उनके बारे में सरकार को उचित फ़ैसला करना चाहिए.

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