हिप्पियों की दुनिया: कौन थे नशे की तलाश में यूरोप से पाकिस्तान और भारत पहुँचने वाले फक्कड़

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- Author, वक़ार मुस्तफ़ा
- पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता, इस्लामाबाद से
यह सत्तर के दशक की बात है. भारत में घूमती चिलम के बीच झूमती ज़ीनत अमान 'दम मारो दम' गाती हैं तो पाकिस्तान में एक गुफा में सिगरेट लिए शबनम की पुकार 'दम दमा दम, पीके ज़रा देखो' है.
पहला गाना गाया 1971 की फ़िल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' के लिए आशा भोसले ने और दूसरा नैयरा नूर ने 1974 की फ़िल्म 'मिस हिप्पी' के लिए. धुआं धुआं सेट पर फ़िल्माए गए गीतों में अधिकतर चेहरे लिबास और बर्ताव में फक्कड़ युवा हैं.
ये हिप्पी हैं.
अमेरिकी संचार माध्यमों में यह नाम 1960 के दशक के ऐसे युवाओं को दिया जिन्हें भौतिकतावादी विरोधी 'बीटनिक्स' का विकसित होता रूप कहा जा सकता है.
बीटनिक्स ने 1950 और 1960 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी संस्कृति को रद्द करते हुए कविता, संगीत और चित्रकारी के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति की.
वियतनाम के युद्ध और उसके लिए भर्ती का विरोध करते ये युवा चरस पीने, यौन संबंधों में आज़ादी और बाल न कटवाने की वकालत करते.
फक्कड़ बाग़ियों का 'हिप्पी ट्रेल'

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सभी राष्ट्रीयताओं के हिप्पियों का 1965 और 1980 के बीच यूरोप से नशे की तलाश में अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भारत और सर्दियों में गोवा तक का ज़मीनी सफ़र ब्रिटेन में 'हिप्पी ट्रेल' कहलाया. इसी को अमेरिकी मीडिया 'हशीश ट्रेल' कहता था.
लेकिन सन 1967 तक 'बीटनिक' की जगह 'हिप्पी' शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था.
सन 1968 में जब रॉक बैंड 'बीटल्स' ने भारत का दौरा किया तो पश्चिमी यूरोप से आने वाले युवाओं की संख्या में काफ़ी इज़ाफ़ा होना शुरू हो गया. कुछ केवल दुनिया देखना चाहते थे.
हिप्पी ट्रेल के दिनों में पाबंदी थी कि कोई व्यक्ति कितनी रक़म नक़द लेकर जा सकता है.
सन 1974 में ब्रिटेन में यह हद 25 पाउंड थी. इसकी बजाय हर एक को कमीशन अदा करके बैंक से ट्रैवलर्स चेक ख़रीदना पड़ता था. यात्रा करने वाले अमेरिकी डॉलर की स्मगलिंग भी करते.
हिप्पी ट्रेल के यात्री ख़ुद को 'हिप्पी' नहीं कहते थे बल्कि फ़्रीक्स कहलाना पसंद करते थे.
ये चरस- गांजा तो हिप्पियों के जीवन का एक पहलू है. हिप्पी ऐसे युवक थे जो आम तौर पर लिबास और बर्ताव में आज़ाद ख़्याल और अपनी पसंद व सोच में समझौतावादी थे.
कई देशों की यात्रा करने वाले लेखक फ़र्रुख़ सोहैल गोइंदी लिखते हैं कि ये ऐसे बाग़ी थे जिन्होंने कभी किसी को अपने विद्रोही जीवन में हिंसा का निशाना नहीं बनाया.
"माल दौलत में धनी और पूंजीवादी जीवन शैली के इन विद्रोहियों ने जहां जहां-क़दम रखे, अपनी छाप छोड़ते चले गए. उनके लिए खाद और केमिकल्स से सुरक्षित किए गए भोजन को हाथ लगाना पाप था. यहां तक कि वे नहाते भी कम ही थे. कपड़े भी जितना कम संभव हो, उतना कम पहते थे. बाल कटवाना तो उन विद्रोहियों की नज़र में बहुत बुरी बात थी."
उन्होंने लिखा है, "विद्रोहियों का यह एक अजीब आंदोलन था जिसका कोई नेता नहीं था. कोई ऑफ़िस, सचिवालय, छ्पे हुए नियम, पदाधिकारी, नेता और सदस्यता जैसी चीज़ें नहीं थीं. पूरी तरह आज़ाद और अपनी मर्ज़ी वाला आंदोलन था. शीत युद्ध के ज़माने में जन्म लेने वाले इन विद्रोहियों ने विश्व की राजनीति और संस्कृति पर ऐसे छाप छोड़ी कि विश्व की शक्तियां अपने संसाधनों और प्रॉपेगैंडा से भी नहीं कर पाईं.
हिप्पी ट्रेल के कुछ यात्री अफ़ग़ानिस्तान क्यों रुक जाते थे?

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रिचर्ड ग्रेगोरी ख़ुद भी युवावस्था में ट्रेल का हिस्सा बने. वह लिखते हैं कि हिप्पी ट्रेल इस्तांबुल से शुरू होती जहां यूरोप की सभी सड़कें मिलती हैं.
हिप्पी ट्रेल के साथ-साथ मशहूर होने वाले होटल इस्तांबुल में गुलहाए, तेहरान मैं अमीर कबीर, काबुल में मुस्तफ़ा, पेशावर में रेनबो, लाहौर में एशिया होटल, दिल्ली में क्राउन और बंबई में रेक्स एंड स्टीफ़ल्स थे.
ग्रेगोरी कहते हैं कि उनकी जगह दूसरे होटल बेहतर और आम तौर पर सस्ते होते थे.
वे बताते हैं, "मुझे कंधार में न्यू टूरिस्ट, काबुल में पीस और पोखरा (नेपाल) में व्हाइट हाउस के नाम याद हैं. श्रीनगर में हाउसबोट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता था जबकि गोवा में लोग स्थानीय मकान किराए पर लेते थे. पेशावर और लाहौर में आधुनिक ऊंचे होटलों का इस्तेमाल करते थे."
उन्होंने लिखा, "जब मैं इस्तांबुल से गुज़रा तो गुलहाए पुलिस के छापों के लिए बदनाम था और उसके आसपास बहुत से दूसरे होटल मौजूद थे जिनमें से एक का मैंने इस्तेमाल किया.
सुल्तान अहमद, इस्तांबुल के लेले रेस्तरां को दुनिया भर के लोग पुडिंग शॉप के नाम से जानते थे. यह 1957 में खोला गया.
नीली मस्जिद और हाया सोफ़िया के पास की यह जगह आदर्श थी. काठमांडू जाते हुए लगभग हर व्यक्ति इस्तांबुल से गुज़रता था और ओवरलैंड बसें आसपास सस्ते होटलों के पास खड़ी होती थीं.
ग्रेगोरी के अनुसार इस्तांबुल में बहुत से आकर्षक स्थान हैं, लेकिन यह यूरोप में है.
ग्रेगोरी के अनुसार, "हिप्पी ट्रेल पर आपकी मुहिम तब तक शुरू नहीं होती जबतक आप उसे पीछे नहीं छोड़ देते."
कुछ लोग दक्षिण में मध्य पूर्व में हशीश पैदा करने वाले एक महत्वपूर्ण देश लेबनान की ओर निकल जाते या तुर्की से यह रास्ता तब शाह (रज़ा शाह पहलवी) के राज में एक सेक्यूलर देश ईरान से होता हुआ अफ़ग़ानिस्तान जा निकलता.
अफ़ग़ानिस्तान के बड़े शहरों में होटल, कैफ़े और रेस्तरां हैं जिनके ग्राहक विशेष तौर पर 'हिप्पी ट्रेलर्स' थे.
ग्रेगोरी के अनुसार दुनिया की बेहतरीन चरस पीते यात्री एक दूसरे को कहानी सुनाते और राय देते कि अगले शहर में कहां जाना है.
हर ऐसे स्थान की एक ख़ास बात वह लाइब्रेरी थी, जहां बहुत सी भाषाओं में पेपरबैक्स का एक अंतरराष्ट्रीय संकलन होता, जो यात्री छोड़ जाते थे.
ग्रेगोरी के अनुसार हेरात हिप्पी ट्रेल पर पहली असली मंज़िल थी.
"यहां जीवन की गति सुस्त थी. प्रभावी ट्रैफ़िक व्यवस्था बहुत कम थी. मुख्य सड़कों पर अधिकतर घोड़ों, गधों और ऊंटों से चलने वाली गाड़ियां और तांगे थे."
हिप्पी ट्रेल पर एक और मशहूर रेस्तरां काबुल में एक जर्मन, सेगी का होटल था, जिसमें अच्छा खाना और चावल की खीर के साथ-साथ हरी चाय और शतरंज के बोर्ड भी मिलते थे.
रिचर्ड नेवेल ने अपने 1966 के लेख में काबुल के ख़ैबर रेस्त्रां के बारे में लिखा है. वह उस समय शहर की इकलौती जगह थी जहां पश्चिमी तर्ज़ का खाना पेश किया जाता था.
अफ़ग़ानिस्तान मैं होटल के आसपास बहुत से व्यापारी हाथ से बुना कपड़ा, चमड़े का सामान और क़ालीन बेचते थे और अधिकतर व्यापारियों के पास चरस भी होती थी; अपने लिए और बेचने के लिए भी.
शायद इसीलिए कुछ लोग अफ़ग़ानिस्तान से आगे नहीं जाते थे.
पाकिस्तान में सूफ़ियों के मज़ार 'हिप्पियों का ठिकाना बने'

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अफ़ग़ानिस्तान के बाद बहुत से मोड़ थे. पाकिस्तान में दाख़िल होने पर उत्तर की ओर स्वात और चित्राल की तरफ़ बढ़ा जा सकता था.
लेखक नदीम फ़ारूक़ पराचा के अनुसार जब पाकिस्तान हिप्पी ट्रेल में बीच का मंज़िल बना तो पेशावर, स्वात, लाहौर और कराची हिप्पियों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बन गए.
वह कहते हैं, "हिप्पी ख़ैबर दर्रे के रास्ते रावलपिंडी आते, फिर वहां से लाहौर और फिर बस से भारत जाते. बहुत से हिप्पी कराची के समुद्री किनारों का आनंद उठाने चले जाते.
"उनके लिए पाकिस्तान में एक और लोकप्रिय ठिकाना लाहौर और कराची के सूफ़ियों के मज़ार थे. उस ज़माने में मिडिल क्लास युवाओं ने भी पहले से अधिक मज़ारों पर जाना शुरू कर दिया. विशेष कर गुरुवार की रात को जब बहुत से मज़ारों पर पारंपरिक सूफ़ी संगीत क़व्वाली की व्यवस्था की जाती थी."
वह लिखते हैं, "हिप्पी पहनावे युवा पाकिस्तानियों में भी लोकप्रिय होने लगे. वो युवा जिनके बाल साठ के दशक के अंत तक छोटे हुआ करते थे, सत्तर के दशक की शुरुआत में लंबे होने शुरू हो गए. महिलाओं की क़मीज़ छोटी होने लगी थी."
फ़र्रुख़ सोहैल गोइंदी कहते हैं, "मैंने अपनी यात्राओं में कई हिप्पियों से दोस्ती भी गांठी. कई बार तो लाहौर के इंटरनेशनल होटल जाकर उनसे मुलाक़ातें करता जहां उनकी मशहूर डबल डेकर बसें आकर रुकती थीं."
यह वह ज़माना था जब विदेशी यहां आने से डरते नहीं थे, बल्कि ख़ुद को बहुत सुरक्षित समझते थे.
"एक हिप्पी को मैंने लगातार चार दिनों तक लाहौर छावनी में अपने घर के पास एक पार्क में लेटे देखा. पांचवें दिन जब मैं उसके पास गया तो मालूम हुआ कि वह भूख से अधमरा हो चुका था. उस युवा हिप्पी का संबंध पूर्व युगोस्लाविया से था. वह कई दिन मेरे यहां खाता-पीता और सोता रहा बल्कि मैंने उसे नहाने पर भी मजबूर किया और उसके सभी कपड़े भी धुलवाए. फिर वह मेरा ऐसा दोस्त बन गया कि दुनिया बदल गई मगर हमारी दोस्ती नहीं बदली."
उन यात्रियों को ठहराने के लिए बहुत से सस्ते होटल उभरे और पर्यटन उद्योग पेशावर, लाहौर और कराची में परवान चढ़ा.
ग्रेगोरी के अनुसार पेशावर में रेनबो गेस्ट हाउस एक लोकप्रिय 'फ़्रीक हैंगआउट' था. लाहौर में रेलवे स्टेशन के पास एशिया होटल पश्चिमी लोगों के लिए एक लोकप्रिय डेरा रहा है.
बहुत कम लोग चित्राल जाते थे क्योंकि वहां बसें नहीं थीं लेकिन 1968 से एक होटल 'माउंटेन इन' था जिसे हैदर अली शाह चलाते थे.
"भारत में कभी शराब नहीं पी, लस्सी पसंदीदा कोल्ड ड्रिंक थी"

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हिप्पियों में अधिकतर पाकिस्तान पार करके भारत में दाख़िल हो जाते जहां नशा तलाश करने वाले कश्मीर की ओर जा सकते थे. उत्तर भारत में कुल्लू और मनाली भी थे जो हिप्पियों के लिए लोकप्रिय जगह और हशीश की खेती के दो बड़े केंद्र थे.
सर्दियों में अधिकतर हिप्पी उत्तर में गोवा के समुद्री किनारों की ओर जाते जहां चरस हमेशा मिलती रहती. हालांकि यह वहां पैदा नहीं होती थी.
रिचर्ड ग्रेगोरी कहते हैं, "बीड़ी सस्ती थी जिसे अक्सर वह पीते थे. पैदल चलने के बाद दूर कहीं भी जाने के लिए मैं अधिकतर साइकिल टैक्सियों का इस्तेमाल करता था. तीन पहियों वाली खुली गाड़ियां जो स्थानीय लोग चलाते थे."
भारत में कुछ हिप्पी मंदिरों में मुफ़्त सोने और प्रसाद में मिलने वाले खाने का फ़ायदा भी उठा लेते थे.
ग्रेगोरी दिल्ली के इलाके पहाड़गंज के 'विकास' में ठहरे. दिल्ली के होटल क्राउन के बारे में भी सुना था. विलको जॉनसन 1970 में वहां रहे.
उनका कहना था, "पुरानी दिल्ली के क्राउन होटल में एक रात हमने वर्षगांठ के अवसर पर ख़रीदा हुआ क्रीम केक देखा जिसको एक सूअर घसीट कर ले जा रहा था."
रहने के लिए ख़ासकर बंबई एक महंगा शहर था. विलको कहते हैं कि बंबई में वह विक्टोरिया टर्मिनस में सोते थे.
एक और मशहूर हैंगआउट मुंबई में मिशन रोड पर दीप्ति का हाउस ऑफ़ प्योर ड्रिंक्स था.
ग्रेगोरी कहते हैं, "एक शाकाहारी के तौर पर मैंने भारत को एक शानदार जगह पाया. मुंबई के चर्चगेट स्टेशन का रेस्त्रां शायद मेरा सबसे पसंदीदा था जिसमें मज़ेदार डोसा और थाली पेश की जाती थी हालांकि कलान गोट में भेलपुरी का स्टॉल भी मेरी याद में एक ख़ास जगह है."
"रात का खाना आम तौर पर सब्ज़ी और चपाती या पूड़ी के साथ होता था. आम नाश्ता पकौड़े, समोसे, कचौरी और चाट थे. मैं दालमोठ और चूड़ा चबाता. मैं मीठा पसंद करता था; हलवा, बर्फ़ी, लड्डू, गुलाब जामुन और काला जामुन मिले. लस्सी मेरी पसंदीदा कोल्ड ड्रिंक थी लेकिन मैं आमतौर पर खाने के साथ केवल एक गिलास पानी पीता था. मैंने भारत में कभी शराब नहीं पी."
वह बताते हैं, "गोवा की अपनी बाद की यात्रा में मैंने भेलपुरी, डोसा और थाली का आनंद लिया. क़ुल्फ़ी, श्रीखंड, फ़ालूदा और गुलाब के दूध को जाना. और बंबई की एक गली से गन्ने के ताज़ा रस का आनंद उठाया."
"और मैंने काफ़ी मात्रा में चाय पी"

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उन्होंने बताया, "कानपुर में रेलवे स्टेशन के पास चाय का स्टॉल है. चाय दुनिया भर में कई ढंग से पेश की जाती है लेकिन मेरी पसंदीदा और भारतीय ट्रक ड्राइवर की बिना पानी के बनती है. चाय की पत्ती, हरी इलायची और लौंग को दूध में उबाला जाता है. उससे तैयार होने वाली चाय को एक गिलास में गरम-गरम पेश किया जाता है, हमेशा काफ़ी मात्रा में चीनी के साथ."
"स्टेशन के सामने एक पगड़ी वाले बूढ़े ने मुझे इशारा किया और चिलम निकाला. हमने उकड़ूं बैठकर वहीं तंबाकू नोशी की. वहां एक बड़ी भीड़ तमाशा देखने के लिए जमा थी. हम वाराणसी में कुछ दिन ठहरे जिसे अंग्रेज़ बनारस के नाम से जानते हैं."
वह बताते हैं, "अगले दिन हमने सरकारी गांजे की दुकान का पता लगाया. वाराणसी में कुछ विशेष व्यवस्था थी और यह ज़मीन पर बाक़ी रह जाने वाली कुछ जगहों में से एक थी जहां अब भी चरस क़ानूनी तौर पर ख़रीदी जा सकती थी. हालांकि दूसरी जगह पर क़ानून को अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता था."
"भांग एक दुकान से खरीदी गई. एक स्थानीय युवक ने उसे कुछ दही में मिला कर घोल बनाने की व्यवस्था की और हमें एक ज़बर्दस्त भांग लस्सी पेश की.
"मैंने भाषा के बिना बातचीत करना सीखा"

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क्लासिक हिप्पी ट्रेल काठमांडू पहुंच कर ख़त्म होती है. यह वह जगह थी जहां तक आप गाड़ी चला सकते थे. तिब्बत और यारकंद तक पहुंचना असंभव था. बर्मा से गुज़रने वाली सड़क बंद थी. इस तरह तो बैंकॉक के लिए फ़्लाइट ली जा सकती थी या मुड़कर घर वापसी हो सकती थी.
काठमांडू एक ख़ूबसूरत शहर था, जो अधिकांश लकड़ी का बना हुआ थाय उसकी बहुत सी इमारतों को सजाया गया था.
काठमांडू के कैफ़े दी ग्लोब और दी कैंप 'बीटनिक्स' के द्वारा इस्तेमाल होने वाले पहले गेस्ट हाउस बने, लेकिन 1969 में सब कुछ बदल गया.
नेपाल के मार्क लेचटी ने अपनी किताब 'फ़ार आउट' में बताया है कि ओरिएंटल लॉज फ़्रीक स्ट्रीट पर पहला होटल था. इसके बाद वाली इमारतों को बदल दिया गया.
फ़्रीक स्ट्रीट कहलाने वाली गली का असली नाम 'झू छन टोला' था. इस गली में कई होटल और रेस्त्रां थे जहां हिप्पी ट्रेलर अक्सर आते थे.
"यहां 1973 तक चरस की बहुत सी दुकानें क़ानूनी तौर पर चल रही थीं और इस तरह दुनिया की बेहतरीन चरस पाने में कोई मुश्किल पेश नहीं होती."
हिप्पी पारंपरिक पर्यटकों की तुलना में स्थानीय लोगों के साथ बातचीत करने में अधिक समय देते थे. उन्हें ठहरने की लग्ज़री जगहों में कोई दिलचस्पी नहीं थी चाहे वह उसके लिए पैसे चुकाने की स्थिति में हों या नहीं (जो कुछ ही हो सकते थे).
ग्रेगोरी कहते हैं, "मैंने सीखा कि भाषा के बिना बातचीत कैसे की जाए. मेरा कुछ बेहतरीन समय ऐसे लोगों के साथ गुज़रा जो अधिकतर इशारों और मुस्कुराहटों का इस्तेमाल करते थे और उनमें नेपाल के तिब्बती शरणार्थी भी थे जो अंग्रेज़ी नहीं जानते थे लेकिन उनका अच्छा मिलना जुलना था."
जॉन बट जैसे हिप्पी यहीं के हो गए

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1986 में भारत के शहर गोवा में फ़्रांसीसी सीरियल किलर चार्ल्स शोभराज को गिरफ़्तार किया गया.
शोभराज ने 1975 में काठमांडू में दो पर्यटकों की हत्या के जुर्म में नेपाल की जेल में 19 साल गुज़ारे हैं लेकिन 1970 के दशक में वह पर्यटकों की हत्या के दूसरे मामलों से भी जुड़े थे. उन्होंने फ़्रांसीसी पर्यटकों को ज़हर देने के आरोप में भारत में भी 20 साल जेल में गुज़ारे.
उनका संबंध 1972 और 1982 के बीच बीस से अधिक मौतों से जोड़ा जाता है. इनमें से अधिकतर युवा पश्चिमी बैगपैकर्स थे जो भारत और थाईलैंड में हिप्पी ट्रेल पर थे.
ग्रेगोरी लिखते हैं "स्वस्थ रहना मुश्किल हो सकता है, ख़ास कर अगर आप अफ़ग़ानिस्तान में हों और यहां तक कि हिप्पी भी सांस्कृतिक झटके का शिकार होते."
"कुछ गंभीर रूप से बीमार हो जाते या उनके पैसे ख़त्म हो जाते और उन्हें घर ले जाना पड़ता. कुछ जेल भी जाते लेकिन अधिकतर बच जाते."
अक्सर हिप्पी दूसरों को अपने पदचिन्हों पर चलने की प्रेरणा दिलाते. उनमें से कुछ ने अपनी आजीविका के साधन बना लिए और भारत में स्थायी तौर पर रहने लगे.
इस्लाम के जानकार और बीबीसी के पत्रकार जॉन मोहम्मद बट की कहानी आप जानते ही होंगे.
वह साठ के दशक में जॉन माइकल बट के नाम से हिप्पी ट्रेल का हिस्सा बने. पाकिस्तान में इस्लाम क़बूल किया.
बाद में भारत से औपचारिक धार्मिक शिक्षा प्राप्त की. उनके संस्मरणों पर आधारित किताब 'एक तालिब की कहानी, एक पश्तून अंग्रेज़ की ज़िंदगी' के नाम से छपी है.
विश्लेषक उसे एक 'बाहरी' के तौर पर पश्तून जीवन का एक उल्लेखनीय, आंख खोलने वाला विवरण बताते हैं.
"जॉन मोहम्मद बट के संस्मरण पाठकों को इंग्लैंड से पाकिस्तान की वादी स्वात और कैथॉलिसिज़्म से इस्लाम तक की यात्रा पर ले जाते हैं."
हिप्पी ट्रेल कैसे ख़त्म हुई?

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क्लासिक हिप्पी ट्रेल 1979 में उस समय ख़त्म हुई जब रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और सीमा को पश्चिमी यात्रियों के लिए बंद कर दिया.
ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद तत्काल ज़मीनी रास्ते को बंद नहीं किया गया लेकिन बहुत सी बस कंपनियां इसका ख़तरा मोल लेने को तैयार नहीं थीं.
सन 1980 में इराक के ईरान पर हमले के बाद यह सेवाएं जल्द ही बंद कर दी गईं. बलूचिस्तान के रास्ते दक्षिणी सड़क का इस्तेमाल अब संभव नहीं रहा था. लेबनान पहले ही गृह युद्ध की लपेट में आ चुका था, कश्मीर में भी तनाव बढ़ता गया और नेपाल भी अपनी शांति खो बैठा था.
तो इस तरह ओवरलैंड हिप्पी ट्रेल ख़त्म होने लगा. हवाई यात्रा अब सस्ती हो गई थी और गोवा हिप्पियों का केंद्र बन गया. इसलिए हिप्पी ट्रेल हवाई रास्ते से जारी रही.
गोइंदी लिखते हैं कि एक हिप्पी जोड़ा अभी कुछ साल पहले दोस्त बना.
"यह इतालवी जोड़ा इस्तांबुल में आया. सोफ़िया के बगल में सूफ़ियाना लिबास में मिला. इस इतालवी सूफ़ी जोड़े ने बताया कि वो शादी से पहले हिप्पी थे."
वह बताते हैं कि हम ख़ाली जेब पूरी दुनिया घूमते हैं.
"चलते-चलते यात्रा में हम दोनों हमसफ़र बने और फिर एक दिन 'हरे कृष्णा, हरे रामा' करते-करते हमने 'दमादम मस्त क़लंदर' गीत सुना. गीत के क़रीब होते हुए हम एक दिन मुसलमान हो गए. मगर हम अब भी एक से दूसरे देश चले जाते हैं. समय मिले तो वापस अपने देश इटली चले जाते हैं. सारा जहां हमारा है."
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