बीटल्स का आध्यात्मिक एकांतवास

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ऋषिकेश से
ऋषिकेश का एक आध्यात्मिक आश्रम खंडहर बन जाने के बावजूद धार्मिक स्थल जैसा बना हुआ है, लेकिन इसलिए नहीं कि एक अध्यात्मिक गुरु कभी यहां रहा करते थे.
असल में 1960 के दशक के मशहूर ब्रितानी रॉक बैंड बीटल्स के कलाकार 1968 में यहां आध्यात्मिक एकांतवास पर थे.
67 वर्षीय एक ब्रिटिश नागरिक जंगल से होते हुए इस जगह को जाते हुए मिले. अब इस आश्रम में घास और झाड़ियां उग आई हैं.
उन्होंने 1963 की गर्मियों में पहली बार बीटल्स के ग्रुप को समंदर के किनारे एक रिसॉर्ट में सुना था. वहां करीब 200 श्रोता मौजूद थे.
आधी शताब्दी बाद वो अपने परिवार को वेल्स से गंगा के किनारे स्थित इस आश्रम दिखाने ले आए हैं. इस आश्रम को कभी खुद महर्षि महेश योगी चलाते थे.
अध्यात्म

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इस ब्रितानी टूरिस्ट ने बताया, “यह जगह बीटल्स के प्रशंसकों के लिए किसी धर्मस्थल से कम नहीं है. वो पूरी दुनिया से यहां आते हैं. मुझे अपने परिवार को यहां लाना था.”
स्थानीय ख़बरों के अनुसार, इस बैंड के चारों कलाकार यहां “ध्यान करने आए थे और उनके गुरु ने उनसे वादा किया था कि वो हर उस चीज को दुरुस्त कर सकते हैं जो बीटल्स (या दुनिया) को परेशान करता है.”
बीटल्स ने 18 एकड़ में फ़ैले इस आश्रम में तीन महीने तक आध्यात्मिक एकांतवास की योजना बनाई थी, लेकिन उनकी योजना काफ़ी अफरातफरी की शिकार हो गई.
बैंड के कलाकार रिंगो स्टार मसाले वाले भोजन की शिकायत करते हुए दस दिन बाद ही वापस चले गए, हालांकि पकाई हुई फलियों से भरे सूटकेस के साथ यहां आए हुए थे.
अफरा तफरी

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पॉल मैकार्टनी एक महीने तक रुके, जबकि जॉन लेनन और जॉर्ज हैरिसन छह हफ़्ते बाद ही अचानक आश्रम छोड़ दिया.
ऊपरी तौर पर लगा कि पैसे को लेकर कुछ विवाद थे. इसके अलावा कुछ अपुष्ट ख़बरें भी थीं कि महर्षि एक अन्य मेहमान अभिनेत्री मिया फ़ॉरा को बुलाना चाह रहे थे.
बाद में लेनन ने गुरु के बारे एक गाना लिखा, “सेक्सी सैडी, व्हाट हैव यू डन? यू मेड अ फ़ूल ऑफ़ एव्रीवन.”
‘दि बीटल्स इन ऋषिकेश’ के लेखक पॉल साल्ट्समैन कहते हैं, “बैंड ने क़रीब 48 बेहतरीन गाने लिखे, जिनमें अधिकांश ने व्हाइट एलबम में जगह बनाई.”
आश्रम में दो सप्ताह तक रहे साल्ट्समैन के अनुसार, “जिस दौरान वो ओब-ला-डी, ओब-ला-डा पर काम कर रहे थे, मैं वहां मौजूद था.”

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वो बताते हैं कि उस समय यहां घास और बगीचे थे. पेड़ों पर बंदर और सुनहले हरे रंग के तोते हुआ करते थे.
आज यह आश्रम उन दिनों की भुतहा निशानी भर रह गया है.
यह आश्रम नेशनल पार्क में स्थित है, जहां 1,700 हाथी और चीता एवं तेंदुआ जैसे जानवर रहते हैं.
अब यहां पत्थर और कंक्रीट की इमारतें उग आए जंगल झाड़ से झांकती हुई दिखाई देती हैं, जिनपर घास फूस उग आई है.
आकर्षण का केंद्र

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हालांकि बीटल्स के प्रशंसकों के लिए यह अभी भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
जर्जर हालात में पड़े मेडिटेशन हॉल में प्रशंसकों ने बीटल्स कैथेड्रल गैलरी बना दिया है और यही इस खंडहर का धड़कता कोना है.
इसकी दीवारों पर रंगबिरंगी भित्ति चित्र बने हुए हैं और इनमें कई में तो बीटल्स के गानों के बोल भी लिखे हैं, जैसे एक में लिखा है, “एंड लाइफ़ फ्लोज़ ऑन विद यू एंड विदाउट यू.”
छत की पपड़ियां गिर रही हैं और छत की दरारों से धूप छनकर फर्श पर आती रही है.
प्रशंसक गिटार बजाते हैं, गाना गाते हैं और बेफिक्र गाय जंगलों से निकल कर हॉल से होते हुए गुज़र जाती है.
शानदार आश्रम

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एक रूसी प्रशंसक बीटल्स की ‘पॉजिटिव एनर्जी’ के बारे में बातें करता है, जबकि एक ऑस्ट्रेलियाई छात्र भित्ति चित्र की तारीफ़ करते हुए बैंड को ‘विद्रोही’ बताता है.
यहां पत्थर के बने एक अंडाकार झोपड़ी में लेनन रहते थे. कुछ रिपोर्टों के अनुसार यह आश्रम अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बहुत सुंदर ढंग से बनाया गया था.
यहां मेहमान हैलीकॉप्टर से आते जाते थे और यूरोपीय मॉडल के किचन में तीन वक़्त का शाकाहारी भोजन दिया जाता था.
महर्षी के अन्य मेहमानों में गायक डोनोवन और बीच ब्वॉय, माइक लव जैसी शख़्सियतें थीं.
डोनोवन के अनुसार, “बीटल्स के कलाकार यहां सूती पायज़ामा बनते थे और जिप्सियों जैसे दिखते थे.”

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महर्षि ने इन पॉप स्टार्स को अध्यात्म और ध्यान में पारंगत बना देने का वादा किया था.
सरकार ने 1957 में आश्रम की ज़मीन को महर्षि को लीज़ पर दिया था, लेकिन 1970 के दशक के मध्य गुरु और उनके शिष्यों ने इस आश्रम को छोड़ दिया.
निर्जन पड़े इस आश्रम को जंगल ने धीरे धीरे अपनी गोद में ले लिया.
महर्षि की 2008 में मृत्यु हो गई थी.
मुख्य गेट के गार्ड का कहना है, “इस जगह को भगवान ने छोड़ दिया लेकिन भक्त अभी भी आ रहे हैं.”
दिल्ली में बीटल्स

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फ़रवरी 1968 में ऋषिकेश जाने के लिए बीटल्स जब दिल्ली में उतरे तो उनका भव्य स्वागत हुआ.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट के मुताबिक़, जैसे बीटल्स के पहुंचने की घोषणा हुई, युवा 'वे आ गए वे आ गए’, चिल्लाते हुए आनन फानन में उनकी ओर दौड़े.
दिल्ली के जिस होटल में बीटल्स का ग्रुप रुका, वहां उन्होंने ब्राउन एंड पार्टी के नाम का नाम लिखा.
बाद में पत्रकारों को पता चला कि जॉर्ज हैरिसन एक सिख सितार वादक से सितार सीख रहे थे जबकि जॉन लेनन बीन बजाने की कोशिश कर रहे थे.
एक रिपोर्ट ने उनसे पूछा कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा?
लेनन का जवाब था, “हमारी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, हम कोई मिशनरी ग्रुप नहीं हैं.”
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