बिहार में असली क्रिकेट टीम पर स्टेडियम में सरेआम कैसे छिड़ी लड़ाई?

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना, बिहार
क्या हो जब दो-दो क्रिकेट टीमें ख़ुद को किसी राज्य की असली टीम होने का दावा करने लगे? बिहार में ऐसी ही एक घटना चर्चा का विषय बनी हुई है.
पिछले हफ़्ते मुंबई की टीम बिहार के ख़िलाफ़ अपना मैच खेलने पटना पहुँची थी. इसी दौरान स्टेडियम में बिहार की दो टीमें मुंबई के ख़िलाफ़ मैच खेलने पहुँच गईं.
पाँच जनवरी को पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में रणजी ट्रॉफ़ी मैच में जो कुछ हुआ, वह अचानक हुई घटना नहीं थी. बिहार में क्रिकेट और इसके संचालन को लेकर विवाद बहुत पुराना है.
हालत यह है कि बिहार क्रिकेट एसोसिएशन यानी बीसीए को बीसीसीआई की मान्यता भी साल 2018 में ही मिल सकी है.
भारत में क्रिकेट को नियंत्रित करने वाली संस्था बीसीसीआई अलग-अलग राज्यों को और उनकी क्रिकेट टीमों को मान्यता देता है.
भारत में क्रिकेट में महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों का वर्चस्व रहा है.
हालांकि, हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों के क्रिकेटरों ने भी खेल की दुनिया में अपना नाम कमाया है.
इधर पटना में हुए रणजी ट्रॉफ़ी मैच में बिहार की टीम मुंबई से पारी के अंतर से हार गई.
लेकिन यह मैच खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ज़्यादा बिहार में क्रिकेट के बुनियादी ढाँचे की हालत और बीसीए की अंदरूनी लड़ाई की वजह से ज़्यादा चर्चा में रहा है.
एक ही राज्य की दो क्रिकेट टीम?

पाँच जनवरी की सुबह पटना के मशहूर मोइनुल हक़ स्टेडियम में क़रीब 27 साल के बाद कोई बड़ा मैच होने जा रहा था.
मैदान के अंदर खिलाड़ी और दर्शक कोहरे और सर्दी का मुक़ाबला कर रहे थे. लेकिन इस सबके बीच मैदान के बाहर एक झगड़ा जारी था.
बीसीए की टीम मुंबई के ख़िलाफ़ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही थी.
लेकिन ठीक इसी वक़्त एक अन्य टीम ने आकर दावा कर दिया कि बिहार की असली क्रिकेट टीम वह है.
इस बात पर दोनों पक्षों के बीच झगड़ा और हाथापाई भी हुई. इस मामले को लेकर पुलिस में एफ़आईआर भी दर्ज कराई गई है.
दरअसल यह विवाद बीसीए के अध्यक्ष और कथित तौर पर पूर्व सचिव के बीच का है.
कथित इसलिए कि अमित कुमार बीसीए के सचिव तो बने थे लेकिन एक साल पहले ही उनको पद से हटा दिया गया था.
बिहार की जिन दो टीमों को लेकर विवाद हुआ है वह इन दो लोगों की अलग-अलग टीम थी.
अमित कुमार का दावा है कि उनको जिस तरह से हटाया गया है वह अधिकार बीसीए के पास नहीं है और यह मामला फ़िलहाल अदालत के विचाराधीन है.
उनका कहना है कि टीम चुनने का अधिकार सचिव के पास होता है.
उन्होंने रणजी मैच से पहले तीन जनवरी को बिहार की क्रिकेट टीम के सदस्यों के नाम की सूचना बीसीसीआई को देने का दावा भी किया है.
हालाँकि, बीसीसीआई ने उनकी टीम को मान्यता दी हो ऐसा कोई प्रमाण उन्होंने बीबीसी को नहीं दिखाया है.
बीसीसीआई वाली टीम?

इस मामले में दूसरी तरफ बीसीए के अध्यक्ष राकेश कुमार तिवारी हैं और उनकी समर्थित टीम को ही बीसीए की टीम माना गया है.
इसी टीम ने मुंबई के ख़िलाफ़ रणजी ट्रॉफ़ी का मैच खेला है.
राकेश कुमार तिवारी आरोप लगाते हैं, “दो टीम कुछ नहीं होती है. अपने बेटों को टीम में रखने के लिए कुछ लोगों ने यह विवाद खड़ा किया है. जो अपने को बीसीए का सचिव बता रहे हैं, उन्हें लोकपाल ने एक साल पहले उनकी करतूतों के लिए पद से हटा दिया था.”
राकेश कुमार तिवारी केंद्र की सत्ता पर बैठी बीजेपी के नेता भी हैं.
टीम को लेकर हुए विवाद में उन्हें बिहार प्लेयर्स एसोसिएशन का भी साथ मिला है.
इस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय तिवारी हैं, जो बिहार सरकार में शामिल राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता भी हैं.
मृत्युंजय कुमार तिवारी कहते हैं, “जिसको बीसीसीआई की मान्यता है, वही बिहार की टीम है. राकेश तिवारी के नेतृत्व में जो टीम है उसी को बीसीसीआई की मान्यता है. बाक़ी अगर किसी को कोई शिकायत है तो वो कोर्ट में जाएं. यह अनुशासन का खेल है. मैं यही कहूंगा कि ऐसे लोगों को सद्बुद्धि मिले.”
वहीं, बिहार के क्रिकेट में आदित्य कुमार वर्मा नाम अक्सर चर्चा में रहता है.
वो राज्य के क्रिकेट में कई तरह के कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं और इसे लेकर उन्होंने अदालत में कई याचिकाएँ डालने का दावा भी किया है.
इन आरोपों में दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों को झूठे दस्तावेज़ों के आधार पर बिहार की क्रिकेट टीम में शामिल करने का आरोप भी शामिल है.
आदित्य वर्मा आरोप लगाते हैं, “सितंबर 2019 में राकेश तिवारी अध्यक्ष बने थे. उनकी बीसीए के पहले के सचिव से भी लड़ाई हुई थी और सचिव को चार महीने में ही पद हटा दिया था. यह विवाद साल 2022 में सचिव बने अमित कुमार के साथ भी जारी रहा. दरअसल राकेश तिवारी बीजेपी से जुड़े हुए हैं और वो बिहार में क्रिकेट को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं.”
बदहाली की तस्वीर

इमेज स्रोत, AMIT KUMAR
बिहार में क्रिकेट के इस विवाद में हर पक्ष का अपना दावा है और दूसरे पर आरोप हैं.
लेकिन इस राज्य में खेल कहाँ है और ख़ासकर क्रिकेट की तस्वीर कैसी है?
इसे समझने के लिए बिहार की राजधानी पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम पर नज़र डालना ज़रूरी है.
इस स्टेडियम में किसी ज़माने में अंतरराष्ट्रीय मैच भी हुआ करते थे. यहां साल 1996 में विश्व कप के मैच का आयोजन भी हो चुका है. लेकिन अब यह स्टेडियम जर्जर हो चुका है.
स्टेडियम में जहाँ-तहाँ झाड़ियाँ उग आई हैं. दर्शकों के बैठने के लिए अच्छी जगह तक नहीं दिखती है. फिर भी क्रिकेट के प्रेम ने कई लोगों को इस स्टेडियम की तरफ खींच लिया है, जहाँ रणजी ट्रॉफ़ी का मैच चल रहा था.
क्रिकेट के दीवाने प्रभात कुमार विपुल कहते हैं, “इस स्टेडियम में 27 साल के बाद मैच हो रहा है. यहाँ एसोसिएशन की राजनीति बहुत ज़्यादा है, इससे ऊपर उठना चाहिए. इससे खिलाड़ियों की प्रतिभा दबती है.”
नालंदा से रणजी ट्रॉफ़ी का मैच देखने पहुँचे सुमित कुमार के मुताबिक़ स्टेडियम में दर्शकों के बैठने के लिए जगह नहीं है और क्रिकेट की राजनीति में यहाँ दो-दो टीमें बिहार की टीम होने का दावा करती हैं, यह बात बाहर के लोगों पता चलेगा तो कितने शर्म की बात है.
भारत में रणजी ट्रॉफ़ी टूर्नामेंट सबसे बड़ा घरेलू मुक़ाबला होता है. इसमें प्रदर्शन के आधार पर ही खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिलता है.
पटना के ही क्रिकेट फ़ैन धीरज कुमार कहते हैं, “यह खेल है इसमें क्यों राजनीति करते हैं? किसी कंपनी को बोलते तो स्पाँसर कर देती और थोड़ी सुविधा मिल जाती. यहाँ चौका लगता है तो पता नहीं चलता, स्कोर क्या हुआ पता नहीं है. दो-दो स्टोर बोर्ड है लेकिन टूटा पड़ा है.”
सच होंगे सपने?

पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम के ठीक बगल में हमें क्रिकेट की एक अकादमी दिखी. यहां कुछ बच्चे क्रिकेट की प्रैक्टिस कर करे हैं. उनको उम्मीद है कि एक दिन वो भी क्रिकेट की दुनिया में अपना नाम रोशन करेंगे.
यहाँ हमारी मुलाक़ात करण रेड्डी नाम के युवा खिलाड़ी से हुई. करण 5 साल से यहाँ प्रैक्टिस कर रहे हैं. उनका कहना है कि जो अच्छा खेलेगा रन बनाएगा, वह आगे बढ़ेगा.
हालाँकि, उनका मानना है कि बिहार में बुनियादी ढाँचे की थोड़ी कमी है और बीसीए को इसपर ध्यान देना चाहिए.
यहीं दूसरी तरफ कुछ महिला क्रिकेटर भी अभ्यास करती हुई दिखीं.
प्रिया रानी अभी इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रही हैं और साथ ही बल्लेबाज़ी के अभ्यास में पसीने बहा रही हैं.
प्रिया कहती हैं, “बिहार के क्रिकेट को बीसीसीआई की मान्यता मिल गई है. अब धीरे-धीरे सब कुछ अच्छा हो रहा है. हमारे पास जितनी सुविधा है उतने में ही कोशिश करते हैं. लेकिन बिहार में थोड़ी और सुविधा होनी चाहिए.”

इस अकादमी में मुकेश कुमार बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं. यहाँ के कुछ बच्चे स्थानीय स्तर पर आगे ज़रूर बढ़े हैं. लेकिन मुकेश को भी लगता है कि सरकार को खेल पर थोड़ा ध्यान देना चाहिए. उनका मानना है कि अगर सुविधा नहीं देंगे तो दूसरी टीम बिहार आकर खेलना नहीं चाहेगी.
क्रिकेट टीम को लेकर हुए विवाद और बिहार सरकार के अधीन आने वाले मोइनुल हक़ स्टेडियम की बुरी हालत से जुड़ी ख़बरों के बीच बिहार सरकार ने सोमवार को एक बड़ा फ़ैसला लिया है.
बिहार में एक अलग खेल विभाग को राज्य सरकार के मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दी है. उम्मीद की जा रही है कि इससे राज्य में खेलों को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. वहीं राज्य सरकार मोइनुल हक़ स्टेडियम को भी पूरी तरह तोड़कर दोबारा बनवाने की योजना पर काम कर रही है.
समस्या की शुरुआत

बिहार में शुरू से ही क्रिकेट और बाक़ी खेलों की बेहतर सुविधा दक्षिण बिहार के इलाक़े में रही है. यह इलाक़ा साल 2000 में झारखंड के तौर पर अलग राज्य बन चुका है.
यहाँ जमशेदपुर और राँची जैसे शहरों में अच्छे स्टेडियम मौजूद हैं. इसके पीछे बड़ी वजह इलाक़े में उद्योगों और औद्योगिक बसावट का होना है.
उद्योगों ने इलाक़े में शुरू से ही खेलों को भी समर्थन दिया है और उनकी मदद से इस इलाक़े के खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौक़ा भी मिला है. क्रिकेट के अलावा तीरंदाज़ी जैसे खेल में भी पहले बिहार का हिस्सा रहे, आज के झारखंड के खिलाड़ियों ने बेहतर जगह बनाई है.
इसी बेहतर बुनियादी ढाँचे की वजह से साल 2000 में नया राज्य बनने के बाद झारखंड को बीसीसीआई की मान्यता मिलने में मदद मिली थी.
आदित्य कुमार वर्मा आरोप लगाते हैं, “यह पूरी तरह बीसीसीआई का सौतेला रवैया था. जिस समय बिहार को तोड़कर झारखंड बनाया गया था, उसी दौरान बने छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्य को बीसीसीआई की मान्यता नहीं मिली थी, बल्कि यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों के पास ही रही.”
आदित्य कुमार वर्मा के मुताबिक़ बँटवारे के बाद बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को बीसीए का अध्यक्ष बनाया गया था, शायद इसलिए बीसीसीआई ने उनको मान्यता नहीं दी और यहां एक नई संस्था बनाकर कीर्ति आज़ाद को भेज दिया. इस विवाद में अठारह साल तक बीसीए को मान्यता नहीं मिल सकी.
बिहार के बँटवारे से पहले पटना के सबा करीम भारतीय टीम से क्रिकेट खेल चुके हैं. सबा करीब विकेट कीपर बल्लेबाज़ थे. उनके बाद पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी शुरुआती क्रिकेट बिहार से ही खेला था, लेकिन झारखंड बनने के बाद वो झारखंड की टीम का हिस्सा हो गए.
मौजूदा समय में बिहार के दो प्रमुख क्रिकेटरों में एक हैं ईशान किशन जिन्होंने क़रीब एक साल पहले बांग्लादेश के ख़िलाफ़ एकदिवसीय मैच में दोहरा शतक लगाकर सुर्खियाँ बटोरी थीं. वहीं दूसरे हैं तेज़ गेंदबाज़ मुकेश कुमार. लेकिन ईशान किशन झारखंड की टीम से खेलते हैं जबकि मुकेश कुमार पश्चिम बंगाल की टीम से.
मृत्युंजय तिवारी कहते हैं, “बिहार के खिलाड़ी आज दूसरे राज्यों में अपनी प्रतिभा के दम पर खेल रहे हैं. जिस समय ईशान किशन और मुकेश कुमार जैसे खिलाड़ियों ने खेलना शुरू किया था उस समय बिहार को बीसीसीआई की मान्यता नहीं थी, इसलिए वो बिहार से नहीं खेल पाए.”
राजनीतिक दावे

वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा 1970 के दशक से ही बिहार में अलग-अलग खेलों पर नज़र रखते हैं. बिहार में खेलों को लेकर बुनियादी ढाँचे का विकास नहीं हो पाना और खेलों में बिहार के पिछड़े रहने के पीछे राज्य की राजनीति कितनी ज़िम्मेवार है?
इस सवाल पर लव कुमार कहते हैं, “जब लालू प्रसाद यादव साल 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तभी से बिहार में खेलों की दशा बिगड़नी शुरू हो गई थी. लालू जी की प्राथमिकता चरवाहा विद्यालय वगैरह थी. शायद उनको लगता था कि ‘खेल’ एलिट क्लास या अमीरों का काम है. इसलिए उन्होंने खेल पर कोई ध्यान ही नहीं दिया.”
हालाँकि लव कुमार मिश्रा याद करते हैं कि साल 1973 में लालू प्रसाद यादव पटना यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे थे और उन्होंने उस वक़्त एक नारा यह भी दिया था कि अगर वो जीत गए तो पटना यूनिवर्सिटी के हर क्रिकेटर को ‘हेल्थ फूड’ का एक-एक डब्बा देंगे.
दरअसल उस वक़्त बाहर की टीमें भी मैच खेलने पटना आती थीं. उसी दौरान सागर यूनिवर्सिटी की टीम ने पटना यूनिवर्सिटी की टीम को हरा दिया था. लालू ने इस हार को अपनी छात्र राजनीति का हिस्सा बना लिया था.

उस दौर में बिहार में खेल बहुत लोकप्रिय था और पटना के गाँधी मैदान, मंगल तालाब, गर्दनीबाग़ एथलेटिक क्लब, पटना हाई स्कूल, पटना कॉलेजिएट, मिलर हाई स्कूल और खगौल के जगजीवन इंस्टीट्यूट वगैरह में खेलों की अच्छी सुविधाएँ थी.
पटना में मोइनुल हक़ स्टेडियम के अलावा साइंस कॉलेज, पटना कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में भी क्रिकेट के अच्छे मैदान थे. साल 1970 के दशक में पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में भारत, वेस्ट इंडीज़ और न्यूज़ीलैंड की टीमों के बीच भी मुक़ाबला हो चुका है.
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लव कुमार मिश्रा के मुताबिक़ बिहार में खेलों की यह तस्वीर बदल चुकी है और पॉलिटिकल लाइन पर जो बंटवारा हुआ है वो भी आज खेलों की बदहाली के पीछे बड़ी वजह है.
हालाँकि बीसीए के मौजूदा अध्यक्ष राकेश तिवारी के मुताबिक़ राजनीति से जुड़े लोग देश के कई राज्यों में क्रिकेट की संस्था से जुड़े हैं और वो ख़ुद राजनीति और क्रिकेट को अलग-अलग रखते हैं. जब से बीसीए को मान्यता मिली है तब से बिहार में क्रिकेट को लेकर अच्छा काम हो रहा है.
इस बीच बिहार सरकार का भी दावा है कि वह राज्य में खेलों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है और उसने ‘मेडल लाओ नौकरी पाओ योजना’ भी शुरू की है. यानी खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने वालों को राज्य सरकार सरकारी नौकरी भी देगी.

इसके तहत बिहार सरकार ने पहली बार 81 खिलड़ियों को राज्य सरकार के अलग-अलग विभाग में नौकरी भी दी है.
बिहार जैसे राज्य की एक हक़ीकत लोगों के लिए खेल से ज़्यादा रोज़गार और नौकरी की ज़रूरत भी है.
मोइनुल हक़ स्टेडियम में मौजूद एक दर्शक जो ख़ुद बिहार सरकार के वित्त विभाग में नौकरी करते हैं.
उनका कहना है, “क्रिकेट टीम में बस 11 लोगों को जगह मिलती है, नौकरी में सैकड़ों और हज़ारों पदों पर भर्ती होती है. ज़ाहिर है खेल में कंपीटिशन ज़्यादा मुश्किल है.”
भारत सरकार के आँकड़े बताते हैं कि आर्थिक तौर पर बिहार फ़िलहाल उन राज्यों से बहुत पीछे है जो खेल में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.
आधार वर्ष 2011-12 के मुताबिक़ साल 2021-22 में बिहार की प्रति व्यक्ति सालाना आय 30,779 रुपये रही थी, जबकि यह हरियाणा के लिए 1,72,657 रुपये, कर्नाटक के लिए 1,64,471 रुपये और महाराष्ट्र के लिए 1,38,490 रुपये थी.
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