बिहार में पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल बने जाति और धर्म का अखाड़ा

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पटना यूनिवर्सिटी की पहचान आज़ादी के बाद कुछ दशकों तक भारत के प्रमुख शैक्षणिक केंद्र के तौर पर होती रही.
साल 1917 में पटना में गंगा नदी के तट पर इस यूनिवर्सिटी के कैम्पस का निर्माण हुआ था.
उस दौर में यह विश्वविद्यालय न केवल बिहार (संयुक्त बिहार में झारखंड भी शामिल था) बल्कि ओडिशा और नेपाल तक के प्रतिभाशाली छात्रों का अड्डा माना जाता था.
दुनिया के पहले गणतंत्र वैशाली से निकटता के चलते राजनीतिक तौर पर भी यह विश्वविद्यालय राजनीतिक हलचलों का केंद्र रहा.
इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1974 के छात्र आंदोलन में दिखी थी.
इस आंदोलन से ही लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे छात्रों ने राजनीति में क़दम रखा.
पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों के लिए बने हॉस्टलों की भी अपनी पहचान रही है.
लेकिन पिछले कुछ दशकों में यूनिवर्सिटी की शैक्षणिक पहचान भी गिरावट की ओर है. हॉस्टल की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार निराशाजनक ख़बरें आती रही हैं.
अभी कुछ महीने पहले ही पटना कॉलेज के इक़बाल और जैक्सन हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के बीच बमबाज़ी की ख़बर आई थी.
यह घटना इस साल जुलाई की है. इसके तुरंत बाद पटना यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पटना कॉलेज के तीनों हॉस्टलों को ख़ाली करवाकर उन्हें सील कर दिया था.
यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस क़दम ने उन छात्रों के लिए मुसीबत पैदा कर दी जिन्हें हॉस्टल में जगह मिली हुई थी.
ऐसे में यूनिवर्सिटी प्रशासन और छात्रों के बीच एक बैठक हुई. इसमें पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो तरुण कुमार भी मौजूद रहे.
प्रो तरुण कुमार ने बीबीसी को बताया, ''प्रशासन की ओर से बैठक में प्रस्ताव रखा गया था कि मिंटो, जैक्सन और इक़बाल हॉस्टल (पटना कॉलेज के हॉस्टल) का नाम बदलकर हॉस्टल संख्या 1, 2 और 3 कर दिया जाए. इसके साथ जातीय और धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर हॉस्टल आबंटित किए जाएँ. यानी हॉस्टल 1 (मिंटो) किसी भी जाति और धर्म के छात्रों को एलॉट हो. लेकिन छात्रों ने यह मानने से इनकार कर दिया.''
जातीय और धार्मिक लड़ाई का अड्डा बने हॉस्टल

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दरअसल पटना यूनिवर्सिटी के कुछ हॉस्टलों में बीते कई दशकों से छात्रों को जाति और धार्मिक पहचान के आधार पर जगह मिलती रही है. हालाँकि विश्वविद्यालय प्रशासन इससे इनकार करता है.
इनमें 1917 में स्थापित पटना यूनिवर्सिटी के पटना कॉलेज और बीएन कॉलेज के हॉस्टल शामिल हैं.
ये ऐसी परंपरा बन गई है जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन चाह कर भी नहीं तोड़ पा रहा है. इसकी वजह यह है कि ऐसी किसी पहल को छात्रों का समर्थन नहीं मिलता है.
पटना यूनिवर्सिटी में कुल 25 हॉस्टल हैं. इनमें क़रीब एक हज़ार छात्र -छात्राएँ रहते हैं.
इनमें से पटना कॉलेज में तीन, साइंस कॉलेज में पाँच, मगध महिला कॉलेज में तीन और लॉ कॉलेज में एक हॉस्टल है.
इसके साथ ही बीएन कॉलेज में दो, पटना ट्रेनिंग कॉलेज में दो, आर्ट एंड क्राफ़्ट कॉलेज में एक, यूनिवर्सिटी कैम्पस में पाँच पीजी और छात्राओं के लिए तीन हॉस्टल हैं.
इसके अलावा पटेल हॉस्टल है, जिसे कुर्मी हितकारिणी न्यास ने 1941 में अवधिया (उपजाति) कुर्मी छात्रों के लिए खोला था. साल 1970 में इसे सभी कुर्मी छात्रों के लिए खोल दिया गया.
क़ानून व्यवस्था के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा दिक़्क़त पीजी रानीघाट, पटना कॉलेज (मिंटो, जैक्सन, इक़बाल हॉस्टल), बीएन कॉलेज (मेन, सैदपुर हॉस्टल नंबर पाँच) और पटेल हॉस्टल में पैदा होती रही है.
इनका जातीय पैटर्न देखें, तो बीएन कॉलेज भूमिहार बहुल और पीजी रानीघाट यादव बहुल हॉस्टल है.
इसके साथ ही इक़बाल हॉस्टल में सिर्फ़ मुस्लिम छात्रों और पटेल हॉस्टल में सिर्फ़ कुर्मी जाति के छात्र रह सकते हैं.
वहीं, मिंटो और जैक्सन हॉस्टल में दलित और पिछड़े वर्गों से आने वाले छात्र ज़्यादा संख्या मेंं रहते आए हैं.
क्या जाति देखकर आबंटित होते हैं हॉस्टल?

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यूनिवर्सिटी प्रशासन जातीय आधार पर हॉस्टल का आबंटन नहीं करता, तो फिर हॉस्टल जातीय अड्डे कैसे बन गए?
इस सवाल पर पटना यूनिवर्सिटी के डीन स्टूडेंट वेलफेयर (डीएसडब्लू) प्रो अनिल कुमार किसी तरह की आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर देते हैं, लेकिन वो यह स्वीकार करते हैं कि ये हॉस्टल अवैध तरीक़े से रह रहे लोगों के अड्डा ज़रूर बन गए हैं.
वो कहते हैं, ''जिस छात्र को कमरा आबंटित होता है, उसे हॉस्टल में अवैध ढंग से रह रहे लोग मारपीट कर भगा देते हैं. हमारी कोशिश है कि हॉस्टलों में छात्र रहें लेकिन हर हॉस्टल में पुलिस खड़ी करना संभव नहीं है.''
साल 1993-94 में पटना यूनिवर्सिटी के डीएसडब्लू रहे और सैदपुर हॉस्टल नंबर पाँच के अधीक्षक रहे प्रो. पीके पोद्दार बताते हैं, ''उस समय छात्र अपनी ही जाति के दूसरे छात्रों को हॉस्टल का कमरा किराए पर दे देते थे. इसके दो नतीजे हुए. पहला हॉस्टल की जातीय गोलबंदी–अपराधीकरण हुआ और दूसरा मेधावी लड़कों ने हॉस्टल में रहने से तौबा कर ली.''
तीन दशकों से यूनिवर्सिटी को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ''जिस हॉस्टल में जो जाति हावी है वो दूसरी जाति के छात्र को रहने ही नहीं देती. अगर दूसरी जाति का छात्र वर्चस्व वाली जाति के टर्म और कंडीशन का पालन करेगा, तभी वो हॉस्टल में रह पाएगा. ये हॉस्टल्स का अलिखित संविधान बन गया है.''
छात्र संगठन अखिल भारतीय स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ़) के पटना ज़िला सचिव रहे विश्वजीत कुमार भी साल 2008 में घटी ऐसी एक घटना का ज़िक्र करते हैं.
वो कहते है, ''बीएन कॉलेज के मेन हॉस्टल में एक छात्र को कमरा अलॉट हो गया था लेकिन उसे भूमिहार छात्रों ने घुसने नहीं दिया. वो हमारे पास आया तो इसकी शिकायत स्थानीय पीरबहोर थाने में दर्ज कराई गई. इसके बाद ग़ुस्साए भूमिहार जाति के छात्रों ने मुझको बीएन कॉलेज ग्रांउड में अकेले बुलाकर हमला किया.''
क्या कहते हैं छात्र
पटना यूनिवर्सिटी के ये हॉस्टल जातीय और धार्मिक लिहाज से बँटे हुए हैं. हालाँकि ज़्यादातर छात्र इस पर खुलकर नहीं बोलते.
इसकी दो वजहें है. पहली तो ये कि वो व्यक्तिगत तौर पर ख़ुद को जातीय संकीर्णता में बँधे छात्र की तरह पेश नहीं करना चाहते.
दूसरा ये कि इन हॉस्टल में उन छात्रों का रहना ही मुश्किल है, जिन्हें ये हॉस्टल आबंटित हुआ है.
जैसा कि डीएसडब्लू अनिल कुमार बताते है, "अभी हमने मिंटो, जैक्सन और इक़बाल का आबंटन किया है. लेकिन वहाँ से शिकायतें मिलनी शुरू हो गई है कि वहाँ अवैध तरीक़े से रह रहे लोग छात्रों को घुसने ही नहीं दे रहे हैं."
इक़बाल हॉस्टल में रहने वाले नफ़ीस अंसारी कहते है, “यूनिवर्सिटी से ज़्यादा कॉस्टिज्म कहीं नहीं होता है. दूसरे हॉस्टल में तो दूसरी जातियों के मठाधीश रहते हैं. हम लोग अपनी सुरक्षा के लिहाज से इक़बाल में ही रहेंगे. बाक़ी अगर बदलाव हो, तो वो दूसरे हॉस्टल से शुरू हो. इक़बाल के पीछे सब क्यों पड़े है.”
एक अन्य छात्र विमल कुमार कहते हैं, “ सैदपुर में तो ज़्यादातर भूमिहार रहते हैं. बाक़ी हमारा एडजैस्टमेंट सबसे ज़्यादा भूमिहार के साथ होता है. तो हम सैदपुर में रहना चाहते हैं. दूसरी जाति के लोग भी यहाँ नहीं आना चाहते और मुसलमान तो यहाँ आएगा ही नहीं. उसके रहने से पूजा पाठ में दिक़्क़त हो जाएगी.”
बीएन कॉलेज में सेकेंड इयर के छात्र और सैदपुर में रहने वाले हर्ष राज सिंह कहते हैं, “अगले 50 साल तक यहाँ भूमिहार ही डॉमिनेट करेगा. हम लोगों को अपने लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है.”
बीए थर्ड ईयर के छात्र और मिंटो हॉस्टल में रहने वाले सन्नी कुमार कहते हैं, “हम लोगों ने मिंटों में नया नियम बना लिया है. जैसे ही कोई छात्र को यहाँ रूम आबंटित होता है हम लोग उसका जातिगत पहचान हटा देते है. जैसे मेरा दोस्त रवि गुप्ता जब यहाँ आया तो उसका नाम रवि कुमार हो गया.”
हालाँकि मिंटो के ही एक पुराने छात्र कहते हैं, “ हॉस्टल में जातियों का ये प्रभुत्व आपको पॉलिटिकल पार्टीज के चश्मे से देखना होगा. वो बाँटकर रखेगी नहीं तो उन्हें फ़ायदा कैसे होगा?”
श्रीकृष्ण बाबू से नीतीश कुमार तक
प्रशासन ने मिंटो, जैक्सन और इक़बाल हॉस्टल का नाम बदलकर हॉस्टल संख्या 1, 2 और 3 करने का प्रस्ताव रखा. लेकिन छात्र इससे सहमत नहीं हुए.
क्या पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल्स का इतिहास यही रहा है? थोड़े दिनों पहले पटना कॉलेज के प्राचार्य तरुण कुमार ने एक सार्वजनिक अपील की थी.
इसमें लिखा है कि पटना कॉलेज के 115-116 साल पुराने छात्रावासों में हर कमरे से आईएएस–आईपीएस निकलते थे.
गौरतलब है कि पटना कॉलेज का मिंटो छात्रावास 1907 और जैक्सन छात्रावास 1908 में स्थापित हुआ था. मिंटो छात्रावास के लिए तो कहा ही जाता था, ''मिंटोनीयन्स रूल इंडिया.''
पटना यूनिवर्सिटी के इन छात्रावासों में रहे छात्रों में बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भूतपूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे और अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी जैसे नाम गिने जा सकते हैं.
इसके साथ ही पटना कॉलेज के मौजूदा प्राचार्य तरुण कुमार, बिहार के मुख्य सचिव आमिर सुबहानी, जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह, धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रहे किशोर कुणाल, आईपीएस मनोज नाथ, विष्णु दयाल राम और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय जैसे छात्र भी यहीं से निकले हैं.
कभी इन हॉस्टल में रहते थे टॉपर

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अर्थशास्त्री और पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो नवल किशोर चौधरी साल 1964 में जैक्सन हॉस्टल के आबंटी थे. अपनी बीमारी के चलते वो दस दिन की देरी से हॉस्टल गए थे.
वो बताते है, ''हॉस्टल अधीक्षक प्रो राम प्रवेश सिंह ने मुझे डाँटा और कहा कि यहाँ एक-एक रूम के लिए मिनिस्टर की पैरवी लगी रहती है. लेकिन मैं टॉपर था इसलिए मुझे टॉपर के लिए आबंटित कमरा नंबर 54 दिया गया. उस समय फ़र्स्ट टॉपर जैक्सन में और सेकेंड टॉपर मिंटो हॉस्टल में रहता था. ग्रेजुएशन में टॉप करने वाले को पीजी हॉस्टल रानीघाट आबंटित होता था.''
धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रहे और आईपीएस किशोर कुणाल भी बताते है, ''मेरा कमरा टॉपर का कमरा था और उसके ऊपर एसपी (सीनियर प्रीफेक्ट) लिखा हुआ था तो सब मज़ाक में कहते थे कि मैं पुलिस वाला बनूँगा. हमारे वक़्त में हमारे हॉस्टल हमारा गौरव थे.''
इसी तरह राजद के प्रवक्ता और पटना यूनिवर्सिटी के छात्र रहे चितरंजन गगन बताते है, ''अभी सरकार में मुख्य सचिव आमिर सुबहानी सैदपुर में रहते थे और उनको आप अपने कमरे से बाहर नहीं देख सकते थे. वहीं दूसरी तरफ़ गुप्तेश्वर पांडेय शायद पीजी रानीघाट में रहते थे और वो मस्तमौला मिजाज के स्टूडेंट थे.''
दिलचस्प है कि उस वक़्त नवल किशोर चौधरी इक़बाल हॉस्टल में रहे, जो मौजूदा दौर में मुमकिन नहीं होता. प्रो. नवल ने यहीं रहते हुए पोस्टग्रेजुएशन किया और इसके यूनियन के सेक्रेटरी भी रहे.
वो बताते हैं कि उस वक़्त इक़बाल में दो तरह की मेस चलती थी, हिंदू और मुस्लिम मेस. यूनियन सेक्रेटरी रहते हुए उन्होंने इसे बदलकर वेज और नॉन वेज मेस किया.
अब उसी इक़बाल हॉस्टल में सिर्फ़ मुस्लिम छात्र रहते हैं.
इकबाल के एक आबंटी इस्माइल रहमान बीबीसी से कहते हैं, ''हम अपने कल्चर वाले लोगों के साथ रहकर पढ़ाई करेंगे. उनके (हिंदू) साथ रहेंगे तो झगड़ा होगा.''
ठीक यही बात सैदपुर के छात्र हर्ष राज सिंह कहते हैं, ''मुस्लिम यहाँ नहीं टिक पाएगा. हिंदू में भी हम सबसे अच्छे से भूमिहार के साथ एडजस्ट हो जाते हैं.''
हॉस्टल का राजनीतिक इस्तेमाल

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इस तरह के जातीय और धार्मिक वर्गीकरण के चलते हॉस्टल्स के बीच लड़ाई होना आम बात है.
कभी-कभी ये लड़ाई पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल वर्सेज आउटसाइडर की भी हो जाती है.
अख़बार 'प्रभात खबर' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 में जुलाई तक पटना यूनिवर्सिटी कैम्पस में 15 बार बमबाज़ी और फ़ायरिंग की घटनाएँ हुईं.
बिहार सरकार में उच्च शिक्षा के निदेशक रहे नागेश्वर प्रसाद शर्मा की किताब 'बिहार का सिसकता शिक्षा तंत्र' में ये ज़िक्र है कि 70 के दशक के आरंभ से ही बिहार के विश्वविद्यालयों का पतन तेज़ी से हुआ. किसी भी कुलपति ने अपनी तीन साल की अवधि पूरी नहीं की, राज्य सरकार में बदलाव के साथ ही कुलपति बदल जाते थे.
यानी 70 का दशक ही वो था जब विश्वविद्यालय में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा. 80 का दशक आते-आते पटना यूनिवर्सिटी कैम्पस और हॉस्टल में मारपीट और हत्याओं का दौर शुरू हुआ.
दिसंबर 1982 में यूनिवर्सिटी के हथुआ हॉस्टल में पिपरा नरसंहार के दोषी ललन सिंह की हत्या सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियों में रही.
पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ''उसके बाद तो हॉस्टल में पिस्टल और बम की बरामदगी कोई नई बात नहीं रही. नेता और उफान मारती जातीय राजनीति के संरक्षण में हॉस्टल अवैध लोगों के रहने के अड्डा बने. इनका इस्तेमाल जातीय राजनीति में सहायक कारक के तौर पर हुआ, जो अब भी जारी है.''
प्रो. तरुण कुमार इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, ''जब मैंने जनवरी में कॉलेज की ज़िम्मेदारी संभाली तो स्थापना दिवस पर सभी राजनीतिक दलों को शामिल होने का न्यौता दिया. भाकपा माले के प्रतिनिधि को छोड़कर कोई स्थापना दिवस में नहीं आया. लेकिन सरस्वती पूजा के वक़्त सभी पार्टियों के नेता इन हॉस्टल में हाजिरी लगाने आते हैं.''
खंडहर बने हॉस्टल

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पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल बदहाल हैं. बारिश के दिनों में कमरों में पानी टपकता है, कमरों के दरवाज़े टूटे हुए हैं, कॉमन रूम लापता हैं और हॉस्टल लाइब्रेरी खंडहर बन गई है.
ज़्यादातर हॉस्टल में मेस नहीं चलते और अधीक्षकों के लिए बने क्वार्टर वीरान पड़े हैं. लेकिन ये बदहाल हॉस्टल भी पटना यूनिवर्सिटी के छात्रों का बड़ा सहारा हैं.
छात्र अमन कुमार लाल कहते हैं, ''हॉस्टल बार-बार बंद कर दिए जाते हैं और हम लोगों को गंगा घाट पर रात गुज़ारनी पड़ती है. प्रशासन को छात्रहित में हॉस्टल की स्थिति सुधारनी चाहिए.''
यूनिवर्सिटी के डीएसडब्लू प्रो अनिल कुमार कहते हैं, ''हॉस्टल का इंफ़्रास्ट्रक्चर बहुत ख़राब है जिसे स्टेट एजुकेशनल इंफ्रास्ट्रक्टर डिवेलपमेंट की ओर से ठीक किया जाना है. वहीं, यूनिवर्सिटी में छात्राओं के हॉस्टल की संख्या बढ़ाई जानी है, क्योंकि अब यूनिवर्सिटी में छात्राएँ 65 प्रतिशत हैं.''
लेकिन हॉस्टल के इंफ्रास्ट्रक्चर से इतर हॉस्टल का कल्चर कैसे सुधरेगा, इस सवाल का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है.
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