पटना यूनिवर्सिटी से अब क्यूं नहीं निकलते जेपी, नीतीश, लालू जैसे नेता

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
बिहार में अभी पक्ष-विपक्ष की राजनीति के शीर्ष पर मौजूद नेता छात्र राजनीति की उपज रहे हैं. इनमें नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी जैसे बड़े नेता शामिल हैं. ये सभी जिस पटना यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति करते हुए आगे बढ़े वह यूनिवर्सिटी एक बार फिर छात्र संघ यानी की छात्रसंघ चुनाव के रंग में रंगा है.
लेकिन जेएनयू, डीयू या दूसरी अन्य छोटी-बड़ी यूनिवर्सिटीज में होने वाले छात्र संघ चुनाव की तरह पटना यूनिवर्सिटी(पूसू) में चुनाव हर साल नहीं होते हैं. पूसू का पिछला चुनाव 2012 में हुआ था और उससे भी दिलचस्प यह कि 2012 में पूसू चुनाव 28 साल बाद हुए थे.
इसी विश्वविद्यालय से निकल कर लालू यादव 1990 में बिहार की सत्ता के शीर्ष पर पहुंच चुके थे. उसके बाद वे अगले 15 वर्षों तक लगातार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता के शीर्ष पर रहे. इस दौरान नीतीश कुमार और सुशील मोदी का भी सूबे की राजनीति में ज़बरदस्त दखल रहा. फिर नीतीश 2005 में सत्ता में आए. इसके बाद भी पूसू चुनाव होने में सात साल का समय लग गया. और चुनाव फिर से शुरू भी हुए तो उनमें निरंतरता नहीं रही.

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क्यूं नहीं हुए चुनाव?
ऐसे में सवाल ये कि छात्र राजनीति के ज़रिए महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुंचने वालों ने ही इसे बढ़ावा क्यूं नहीं दिया?
पटना यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डेजी नारायण कहती हैं, ''राजनीति को सिर्फ चुनाव ही नहीं बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो पटना यूनिवर्सिटी की सक्रिय भागीदारी नक्सल आंदोलन, संपूर्ण क्रांति आंदोलन सहित कई आंदोलनों में रही है. यहां के छात्रों ने समय-समय पर सत्ता का जबरदस्त प्रतिरोध किया.''
वह आगे बताती हैं, ''मुझे लगता है कि छात्र राजनीति के जरिए शीर्ष पर पहुंचने वालों की कोशिश छात्रों की शक्ति को काबू में रखने की रही है. उनकी कोशिश ये रही कि छात्रों की आवाज को नियंत्रण ना भी करो तो उसे अलग-थलग रहने दो ताकि उनके सत्ता में आने के बाद नई पीढ़ी में कोई उनसे तुरंत तीखे सवाल संगठित रूप से न करे.''
जबकि वरिष्ठ पत्रकार सुरुर अहमद लंबे समय तक चुनाव नहीं होने की ये वजहें मानते हैं, ''एक तो लालू के सत्ता में आने के पहले से ही छात्र संघ के चुनाव नहीं हो रहे थे तो उन्हें भी इस आधार पर एक बहाना शायद मिल गया हो. साथ ही नब्बे के दशक का शुरुआती दौर मंडल-कमंडल की राजनीति के उभार का था और इस कारण भी शायद उन्हें लगा हो कि अभी चुनाव के लिए पहल करना सही नहीं है.''
साथ ही वे डेजी नारायण की बातों से भी इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ''छात्र राजनीति से उभरे तमाम नेताओं के ज़हन में शायद यह ख़तरा रहा होगा कि चुनावों से नई लीडरशिप पैदा हो सकती है और इसलिए उन्होंने छात्र राजनीति और मूवमेंट को बढ़ावा नहीं दिया.''

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वैश्विक बदलाव का असर
दूसरी ओर नब्बे के दशक में जब पूसू से निकले नेता नेतृत्व की भूमिका में आए तो पूरी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण का दौर भी शुरू हो चुका था. जानकारों के मुताबिक इस दौर में शिक्षा का निजीकरण और व्यवसायीकरण भी बहुत तेज़ हुआ. इसी बीच यह सोच भी आई कि पुरानी यूनिवर्सिटीज को अगर खुद में सुधार लाना है तो उन्हें इन निजी संस्थानों का अनुकरण करना चाहिए.
जैसा कि डेजी नारायण बताती हैं, ''उसी दौर में प्रोफेशनल और वोकेशनल कोर्स को दौर शुरू हुआ. इन कोर्सेस में आम तौर पर एलीट तबके से आने वाले छात्र पढ़ने लगे. ऐसे छात्रों के बीच एक आम सोच यह बनी कि राजनीति हमारे लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए है. उनके लिए रोज़गार और मार्केट प्रमुख हो गया. इससे वे राजनीति से कटते गए. ऐसे में छात्रों के बीच भी छात्र राजनीति और छात्र संघ चुनाव को लेकर ज़रुरी दवाब बनना बंद हो गया क्यूंकि आधे-से-अधिक स्टूडेंट्स ने इस प्रक्रिया से खुद को करीब-करीब अलग-अलग कर लिया था.''

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चुनाव हुए मगर घटा असर
लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान ही छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन किया था. सत्तर और अस्सी के दशक में पटना यूनिवर्सिटी के छात्र रहे चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी भी आंदोलन के दौरान इससे जुड़े और अस्सी के दशक में वाहिनी के बिहार संयोजक भी रहे.
अशोक प्रियदर्शी बताते हैं, ''जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुए छात्र आंदोलन के बाद छात्र संघ के चुनाव हुए लेकिन छात्र संघों की धमक और प्रासंगिकता धीरे-धीरे बहुत कम रह गई. उस दौर में ही धीरे-धीरे ज्यादातर नामी-गिरामी शिक्षकों ने कैंपस से ज्यादा कोचिंग में पढ़ाने पर ध्यान देना शुरु किया. इससे कैंपस से स्टूडेंट्स का अलगाव बढ़ने लगा. कैंपस छात्रों से खाली होने लगे. इसके बाद छात्रों के मुद्दों पर राजनीति कर कोई लीडर बना हो ऐसी बात नहीं रह गई. इस कारण स्टूडेंट्स यूनियन की भूमिका और गरिमा बहुत कम हो गई. नतीजा ये हुआ कि लंबे समय तक चुनाव नहीं हुए या नियमित चुनाव नहीं हो रहे हैं तो वह बैचेनी नहीं दिखती है.''

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नुकसान
जानकारों का मानना है कि नियमित चुनाव नहीं होने से, यूनिवर्सिटी के रोजमर्रा के काम-काज से लेकर लंबी अवधि की नीतिगत योजनाओं तक में छात्रों की भागीदारी नहीं होने से यूनिवर्सिटी कमजोर पड़ जाती है. जैसा कि प्रोफेसर डेजी कहती हैं, ''यूनिवर्सिटी बनती ही है छात्रों से. इसके संचालन में छात्रों को औपचारिक रूप से शामिल नहीं करने से यूनिवर्सिटी की नींव कमजोर होती है. चुनाव नहीं होने से छात्रों की प्रतिनिधि आवाज गुम हो जाती है.''
नियमित चुनाव नहीं होने के असर को डेजी नारायण इस रूप में भी देखती हैं, ''एक खालीपन पैदा हुआ है. ऐसे छात्र अब कम निकल कर सामने आ रहे हैं जो गंभीर मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हों. आज अगर नई शिक्षा नीति पर चर्चा करनी हो तो वहीं दस छात्र मिलेंगे जो बाकी मुद्दों पर भी बहस करते हैं. धीरे-धीरे छात्र राजनीति सतही चीज़ों, व्यवस्था संबंधी बातों तक सिमट तक रह जाती है.''
यूनियन हुआ करता थी तो सभी कॉलेज में उनका ऑफिस था. वहां स्टूडेंट्स आते थे तो सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से जुड़ते थे. नियमित चुनाव नहीं होने से स्टूडेंट्स के मिलने-जुलने की यह जगह खत्म हो गई..
ऐसे में कैंपस निर्माण के नजरिए से अशोक प्रियदर्शी चुनाव नहीं होने के नुकसान को इस तरह देखते हैं, ''यूनिवर्सिटी और स्टूडेंट्स यूनियन एक-दूसरे को गढ़ने का काम करते हैं. यूनिवर्सिटी से नए विचार-नई बहस पैदा होते हैं तो दूसरी ओर देश और समाज को नया राजनीतिक नेतृत्व मिलता है. नियमित चुनाव के कारण स्टूडेंट्स यूनियन सक्रिय रहता है, यूनिवर्सिटी में एकेडमिक कैलेंडर और माहौल सही रहता है, गैर शैक्षणिक गतिविधियां चलती हैं, हॉस्टल का माहौल सही रहता है. शिक्षकों को मौका नहीं मिलता है कि वे पढ़ाने में कोताही बरतें. ये सब कमियां आज पटना युनिवर्सिटी सहित बिहार के सभी यूनिवर्सिटीज में दिखाई देती हैं.''

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छात्र संघों की भूमिका अहम
उच्च शिक्षा को एक नए मकाम तक पहुंचाने में छात्र संघों की अहम भूमिका मानी जाती है और इन संघों को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने के लिए चुनाव जरुरी हैं. अशोक प्रियदर्शी कहते हैं, ''शिक्षा व्यवस्था की गिरावट की वजहें मुलतः कहीं और हैं लेकिन इसे स्टूडेंट्स ही रोकेंगे. यूनिवर्सिटीज को फिर से प्रासंगिक बनाने में अन्य संस्थाओं के साथ-साथ छात्र संघों अहम भूमिका होगी.''
जबकि प्रोफेसर नारायण का मानना है कि आवाज उठाना, विरोध करने की संस्कृति, मुद्दों की बात ये सब छात्र जीवन की ज़रुरी बातें हैं जो कि छात्र राजनीति से ज्यादा बेहतर ढंग से सीखी जा सकती है. ये यब उन्हें भविष्य की ज़िम्मेवारियों के लिए तैयार करता है.
वह कहती हैं, ''सामाजिक विज्ञान और इतिहास में अगर हम क्रांति पढ़ा रहे हैं, चुनाव की प्रक्रिया पढ़ा रहे हैं और यूनिवर्सिटी में चुनाव न कराएं या स्टूडेंट्स को राजनीति से दूर रखें तो यह कथनी और करनी में अंतर का एक बड़ा उदाहरण होगा.''












