ग़ज़ा युद्ध: इसराइल पर अमेरिकी दबाव और घर में दांव पर बाइडन की साख, क्या है कनेक्शन

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- Author, बारबरा प्लेट अशर और एंथनी ज़र्चर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
ग़ज़ा युद्ध में अमेरिका का एक नया कूटनीतिक उद्देश्य इसराइल को इस बात के लिए मनाना है कि वो अपने सैन्य अभियानों की तीव्रता कम करे.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन की ये एक महत्वपूर्ण परीक्षा है. अगर अमेरिका सफल होता है तो इससे युद्ध के अगले चरण की तस्वीर तय करने में मदद मिलेगी. इसका असर घर में राष्ट्रपति की राजनीतिक किस्मत पर भी दिख सकता है.
इसराइल के युद्ध को आकार देने और नियंत्रित करने के अमेरिकी प्रयास ने दबाव की जगह सलाह का रूप ले लिया है.
राष्ट्रपति बाइडन, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ग़ज़ा में जारी युद्ध को इसराइल के आत्मरक्षा के अधिकार के रूप में पेश करते रहे हैं. उनका कहना है कि एक ऐसा सैन्य अभियान जो हमास को सत्ता से हटाने से रोकता है, वह केवल और अधिक हमलों की गारंटी देगा.

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नागरिकों की सुरक्षा
लड़ाई बढ़ने के साथ वे नागरिकों की सुरक्षा को लेकर और अधिक मुखर हो गए हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि इसकी अनदेखी करने पर इसराइल को 'रणनीतिक हार' का सामना करना पड़ेगा.
दुनिया के अधिकांश लोग इस नजरिए को बमबारी अभियान को नियंत्रित करने में विफलता के रूप में देखते हैं. यह इस सदी के सबसे घातक और विनाशकारी अभियानों में से एक है.
अमेरिकी अधिकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हमास के अभूतपूर्व हमले से आहत और पीछे हटने से मना कर रहे इसराइल पर प्रभाव डालने के लिए उनकी रणनीति प्रशासन का सबसे प्रभावी तरीका है.
अमेरिकी नीति ने बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी को बांट दिया है. युवा और अरब अमेरिकियों के बीच बाइडन ने समर्थन खो दिया है और अमेरिका विश्व मंच पर अलग-थलग पड़ गया है.
राष्ट्रपति जो बाइडन के इस नजरिए ने अब तक भले ही सीमित लेकिन ठोस परिणाम हासिल किए हैं.

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अमेरिकी प्रयास के नतीजे क्या निकले
लगातार और श्रमसाध्य कूटनीति ने युद्ध की शुरुआत में ही ग़ज़ा में कुछ मानवीय सहायता पहुंचाने की इजाजत देने का रास्ता साफ किया. इसने बंधकों की रिहाई को प्रोत्साहित करने और हताश नागरिकों को अधिक सहायता देने के लिए सात दिन का युद्धविराम कराने में मदद की.
अमेरिकी निश्चित रूप से बहुत कुशल हैं. इस इलाके में वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार दौरे का मतलब है कि अधिकतर समय कमरे में कोई न कोई होता है. इससे आमने-सामने कठिन बातचीत होती है.
एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा, "ये यात्राएं महत्वपूर्ण हैं क्योंकि हमारे पास लगातार मुद्दे हैं, जिनसे हम इसराइलियों से मिलकर निपट रहे हैं."
इस इलाके में ब्लिंकन की तीन यात्राओं में से हरेक में काफी गतिविधियां हुईं. वे बंधकों की रिहाई, मानवीय सहायता बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने के अमेरिकी प्रयासों के लिए उत्सुक रहे कि संघर्ष पूरे मध्य पूर्व में फैल न जाए.

अमेरिका की बात मानेगा इसराइल?
नागरिकों की सुरक्षा के मामले में प्रगति देखना कठिन रहा है. हमास की ओर से संचालित ग़ज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इस हफ्ते ग़ज़ा में मरने वालों की संख्या 20,000 तक पहुंच गई. दक्षिणी इसराइल पर सात अक्तूबर को हुए हमास के हमले में करीब 1,200 लोग मारे गए थे. इनमें से अधिकतर नागरिक थे. लड़ाकों ने करीब 240 लोगों को बंधक बना लिया था.
इस आश्वासन के बावजूद कि इसराइल ऐसा करने के लिए कदम उठाएगा, ब्लिंकन ने इरादों और परिणामों के बीच 'अंतर' की बात की है.
इसलिए जनवरी में इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा होगी कि क्या बाइडन प्रशासन इसराइल को युद्ध की गति को बदलने के लिए मना सकता है.
ये इसराइलियों को ग़ज़ा में सैन्य अभियानों को तेज करने और अधिक टार्गेटेड रणनीति के लिए प्रेरित कर रहा है, जिसमें बमबारी और तोपखाने से चलने वाले अभियानों की तुलना में नागरिकों की जान कम जाती है.
यह एक अनुरोध है, इसका इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से समर्थन नहीं किया है, लेकिन उनके रक्षा मंत्री ने युद्ध को विभिन्न चरणों में आगे बढ़ने की बात की है.

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अमेरिकी रणनीति की आलोचना
अमेरिकी रणनीति के आलोचकों का कहना है कि अमेरिका इतना सतर्क है कि वह इसराइल के युद्ध में प्रभावी रूप से शामिल है.
उनका कहना है कि अमेरिका को चाहिए कि वो इसराइल को असंगत सैन्य अभियान को कम करने के लिए और अधिक मजबूती से कहे. उनका कहना है कि इसराइल पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका को सैन्य सहायता रोकने या उस पर शर्तें लगाने की चेतावनी देनी चाहिए थी.
एरोन डेविड मिलर ने विदेश विभाग में मध्य पूर्व सलाहकार के रूप में करीब 25 साल तक काम किया है. मिलर इस धारणा को 'जादुई सोच' कहते हैं कि अमेरिका इसराइल पर अपनी नीति बदलने के लिए दबाव डाल सकता है.
वो कहते हैं, ''युद्धक्षेत्र की गतिशीलता को नियंत्रित करना हमारी क्षमता से परे है, सूक्ष्म प्रबंधन की तो बात ही छोड़ दें.''
वो कहते हैं कि इसराइल और हमास परस्पर विरोधी लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं.
मिलर अब कार्नेगी इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल पीस में सीनियर फेलो हैं.
वो कहते हैं, "इसराइलियों के लिए महत्वपूर्ण मामले में ऐसा कोई विकल्प या कोई परिणाम पेश किए बिना, जिसे वे तर्कसंगत और उचित ठहरा सकें, दबाव डालना कभी काम नहीं करता है."
इस बीच अमेरिकी बढ़ते अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना कर रहे हैं.

यह संयुक्त राष्ट्र से अधिक स्पष्ट कहीं नहीं है, जहां अमेरिका ने तत्काल मानवीय युद्धविराम की मांग का विरोध किया है.
इस हफ्ते ग़ज़ा में अकाल से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी के बाद अमेरिका ने ग़ज़ा में अधिक मानवीय सहायता की पहुंच के लिए सुरक्षा परिषद के दूसरे प्रस्ताव को पारित करने की इजाजत दी.
अमेरिकी प्रशासन युद्धविराम का कोई सुझाव नहीं चाहता है जो हमास नेतृत्व और उसकी सैन्य क्षमता को नष्ट करने की इसराइल की क्षमता में बाधा पहुंचाएगा.
लेकिन इस दृष्टिकोण को लेकर उसके कुछ सहयोगी भी मुखर हैं.

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अमेरिकी साख को खतरा
आयरलैंड के पूर्व राष्ट्रपति मैरी रॉबिन्सन ने वैश्विक नेताओं के समूह 'द एल्डर्स' की ओर से दिए इंटरव्यू में कहा, "संयुक्त राज्य अमेरिका सम्मान खो रहा है, वह एक शक्तिशाली देश के रूप में विश्वसनीयता खो रहा है."
उन्होंने कहा, "संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयम बरतने की अपील की है, लेकिन (इसराइली सरकार) सुन नहीं रही है."
वहीं अमेरिका के अरब साझेदार ग़ज़ा में इसराइल की ओर से किए गए विनाश के कट्टरपंथी प्रभाव को लेकर चिंतित हैं.
जॉर्डन के विदेश मंत्री अयमान सफ़ादी ने हाल ही में अमेरिकी यात्रा के दौरान कहा, "इसराइल हमारे क्षेत्र में संयुक्त राज्य अमेरिका और हमारे अन्य पश्चिमी मित्रों की स्थिति को खतरे में डाल रहा है."
उन्होंने कहा, "यह केवल फलस्तीनियों को नहीं मार रहा है...यह क्षेत्र में एक ऐसा माहौल भी बना रहा है जहां ग़ज़ा में जो कुछ हम देख रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप दिन पर दिन बढ़ती नफरत हमारे 30 साल के काम को बर्बाद कर रही है, जिसे हमने शांति के विचार को सामान्य बनाने के लिए निवेश किया है."
वहीं ब्लिंकन का जोर इस बात पर है कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी हमास पर हथियार डालने और नागरिकों के पीछे छिपना बंद करने के लिए दबाव डालना चाहिए.
लेकिन पिछले हफ्ते पैसा जुटाने के एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति बाइडन अपने प्रशासन की कुछ आंतरिक निराशाओं को स्वीकार करते नजर आए.
राष्ट्रपति बाइडन ने कहा, "(इसराइल) दुनिया के अधिकांश लोग इसका समर्थन कर रहे हैं. लेकिन अंधाधुंध बमबारी की वजह से वे इस समर्थन को खोने लगे हैं.''

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अमेरिका की घरेलू राजनीति
बाइडन को इसराइल के खिलाफ एक मजबूत रुख अपनाने के लिए बढ़ते घरेलू दबाव का भी सामना करना पड़ रहा है.
इस हफ्ते 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के एक ओपिनियन पोल में केवल 33 फीसदी पंजीकृत अमेरिकी मतदाताओं ने राष्ट्रपति के इसराइल-फलस्तीनी संघर्ष से निपटने के तरीके को मंजूरी दी.
वहीं 44 से 39 फीसदी का कहना था कि इसराइल को अपना सैन्य अभियान खत्म कर देना चाहिए.
साल 2024 के राष्ट्रपति चुनाव की ओर बढ़ते हुए इस पोल से पता चलता है कि बाइडन प्रशासन को अपने चुनावी गठबंधन के प्रमुख सदस्यों से समर्थन नहीं मिल रहा है.
30 साल से कम उम्र के मतदाताओं में से 46 फीसदी ने कहा कि वे फलस्तीनी पक्ष के प्रति अधिक सहानुभूति रखते हैं. वहीं केवल 27 फीसदी ने इसराइल का पक्ष लिया.
डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ प्रमुख उदारवादी सदस्यों ने एक प्रस्ताव पेश किया है. इसमें इसराइल की ओर से अमेरिकी हथियारों के इस्तेमाल पर एक मानवाधिकार रिपोर्ट की मांग की गई है. इससे अमेरिकी सुरक्षा सहायता के निलंबित होने की संभावना है.
वर्मांट के वामपंथी सीनेटर बर्नी सैंडर्स बाइडन के एक महत्वपूर्ण सहयोगी हैं, वे प्रस्ताव को प्रायोजित कर रहे हैं. उन्होंने युद्ध के दौरान इसराइल के व्यवहार को 'लापरवाह और अनैतिक' बताया है.
वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा की पृष्ठभूमि वाले हाउस डेमोक्रेट्स के एक समूह ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखकर कहा है कि बिन्यामिन नेतन्याहू की सैन्य रणनीति इसराइल या अमेरिका के हित में नहीं है.
इसके अलावा बाइडन के अपने प्रशासन के लोगों ने भी असहमति जताई है. आठ सौ से अधिक स्टाफ सदस्यों ने तत्काल युद्धविराम की मांग करने वाले एक पत्र का समर्थन किया है, हालांकि इनमें से अधिकांश लोगों ने गुमनाम रूप से ऐसा किया है. इनमें से केवल एक सदस्य ने इस्तीफा दिया है.
इस तरह की भावनाएं इस बात को रेखांकित करती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति खुद को किस मुश्किल बंधन में फंसा हुआ पाते हैं.
कई अंतरराष्ट्रीय नेता, बड़ी संख्या में उनके प्रशासन के लोग और करीब आधी अमेरिकी जनता वर्तमान रणनीति से खुश नहीं हैं.
लेकिन अगर राष्ट्रपति इसराइल के साथ सख्त होते हैं, तो इसराइल का समर्थन करने वाले आधे अमेरिकी निश्चित रूप से आपत्ति जताएंगे. और इस बात की अभी भी कोई गारंटी नहीं है कि उनके वर्तमान आलोचक संतुष्ट होंगे.
इसराइली हमले को कम करना महत्वपूर्ण है. लेकिन यदि यह इतनी तेजी से नहीं होता है तो बाइडन को अपने अगले कदम पर गंभीरता से विचार करना होगा.
वह भी तब जब कैलेंडर जल्द ही 2024 में बदल जाएगा, उनके पहले राष्ट्रपति कार्यकाल का आखिरी साल. घरेलू राजनीति, जो हमेशा से ही अमेरिकी विदेश नीति का एक कारक रही है, राष्ट्रपति के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन जाएगी.
एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने डोनल्ड ट्रंप की उथल-पुथल वाली विदेश नीति को स्थिरता देने का वादा किया था, ग़ज़ा युद्ध उसके राजनीतिक भाग्य के लिए एक गंभीर चुनौती साबित होगा.
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