इसराइल-हमास युद्ध: ग़ज़ा में मरने वालों की संख्या इस संघर्ष के बारे में क्या बताती है?

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- Author, मर्लिन थॉमस
- पदनाम, बीबीसी वेरिफ़ाई
फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास की ओर से बीती सात अक्टूबर को इसराइल पर किए गए हमले के बाद शुरू हुई इसराइली कार्रवाई में कम से कम बीस हज़ार फ़लस्तीनी लोगों की मौत हो गई है.
लेकिन मृतकों की ये संख्या इस संघर्ष के बारे में क्या बताती है, बीबीसी वेरिफ़ाई ने इस बात की पड़ताल की है.
ग़ज़ा में हमास नियंत्रित स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, इस संघर्ष की शुरुआत होने के बाद से हर दिन औसतन कम से कम तीन सौ लोगों की मौत हुई है. हालांकि, इसमें सात दिन तक लागू रहे युद्धविराम की अवधि शामिल नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के रीजनल इमरजेंसी डायरेक्टर रिचर्ड ब्रेनन ने इन आंकड़ों को भरोसेमंद माना है.
किसी भी युद्ध क्षेत्र में मृतकों की संख्या का सटीक आकलन लगाना एक जटिल कार्य होता है.
ग़ज़ा में मौजूद डॉक्टरों के मुताबिक़, मृतकों की संख्या काफ़ी ज़्यादा होने की आशंका है क्योंकि अब तक उन लोगों की गिनती नहीं हो पाई है जो ग़ज़ा में इमारतों के मलबे के नीचे दबे हुए हैं, या जिन्हें अस्पताल नहीं ले जाया जा सका.
बीबीसी वेरिफ़ाई ने बेहद गहनता से इन आंकड़ों की पड़ताल की है.
इस प्रक्रिया में ये समझने की कोशिश की गई कि ये आंकड़े दूसरे संघर्षों के आंकड़ों की तुलना में कैसे अलग हैं और इनका आने वाले कल में ग़ज़ा की युवा आबादी पर क्या असर पड़ेगा.
मृतकों की संख्या बहुत ज़्यादा होना

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो से लेकर कोलंबियाई गृह युद्ध और 2003 में हुए इराक़ युद्ध जैसे तमाम संघर्षों में मरने वालों की संख्या के विश्लेषण के बारे में विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर माइकल स्पागट कहते हैं कि इस युद्ध में जिस तेज़ी से लोगों की मौत हुई है, वो बहुत ज़्यादा है.
वह कहते हैं, "ग़ज़ा में साल 2008 से शुरू हुए संघर्ष के सिलसिले में, ये युद्ध मृतकों की संख्या और अंधाधुंध ढंग से हत्याएं होने के लिहाज़ से अभूतपूर्व है."
आबादी के लिहाज़ से दखा जाए तो, 20,000 का ये आंकड़ा ग़ज़ा की 22 लाख की आबादी का एक प्रतिशत है.
बीबीसी ने कई सैन्य विशेषज्ञों से बात की है जिन्होंने इस युद्ध में इसराइल द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बमों की जानकारी दी है.
इनमें कुछ बम 45 किलोग्राम वज़न तक के हैं और कुछ 900 किलोग्राम से भी बड़े हैं.

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के दफ़्तर पेंटागन में काम कर चुके और संयुक्त राष्ट्र के क्राइम इन्वेस्टिगेटर मार्क गार्लास्को कहते हैं कि किसी बड़े बम के निशाने के क़रीब होना ऐसा है जैसे उसके गिरने की जगह को पिघलते हुए देखना. गार्लास्को फिलहाल नीदरलैंड्स की संस्था पीएएक्स में बतौर सलाहकार काम कर रहे हैं.
ग़ज़ा की आबादी का घनत्व हालात को और गंभीर बनाता है. महज़ 41 किलोमीटर लंबी और 10 किलोमीटर चौड़ी गज़ा पट्टी में 22 लाख लोग रहते हैं.
इस युद्ध से पूर्व औसतन गज़ा में प्रति वर्ग किलोमीटर में 5700 लोग रहते थे. आबादी का ये घनत्व लंदन जैसा है.
इसराइल ने ग़ज़ा में अपना सैन्य अभियान हमास के हमले के बाद शुरू किया था. सात अक्तूबर को हमास ने इसराइल में हमला कर 1200 इसराइलियों की हत्या की थी. इनमें से ज़्यादातर लोग सैनिक नहीं थे.
इस हमले के लगभग ढाई महीने बाद अब आम फ़लस्तीनियों की मौतें होने के कारण इसराइल पर दबाव बढ़ रहा है.

एक्शन ऑन आर्म्ड वॉयलेंस के मुताबिक़, 2011 से 2021 के बीच दुनियाभर में हुए संघर्षों में मरने वालों में 90 फ़ीसदी आम लोग थे.
अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्ट जिसे सीएनएन ने देखा है, उसके मुताबिक़, इसराइल ने ये जंग शुरू होने के बाद ग़ज़ा पर 29,000 बम गिराए हैं. इनमें 40-45 फ़ीसदी बिना किसी को निशाना बनाकर दागे गए थे.
गार्लास्को कहते हैं कि बिना किसी को निशाने पर दागे गए बम अक्सर तीस मीटर के दायरे में कहीं भी फट सकते हैं. मिसाल के तौर पर हमास के मुख्यालय की ओर दागा गया बम पास की रिहायशी इमारत पर भी गिर सकता है.
इसराइली सेना का कहना है कि वो आम लोगों को नुक़सान से बचाने के लिए कई एहतियाती क़दम उठाती है. सेना के मुताबिक़, जहां भी वो हमला करते हैं, वहां पहले चेतावनी जारी की जाती है.
इसराइल का ये भी कहना है कि दुनियाभर में हुई जंगों में आम लोगों की मौतों की संख्या में उनका रिकॉर्ड बेहतर है.
इसराइली सेना कहती है "जहां पर सिविल आबादी का पता चलता है तो हम अपना हमला रोक देते हैं. हम हर लक्ष्य के लिए सही बम का चुनाव करते हैं - ताकि ग़ैर-ज़रूरी नुक़सान न हो."
इसराइल का दावा है कि हमास आम लोगों का इस्तेमाल मानव ढाल की तरह कर रहा है.
कितने आम लोग मारे गए हैं?

हमास का कहना है कि मौजूदा जंग में मरने वालों में 70 फ़ीसदी महिलाएं और बच्चे हैं.
लेकिन हमास के आंकड़े हथियारबंद और आम लोगों में भेद नहीं करते.
19 दिसंबर को जारी हमास के आंकड़ों के मुताबिक़, मरने वालों की संख्या 19,667 थी. उसका दावा है कि इनमें से 8000 बच्चे और 6200 महिलाएं थीं.
इसके अलावा 310 मेडिकल कर्मी, 35 सिविल डिफेंस के लोग और 97 पत्रकार भी इस आंकड़े में शामिल थे.
युद्ध का सबसे भयंकर असर ग़ज़ा के बच्चों पर हो रहा है. ग़ज़ा की आधी से अधिक आबादी 18 साल के कम आयु की है.
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हमास के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार अब तक इस युद्ध में अब तक लगभग 52,000 लोग घायल हो चुके हैं. हालांकि, घायल बच्चों की संख्या के बारे में ताज़ा आंकड़े नहीं है.
तीन नवंबर को घायलों की संख्या 24,173 थी. इनमें 8,067 बच्चे, 5,960 महिलाएं और 10,146 पुरुष शामिल थे.
संयुक्त राष्ट्र की चाइल्ड एजेंसी यूनिसेफ़ ने पहले भी कहा है कि दुनिया में किसी भी बच्चे के लिए ग़ज़ा इस वक़्त सबसे ज़्यादा ख़तरनाक जगह है.
यूनिसेफ़ के क्षेत्रीय निदेशक एडेल खोद्र ने कहा, "जहां बच्चे खेला करते थे, स्कूल जाया करते थे, अब वो जगहें पत्थरों के ढेर में तब्दील हो गयी है."
ये जंग दूसरे युद्धों की तुलना में कितना अलग है?

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हर संघर्ष अपने आप में ख़ास होता है. लेकिन बीबीसी ने जिन विशेषज्ञों से बात की है, वे इस बात पर सहमत हैं कि ग़ज़ा में इस युद्ध के दौरान आम लोगों की मृत्यु दर दूसरे तमाम संघर्षों की तुलना में बहुत ज़्यादा है.
साल 2014 से युद्धों और संघर्षों में आम लोगों की मौतों पर नज़र रखने वाले संगठन एयरवॉर्स की निदेशक एमिली ट्रिप कहती हैं, "हमने इस युद्ध के दौरान आम लोगों की जो मृत्यु दर देखी है, वो तमाम दूसरे संघर्षों से कहीं ज़्यादा है."
मार्क गार्लास्को कहते हैं, "इतने छोटे रिहायशी इलाके़ में इतने ज़्यादा विस्फोटकों के इस्तेमाल का ऐसा दूसरा उदाहरण तलाशने के लिए हमें वियतनाम युद्ध के दौर को देखना होगा. और हमें 1972 की क्रिसमस बॉम्बिंग जैसा उदाहरण मिलेगा जब ऑपरेशन लाइनबेकर द्वितीय के दौरान हनोई पर बीस हज़ार टन के बम बरसाए गए थे. इस बमबारी में लगभग 1,600 वियतनामी बच्चे मारे गए थे. "
एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक़, 2017 में सीरियाई शहर रक़्क़ा से इस्लामिक स्टेट को बाहर निकालने के लिए चलाए जा रहे चार महीने लंबे अभियान के दौरान अमेरिकी नेतृत्व वाली एयर एवं आर्टिलरी हमलों की वजह से औसतन हर रोज़ बीस आम लोग मारे जा रहे थे.
उस वक़्त वहां रहने वाले आम लोगों की संख्या स्पष्ट नहीं है. लेकिन सयुंक्त राष्ट्र के अधिकारियों का अनुमान है कि ये संख्या 50,000 से 1,00,000 के बीच रही होगी.
इसके साथ ही लगभग 1,60,000 आम लोगों को इस संघर्ष के कारण विस्थापित होना पड़ा था.
अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस की एक जांच में पता चला है कि इराक़ी शहर मोसुल के लिए अमेरिका समर्थित इराकी बलों और इस्लामिक स्टेट के बीच नौ महीने की लड़ाई में 9,000 से 11,000 आम नागरिक मारे गए थे. इस संघर्ष में भी औसतन प्रति दिन क़रीब 40 आम लोगों की मौत हुई थी.
साल 2014 में जब इस्लामिक स्टेट ने ने मोसुल पर कब्जा किया था तब इसकी अनुमानित आबादी 20 लाख से भी कम थी.
वहीं यूक्रेन युद्ध के बारे में संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इसमें लगभग दो वर्षों के दौरान कम से कम 10,000 आम नागरिक मारे गए हैं.
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का ह्यूमन राइट्स मॉनिटरिंग मिशन चेतावनी देते हुए कहता है कि मृतकों की असल संख्या काफ़ी ज़्यादा हो सकती है. क्योंकि आंकड़ों की सत्यता की जांच करना काफ़ी चुनौतीपूर्ण है और इसमें काफ़ी समय लग सकता है.
इसके साथ ही अलग-अलग संघर्षों में मरने वाले आम लोगों की संख्या की तुलना करना काफ़ी मुश्किल होता है क्योंकि मृतकों की संख्या गिनने के लिए इस्तेमाल किया गया ढंग अलग-अलग हो सकता है.
हमास के कितने लड़ाके मारे गए?

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इसराइल ने कहा है कि उसका मकसद हमास को तबाह करना है. लेकिन अब तक उसने ये नहीं बताया है कि उसने हमास के कितने लड़ाकों को मारा है.
पहले इसराइली अधिकारी कह चुके हैं कि उन्होंने हज़ारों लड़ाकों को मारा है. एक जगह इसराइल ने ये भी कहा था कि अब तक 7,000 हमास लड़ाके मारे जा चुके हैं.
हमास को इसराइल, ब्रिटेन और दुनिया की कई ताक़तें एक आतंकवादी संगठन मानती हैं.
जब इसराइली सेना से सीधा सवाल पूछा गया तो उनके एक अधिकारी ने कहा कि उनके पास ‘हमास के मारे गए आतंकवादियों की संख्या का सही आंकड़ा नहीं है.'
समाचार एजेंसी एएफ़पी को एक इसराइली अधिकारी ने बताया था कि उन्होंने हर इसराइली मृतक के बदले हमास के दो लड़ाकों को मारा है.
सीएनएन से एक बातचीत में इसराइली सेना के प्रवक्ता जोनाथन कॉनरिक्स इस अनुपात को ‘बेहद सकारात्मक’ मानते हैं.
लेकिन बीबीसी हमास के मरने वाले लड़ाकों की सही संख्या की पुष्टि नहीं कर सकता.
प्रोफ़ेसर माइकल स्पागट कहते हैं, "मैं इस बात से हैरान नहीं होऊंगा अगर ग़ज़ा में मरने वालों में 80 फ़ीसदी आम लोग हों.”
इराक़ युद्ध में मृतकों के आंकड़ों का अध्ययन करने वाली संस्था इराक़ बॉडी काउंट के हमित दार्दागन और जॉन स्लोबोडा कहते हैं कि ग़ज़ा में सैनिक और ग़ैर-सैनिक मृतकों के अनुपात पर कोई भी भरोसेमंद आंकड़े नहीं है.
(बैकी डेल की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)
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