उत्तर प्रदेश: डीजीपी की नियुक्ति पर योगी सरकार की नई नियमावली में ऐसा क्या है, जिस पर हो रहा है विवाद

योगी आदित्यनाथ

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    • Author, सैय्यद मोज़ेज इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी को नियुक्त करने की नई प्रक्रिया को मंज़ूरी दी है.

इसके साथ ही इसपर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है. विपक्ष ने आरोप लगाया है कि योगी सरकार का ये क़दम अपने किसी ख़ास अधिकारी की नियुक्ति के लिए है.

उत्तर प्रदेश में कई अधिकारी मौजूदा डीजीपी प्रशांत कुमार से सीनियर हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने जिस नई नियमावली को मंज़ूरी दी है, वो अब से प्रदेश के नए पुलिस महानिदेशक के चयन का आधार बनेगी.

नए डीजीपी के चयन को लेकर बनी नई प्रक्रिया लागू भी कर दी गई है.

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पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में नए पुलिस महानिदेशक के चयन की नई प्रक्रिया के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई.

अब नए डीजीपी के चयन के लिए छह सदस्यीय समिति का गठन किया जाएगा. ये समिति हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में नए डीजीपी का चयन करेगी.

इस समिति में राज्य के चीफ़ सेक्रेटरी, संघ लोक सेवा आयोग का एक सदस्य, राज्य सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष या उनकी तरफ से नामित अधिकारी, राज्य के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव और राज्य के पूर्व डीजीपी सदस्य के तौर पर शामिल होंगे.

आलोचना

कार्यवाहर डीजीपी प्रशांत कुमार

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प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन ने बीबीसी से कहा, "पहले की प्रक्रिया ज़्यादा फ़ेयर थी. नई प्रकिया पूरी तरह से सरकार के अधीन होगी. समिति में मौजूद यूपीएससी के सिर्फ़ एक सदस्य की राय की ज़्यादा अहमियत नहीं होगी. सरकार मनमाने ढंग से नियुक्ति भी करेगी और हटाएगी भी."

प्रशासन का लंबा अनुभव रखने वाले आलोक रंजन के मुताबिक़ जूनियर अधिकारियों के प्रमोट होने से उन सीनियर अफ़सरों का मनोबल गिरेगा, जिन्होंने 30 से 35 साल सेवा में दिए हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार में मुख्य सचिव और डीजीपी के दो पद ऐसे हैं, जिन्हें राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाना चाहिए.

राज्य के पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह का कहना है कि ताज़ा प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की मंशा के ख़िलाफ़ है.

पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने बीबीसी से कहा, "साल 2006 के प्रकाश सिंह केस में बाकायदा वह प्रक्रिया भी बताई गई थी, जिससे डीजीपी का चुनाव किया जा सकता है."

"इसके बरअक्स नई प्रक्रिया के वजूद में आने से यूपीएससी का रोल लगभग समाप्त हो जाएगा. पहले राज्य सीनियर अधिकारियों का पैनल यूपीएससी को भेजता था. उनमें से ही किसी एक की नियुक्ति होती थी."

पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का मानना है कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का कुछ हिस्सा तो रखा है, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय का प्रतिनिधि इसमें नहीं है.

प्रकाश सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा कि साल 2006 के फ़ैसले में भी राज्य सरकार को क़ानून बनाने की इजाज़त कोर्ट ने दी थी.

हालांकि पूर्व डीजीपी बृजलाल का कहना है कि डीजीपी की स्थायी नियुक्ति के लिए बनाई गई नियमावली सही है और इस निर्णय के आने वाले समय में अच्छे नतीजे दिखाई देंगे.

सियासत हुई तेज़

अखिलेश यादव

डीजीपी के चयन पर बनाई गई नई प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने सरकार की आलोचना की है.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि अपने चहेते अफ़सर की नियुक्ति के लिए यह सब किया जा रहा है.

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, "सुना है किसी बड़े अधिकारी को स्थायी पद देने और उनका कार्यकाल 2 साल बढ़ाने की व्यवस्था बनाई जा रही है. सवाल ये है कि व्यवस्था बनाने वाले ख़ुद दो साल रहेंगे या नहीं. कहीं ये दिल्ली के हाथ से लगाम अपने हाथ में लेने की कोशिश तो नहीं है. दिल्ली बनाम लखनऊ 2.0."

अखिलेश यादव का कहना है कि नई प्रक्रिया केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच चल रही तकरार का नतीजा है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी केंद्र बनाम राज्य सरकार की तनातनी की तरफ़ इशारा किया है.

उन्होंने कहा, "केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों की सर-फुटौव्वल का ख़ामियाज़ा उत्तर प्रदेश की जनता चुका रही है. तीन साल से कोई पूर्णकालिक डीजीपी ना होने से प्रदेश में क़ानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो चुकी है."

राय ने कहा कि अपराधी निरंकुश होकर अपराध कर रहे हैं और पुलिस विभाग घोर अनुशासनहीनता और राजनीति का शिकार है.

उन्होंने कहा कि लखनऊ और दिल्ली के झगड़े में पिछले तीन साल से उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है. तीन साल से कार्यवाहक डीजीपी से प्रदेश का पुलिस महकमा चल रहा है.

विपक्ष के आरोपों पर बीजेपी की प्रतिक्रिया

राकेश त्रिपाठी

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इमेज कैप्शन, बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज़ किया है

बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि अखिलेश यादव जी को अपने कार्यकाल को याद रखना चाहिए, जब वो ख़ुद अपने फ़ैसले नहीं कर पाते थे.

मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "अखिलेश यादव को रह रहकर अपने कार्यकाल की याद सताती है. अखिलेश जी की कुर्सी के चार पाए रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव, नेताजी और आज़म ख़ान खींचा करते थे."

त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्य सचिव दीपक सिंघल के मामले में अखिलेश यादव ने इसकी सार्वजनिक स्वीकारोक्ति भी की थी.

उन्होंने कहा, "अखिलेश ख़ुद अपना चीफ़ सेक्रेटरी तय नहीं कर पाते थे, इसलिए मुख्यमंत्री योगी जी के डीजीपी तय करने पर पीड़ा हो रही है."

दरअसल, मौजूदा डीजीपी से पहले के ढाई साल में उत्तर प्रदेश में तीन कार्यवाहक डीजीपी रह चुके हैं; डीएस चौहान, आरके विश्वकर्मा और विजय कुमार.

उत्तर प्रदेश के मौजूदा डीजीपी प्रशांत कुमार से सीनियर क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा आईपीएस अफ़सर ऐसे थे, जिन्हें सरकार ने प्रदेश पुलिस के मुखिया पद के लिए नज़रअंदाज़ कर दिया था.

इस वजह से दो साल की स्थायी नियुक्त होने पर कई अफ़सर बिना डीजीपी बने ही रिटायर हो सकते हैं.

ऐसे अफ़सरों की फ़ेहरिस्त में पीवी रामाशास्त्री, आदित्य मिश्रा, संदीप सालुंके, दलजीत सिंह चौधरी, विजय कुमार मौर्य, एमके बशाल, तिलोत्तमा वर्मा, आलोक शर्मा, अभय कुमार प्रसाद, दीपेश जुनेजा और नीरा रावत शामिल हैं.

यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ और गृह मंत्री अमित शाह

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इमेज कैप्शन, विपक्ष ने यूपी सरकार और दिल्ली की केंद्र सरकार के बीच खींचतान का आरोप लगाया है

अगर राज्य सरकार मौजूदा कार्यवाहक डीजीपी प्रशांत कुमार को स्थायी पद देती है, तो उनके रिटायर होने के बाद नए डीजीपी की चयन प्रक्रिया तहत उन्हीं अफसरों के नाम पर विचार किया जा सकेगा, जो जुलाई 2026 के बाद रिटायर होने वाले हों.

इस प्रक्रिया का ख़ामियाजा कई अफसरों को उठाना पड़ सकता है.

फ़िलहाल उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अफ़सरों में एसएन साबत, आनंद कुमार, एसए रिज़वी, आशीष गुप्ता, आदित्य मिश्रा, पीवी रामाशास्त्री, संदीप सालुंके, दलजीत सिंह चौधरी, रेणुका मिश्रा और विजय कुमार मौर्य समेत कई अफ़सर प्रशांत कुमार से सीनियर हैं.

बिज़नेस स्टैडर्ड के ब्यूरो चीफ़ सिद्धार्थ कलाहंस का कहना है कि जब राज्य और केंद्र में एक पार्टी की सरकार हो, तो असहमति की स्थिति नहीं बननी चाहिए, इससे ग़लत संदेश जाता है.

उन्होंने कहा, "जिस प्रदेश में दूसरे दलों की सरकार है, वहाँ तो बात समझ में आती है. अभी तक संघीय व्यवस्था में जो प्रक्रिया चल रही थी वो सही लग रही थी. अब नई नियमावली से लगेगा कि केंद्र और राज्य एक प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं है."

'प्रकाश सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया' केस में कोर्ट ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, साल 2006 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में डीजीपी और अन्य अधिकारियों के चयन को लेकर एक गाइडलाइन दी थी.

साल 2006 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में डीजीपी और अन्य अधिकारियों के चयन को लेकर एक गाइडलाइन दी थी.

इस गाइडलाइन के मुताबिक़ प्रदेश सरकार पुलिस विभाग के तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से ही किसी एक का चुनाव राज्य के पुलिस महानिदेशक के पद के लिए कर सकती है.

ये तीन अधिकारी वो होंगे, जिन्हें यूपीएससी की ओर से प्रदेश के पुलिस बल का नेतृत्व करने के लिए उनकी सेवा की अवधि, रिकॉर्ड और अनुभव के आधार पर पदोन्नति के लिए विचारयोग्य अधिकारियों के पैनल में शामिल किया गया हो.

इस गाइडलाइन के मुताबिक़ राज्य के पुलिस महानिदेशक पद पर नियुक्ति के बाद न्यूनतम कार्यकाल कम से कम दो साल का होना चाहिए.

'प्रकाश सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया' के फ़ैसले में दी गई गाइडलाइन में किसी कार्रवाई के परिणामस्वरूप, अपराध या भ्रष्टाचार के मामले में अदालत से सज़ा मिलने पर पुलिस महानिदेशक को हटाने का प्रावधान था.

इसके अलावा किसी अन्य वजह से कर्तव्य पूरा करने में असमर्थता की स्थिति में राज्य सुरक्षा आयोग की सलाह पर पुलिस महानिदेशक को हटाने का प्रावधान भी किया गया था.

इस गाइडलाइन में एडीजी ज़ोन, आईजी, डीआईजी और जनपद के पुलिस अधीक्षक के लिए भी दो साल का न्यूनतम कार्यकाल निर्धारित किया गया था, जिसे अनुशासनात्मक कार्रवाई, अपराध या भ्रष्टाचार के मामले में सज़ा या सेवानिवृति की स्थिति में ही सीमित किए जाने का प्रावधान था.

साल 2006 इसके फ़ैसले को न मानने और कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त करने पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तीन याचिकाओं को एक साथ जोड़ते हुए अक्तूबर माह में आठ राज्यों को अवमानना का नोटिस भेजा था.

तत्कालीन चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार की सरकारों से इस बाबत जवाब मांगा था.

याचिकाकर्ताओं में एक हरियाणा के विनोद कुमार की ओर से शीर्ष कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण की इस मामले में दलील थी कि इन राज्यों ने कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया है.

2018 और 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले

रंजन गोगोई

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इमेज कैप्शन, रंंजन गोगोई ने चीफ़ जस्टिस रहते हुए डीजीपी की नियुक्ति पर अहम फ़ैसला सुनाया था

याचिकाकर्ता के वकील शंकरनारायण ने मीडिया को बताया कि सबसे बड़ा उल्लंघन उत्तर प्रदेश में हुआ, जहाँ 18 अफ़सरों की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ किया गया और कार्यवाहक डीजीपी बनाए गए अफ़सर उस समय वरिष्ठता में 19वें नंबर पर थे. हालांकि अभी भी प्रशांत कुमार वरिष्ठता क्रम में काफ़ी नीचे हैं.

पुलिस महानिदेशक नियुक्ति पर आई उत्तर प्रदेश सरकार की नई नियमावली डीजीपी की तैनाती पर सुप्रीम कोर्ट के साल 2018 और 2019 के फ़ैसलों के बरअक्स है.

इस फ़ैसले में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि राज्य सरकारें कोर्ट के इस फ़ैसले के विपरीत जाने वाले प्रावधान नहीं बनाएँगी.

इसी तरह का एक फ़ैसला साल 2019 में तत्कालीन चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस संजीव खन्ना ने भी दिया था.

हालांकि जस्टिस गोगोई ने साल 2006 के फ़ैसले में संशोधन करते हुए डीजीपी पद पर नियुक्ति पाने वाले अधिकारी के शेष कार्यकाल की अवधि घटा दी थी.

इस फ़ैसले से पहले डीजीपी बनने वाले अधिकारी का कार्यकाल कम से कम 2 साल बचा होना चाहिए था, जिसे 2019 के फ़ैसले में घटाकर सिर्फ़ छह महीने कर दिया गया था. जस्टिस गोगोई ने यह भी कहा था कि कोई भी राज्य सरकार कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त नहीं करेगी.

वही साल 2018 के फ़ैसले में स्पष्ट किया गया था कि राज्य सरकार कोई भी क़ानून, नियमावली या रूल कोर्ट के निर्देशों के ख़िलाफ़ बनाती है, तो वो अमल में नहीं लाया जाएगा या स्थगित रहेगा.

कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर किसी सरकार को परेशानी हो, तो वह कोर्ट में आ सकती है.

पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरकार को बेशक नए नियम बनाने का अधिकार है, लेकिन ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट की मंशा के ख़िलाफ़ है. नई नियमावली में प्रस्तावित पैनल राज्य सरकार की कमेटी लग रही है.

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