न्यायपालिका में 50% आरक्षण की सलाह: क्या कहती हैं महिला वकील?

जस्टिस एन वी रमन्ना

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

महिला वकीलों को 'गुस्से से' न्यायपालिका में 50 फ़ीसदी आरक्षण के लिए मांग उठानी चाहिए - ये बात मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट की महिला वकीलों द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में कही.

न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने इसे लैंगिक असंतुलन को ख़त्म करने के लिए अति आवश्यक सुधार बताया और कहा कि आपको गुस्से से चिल्लाना होगा, मांग करनी होगी कि आपको 50 फ़ीसदी आरक्षण चाहिए. ये छोटा मुद्दा नहीं है. ये हज़ारों वर्षों से दबाया हुआ मुद्दा है. ये आपका हक़ है और ये आपके अधिकारों का मामला है.

न्यायाधीश एन वी रमन्ना के इस वक्तव्य पर महिला वकीलों ने खुशी ज़ाहिर की है और उनका मानना है कि इससे महिलाओं को आगे आने के अवसर मिलेंगे.

सीमा कुशवाहा

सीमा कुशवाहा

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सीमा कुशवाहा निर्भया मामले में वकील रह चुकी हैं और उत्तप्रदेश के इटावा के एक छोटे से गांव उग्रपुर से आती हैं.

वे बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहती हैं कि न्यायपालिका में महिलाओं की भागादारी बढ़ने से लोगों का नज़रिया बदलने में मदद मिलेगी.

सीमा बताती हैं कि निर्भया मामले और फिर हाथरस मामले की वजह से एक वकील के तौर पर ज़्यादातर शहरों में लोग उन्हें जानने लगे हैं लेकिन अगर वे किसी मामले के सिलसिले में पंचायत या गांव में जाती हैं तो लोग उन्हें वकील के तौर पर नहीं देखते. वो सिर्फ़ एक महिला के तौर पर ही देखी जाती हैं.

महिला केस कैसे लड़ सकती है?

वे आगे बताती हैं कि सामाजिक संरचना ऐसी बना दी गई है कि लड़कियों को घर में ही बोलने नहीं दिया जाता तो ऐसे में वे सबके सामने खुलकर कैसे बोलना सीखेंगी.

सीमा कुशवाहा बताती हैं, ''ज्यादातर लोगों का नज़रिया रहता है कि ये महिला है ये क्या केस लड़ेगी. वो आपको गंभीरता से नहीं लेते लेकिन जब महिलाओं की संख्या न्यायापालिका में बढ़ेगी तो लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा ऐसे में सीजेआई के इस वक्तव्य से ऐसी लड़कियों को मदद ज़रूर मिल सकती है.''

कानपुर यूनिवर्सिटी से वकालत की डिग्री हासिल करने वाली सीमा बताती हैं कि कालत की पढ़ाई कर रही या कर चुकी लड़कियाँ उनके साथ अपने अनुभव साझा करती रहती हैं.

उनके अनुसार, ''जब लड़कियां प्रैक्टिस के लिए जाती हैं तो वहां ज्यादातर पुरुष वकील होते हैं जिनके नीचे प्रशिक्षण लेना होता है. वे उन्हें केवल दौड़ाते हैं, एक्पोज़र नहीं मिल पाता. ऐसे में किसी भी केस को लेकर उनकी सीनियर पर निर्भरता बढ़ जाती है और लोगों को यकीन नहीं होता कि वो केस भी लड़ सकती है. उन्हें ज़िला या निचली अदालतों में भी केस नहीं मिलते क्योंकि लोगों को लगता है कि उनमें काबिलियत ही नहीं हैं.''

वे अपना उदाहरण देकर कहती हैं कि हाथरस गैंग रेप मामले में उन्हें धमकियां मिलीं लेकिन ऐसा चलता रहता है और आपको ऐसी समस्याओं का डटकर सामना करना होता है.

अर्चना सिन्हा

अर्चना सिन्हा

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अर्चना सिन्हा पटना हाई कोर्ट में इनकम टैक्स विभाग की सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल हैं. वो जस्टिस रमन्ना की बात पर खुशी ज़ाहिर करती हैं और इसे एक सकारात्मक कदम बताते हुए कहती हैं इससे निचली, उच्च और उच्चतम न्यायालय में काम करने वाली महिला वकीलों के साथ न्याय होगा.

सिविल और क्रिमिनल केस लड़ने वाली अर्चना सिन्हा का कहना है कि वे साल 1999 में गया ज़िले में प्रैक्टिस करने वाली पहली अविवाहित महिला वकील थीं.

लालू यादव के साले साधु यादव की अवैध संपति और चारा घोटाला जैसे मामलों पर क़ानूनी लड़ाई लड़ने वाली अर्चना सिन्हा कहती हैं कि महिलाओं के सामने कई समस्याएं पेश आती हैं.

वो कहती हैं, "मसलन, गया स्थित कोर्ट में महिलाओं के लिए एक टॉयलेट है जिसपर आप ताला लगा पाएंगे. आपको अपनी सुरक्षा का खुद ख़्ताल रखना होता है. इसके साथ-साथ लोगों का नज़रिया ऐसा है कि वो आपकी प्रतिभा को समझना नहीं चाहते. लेकिन, आपको इन सभी बातों को दरकिनार कर कोर्ट में अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास और तर्कों के साथ रखना होता है."

जस्टिस रमन्ना चार महिला जजों के साथ

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मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा था कि वक़ालत के पेशे में आते ही महिलाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसमें लैंगिक भेदभाव शामिल है जिसकी वजह से परिवार की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल दी जाती है, लोग पुरुष वकीलों को तरजीह देते हैं, कोर्ट में एक असुविधानजनक माहौल होता है जैसे भीड़ भरे कोर्ट रूम, टॉयलेट या ढाँचागत सुविधाओं की कमी.

अर्चना सिन्हा बीबीसी से कहती हैं, ''यहां जातिगत आरक्षण की बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि महिलाएं तो सभी पिछड़ी हुई हैं. न्यायापालिका में आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि एक महिला की योग्यता पर होना चाहिए और उसी के आधार पर पद दिया जाना चाहिए.''

वंदना शाह

वंदना शाह

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वंदना शाह, सीजेआई के बयान को महिलाओं के लिए बूस्टर शॉट मानती हैं और कहती हैं कि ऐसी बात कर जस्टिस रमना अब चेंजमेकर हो चुके हैं.

ज़्यादातर तलाक़ के मामले लड़ने वाली वंदना शाह मुंबई की फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट की वकील हैं. साथ ही वे लेखिका भी हैं.

वंदना स्वयं घरेलू हिंसा का शिकार रही हैं और तलाक़ लेने के बाद उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की ताकि महिलाओं की मदद कर सकें.

वे कहती हैं कि मेरे जैसी महिलाओं को तो आरक्षण की ज़रूरत नहीं है लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है जिन्हें इस आरक्षण से लाभ होगा.

उनके अनुसार जनसंख्या में महिला का हिस्सा 49 फ़ीसदी है लेकिन क्या हमें उसके मुताबिक अधिकार मिले हैं? पितृसत्तामक सोच से टक्कर लेने के लिए हमें आरक्षण की ज़रूरत पड़ेगी. वैसे भी आप अगर महिलाओं से जुड़े मामले जैसे घरेलू हिंसा, बलात्कार, तलाक़, संपत्ति के अधिकार को लें तो उन्हें महिलाएं ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाती हैं.

ऐसी ही बात पिछले साल दिसंबर में, देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कही थी.

उनका कहना था, "यौन हिंसा से जुड़े मामलों में अधिक संतुलित और सहानुभूतिपूर्ण नज़रिए के लिए अधिक महिलाओं को जज बनाया जाना चाहिए."

वंदना शाह आगे कहती हैं कि ये आरक्षण एक निर्धारित समय के लिए होना चाहिए ताकि लड़कियों को मौक़ा मिल सके. महिलाओं को थोड़ी भी जगह मिलती है तो वो अपने लिए जगह बना लेती हैं. इसे तोहफ़ा मानकर सोच समझ के इस्तेमाल किया जाना चाहिए और ये कम समय के लिए हो जहां महिलाएं मेहनत करके आगे आएंगी. अगर ये योग्यता के बिना दिया जाएगा तो महिलाओं को मौक़ा तो मिलेगा लेकिन ये एक समझौता होगा.

जस्टिस रंजन गोगोई

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वे अपने अनुभव बताते हुए कहती हैं, ''आप ये सोचिए कि मुझे ताने मारे जाते हैं कि आपकी शक्ल देखकर ही जज आपके पक्ष में फैसला सुना देंगे लेकिन क्या महिलाएं ऐसी बातें करती हैं. मैं खुद तलाकशुदा हूं और तलाक़ के मुक़दमे लड़ती हूं तो समझ जाइए क्या छवि बनाई जाती है. आपके हर क़दम पर सवाल उठाए जाते हैं और तलाकशुदा हों तो स्टिग्मा (कलंक) जोड़ दिया जाता लेकिन आपको ख़ुद को ताकत देकर लड़ना होता है.''

दीपिका सिंह रजावत

दीपिका सिंह रजावत

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दीपिका सिंह रजावत जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में वकील हैं. वे सिंगल मदर हैं और मानवाधिकार , सिविल और क्रिमिनल मामले से जुड़े केस लड़ती हैं.

कठुआ गैंग रेप मामले में आसिफ़ा की तरफ़ से वकील रहीं और उसके बाद चर्चा में आई दीपिका सिंह कहती हैं कि कितने ही छात्र क़ानून की पढ़ाई करने के बाद प्रैक्टिस करने कोर्ट आते हैं लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होती जाती है. वे सीजेआई के बयान की तारीफ़ करती हैं लेकिन कहती हैं कि ऐसे भावी युवा वकीलों को इसी पेशे में थामे रखने के लिए वेलफ़ेयर या कल्याणकारी नीतियां लानी चाहिए.

उनके अनुसार,''शायद प्रैक्टिस को पेशे के तौर पर नहीं लिया जाता है ऐसे में जिंदगी चलाने के लिए ये काफ़ी मुश्किल हो जाता है. आप यहां शोषण देखेंगे , हालांकि ऐसा आप हर पेशे में पाएंगे. ऐसे भी मामले आते हैं लेकिन यहां लड़कियों को ना बोलना सीखाने की ज़रूरत है. सीनियर पढ़ाते नहीं हैं, बढ़ावा नहीं मिलता है और ये सारी चुनौतियां देखकर लड़कियां ही नहीं लड़के भी ये पेशा छोड़ देते हैं.''

उनके अनुसार, ''बार काउंसिल और बार एसोसिएशन को इन युवा लोगों की शुरुआत के पांच से सात तक वित्तीय सहायता करनी चाहिए क्योंकि ये संघर्ष के दिन होते हैं.''

पिंकी आनंद

पिंकी आनंद

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सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) रह चुकीं और राजनीतिज्ञ पिंकी आनंद का कहना है कि जब उच्च पदों से फैसले लिए जाते हैं तो उनकी गूंज पूरे देश से सुनाई देती है.

लेकिन यहां केवल आरक्षण की ही बात नहीं है बल्कि योग्यता की भी बात है और नागरिक के तौर अधिकार की बात तो है ही बल्कि यहां उनके योगदान की भी बात है.

इससे पहले सीजेआई ने महिलाओं के प्रतिनिधित्व के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि निचली न्यायपालिक में महिलाओं की संख्या 30 फ़ीसदी से भी कम है वहीं उच्च न्यायालय में वे 11 फ़ीसदी है. और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में हमारे पास 33 में से चार जज हैं.

उन्होंने आगे कहा था कि 17 लाख वकीलों में से केवल 15 फ़ीसदी महिलाएं है और बार काउंसिल में निर्वाचित प्रतिनिधियों में वे केवल 2 फ़ीसदी है.

इससे पहले आपको याद होगा कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे ने कहा था, "उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि कई महिलाओं को न्यायाधीश बनने का ऑफ़र दिया गया. लेकिन महिलाओं ने उस ऑफ़र को ठुकराया है. सभी ने घरेलू ज़िम्मेदारियों के नाम पर इनकार किया है, जैसे कि बच्चा कक्षा 12वीं में पढ़ रहा है. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने मुझे इस बारे में रिपोर्ट किया है. ये वे बाते हैं, जिस पर हमलोग चर्चा नहीं कर सकते. लेकिन हर कॉलेजियम महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सोचता है."

यहां सवाल यह है कि क्या महिलाएँ वास्तविकता में घरेलू ज़िम्मेदारियों के नाम पर न्यायाधीश बनने का ऑफ़र ठुकरा देती हैं?

पिंकी आनंद का कहना है कि महिलाएं मल्टीटास्कर होती हैं, वे घर को संभाल सकती हैं और बाहर का काम कर सकती है लेकिन सिस्टम का सपोर्ट भी चाहिए और ऐसा नहीं हैं कि उच्च पदों पर आना नहीं चाहती लेकिन यहां एक धक्के की ज़रूरत है और सीजेआई ने जो आरक्षण की बात कही है उससे बल तो मिलेगा, और जब एक महिला सीजेआई बनेगी तो लड़कियों को प्रेरणा मिलेगी कि वो भी इस पद पर आ सकती हैं.

लेकिन महिला आरक्षण बिल अभी भी लटका पड़ा है तो न्यायपालिका में कब मिलेगा आरक्षण?

इस सवाल पर पिंकी आनंद का कहना है ,''महिला आरक्षण बिल लटका है लेकिन पंचायती राज तो कम से कम आया, तो संविधान में संशोधन करके ये भी आ सकेगा.''

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