योगी सरकार के नए धर्मांतरण क़ानून में क्या है, जिस पर हो रहा है विवाद

योगी

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर धर्मांतरण को लेकर मुद्दा गर्म है.

हाल ही में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश की बीजेपी सरकार ने विधानसभा में धर्मांतरण संशोधन विधेयक पास करा लिया है.

इस संशोधन विधेयक में धर्मांतरण को लेकर सज़ा का प्रावधान बढ़ा दिया गया है.

इस विधेयक का नाम 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम 2024 है.'

इस विधेयक में तथ्यों को छिपाकर या डरा-धमकाकर धर्म परिवर्तन कराने को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, जिसमें उम्र क़ैद का प्रावधान किया गया है.

इस बिल में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन के लिए विदेश से फ़ंड लेना और किसी भी अवैध संस्था से फ़ंड लेना अपराध के दायरे में माना जाएगा और इसमें भी सज़ा का प्रावधान बढ़ाया गया है.

बीबीसी हिंदी का व्हाट्सऐप चैनल
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

उठ रहे सवाल और सरकार का तर्क

सोमवार को जब ये विधेयक विधानसभा में पेश किया गया था, तब से ही इसको लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं.

सरकार की तरफ़ से विधेयक के मक़सद को लेकर कहा गया है- अपराध की संवेदनशीलता महिलाओं की गरिमा व सामाजिक स्थिति; महिला, एससी, एसटी आदि का अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए यह महसूस किया गया है.

सरकार के मुताबिक़ इस अपराध में सज़ा और जुर्माने को और कड़ा करने की ज़रूरत है इसलिए यह विधेयक लाया जा रहा है.

सरकार की तरफ़ से कहा जा रहा है कि महिला सुरक्षा को लेकर सरकार चिंतित है.

इस विधेयक पर बहस के दौरान योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में मंगलवार को कहा था कि उनकी सरकार आने के बाद एंटी रोमियो जैसे स्क्वाड बनाए गए थे और इससे मनचलों की समस्या से छुटकारा मिला है, लेकिन उस वक़्त भी समाजवादी पार्टी ने इसका विरोध किया था.

योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि सरकार ने महिला और बाल सुरक्षा, जिसमें ख़ासकर सेक्सुअल हैरेसमेंट रोकने की दिशा में ठोस क़दम उठाए हैं.

उन्होंने कहा कि 2017 से लेकर 2024 के बीच यौन उत्पीड़न के मामले में 24 हज़ार 402 अभियुक्तों को सज़ा दिलाई गई है.

ये भी पढ़ें-

सपा
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री विधेयक को सही बता रहे हैं. संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना का कहना है,"इस बिल पर कोई विवाद नहीं है. इस बिल का मक़सद उन लोगों को न्याय दिलाना है, जो ग़ैर क़ानूनी ढंग से धर्म परिवर्तन के पीड़ित हैं."

राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष माता प्रसाद पांडे ने इस क़ानून के दुरुपयोग को लेकर सवाल खड़े किए हैं.

उन्होंने कहा, "बिल में झूठी शिकायत करने पर भी सख़्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए."

इस पर संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि मौजूदा क़ानून में झूठी शिकायत करने वाले के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई का प्रावधान है.

बिल में प्रस्ताव किया गया है कि कोई भी व्यक्ति डरा-धमकाकर या जान माल की हानि की धमकी देकर धर्म परिवर्तन कराता है, तो इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में माना जाएगा.

साथ ही अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के इरादे से शादी करता है या नाबालिग़ लड़की या महिला की मानव तस्करी करता है, तो उसे 20 साल तक की सज़ा हो सकती है.

इस बिल के क़ानून बन जाने पर धर्म परिवर्तन की शिकायत कोई भी कर सकता है.

इससे पहले वाले क़ानून में पीड़ित या उसके भाई या फिर माता पिता ही शिकायत दर्ज करा सकते थे.

इस तरह की शिकायत होने पर ये ग़ैर ज़मानती अपराध होगा और इसकी सुनवाई सेशन कोर्ट से नीचे की अदालत नहीं कर सकती है, वहीं ज़मानत पर फ़ैसला बिना अभियोजन को सुने नहीं दिया जा सकता है.

इस विधेयक में कोर्ट पाँच लाख तक का जुर्माना भी लगा सकता है, जो पीड़ित को उपलब्ध कराया जाएगा.

विधेयक के पीछे राजनीतिक मक़सद- विपक्ष

वीडियो कैप्शन, क्या सच साबित हो सकती है योगी आदित्यनाथ को लेकर की गई केजरीवाल की भविष्यवाणी?

कांग्रेस विधायक दल की नेता अराधना मिश्रा ने संविधान का हवाला देते हुए मांग की है कि इसको लेकर एक कमिशन बनाया जाना चाहिए, जो इस बात की जाँच करे कि शिकायत सही है या नहीं, क्योंकि ये संवेदनशील मुद्दा है.

अराधना ने कहा, "हम ये मानते हैं कि जबरन धर्म परिवर्तन एक गंभीर अपराध है. लेकिन सरकार को सावधानी बरतना चाहिए क्योंकि हमेशा ये जबरन नहीं होता, कभी स्वेच्छा से भी होता है."

उत्तर प्रदेश में इस संशोधित विधेयक के ख़िलाफ़ कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं.

विधानसभा में समाजवादी पार्टी की विधायक डॉ. रागिनी सोनकर ने बीबीसी से बातचीत में कहा,"ये पूरी तरह से संविधान के ख़िलाफ़ है, क्योंकि दो युवा अगर अपनी मर्ज़ी से शादी करते हैं, तो उसमें कोई हर्ज नहीं है. अगर इनके माँ बाप भी राजी हैं, तो तीसरे व्यक्ति के शिकायत का क्या मतलब है."

रागिनी सोनकर के मुताबिक़ ग़रीब आदमी तो वैसे पुलिस के डर से अपनी बात नहीं रख पाएगा और इतने कड़े क़ानून के पीछे सरकार की मंशा साफ़ नहीं है और ये ग़ैर ज़रूरी मुद्दे पर ध्यान भटका रहे हैं.

क्या कहते हैं समाजशास्त्री

बीजेपी

योगी के इस बिल को लेकर समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित ने बीबीसी से कहा कि है कि प्रदेश में मसला बेरोज़गारी का है लेकिन सरकार इस सबसे हटकर 'लव जिहाद' की बात कर रही है.

रमेश दीक्षित के मुताबिक़, "दिल्ली और प्रदेश की सरकार की सिर्फ़ एक चिंता है कि कैसे मुसलमानों को परेशान किया जाए. अगर दो लोग प्रेम करने के बाद शादी कर लेते हैं, तो उसमें समस्या क्या है? इसको 'लव जिहाद' कह देते हैं.

प्रोफ़ेसर दीक्षित का कहना है कि धर्म परिवर्तन की घटनाएँ 100 साल पहले होती थीं, अब नहीं होती है. कोई अपनी इच्छा से धर्म नहीं छोड़ता, उसकी कई वजहें होती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता और कांग्रेस की नेता सदफ़ जाफ़र ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "सरकार की टाइमिंग देखिए, जब ख़ुद अंदरूनी लड़ाई अपने चरम पर है, तब यह विधेयक लाया जा रहा है.

सदफ़ जाफ़र के मुताबिक़ पहली बात यह कि विवाह एक सिविल मामला है. उसको क्रिमिनलाइज़ करना संविधान के मूल अधिकारों का हनन है.

सदफ़ जाफ़र का आरोप है, "दो बालिग़ लोग अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं, तो इसमें सरकार की क्या भूमिका है. जब किसी के माता पिता भी राज़ी है, तो फिर तीसरे को बोलने का क्या अधिकार है. दरअसल ये बजरंग दल जैसे अपने फ्रिंज एलीमेंट को किसी के मामले में टोकने की अनुमति देने जैसा है."

बहरहाल राज्य सरकार ने इस विधेयक को विधानसभा से पास करा लिया है.

उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण क़ानून में बदलाव. सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या था पुराना क़ानून?

राज्य के पुराने क़ानून में शिकायत सिर्फ़ पीड़ित महिला या उसके सगे रिश्तेदार यानी माता पिता या भाई बहन ही कर सकते थे.

पहले एक से दस साल तक की सज़ा का प्रावधान था. इस विधेयक में सिर्फ़ शादी के लिए किया गया धर्म परिवर्तन अमान्य माना गया था.

धर्म परिवर्तन से दो महीने पहले मजिस्ट्रेट को सूचना देने का प्रावधान था. उल्लंघन करने पर छह महीने से तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान था.

पुराने क़ानून में धोखे से या जबरन धर्म परिवर्तन कराने के लिए एक से पाँच साल तक की सज़ा का प्रावधान था.

इससे पहले फ़्रॉड तरीक़े से शादी करने और जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर 10 साल की अधिकतम सज़ा और 50 हज़ार रुपए जुर्माने का प्रावधान था.

इस क़ानून के लिए नवंबर 2020 में अध्यादेश लाया गया था, फिर 2021 में इसे क़ानूनी जामा पहनाया गया था.

इसके तर्क में कहा गया था कि प्रदेश में ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन हो रहा है, ख़ासकर शादी के बहाने लोग अपनी पहचान छिपा कर, बहला फुसला कर शादी कर रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)