उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के विशेष सुरक्षा बल के गठन पर उठे सवाल

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार को विशेष सुरक्षा बल के गठन की अधिसूचना जारी कर दी, जिसके तहत सुरक्षा बलों को किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ़्तार करने, तलाशी लेने और ऐसे ही कई असीमित अधिकार मिल जाएँगे.
विशेष सुरक्षा बलों की तैनाती शुरुआत में सरकारी इमारतों, धार्मिक स्थलों जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर होगी और निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान भी पैसे देकर इनकी सेवाएँ ले सकेंगे.
हाल ही में विधानसभा के संक्षिप्त मॉनसून सत्र में इस विधेयक को पारित किया गया था और फिर राज्यपाल की मंज़ूरी मिलने के बाद इसे लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई है.
उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने विशेष सुरक्षा बल के गठन की अधिसूचना जारी करते हुए बताया कि इसका मुख्यालय लखनऊ में होगा और अपर पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी इस विशेष पुलिस बल के प्रमुख होंगे.
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राज्य सरकार ने यूपी के पुलिस महानिदेशक को तीन महीने के भीतर उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल (यूपीएसएसएफ़) के पहले चरण को शुरू करने संबंधी सुझाव देने का भी निर्देश दिया है.
अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी ने बताया कि यूपी एसएसएफ़ के पास इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ, ज़िला न्यायालयों, राज्य सरकार के महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यालयों, पूजा स्थलों, मेट्रो रेल, हवाई अड्डों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होगी.
पैसे देकर निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान भी इसकी सेवाएँ ले सकेंगे और उन परिस्थितियों में भी पुलिस बल के ये असीमित अधिकार बने रहेंगे.
क्या हैं अधिकार

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अधिनियम के अनुसार अगर विशेष सुरक्षा बल के सदस्यों को यह विश्वास हो जाए कि कोई भी अभियुक्त कोर्ट से तलाशी वारंट जारी करने के दौरान भाग सकता है या अपराध के साक्ष्य मिटा सकता है, तो ऐसी स्थिति में उस अभियुक्त को तुरंत गिरफ़्तार किया जा सकता है.
यही नहीं, अभियुक्त के घर और संपत्ति की तत्काल तलाशी भी ली जा सकती है. इसके लिए सर्च वारंट या मजिस्ट्रेट की अनुमति की ज़रूरत नहीं होगी. हालांकि ऐसा करने के लिए एसएसएफ़ जवान के पास पुख़्ता सबूत होने चाहिए.
अधिनियम के मुताबिक़, ऐसी किसी भी कार्रवाई में सुरक्षा बल के अधिकारी या सदस्य के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज नहीं कराया जा सकेगा और बिना सरकार की इजाज़त के न्यायालय भी विशेष सुरक्षा बल के किसी सदस्य के विरुद्ध किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा.
इस अधिनियम के गठन पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक दलों ने अधिनियम को काला क़ानून बताते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की है.
'ये काला क़ानून है'

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यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "राज्य में क़ानून-व्यवस्था में फेल हो चुकी बीजेपी सरकार ने एसएसएफ़ का गठन इसलिए किया है ताकि अपने विरोधियों पर अपने ही इशारे पर मनमानी कार्रवाई कर सके और लोगों को प्रताड़ित कर सके. इस क़ानून से विरोधियों का, दलितों, पिछड़ों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों का दमन होगा. लोकतंत्र और संविधान की मूल भावनाओं के ख़िलाफ़ यह क़ानून तत्काल रद्द किया जाना चाहिए. न दलील, न वकील के सिद्धांत पर काम करने वाले इस क़ानून के ख़िलाफ़ हम सदन से लेकर सड़क तक लड़ेंगे."
हालांकि राज्य में पुलिस महानिदेशक रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एके जैन कहते हैं कि यह सकारात्मक प्रयोग है और इसे लागू करने में कोई बुराई नहीं है.
एके जैन के मुताबिक़, "ख़ामियाँ तो हर व्यवस्था में रहती हैं लेकिन उनकी वजह से ये सारी संस्थाएँ भंग तो नहीं हो सकती हैं. जिन जगहों पर इन बलों की तैनाती होनी है, वहाँ ऐसी गुंज़ाइश ही नहीं है कि इनका दुरुपयोग किया जा सके."
अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान भी इनकी सेवाएँ पैसे देकर ले सकेंगे और यह प्रावधान आलोचना का मुख्य बिंदु भी है.
आशंका जताई जा रही है कि तमाम प्रतिष्ठानों में, ख़ासकर अस्पताल जैसी जगहों पर अगर इनका उपयोग होने लगा तो अस्पतालों की मनमानी और बढ़ जाएगी.
मरीज़ों और परिजनों का शोषण तो होगा ही, ये लोग अपनी आवाज़ भी नहीं उठा सकेंगे.
लेकिन रिटायर्ड डीजीपी एके जैन कहते हैं, "दुरुपयोग नहीं होगा और अगर ऐसा होगा तो उसके ख़िलाफ़ अपील करने के और भी फ़ोरम हैं. जहाँ तक औद्योगिक प्रतिष्ठानों की बात है तो हज़ारों करोड़ रुपए का निवेश करने वालों को सुरक्षा मुहैया कराना तो सरकार की ज़िम्मेदारी है ही."
उठ रहे हैं सवाल

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यूपी में मौजूदा समय में महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और व्यक्तियों की सुरक्षा पुलिस और पीएसी कर रही है. उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल के रूप में प्रथम चरण में पाँच बटालियन गठित की जाएँगी, जिसके लिए कुल 1,913 नए पदों का सृजन किया जाएगा. इन पाँच बटालियन के गठन पर क़रीब 1746 करोड़ रुपए ख़र्च अनुमानित है जिसमें वेतन, भत्ते और अन्य व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और लखनऊ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राजनीतिक संपादक सुभाष मिश्र इस विशेष पुलिस बल के गठन के औचित्य पर सवाल उठाते हैं.
सुभाष मिश्र कहते हैं, "योगी सरकार शुरू से ही इस पैटर्न पर काम कर रही है जिसमें पुलिस को असीमित अधिकार दिए जाएँ और उसका इस्तेमाल अपने हित में किया जा सके. आपने पहले भी देखा कि पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था को लागू करने में कितना उत्साह दिखाया गया, यूपीकोका अधिनियम लाने में हड़बड़ी दिखाई, संपत्ति वसूली के संबंध में तेज़ी दिखाई, तो यह सब मौजूदा सरकार की कार्यशैली का हिस्सा है."
"वे पुलिस सिस्टम को ज़्यादा से ज़्यादा मज़बूत करना चाहते हैं. हालाँकि आने वाले दिनों के लिए भी यह ठीक नहीं है क्योंकि आज कोई सरकार में हो तो कल को वही पार्टी विपक्ष में भी रहेगी. कुल मिलाकर लोकतंत्र के लिए इस तरह की व्यवस्था ठीक नहीं है."
इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता एक्यू ज़ैदी सवाल उठाते हैं कि जब औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए सीआईएसएफ़ जैसा बल मौजूद है, तब राज्य को इसकी ऐसी क्या ज़रूरत थी.
ज़ैदी कहते हैं, "जिस तरीक़े के प्रावधान ऐक्ट में हैं, उनसे साफ़ पता चलता है कि आम आदमी को दी गई संवैधानिक सुरक्षा ख़त्म हो सकती है और आर्टिकल 21 के तहत मिला संरक्षण विशेष सुरक्षा बल के अधिकारी या सिपाही के विवेक का ग़ुलाम हो जाएगा. दूसरा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस ऐक्ट की फंक्शनिंग का आगे विस्तार नहीं किया जाएगा."
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 26 जून को हुई कैबिनेट की बैठक में इस विशेष पुलिस बल के गठन के संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया था और उसके बाद मॉनसून सत्र में विपक्षी दलों के सदन बहिर्गमन के बीच पारित कर दिया गया था.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं कि पहले दी गई कार्यसूची में इस अधिनियम को पारित करने का ज़िक्र नहीं था, बल्कि उसी दिन इसे कार्यसूची में शामिल किया गया था.
बीजेपी के एक विधायक नाम न छापने की शर्त पर हँसते हुए कहते हैं, "मुझे तो पता भी नहीं कि यह विधेयक पारित हो गया है."
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