"उत्तराखंड सरकार हमारे बेडरूम में दख़लअंदाज़ी क्यों कर रही है?"

पुष्कर सिंह धामी

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इमेज कैप्शन, 18 अक्तूबर 2025 को यूसीसी रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपते हुए समिति के प्रमुख शत्रुघ्न सिंह.
    • Author, सुमेधा पाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तराखंड के दो युवा मृणालिनी और फ़ैज़ चार साल से साथ हैं. वे दोनों शादी करना चाहते हैं. इन दोनों के धर्म अलग-अलग हैं. उनके माँ-बाप उनकी शादी के खिलाफ़ हैं. इनके परिवार वाले पढ़े-लिखे हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न भी हैं.

मृणालिनी कहती हैं कि उनके लिए शादी करना आसान नहीं है. उन्हें डर है कि अगर वह यूसीसी के पोर्टल पर शादी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाएँगी तो उनके घरवालों को पता चल सकता है.

मृणालिनी का कहना है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि ये क़ानून क्यों लाया गया है.

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के अमल में आने के बाद मृणालिनी की तरह कई लिव-इन जोड़े इसे अपनी निजता (प्राइवेसी) पर हमले के तौर पर भी देख रहे हैं.

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यूसीसी के तहत उत्तराखंड में लिव-इन में रह रहे जोड़ों को पंजीकरण कराना ज़रूरी है.

उत्तराखंड देश में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य है. उत्तराखंड सरकार इसे ऐतिहासिक क़दम बता रही है. उसका कहना है कि ये क़ानून समाज में महिलाओं की सुरक्षा करेगा.

दूसरी ओर, कई नागरिक, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता इसके प्रावधानों के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा भी खटखटा रहे हैं. उनका कहना है कि ये क़ानून राज्य में -नागरिकों की 'निगरानी' को बढ़ावा देगा और राज्य को 'पुलिस स्टेट' बना देगा.

इस बीच, 13 फ़रवरी को यूसीसी के अलग-अलग प्रावधानों के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकार से छह हफ़्ते में जवाब देने को कहा है.

यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड में क्या है?

इस साल 27 जनवरी को लागू हुए यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी के मुताबिक, लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण रजिस्ट्रार के ज़रिये करवाना होगा.

यूसीसी के क़ानून के तहत अगर कोई जोड़ा अपने लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण दो महीने के अंदर नहीं करवाता है तो उसे 10 हज़ार रुपये जुर्माना या तीन महीने क़ैद या दोनों सज़ा हो सकती है.

लिव-इन में रहने वाले जोड़े अपना पंजीकरण ऑफ़लाइन और ऑनलाइन दोनों तरह से कर सकते हैं.

ऑनलाइन पंजीकरण के लिए एक पोर्टल (ucc.uk.gov.in) है. इस पोर्टल पर दोनों पार्टनर को अपने दस्तावेज़, धर्म, पता वग़ैरह अपलोड करने होंगे. एक फ़ॉर्म भी भरना होगा.

यूसीसी का विरोध क्यों?

विश्वराम की उम्र 63 साल है. वे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में लिव-इन रिलेशनशिप में हैं.

विश्वराम कहते हैं, "जब 1990 में मैं और मेरी पार्टनर यहाँ आए थे, तब यहाँ माहौल शांत था. मगर 30 सालों के बाद अब वह माहौल बदल रहा है."

वे सवाल करते हैं, "उत्तराखंड सरकार हमारे निजी जीवन, हमारे बेडरूम में दख़लअंदाज़ी क्यों कर रही है?"

देहरादून स्थित सीजेएम कोर्ट में रजिस्ट्रार का दफ़्तर है. यहाँ लिव-इन जोड़े ख़ुद को रजिस्टर करवा सकते हैं. इस कोर्ट में चहल-पहल तो है मगर कोई लिव-इन जोड़ा यहाँ नहीं आ रहा है. इसी कोर्ट के एक चैम्बर में वकील चन्द्रकला कई फ़ाइलों के गट्ठरों के बीच बैठी हैं.

उत्तराखंड महिला मंच की सदस्य और वकील चन्द्रकला का कहना है कि इन क़ानूनों से महिलाओं की आज़ादी का हनन होगा

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चन्द्रकला उत्तराखंड महिला मंच की सदस्य भी हैं. उनका मानना है कि यूसीसी के ये नए प्रावधान 'खाप पंचायतों' को क़ानूनी स्वरूप देने की प्रक्रिया जैसे हैं. उनका कहना है कि इन क़ानूनों से महिलाओं की आज़ादी का हनन होगा.

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जो महिलाएँ शादी में प्रताड़ना का शिकार होती हैं, कई बार वे बिना तलाक़ लिए किसी और के साथ रहने लगती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि तलाक़ ले पाने के रास्ते में उनके पति और ससुराल वाले अड़चन बनते हैं.

दरअसल, यूसीसी के तहत वही लोग लिव-इन रिलेशनशिप के लिए रजिस्टर करवा सकते हैं जो शादीशुदा नहीं हैं. मगर कई लोग बिना आधिकारिक तलाक़ लिए भी रिश्तों को ख़त्म कर देते हैं. इनके लिए अपना लिव-इन रिश्ता रजिस्टर करवा पाना मुश्किल है.

ऐसी ही कहानी शीतल और रॉड्रिक की भी है. उन्होंने साल 2024 में यूसीसी के ऐलान के बाद शादी की थी. इससे पहले वे लिव-इन में रह रहे थे. दोनों की यह दूसरी शादी है मगर अलग-अलग धर्मों से होने की वजह से उनका सफ़र बिल्कुल आसान नहीं था.

शीतल और रॉड्रिक भी मानते हैं कि अगर आज वे शादीशुदा न होते तो उन्हें लिव-इन में मुश्किल होती.

वह कहते हैं, "अगर आज हमारी शादी नहीं हुई होती और हम लिव-इन में रह रहे होते तो न जाने क्या होता. अब लिव-इन रजिस्टर करने के लिए माँ-बाप को भी सूचित किया जाएगा. अगर हमारे समय ऐसा होता तो हम यह कभी नहीं कर पाते. हम दोनों ने अपने दम पर अपना जीवन बनाया है."

'निजी डेटा शेयर नहीं किया जाएगा'

हालाँकि, उत्तराखंड सरकार का कहना है कि यूसीसी में सूचनाओं की गोपनीयता बनाए रखने के लिए सख़्त प्रावधान किए गए हैं.

राज्य के गृह विभाग में अपर सचिव निवेदिता कुकरेती ने कहा है कि यूसीसी में सेवाओं के पंजीकरण के समय दी जाने वाली जानकारियों तक किसी भी तीसरे व्यक्ति की पहुँच नहीं हो पाएगी.

निवेदिता कुकरेती बताती हैं, "इस क़ानून में यह साफ़ किया गया है कि किसी का निजी डेटा शेयर नहीं किया जाएगा. सिर्फ़ इसके आँकड़े दिए जाएँगे कि अब तक कितने लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवा लिया है. इसमें किसी का नाम, उम्र या कोई भी निजी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी.''

दक्षिणपंथी संगठनों के हमलों के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, "इसके लिए ख़ुद रजिस्ट्रार की भी ज़िम्मेदारी होगी कि वे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें. हमारी बुनियादी सोच उन्हें सुरक्षा देने की है. आपको सिस्टम पर भरोसा करना होगा. अगर कुछ ग़लत होता है तो हम उस पर तुरंत कार्रवाई करेंगे."

यूसीसी के पक्षधर क्या कहते हैं

भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और उत्तराखंड राज्य उच्च शिक्षा उन्नयन समिति के उपाध्यक्ष देवेन्द्र भसीन मानते हैं कि भाजपा ने यूसीसी को बहुत सोच-समझकर लागू किया है.

उत्तराखंड राज्य का गठन साल 2000 में हुआ था. उसके बाद से हुए विधानसभा चुनावों में यही रवायत थी कि एक बार बीजेपी की सरकार बनती थी और एक बार कांग्रेस की. मगर 2022 के चुनाव में यह रवायत टूटी. बीजेपी ने दोबारा सरकार बनाई.

देवेन्द्र भसीन ने बताया कि 2022 के संकल्प पत्र में बीजेपी ने यूसीसी के मुद्दे को आगे रखा था. उनका कहना है कि इसको लागू करने से पहले अलग-अलग समुदायों और राजनीतिक पार्टियों से भी सलाह-मशवरा किया गया था.

देवेन्द्र भसीन ने बताया, "मैं बीजेपी की कमेटी का संयोजक था. मैंने पार्टी की तरफ़ से हाई पावर कमेटी को सुझावों के साथ एक पत्र भी दिया था."

बीजेपी के सदस्य और उत्तराखंड राज्य उच्च शिक्षा उन्नयन समिति के उपाध्यक्ष देवेन्द्र भसीन

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देवेन्द्र भसीन कहते हैं, "समाज को भी समझना बहुत ज़रूरी है. हमारे समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार नहीं किया जाता लेकिन हम जानते थे कि हम किसी को रोक नहीं सकते."

पंजीकरण की ज़रूरत बताते हुए वह कहते हैं, "जब तक रिश्ता अच्छा चलता है तब तक ठीक है. रिश्ता टूटने पर लड़कियाँ काफ़ी नुक़सान झेलती हैं. दूसरी बात, माँ-बाप को पता भी नहीं होता कि क्या चल रहा है. अगर बच्चा पैदा हो गया तो और परेशानी होती है. इन्हीं सब बातों को देखते हुए पंजीकरण ज़रूरी है. हम इसके ज़रिये एक परिवार को, एक समाज को बचा रहे हैं."

उनका कहना है, "सभ्य समाज में रहने का भी एक तरीक़ा है. आज़ादी ज़रूरी है मगर कोई भी चीज़ ऐब्सल्यूट नहीं हो सकती."

वह कहते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 44 में भी यूसीसी को अमल में लाने की बात कही गई है.

हिंदुत्ववादी संगठनों की भूमिका

22 साल के मोहम्मद शानू और 23 साल की आकांक्षा कंडारी ने सात जनवरी को उधम सिंह नगर के एसडीएम ऑफ़िस में एक आवेदन किया था और कहा था कि वे शादी करना चाहते हैं. ये आवेदन सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इसमें दोनों की व्यक्तिगत जानकारी शामिल थी.

शानू और आकांक्षा का आरोप है कि उन्हें दक्षिणपंथी संगठनों की ओर से धमकियाँ मिली हैं.

उत्तराखंड में हिन्दू रक्षा दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठन यूसीसी का समर्थन और इसको लागू करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए यूसीसी ज़रूरी है.

वहीं, वकील चन्द्रकला कहती हैं, "लिव-इन संबंधों को 2005 के घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत क़ानूनी तौर पर औपचारिक मान्यता मिली हुई है. इसमें किसी भी तरह की हिंसा दंडनीय है. इससे लिव-इन संबंधों में महिलाओं को सुरक्षा मिलती है. इसीलिए महिलाओं की सुरक्षा की बात करके यूसीसी के तहत लिव-इन संबंधों को रजिस्टर करने की आवश्यकता का तर्क अनुचित लगता है."

हिन्दू रक्षा दल की सदस्य रिमझिम कम्बोज

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रिमझिम कम्बोज हिंदुत्ववादी संगठन हिन्दू रक्षा दल की सदस्य हैं. उन्होंने हाल ही में एक ग़ैर हिन्दू लड़के का धर्म परिवर्तन इसलिए करवाया है, क्योंकि वह एक हिन्दू लड़की से शादी करना चाहता था. रिमझिम ने लड़के के धर्म परिवर्तन के बाद दोनों की शादी रजिस्टर करवाई है.

कथित 'लव जिहाद' का ज़िक्र करते हुए वह कहती हैं, "हमने ऐसे कई मामले देखे हैं जिनमें लड़का-लड़की, ख़ास तौर पर हिन्दू लड़कियाँ अपने माँ-बाप को बिना बताए साथ रहने लग जाती हैं. वह हिन्दू लड़कियाँ जो ज़्यादा मॉडर्न हो गई हैं और सोचती हैं कि धर्म के कोई मायने नहीं हैं, उन्हें बहलाया फुसलाया जाता है."

ईसाई समुदाय से आने वाले रॉड्रिक बताते हैं कि लिव-इन में रहते हुए वह और शीतल लगातार असुरक्षित महसूस करते थे. वह कहते हैं, "हमें हमेशा लगता रहता था कि कोई हमारी शिकायत कर देगा या कोई धार्मिक संगठन हमारे घर आ जाएगा."

रिमझिम कहती हैं, "अंत में हिन्दू लड़कियाँ फ़्रिज में और बक्से में पाई जाती हैं. ये क़ानून इसलिए ज़रूरी है कि कोई भी हिन्दू लड़कियों का नाजायज़ फ़ायदा न उठाए."

रॉड्रिक कहते हैं, "यूसीसी के प्रावधान लिव-इन जोड़ों, ख़ास तौर पर अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान को बढ़ावा दे रहे हैं. देहरादून जैसी जगह पर भी अब हम लोग असुरक्षित महसूस करेंगे क्योंकि सरकार के पास आपका पूरा डेटा मौजूद है."

विश्वराम का मानना है कि इस क़ानून के ज़रिये लोगों को ज़बरदस्ती बांधने, उन पर बोझ डालने की कोशिश की जा रही है. यह समाज को और पिछड़ा बना देगा.

यूसीसी के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई लड़ने वालों का पक्ष क्या है?

देहरादून की वकील रज़िया बेग़ ने भी यूसीसी के लागू होने के ख़िलाफ़ अदालत में याचिका दायर की है

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हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले कार्तिकेय हरि गुप्ता का कहना है कि यूसीसी के प्रावधानों की वजह से संविधान के अनुच्छेद 21 का हनन हो रहा है. यह जीने के अधिकार की बात करता है.

वह कहते हैं, "एक चहारदीवारी में कोई इंसान जैसे चाहे, वैसे रह सकता है. मगर इन नए क़ानूनों ने सरकार को 'तहक़ीक़ात' करने का अधिकार दे दिया है. इससे वह लोगों के जीवन में हस्तक्षेप कर सकती है."

देहरादून की वकील रज़िया बेग़ ने भी यूसीसी के लागू होने के ख़िलाफ़ अदालत में याचिका दायर की है. उनके मुताबिक, शादी, तलाक़ और संपत्ति के मसलों के लिए पहले से क़ानून बने हुए हैं. ऐसे में यूसीसी के लागू होने के बाद पुराने क़ानूनों का क्या होगा, इसको लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है.

मौलिक अधिकारों और निजता के मसलों पर रज़िया कहती हैं, "संविधान ने जो हमें मौलिक अधिकार दिए थे वो भी छीने जा रहे हैं. इस क़ानून के तहत एक रिश्ते के बारे में माँ-बाप को बताया जाएगा और उनकी अनुमति ली जाएगी. कौन माँ-बाप इसकी अनुमति देंगे? एक वयस्क की अपनी मर्ज़ी से जीने की आज़ादी को छीना जा रहा है. पड़ोसी शिकायत कर सकते हैं या कोई भी शिकायत करके एक जोड़े को ख़तरे में डाल सकता है."

यूसीसी का एक पहलू यह भी

लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण के अलावा यूसीसी में सभी धर्मों के लिए विवाह, तलाक़, संपत्ति से जुड़े एक जैसे क़ानून लागू करने का भी प्रावधान है. इस वजह से भी कई वर्गों के लोग इसका विरोध कर रहे हैं.

चन्द्रकला का कहना है, "वास्तव में यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है. मुख्य रूप से इसके द्वारा उन प्रावधानों में बदलाव लाना है जो हिंदूवादी नज़रिये से मुस्लिम क़ानून में दोष देखते हैं. एक अर्थ में इसने मुस्लिम पर्सनल लॉ को समाप्त कर दिया है. मुस्लिम पुरुष और महिला को और अधिक अपराधी बना दिया है."

वकील नजमा इस्लाम की बात करते हुए कहती हैं, "हमारे धर्म में लिव-इन का प्रावधान नहीं है. हमारे यहाँ दूसरी शादी का प्रावधान है. इसे यूसीसी ने बंद कर दिया है. तो अब मुसलमान भी लिव-इन में रहेंगे."

भ्रष्टाचार की बात करते हुए नजमा कहती हैं, "एक डर यह भी है कि जो लोग शादीशुदा हैं और उनकी आपस में नहीं बनती है, वे लोग एक-दूसरे को छोड़ कर नए लोगों के साथ रहने लगे. यही नहीं, किसी भी तरह से उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप रजिस्टर करवा लिए तो यह भी दूसरी शादी की तरह ही हो जाएगा."

नजमा मानती हैं कि पंजीकरण और माँ-बाप को सूचित करने के प्रावधानों से महिलाओं का फ़ायदा होगा.

वह कहती हैं, "अगर लड़का लड़की को छोड़ कर चला भी जाए तब भी वह सुरक्षित है. कम से कम एक सर्टिफिकेट तो होगा कि ये लोग साथ रहते थे."

रजिस्ट्रेशन का महत्व बताते हुए नजमा ने एक लड़की दीक्षा के बारे में बताया.

"दीक्षा अपने पार्टनर कमल के साथ काफ़ी समय से रह रही थी. दोनों की पहले किसी और से शादियाँ हुई थीं. जब लिव-इन रजिस्टर करने की बात आई तो कमल ने साफ़ मना कर दिया. दीक्षा ने इस रिश्ते के लिए अपने पति, अपने परिवार सबको छोड़ दिया था. अब कमल ने उन्हें छोड़ दिया है. अब उनके पास कोई सुरक्षा नहीं है. इसलिए भी रजिस्ट्रेशन ज़रूरी है."

क्या उत्तराखंड प्रयोगशाला है?

उत्तराखंड में यूसीसी अमल में आने के बाद से अन्य बीजेपी-शासित राज्य भी इसे लागू करने की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं. मसलन, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने इस साल चार फ़रवरी को यूसीसी का ड्राफ़्ट तैयार करने के लिए पाँच सदस्यीय कमेटी बनाने का ऐलान किया है.

अनुच्छेद 370, राम मंदिर के साथ-साथ यूसीसी भी 1989 से ही बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा रहा है. अप्रैल 2022 में भोपाल में एक सभा के दौरान गृह मंत्री ने कहा था कि 370, राम मंदिर और ट्रिपल तलाक़ के बाद अब जल्द ही पूरे देश में यूसीसी लागू किया जाएगा.

सरकार पर निशाना साधते हुए रज़िया बेग़ कहती हैं, "आपको किसी तरह की आज़ादी नहीं है. अगर आप जियेंगे तो सरकार और इस क़ानून के अनुसार जियेंगे. सरकार निजी रिश्तों को सार्वजनिक बना रही है. इसी का हम विरोध कर रहे हैं."

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विपक्ष और यूसीसी के विरोधियों पर निशाना साधते हुए कहा है कि जो लोग देश के अंदर तुष्टिकरण की राजनीति, वर्ग विशेष की राजनीति और वोट बैंक की राजनीति करते रहे हैं, उन्हें समान नागरिक संहिता से दिक़्क़त ज़रूर होगी.

(पहचान उजागर न हो इसलिए रिपोर्ट में शामिल जोड़ों के नाम बदल दिए गए हैं.)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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