क्या विमान बनाने वाली बोइंग कंपनी दोबारा पटरी पर लौट सकती है?

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क्या आपको मालूम है कि पिछली बार जब आपने किसी विमान यात्रा की, तो वो विमान किसने बनाया था?
इस मामले में संभावना यही है कि या तो उसे अमेरिका स्थित बोइंग कंपनी ने बनाया होगा या फिर यूरोप की एयरबस कंपनी ने बनाया होगा. दरअसल कमर्शियल एविएशन या वाणिज्यिक विमान बनाने में इन्हीं दो विशाल कंपनियों का वर्चस्व है.
दुनियाभर के आसमान में उड़ रहे क़रीब नब्बे फ़ीसदी विमान इन्हीं दो कंपनियों ने बनाये हैं. फ़िलहाल बाज़ार में एयरबस का कारोबार बुलंदी पर है, क्योंकि दुनियाभर की एयरलाइंस उसके विमान तेज़ी से ख़रीद रही हैं.
वहीं, बोइंग पिछले कुछ साल से मुश्किल दौर में है. इसके क्लासिक विमान 'बोइंग-737' के नए मॉडल 737-मैक्स के दो विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गए. एक दुर्घटना साल 2018 में हुई, जबकि दूसरी साल 2019 में.

इस साल की शुरुआत में बोइंग के एक विमान का दरवाज़ा टूट कर बाहर गिर गया था, जब विमान अमेरिका के ओरेगन के नज़दीक उड़ रहा था.
इससे विमान में हवा का दबाव कम हो गया और उसे इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी.
जब कंपनी इस समस्या से जूझ रही थी, तभी उसके बड़े विमान निर्माण कारख़ानों में कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी.
इस कंपनी के सामने कैश यानी नकदी की किल्लत भी है. इसलिए इस हफ़्ते दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या बोइंग कंपनी दोबारा पटरी पर आ सकती है?
विमान बनाने में लगता है बहुत धन

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एविएशन के क्षेत्र में इन्हीं दो कंपनियों का वर्चस्व क्यों?
किसी नए विमान की डिज़ाइन तैयार करके उसे बनाने में बहुत समय और लागत की ज़रूरत होती है.
उड्डयन विश्लेषक स्कॉट हैमिल्टन बताते हैं कि साल 2008 में जब बोइंग ने 787 विमान बनाया था, उस समय उसे डिज़ाइन करने और बनाने में 10 अरब डॉलर लगते थे.
अब यह कीमत 20 से 30 अरब डॉलर तक पहुंच गई है.
उनका कहना है, "साल 1903 में राइट बंधुओं ने अपना पहला विमान बनाया था. उसके बाद कई कंपनियों ने विमान निर्माण में कदम रखा था. उन्हीं से प्रेरित होकर विल बोइंग ने विमान निर्माण कंपनी शुरू की थी."
"साल 1916 में विल बोइंग ने सिएटल में इसकी स्थापना की थी. तब एविएशन उद्योग को शुरू हुए केवल 13 साल ही हुए थे."
साल 1933 में बोइंग कंपनी का पहला सफल मॉडल था '247', जिसने उस समय सैन फ्रांसिस्को से न्यूयॉर्क की दूरी साढ़े 19 घंटे में तय की थी.
लेकिन 1957 में लॉन्च किए गए 'बोइंग 707' में पहली बार प्रोपेलर की जगह जेट इंजन का इस्तेमाल किया गया. इसी के साथ कंपनी का सुनहरा दौर शुरू हुआ.
स्कॉट हैमिल्टन का कहना है कि ये विमान अमेरिका के एक सिरे से दूसरे सिरे की दूरी आठ घंटे की जगह पांच घंटे में पूरी कर सकते थे.
हालांकि इस विमान को अमेरिका से यूरोप जाने के लिए विमान को तीन बार ईंधन भरने के लिए उतरना पड़ता था.
लेकिन बाद में इसकी रेंज बढ़ गई और वो यह यात्रा नॉन स्टॉप या बिना रुके होने लगी, जिससे इस उद्योग में एक क्रांतिकारी बदलाव आया.
उसके बाद बोइंग ने साल 1969 में 'बोइंग 747' जंबो जेट को लॉन्च किया. 350 टन का यह विशाल विमान बोइंग- 707 से तीन गुना बड़ा था और इसमें 350 यात्री बैठ सकते थे.

स्कॉट हैमिल्टन कहते हैं कि अधिक यात्रियों को ले जाने की क्षमता के कारण इस एयरलाइंस ने हवाई यात्रा के किराए काफ़ी कम कर दिए, जिससे ज़्यादा लोग हवाई यात्रा करने लगे.
साल 1970 में बोइंग का मुकाबला करने के लिए यूरोपीय देशों ने मिलकर विमान निर्माण कंपनी 'एयरबस' की स्थापना की, जिसमें ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और स्पेन शामिल थे.
स्कॉट हैमिल्टन कहते हैं कि शुरुआत में बोइंग ने एयरबस की चुनौती को गंभीरता से नहीं लिया.
लेकिन, जब साल 1992 में एयरबस ने अमेरिका की यूनाइटेड एयरलाइंस से ऑर्डर हासिल किए, तो बोइंग कंपनी चौंक गई.
उसके बाद साल 1997 में बोइंग और अमेरिकी प्रतिस्पर्धी मैकडोनाल्ड डगलस का विलय हो गया, क्योंकि मैकडोनाल्ड डगलस बोइंग और एयरबस के साथ प्रतिस्पर्धा के चलते मुश्किल स्थिति में आ चुका था.
इससे बोइंग के लिए यह फ़ायदा था कि वो मैकडोनाल्ड डगलस के कारख़ानों की क्षमता का इस्तेमाल कर सकता था.
लेकिन, इस विलय से कार्पोरेट संस्कृति में एक बड़ा बदलाव भी आया और कई लोगों का कहना है कि उसी वजह से बोइंग आज समस्याओं का सामना कर रहा है.
स्कॉट हैमिल्टन कहते हैं, "कई प्रेक्षक मानते हैं कि विलय के बाद मैकडोनाल्ड डगलस ग्रुप के प्रमुख ने इस बात पर ज़ोर देना शुरू किया कि बोइंग को मुनाफ़े और कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ाने पर अधिक ज़ोर देना चाहिए."
"इसके बाद बोइंग कंपनी में पैसे की बचत के लिए कटौती और छंटनियां शुरू हुई. और जब सारा ध्यान कटौती और मुनाफ़े पर हो तो सुरक्षा के मुद्दों से ध्यान हटना लाज़िमी होता है."
संकट में कैसे आई बोइंग?

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उड्डयन मामलों की पत्रकार और सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस्टीन नेग्रोनी मानती हैं कि मैकडोनाल्ड डगलस के साथ विलय से पहले भी बोइंग के विमानों में समस्या मौजूद थी, लेकिन विलय से यह समस्याएं और गंभीर हो गयीं.
उन्होंने कहा, "मेरे ख़्याल से बोइंग कंपनी मैकडोनाल्ड डगलस के साथ विलय से पहले ही इस रास्ते पर निकल पड़ी थी. यह ज़रूर है कि मैकडोनाल्ड डगलस के साथ विलय के बाद यह प्रक्रिया काफ़ी तेज़ हो गयी."
साल 2010 के दशक में सुरक्षा संबंधी समस्याएं साफ़ तौर पर सामने आ गयीं, जब बोइंग ने एयरबस से प्रतिस्पर्धा के मद्देनज़र एक नया विमान लॉन्च किया.
बोइंग एक बिल्कुल नया विमान बनाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन फिर उसने अपने लगभग पचास साल पुराने विमान बोइंग 737 के मॉडल में ही सुधार करके उसे अपग्रेड करने का फ़ैसला किया और उसे '737-मैक्स' नाम दिया.
क्रिस्टीन नेग्रोनी ने कहा, "इस विमान को 1960 के दशक में डिजाइन किया गया था."
"एक पायलट जो 737 मैक्स चलाते हैं, उन्होंने मुझे बताया कि यह ऐसा ही है, जैसे साल 1960 की फ़ोक्स वैगन गाड़ी में आप टेस्ला जैसी आधुनिक गाड़ी की टेक्नोलॉजी लगा दें."
"बोइंग ने यही किया, क्योंकि पैसे बचाने के लिए उसने एक नया विमान डिज़ाइन करने के बजाय पुराने विमान पर नया रंगरोगन लगा कर लॉन्च कर दिया."
737 मैक्स की समस्या उस वक़्त भयानक रूप से सामने आयी, जब साल 2018 में लायन एयरलाइंस का यह विमान जकार्ता से उड़ान भरने के कुछ समय बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें मौजूद सभी लोग मारे गए.
मैक्स विमानों में पिछले 737 मॉडल से बड़े इंजिन लगाए गए थे, जो थोड़ा आगे और पंखों के उपर लगाना पड़ा था, जिस वजह से यह विमान पिछले मॉडल से अलग तरह से काम करता था.
इससे धीमी गति से उड़ान के समय समस्या पैदा होने का ख़तरा था. इस समस्या से निपटने के लिए विमान में एक सॉफ़्टवेयर डाला गया था.
लेकिन, इस विमान के उड़ने के तरीके को पायलट समझ नहीं पाए. क्रिस्टीन नेग्रोनी ने कहा कि जब इस विमान की नाक ज़्यादा ऊपर उठ जाती है, तब यह सॉफ्टवेयर उसे नीचे कर देता था.
पायलटों को इसकी जानकारी नहीं थी, क्योंकि यह मान लिया गया कि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें इस बारे में पता चल गया होगा. लेकिन, असल में ऐसा नहीं हुआ.
इसलिए, पायलट विमान की नाक उपर रखने की कोशिश करते रहे, लेकिन सॉफ़्टवेयर उसे नीचे कर देता और अंतत: विमान समुद्र में गिर गया.
बोइंग ने समस्या को गंभीरता से लेने के बजाय इसका दोष पायलटों पर मढ़ दिया और कंपनी ने इस समस्या से निपटने के लिए पायलटों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए.
इस दौरान उसने समस्या का समाधान खोजने के लिए काम शुरू किया, लेकिन उससे पहले ही साल 2019 में इथियोपियन एयरलाइंस का एक 737 मैक्स विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.
दूसरी दुर्घटना के बाद दुनियाभर में मैक्स 737 विमानों की उड़ान पर पाबंदी लगा दी गयी.
शुरुआत में बोइंग और अमेरिकी उड्डयन संस्था एफ़एए ने इसका विरोध किया था. क्रिस्टीन नेग्रोनी कहती हैं कि इससे पता चलता है कि बोइंग सुरक्षा को गंभीरता से नहीं ले रहा था.
क्रिस्टीन नेग्रोनी ने कहा, "जब कोई कंपनी, ख़ास तौर पर विमान बनाने वाली कंपनी कहती है कि उसने ख़तरे की सभी संभावनाओं को परख कर उसका समाधान कर लिया है, तो आमतौर पर उसकी बात पर विश्वास किया जाता है."
"बोइंग ने कहा कि उसका सॉफ़्टवेयर विमान का नियंत्रण पायलट के हाथ से अपने हाथ में ले लेगा और उससे कोई समस्या नहीं आएगी, तो उसके दावे पर विश्वास किया गया. मगर, यही समस्या दोनों विमान दुर्घटनाओं का कारण थी."
क्रिस्टीन नेग्रोनी कहती है कि बोइंग ने ख़र्च में कटौती करके जल्दबाज़ी में विमान को डिज़ाइन करके लॉन्च कर दिया.
इस साल जब बोइंग को लगा कि उसके विमानों की सुरक्षा पर से लोगों का ध्यान हट गया है, तब अलास्का एयरलाइंस के एक 737 मैक्स विमान का दरवाज़ा उड़ान के दौरान टूट कर गिर गया.
क्रिस्टीन नेग्रोनी कहती हैं कि यह सॉफ्टवेयर का नहीं, बल्कि विमान निर्माण की गुणवत्ता का मसला था.
इससे पता चला कि यह मसला बोइंग के विमान के डिज़ाइन का नहीं, बल्कि कंपनी के काम करने के तरीके का है.
बोइंग के सीईओ ने स्वीकार किया कि लोगों का कंपनी पर से भरोसा कम हुआ है और बोइंग को अपने कामकाज के तरीके को बदलना होगा.
बोइंग ने बदला तरीका

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इथियोपियन एयरलाइंस की विमान दुर्घटना के बाद सभी बोइंग 737 मैक्स विमानों की उड़ानों पर बीस महीनों तक पाबंदी लगी रही.
साथ ही बोइंग को जुर्माने, मुआवज़े और ऑर्डर के रद्द होने की वजह से 80 अरब डॉलर का नुकसान हुआ.
उसके बाद कोविड लॉकडाउन के चलते एयरलाइंस उद्योग लगभग डेढ़ साल तक ठंडा पड़ गया था.
हमारे तीसरी एक्सपर्ट वॉलस्ट्रीट जर्नल की उड्डयन मामलों की पत्रकार शैरन टर्लिप कहती हैं कि ये सारी समस्याएं और श्रमिकों के मसले एक साथ बोइंग के सामने आए, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा असर पड़ा और जिसका प्रभाव अभी तक जारी है.
"दुनियाभर में विमान बेचने वाली इस कंपनी का काम एक बार नहीं बल्कि दो बार ठप्प हो गया, जिससे वहां काम करने वाले कई अच्छे श्रमिक और इंजीनियर दूसरी जगह काम पर चले गए."
"साथ ही कंपनी को सामान बेचने वाली अन्य कंपनियों की सप्लाई भी बाधित हुई, जिसका कंपनी पर बुरा असर पड़ा."
बोइंग पर अमेरिकी उड्डयन संस्था ने पाबंदी तो हटा दी, लेकिन वो हर साल कितने विमान बना सकती है इसकी सीमा तय कर दी.
शैरन टर्लिप के अनुसार इसका मक़सद यह था कि ज़्यादा विमान बनाने की होड़ में बोइंग सुरक्षा की अनदेखी ना करे.
यह सीमा इस साल की शुरुआत में समाप्त होने वाली थे, लेकिन उससे पहले ही बोइंग के एक 737 मैक्स का दरवाज़ा उड़ान के दौरान टूट कर बाहर गिर गया, जिस वजह से नियंत्रण जारी रहे.
बोइंग के सामने समस्या तब बढ़ गयी, जब इस साल सितंबर में बोइंग की फ़ैक्ट्रियों के तैंतीस हज़ार से अधिक श्रमिक हड़ताल पर चले गए.
धन की समस्या से निपटने के लिए बोइंग ने कंपनी के शेयर जारी करके 21 अरब डॉलर हासिल किए.
साथ ही कंपनी ने कैली ओर्टबर्ग को सीईओ नियुक्त किया, जिन्होंने नवंबर में श्रमिकों की हड़ताल समाप्त करने में कामयाबी हासिल की.
उम्मीद जताई जा रही है कि वो बोइंग की गुणवत्ता में लोगों का भरोसा दोबारा कायम करने में भी सफल होंगे.
शैरन टर्लिप का कहना है कि कैली ओर्टबर्ग की पृष्ठभूमि मार्केटिंग या फ़ाइनेंस से नहीं बल्कि इंजीनियरिंग से जुड़ी है.
उन्होंने कहा, "इससे पहले के बोइंग प्रबंधन पर यह आरोप लगता रहा है कि उसका इंजीनियरिंग और निर्माणकार्य से कम ताल्लुक है."
"ओर्टबर्ग की नियुक्ति के ज़रिए बोइंग कंपनी यह संकेत देना चाह रही है कि वो अपने प्रबंधन के रुख़ को बदल रही है."
"बोइंग के ग्राहक अभी उसका दामन थामे हुए हैं, जिसकी एक वजह यह है कि इस बाज़ार में उनके पास बहुत कम विकल्प हैं, क्योंकि बोइंग की प्रतिस्पर्धी कंपनी के पास 2030 तक के लिए विमानों के ऑर्डर पहले ही आ चुके हैं."
शैरन टर्लिप की राय है कि बोइंग को पता है कि उसके ग्राहक कहीं भागे नहीं जा रहे. उसे बस विमान बना कर बेचने हैं. उसके पास अरबों डॉलर के ऑर्डर पहले से मौजूद हैं.
उसका सिर्फ़ एक प्रतिस्पर्धी है, इसलिए ऐसा किसी को नहीं लगता कि बोइंग का व्यापार ठप्प हो जाएगा.
दो बड़ी कंपनियों को चुनौती

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विमान निर्माण उद्योग में पिछले पचास सालों से बोइंग और एयरबस का वर्चस्व रहा है, लेकिन शायद चीन की सरकारी विमान निर्माण कंपनी कोमैक और उसके विमान सी-919 से उन्हें चुनौती मिल सकती है.
एयरोस्पेस उद्योग को सलाह देने वाली कंपनी एयरोडायनामिक एडवाइज़री के प्रमुख रिचर्ड अबूलाफ़िया मानते हैं कि कोमैक का सी 919 काफ़ी पुरानी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है, इसलिए वो फ़िलहाल एयरबस और बोइंग के लिए बड़ी चुनौती नहीं है.
लेकिन, ब्राज़ील की एमब्रेयर कंपनी ज़रूर इन दो बड़ी कंपनियों को टक्कर दे सकती है.
उन्होंने कहा, "इस बात की काफ़ी चर्चा रही है कि क्या एमब्रेयर इस उद्योग में कोई उथलपुथल कर सकता है? दरअसल, एमब्रेयर के सबसे बड़े जेट में केवल 120 सीटें हैं."
"एमब्रेयर काफ़ी प्रतिष्ठित कंपनी है. अगर वह कुछ बड़े निवेशकों को आकर्षित कर पाए, तो वो इस उद्योग में काफ़ी ऊपर तक पहुंच सकता है."
इसके अलावा विमान निर्माण उद्योग में कुछ नयी कंपनियां भी हैं.
मिसाल के तौर पर जेट ज़ीरो, जो अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में स्थित है और एक ऐसे नए किस्म का विमान बनाने की योजना बना रही है, जिसके पंख बहुत लंबे होंगे और बॉडी बीच में होगी.
इसमें कम ईंधन का इस्तेमाल होगा.
रिचर्ड अबूलाफ़िया ने कहा कि यह विमान किफ़ायती होगा और इससे प्रदूषण भी कम होगा.
मगर, इसे विकसित करने के लिए पैसों की ज़रूरत होगी. इस सपने को सच्चाई में बदलने के लिए पंद्रह से बीस अरब डॉलर के निवेश की ज़रूरत होगी.
रिचर्ड अबूलाफ़िया कहते हैं फ़िलहाल तो बोइंग को केवल एयरबस ही टक्कर दे रही है. वो बोइंग के प्रबंधन में आए बदलाव से काफ़ी आशावान भी हैं.
रिचर्ड अबूलाफ़िया ने कहा, "पिछले पंद्रह बीस साल से जो लोग बोइंग का प्रबंधन संभाल रहे थे, उन्हें विमान निर्माण में कम और मुनाफ़े और आंकड़ों के जोड़-तोड़ में अधिक रुचि थी."
बोइंग ने एक विज्ञप्ति जारी कर के कहा है कि वो सुरक्षा के प्रति कटिबद्ध है. वो अपने कर्मचारियों की राय को एहमियत दे रहा है और उड्डयन नियंत्रण संस्थाओं के साथ पारदर्शिता बरत रहा है.
साथ ही उसने अपने विमानों में सुरक्षा व्यवस्था और गुणवत्ता को और पुख़्ता करने के लिए योजनाएं तैयार कर ली हैं.
रिचर्ड अबूलाफ़िया कहते हैं कि बोइंग को ये वादे पूरे करने में वक़्त लगेगा और बहुत काम करना पड़ेगा.
तो अब लौटते हैं, अपने प्रमुख सवाल की ओर- क्या बोइंग कंपनी दोबारा पटरी पर आ सकती है?
एक बात तो तय है कि बोइंग कंपनी ठप्प तो नहीं होने जा रही. लेकिन, जितने लंबे समय से कंपनी में काम धीमा रहा है, उसकी भरपाई करने में समय और पैसे की ज़रूरत होगी.
कंपनी पर अभी भी आर्थिक संकट के बादल हैं, लेकिन उसका सबसे बड़ा लक्ष्य अपने ग्राहकों यानी एयरलाइंस और यात्रियों का भरोसा दोबारा हासिल करना होगा.
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