एयर इंडिया की टाटा ग्रुप में 'घर वापसी' से क्या बदलेगा?

एयर इंडिया

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नमक से सॉफ़्टवेयर तक का कारोबार करने वाले टाटा समूह ने कर्ज़ में डूबी सरकारी एयरलाइंस कंपनी एयर इंडिया की 100 फ़ीसदी हिस्सेदारी 18,000 करोड़ रुपये में खरीद ली है.

इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग) के सचिव तुहीन कांत पांडेय ने बताया कि टाटा सन्स की कंपनी टैलेस प्राइवेट लिमिटेड ने एयर इंडिया खरीदने के लिए 18,000 करोड़ रुपये की विजेता बोली लगाई थी.

उन्होंने जानकारी दी कि टाटा के विनिवेश की प्रक्रिया साल 2021 के दिसंबर तक पूरी हो जाएगी. ग़ौरतलब है कि एयर इंडिया को खरीदने के लिए सात कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई थी.

एयर इंडिया को खरीदने की दौड़ में टाटा सन्स ने स्पाइस जेट के प्रमोटर को मात दी. क़ीमत के तौर पर टाटा सन्स एयर इंडिया के 15,300 करोड़ रुपये के कर्ज का ज़िम्मा लेगा बाक़ी रकम का वो नकद में भुगतान करेगा.

'दीपम' के सचिव तुहीन कांत पांडेय ने बताया कि एयर इंडिया की नीलामी में दोनों ही कंपनियों ने रिज़र्व प्राइस से ज़्यादा की बोली लगाई थी.

उन्होंने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मंत्री समूह ने चार अक्टूबर को एयर इंडिया की विजेता बोली को मंज़ूरी दी थी.

टाटा समूह की विमानन क्षेत्र की कंपनी विस्तारा में 51 फ़ीसदी (सिंगापुर एयरलाइंस की इसमें 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी है) और एयर एशिया लिमिटेड में 84 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

रतन टाटा

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रतन टाटा ने क्या कहा?

टाटा सन्स के चेयरमैन रतन टाटा ने एयर इंडिया की 'घर वापसी' का स्वागत करते हुए कहा, "टाटा समूह का एयर इंडिया की बोली जीतना एक बड़ी ख़बर है. एयर इंडिया को फिर से खड़ा करने के लिए हमें काफी कोशिश करनी होगी. हमें उम्मीद है कि इससे टाटा समूह की एविएशन इंडस्ट्री में मौजूदगी से मजबूत व्यापारिक अवसर पैदा होंगे."

"भावनात्मक रूप से कहें तो जेआरडी टाटा के नेतृत्व में एयर इंडिया ने एक समय में दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एयरलाइंस में से एक का रुतबा हासिल किया था. शुरुआती सालों में एयर इंडिया का जो साख और सम्मान था, टाटा समूह को उसे फिर से हासिल करने का एक मौक़ा मिला है. जेआरडी टाटा अगर हमारे बीच होते तो उन्हें बेहद खुशी होती."

"चुनिंदा उद्योगों को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोले जाने के लिए अपनाई हालिया नीति के लिए हम सरकार का शुक्रिया अदा करते हैं. वेकलम बैक, एयर इंडिया."

इस संदेश के साथ ही रतन टाटा ने एक तस्वीर भी शेयर की है जिसमें जेआरडी टाटा एयर इंडिया के विमान के साथ से उतरते हुए दिख रहे हैं और उनके पीछे फ़्लाइट का क्रू है.

एयर इंडिया

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'सरकार को इसे बेचना ही था'

बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने एविएशन एक्सपर्ट हर्षवर्धन से इसी मुद्दे पर बातचीत की. हर्षवर्धन कहते हैं, "एयर इंडिया भारत के बनाए सबसे बेहतरीन ब्रांड में से एक है, लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद इसके साथ मुश्किलें आनी शुरू हुई थीं और इसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई."

"कंपनी में मुश्किलें तो थी हीं लेकिन इसके साथ सरकार ने इसे जिस तरह संभाला उसमें काफी दिक्कतें थीं. 80 के दशक के बाद के दौर में संगठन में लालफीताशाही बढ़ी और प्रोफ़ेशनल प्लेटफॉर्म पर काम करने की उसे इजाज़त नहीं मिली."

"प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के वक़्त से ही कंपनी ने नए विमान खरीदने बंद कर दिए. इससे पहले एक बाद एक मंत्री ने बिना किसी कारण कंपनी के सभी जहाज़ों को उड़ने नहीं दिया."

वो कहते हैं, "अभी टाटा ने एयर इंडिया को सरकार से लिया है तो सरकार ने इसके लिए पहले व्यवस्था की है. सरकार को हर हाल में इसे बेचना ही था और खरीदार ने जो मांग रखी गई उसे सरकार को मानना पड़ा है. अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ रही है और सरकार को अब ये पता है कि वो इसे चला नहीं पाएगी, उसे इसको बेचना ही होगा."

"साल 2014 के चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने ये मुद्दा बनाया कि गुजरात में सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों को उन्होंने बेहतर बनाया है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सरकार का ये रवैया रहा है कि कैसे किसी संगठन की हालत पहले बद से बदतर कर दिया जाए और फिर उसे बेचने लायक बनाया जाए. मेरा मानना है कि ये भी उसी तरह की प्रक्रिया रही."

हर्षवर्धन कहते हैं कि कंपनी की हालत पहले से बिगड़ी थी लेकिन बाद में और बिगड़ गई, सरकार उसे मजबूरी में चला रही थी.

वो कहते हैं, "एयर इंडिया को केवल एक कमर्शियल कंपनी नहीं माना जा सकता, रणनीतिक तौर पर भी उसका महत्व था, ख़ास कर भारत जैसे देश में जहां कई भू-राजनीति मुद्दे हैं. ये सरकार की तकनीकी सहयोगी की तरह थी. सरकार के हाथों में रहने से समस्या से हुई कि जब इसे फंड करने की ज़रूरत पड़ती है तो सरकार कहती है ये कमर्शियल संगठन है, इसके प्रबंधन में अस्थिरता आना स्वाभाविक है."

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क्या टाटा कंपनी को पटरी पर वापिस लेकर आ पाएगी, इस सवाल के उत्तर में हर्षवर्धन कहते हैं, "टाटा को ये पता है कि इसे फिर से पटरी पर लाने के लिए उसे कम से कम पांच से सात साल का वक्त लगेगा और उसके पास इतनी क्षमता भी है. मुझे लगता है कि सरकार के पास इसे टाटा को देना ही सबसे बेतहर विकल्प था क्योंकि सरकार की ये मजबूरी बन गई थी. वैसे भी अगर उसे कंपनी को बेचना हुआ तो वो ऐसा कर सकती है."

वो कहते हैं, "सरकार के लिए इसे बेचना सम्मान का मुद्दा भी था. हालांकि मैं इसे घर वापसी नहीं कहता क्योंकि जब एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण हुआ था उस वक्त वो करना भी सरकार की मजबूरी था. लेकिन उस वक्त लीडरशिप अलग थी और एयर इंडिया भी तेज़ी से आगे बढ़ती गई लेकिन अब ऐसा नहीं है. अभी सरकार को पता चल रहा है कि इसे निजी हाथों में देना ज़रूरी है."

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एयर इंडिया इतना आकर्षक क्यों था?

घाटे में चलने के बावजूद एयर इंडिया के पास काफी परिसंपत्तियां है. लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर उसका अपना स्लॉट है. 130 विमानों का बेड़ा और साथ में हज़ारों ट्रेंड पायलट और क्रू.

टाटा समूह को इस सौदे के साथ ही देश के हवाई अड्डों पर 4400 घरेलू और 1800 अंतरराष्ट्रीय लैंडिंग और पार्किंग स्लॉट्स और विदेशों में 900 स्लॉट्स मिलेंगे.

इसके अलावा एयर इंडिया के पास करोड़ों डॉलर का रियल इस्टेट है. नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार, पिछले साल मार्च के महीने में इसका मूल्यांकन 6 अरब डॉलर का किया गया था.

एयर इंडिया के पास 40,000 कलाकृतियों का कलेक्शन है जिसमें स्पैनिश कलाकार सल्वाडोर डाली का गिफ़्ट किया हुआ एशट्रे भी शामिल है. भारत का विमानन क्षेत्र 20 फ़ीसदी की सालाना दर से बढ़ रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय बाज़ार की पूरी क्षमता का दोहन अभी तक नहीं हो पाया है. विशेषज्ञों का कहना है कि एयर इंडिया में टाटा समूह के लिए काफ़ी संभावनाएं हैं.

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विनिवेश की शर्तों में सरकार ने दी थी ढील

सरकार पहले भी एयर इंडिया को बेचने की कई बार कोशिश कर चुकी थी, लेकिन इसके लिए खरीदार नहीं मिले थे. सरकार ने इस बार एयर इंडिया को बेचने की शर्तों में काफ़ी बदलाव किए थे.

साल 2001 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने एयर इंडिया में 40 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचने की कोशिश की थी. उस वक़्त लुफ़्तहांसा एयरलाइंस, ब्रिटिश एयरवेज़ और सिंगापुर एयरलाइंस ने इसे खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी.

लेकिन जब सरकार ने ये कहा कि बोली लगाने वाली कंपनी को किसी भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी करनी होगी तो ये विदेशी कंपनियां पीछे हट गई थीं.

मौजूदा वक़्त में एयर इंडिया पर लगभग 60 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ है. कर्ज़ को कम करने के लिए सरकार ने ऋण विशेष इकाई का गठन किया है. साल 2018 में सरकार ने 76 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचने की बात कही.

जनवरी, 2020 में 100 फ़ीसदी हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव सामने रखा गया. उस वक़्त के नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. या तो हम एयर इंडिया को बेच दें या फिर इसे बेच दें.

इसके अलावा सरकार ने कुछ और शर्तों में भी ढील दी थी, ताकि इस बार उसे ख़रीदार मिल सके. सरकार ने कहा था कि अगर किसी संभावित खरीदार को मौजूदा शर्तों को लेकर कोई दिक्कत है तो वो इस बारे में बात करने को तैयार है.

केंद्र सरकार की शर्तों के मुताबिक़ एयर एंडिया के खरीदार की नेट वर्थ कम से कम 3,500 करोड़ होनी अनिवार्य है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के अनुसार टाटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड की नेट वर्थ 6.5 ट्रिलियन रुपये है.

टाटा समूह

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टाटा एयरलाइंस कैसे बनी थी एयर इंडिया?

अप्रैल 1932 में एयर इंडिया का जन्म हुआ था. उस समय के उद्योगपति जेआरडी टाटा ने इसकी स्थापना की थी मगर इसका नाम एयर इंडिया नहीं था. तब इसका नाम टाटा एयरलाइंस हुआ करता था.

टाटा एयरलाइंस की शुरुआत यूं तो साल 1932 में हुई थी मगर जेआरडी टाटा ने वर्ष 1919 में ही पहली बार हवाई जहाज़ तब शौकिया तौर पर उड़ाया था जब वो सिर्फ 15 साल के थे.

फिर उन्होंने अपना पायलट का लाइसेंस लिया. मगर पहली व्यावसायिक उड़ान उन्होंने 15 अक्टूबर को भरी जब वो सिंगल इंजन वाले 'हैवीलैंड पस मोथ' हवाई जहाज़ को अहमदाबाद से होते हुए कराची से मुंबई ले गए थे.

इस उड़ान में सवारियां नहीं थीं बल्कि 25 किलो चिट्ठियां थीं. यह चिट्ठियां लंदन से 'इम्पीरियल एयरवेज' द्वारा कराची लाई गईं थीं. 'इम्पीरियल एयरवेज़' ब्रिटेन का राजसी विमान वाहक हुआ करता था. फिर नियमित रूप से डाक लाने ले-जाने का सिलसिला शुरू हुआ.

मगर भारत में तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने टाटा एयरलाइंस को कोई आर्थिक मदद नहीं दी थी. सिर्फ हर चिट्ठी पर चार आने दिए. उसके लिए भी डाक टिकट चिपकाना था. शुरुआती दौर में टाटा एयरलाइंस मुंबई के जुहू के पास एक मिट्टी के मकान से संचालित होता रहा.

वहीं मौजूद एक मैदान 'रनवे' के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा.

टाटा समूह

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सिर्फ़ दो जहाज़ से शुरू हुई थी कंपनी

जब भी बरसात होती या मानसून आता तो इस मैदान में पानी भर जाया करता था. उस वक़्त 'टाटा एयरलाइंस' के पास दो छोटे सिंगल इंजन वाले हवाई जहाज़, दो पायलट और तीन मैकेनिक हुआ करते थे.

पानी भर जाने की सूरत में जेआरडी टाटा अपने हवाई जहाज़ पूना से संचालित करते थे. टाटा एयरलाइंस के लिए साल 1933 पहला व्यावसायिक वर्ष रहा. 'टाटा संस' की दो लाख की लागत से स्थापित कंपनी ने इसी वर्ष 155 पैसेंजरों और लगभग 11 टन डाक भी ढोई.

टाटा एयरलाइन्स के जहाज़ों ने एक ही साल में कुल मिलाकर 160,000 मील तक की उड़ान भरी. ब्रितानी शाही 'रॉयल एयर फोर्स' के पायलट होमी भरूचा टाटा एयरलाइंस के पहले पायलट थे जबकि जेआरडी टाटा और और विंसेंट दूसरे और तीसरे पायलट थे.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब विमान सेवाओं को बहाल किया गया तब 29 जुलाई 1946 को टाटा एयरलाइंस 'पब्लिक लिमिटेड' कंपनी बन गयी और उसका नाम बदलकर 'एयर इंडिया लिमिटेड' रखा गया.

आज़ादी के बाद यानी साल 1947 में भारत सरकार ने एयर इंडिया में 49 प्रतिशत की भागेदारी ले ली थी. साल 1953 में सरकार ने इसका पूरी तरह से अधिग्रहण कर लिया.

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