नेहरू से गहरे मतभेदों के बीच राजेंद्र प्रसाद कैसे सबसे लंबे समय तक राष्ट्रपति रहे

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
राजेंद्र प्रसाद ने कलकत्ता के नामी प्रेसीडेंसी कॉलेज में विज्ञान छात्र के रूप में दाख़िला लिया था. उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से सन 1904 में एफ़ए की परीक्षा पास की थी और फिर वहीं से बीए में फ़र्स्ट डिवीज़न हासिल किया था.
उसी दौरान एक परीक्षक उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने राजेंद्र प्रसाद की उत्तर-पुस्तिका में लिखा था, ‘परीक्षा देने वाला परीक्षक से बेहतर है’.
डाक्टर राजेंद्र प्रसाद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “परीक्षा में दस प्रश्न पूछे गए थे और छात्रों से कहा गया था कि वो किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर दें. मैंने सभी 10 प्रश्नों के उत्तर लिखने के बाद लिखा था, उनमें से किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर जाँच लीजिए.”
राजेंद्र प्रसाद की महात्मा गाँधी से पहली मुलाकात की भी दिलचस्प कहानी है.
राजेंद्र प्रसाद वकालत पास कर पटना के बहुत बड़े वकील बन गए थे. वो कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने कलकत्ता गए.
राजेंद्र प्रसाद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “मैं वहाँ गाँधीजी की बग़ल में बैठा हुआ था लेकिन मैंने उनसे बातचीत की कोई कोशिश नहीं की क्योंकि मैं स्वभाव से थोड़ा शर्मीला था.''
''वहाँ पर गाँधीजी से कांग्रेस के महासचिव बनने का प्रस्ताव किया गया लेकिन उन्होंने वो पद लेने से इनकार कर दिया. मुझे ये बात अच्छी नहीं लगी. वहाँ से गाँधीजी राजकुमार शुक्ल के साथ चम्पारण जाने के लिए पटना रवाना हुए और मैं पुरी चला गया.”
वे लिखते हैं, “मैं राजकुमार शुक्ल का मुक़दमा लड़ रहा था इसलिए वो गाँधीजी को पटना में मेरे घर ले आए. मैं उस समय अपने घर में नहीं था. जब शुक्ल ने मेरे नौकरों से कहा कि ये हमारे मेहमान हैं तो उन्होंने उन्हें बरामदे में उस जगह बिस्तर बिछाने की जगह दे दी जहाँ मुवक्किलों को ठहराया जाता था.”
राजेंद्र प्रसाद की महात्मा गांधी से मुलाक़ात
गांधी के पौत्र राजमोहन गाँधी उनकी जीवनी मोहनदास में लिखते हैं, “राजेंद्र प्रसाद के नौकरों को गांधी वेषभूषा से सभ्रांत व्यक्ति नहीं लगे इसलिए उन्होंने गांधी को न तो कुएं से पानी निकालने की इजाज़त दी और न ही घर के अंदर का शौचालय इस्तेमाल करने दिया.''
''तभी गांधी को ख़्याल आया कि लंदन में पढ़ने वाले मज़हरुल हक़ भी उसी शहर में रहते हैं. उन्होंने उन तक संदेशा भिजवाया और वो गाँधी को लेने ख़ुद अपनी कार में पहुंच गए. उसी रात उन्होंने गांधीजी को मुज़फ़्फ़रपुर जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया.”
जब राजेद्र प्रसाद पटना लौटे तो उन्हें सारी घटना की जानकारी मिली. अगले ही दिन वो गांधी से मिलने मोतीहारी पहुंच गए. गांधीजी उस समय एक साधारण कुर्ता पहने हुए थे. राजेंद्र प्रसाद उनसे मिलकर बहुत शर्मिंदा हुए और उनसे अपने नौकरों के व्यवहार के लिए माफ़ी माँगी.
उसके बाद चंपारण में जितने दिन गाँधी रहे राजेंद्र प्रसाद उनके साथ रहे. गांधी जी के साथ रहने से उनकी रोज़मर्रा की ज़िदगी में बहुत बदलाव आया.
राजेंद्र प्रसाद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘'मैं जाति नियमों का बहुत कड़ाई से पालन करता था और ग़ैर-ब्राह्मण के हाथ का छुआ कुछ भी नहीं खाता था. धीरे-धीरे हम सब लोग साथ खाना खाने लगे. एक-एक करके हमने अपने सारे नौकर वापस भेज दिए.''
''हम अपने कपड़े खुद धोते, कुएं से खुद पानी निकालते और अपने बर्तन भी खुद साफ़ करते. अगर हमें पास के गाँव जाना होता तो हम पैदल ही जाते. ट्रेन में हम हमेशा तीसरे दर्जे में सफ़र करते. हमने बिना पलक झपकाए अपने जीवन के सारे ऐशो-आराम छोड़ दिए थे.”

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बिहार के भूकंप में राहत कार्य
राजेंद्र प्रसाद की ख्याति पूरे देश में तब फैली जब बिहार में सन 1934 में भयंकर भूकंप आया. चारों तरफ़ भारी तबाही हुई और करीब-करीब सारी इमारतें ढह गईं. हज़ारों लोगों की मौत हुई और दसियों हज़ार लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया.
जैसे ही बर्बादी की ख़बर फैली सरकार ने उस इलाके के सारे राजनीतिक क़ैदियों को रिहा कर दिया. जवाहरलाल नेहरू पटना आए और फिर वहाँ से नुक़सान का जायज़ा लेने मुंगेर गए.
राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं कि नेहरू ने अपने हाथों से इलाके को साफ करने और दबे हुए शवों को बाहर निकालने का बीड़ा उठाया.
उन्होंने लिखा, “हमारे ऊपर काम का इतना बोझ था कि हमारा दिन सुबह चार बजे शुरू होता था. सारे प्रदेश का सड़क और रेल मार्ग से संपर्क टूट गया था. सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की थी. हमने कितने ही नए कुएं खुदवाए और कई नष्ट हो चुके कुओं की मरम्मत भी करवाई.”
इसके एक साल बाद 1935 में जब क्वेटा में भूकंप आया तो राजेंद्र प्रसाद को ही एक बार फिर राहत पहुंचाने की ज़िम्मेदारी दी गई.

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ख़ुद करवाई वेतन में कटौती
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सबसे लंबे समय, 12 वर्षों तक भारत के राष्ट्रपति रहे. 25 जनवरी, 1960 की रात को उनकी बड़ी बहन भगवती देवी का निधन हो गया.
जब वो सिर्फ़ 19 वर्ष की थी तभी उनके पति का निधन हो गया था. तब से वो अपने छोटे भाई राजेंद्र प्रसाद के साथ रह रही थीं. कुछ घंटे पहले हुई उनकी प्रिय बहन की मौत के बावजूद राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी की सुबह गणतंत्र दिवस परेड की सलामी ली.
परेड से लौटने के बाद उन्होंने अपनी बहन के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की.
जब राजेंद्र प्रसाद राष्ट्पति बने तो उस समय राष्ट्रपति का वेतन दस हज़ार रुपए प्रति माह हुआ करता था. उन्होंने शुरू से ही उसका आधा यानी सिर्फ़ 5000 रुपए वेतन लिया. बाद में उन्होंने उसको भी घटाकर सिर्फ़ 2500 रुपए प्रति माह कर दिया था.
जब आज़ादी से पहले 2 सितंबर, 1946 को अंतरिम सरकार बनी तो जवाहरलाल नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को खाद्य और कृषि मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया.
साल का अंत होते होते नेहरू ने महात्मा गांधी और सरदार पटेल की सलाह पर कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष बनाने का फ़ैसला किया.
नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को स्पष्ट कर दिया कि इस पद को ग्रहण करने से पहले उन्हें सरकार से इस्तीफ़ा देना होगा क्योंकि नेहरू की नज़र में संविधान सभा का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जो सरकार में उनके अधीन पद पर काम कर रहा हो.राजेंद्र प्रसाद को ये तर्क पसंद नहीं आया था.
दुर्गा दास अपनी किताब ‘फ़्रॉम कर्ज़न टू नेहरू एंड आफ़्टर’ में लिखते हैं, “इसका नतीजा ये हुआ कि नेहरू-प्रसाद और पटेल के बीच तनाव पैदा हो गया. जब मामला सुलझ नहीं पाया तो इसे गांधीजी के पास ले जाया गया.
गाँधी ने राजेंद्र प्रसाद को बुलवा भेजा और उनसे बात की और कहा कि उन्हें दो पदों पर नहीं रहना चाहिए. राजेंद्र बाबू को बात समझ में आ गई और उन्होंने तुरंत अपना इस्तीफ़ा नेहरू को भेज दिया.
गांधी के पुत्र देवदास ने मुझे बताया था कि गाँधी को राजेंद्र प्रसाद के रवैये से थोड़ी निराशा हुई थी.
उन्होंने कहा था कि मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ कि ‘राजेंद्र बाबू जैसा व्यक्ति भी सत्ता की चाह रख सकता है.’
उस दौरान नेहरू ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की पेशकश भी की लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने इसे नामंज़ूर कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उन्हें मंत्रिमंडल और संविधान सभा के अध्यक्ष पद से हटाने के लिए ऐसा किया जा रहा है.

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नेहरू राजगोपालाचारी बनाना चाहते थे राष्ट्रपति
नेहरू एक परंपरा शुरू करना चाहते थे कि अगर अगर देश का प्रधानमंत्री उत्तर से चुना जाता है तो राष्ट्रपति दक्षिण से होना चाहिए. इसको देखते हुए वो चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे.
नेहरू के सहायक रहे एमओ मथाई अपनी किताब ‘रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज’ में लिखते हैं, “नेहरू राजेंद्र प्रसाद को पहला राष्ट्पति नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि उनकी नज़र में वो पुरातनपंथी और
परंपरावादी थे. उन्होंने राजेंद्र प्रसाद से बात करके उन्हें केंद्रीय मंत्री और योजना आयोग का अध्यक्ष बनाने की पेशकश की थी लेकिन राजेंद्र प्रसाद को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी.”
नेहरू को कुछ दिनों में अंदाज़ा हो गया कि कांग्रेस के अधिकतर नेता राजाजी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि जब 1942 में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था तो राजाजी ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था.
मथाई लिखते हैं, “सरदार पटेल भी राजाजी का विरोध कर रहे थे. आखिरकार नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनाने का फ़ैसला लिया, हालांकि राजाजी ने इसका बहुत बुरा माना.”
नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के बीच वैचारिक दूरी 30 के दशक से ही शुरू हो गई थी जब सरदार पटेल, राजाजी और आचार्य कृपलानी ने नेहरू की समाजवाद की अवधारणा को समर्थन देने से मना कर दिया था.
सन 1950 में ये खाई और बढ़ी जब राजेंद्र प्रसाद ने कच्छ में ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण समारोह में जाने का फ़ैसला किया.
सोमनाथ मंदिर को दसवीं शताब्दी में महमूद गज़नी ने लूटा और बर्बाद कर दिया था.
दुर्गा दास लिखते हैं, “नेहरू ने इस आधार पर राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ जाने का विरोध किया कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख के लिए किसी धार्मिक समारोह में भाग लेना उचित नहीं है. प्रसाद नेहरू के इस विचार से सहमत नहीं थे. उन्होंने कहा कि सोमनाथ एक आक्रांता के राष्ट्रीय विरोध का प्रतीक है. मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ और मैं इससे अपने-आप को अलग नहीं कर सकता.”
राजेंद्र प्रसाद ने सरदार पटेल और नवानगर के जाम साहब की उपस्थिति में ये समारोह देखा.
दुर्गा दास लिखते हैं, “इस पर नेहरू नाराज़ हुए और उन्होंने सूचना-प्रसारण मंत्रालय को आदेश दिया कि इस अवसर पर राजेंद्र प्रसाद के दिए गए भाषण को प्रसारित न किया जाए.”

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हिंदू कोड बिल पर नेहरू और प्रसाद में असहमति
सन 1952 में जब काशी यात्रा के दौरान जब राजेंद्र प्रसाद ने पंडितों के पैर धोए तो इसे भी नेहरू ने पसंद नहीं किया.
इस पर प्रसाद का जवाब था, “देश का सबसे बड़ा व्यक्ति भी अध्येताओं की उपस्थिति में छोटा है.”
जब संसद में हिंदू कोड बिल पर बहस हुई तो राजेंद्र प्रसाद ने सांसदों को ये स्पष्ट कर दिया कि वो इसके विरोध में हैं. उन्होंने नेहरू को भी पत्र लिखकर कहा कि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति संसद का हिस्सा होता है और वो जब भी चाहें संसद में प्रेसिडेंशियल बॉक्स में बैठ सकते हैं लेकिन नेहरू इससे सहमत नहीं हुए.
नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा कि संसद का हिस्सा होने का अर्थ यही है कि वो साल में एक बार संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करें.
संसद में प्रेसिडेंशियल बॉक्स सिर्फ़ इसलिए बनाया गया है कि उसमें विदेशी मेहमान बैठ कर संसद की कार्रवाही देख सकें लेकिन नेहरू ने ये व्यवस्था भी करवाई कि राष्ट्रपति अपनी स्टडी में बैठ कर संसद के दोनों सदनों की पूरी कार्यवाही को सुन सकते हैं.
इस सबका नतीजा ये हुआ कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के बीच संबंध इतने ठंडे होते चले गए कि दोनों ज़रूरत पड़ने पर ही एक दूसरे से बात करते.
धीरे-धीरे नेहरू का झुकाव उप-राष्ट्रपति राधाकृष्णन की तरफ़ होने लगा. नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के संबंध औपचारिक होते चले गए लेकिन वो हर हफ़्ते राजेंद्र बाबू से मिलने जाते रहे और सरकार के महत्वपूर्ण फ़ैसलों से उन्हें अवगत कराते रहे.
मथाई लिखते हैं, “दोनों के बीच कोई निजी गर्मजोशी नहीं थी लेकिन आम लोगों के सामने नेहरू ने राष्ट्रपति के सम्मान में कोई कमी नहीं दिखाई.”
इन सबके बावजूद जब सन 1955 में नेहरू सोवियत संघ की यात्रा से लौटे तो राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने का फ़ैसला किया.
ये सम्मान नेहरू को एक भोज के दौरान बिना किसी साइटेशन के दिया गया.
जब राजेंद्र प्रसाद से इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, “नेहरू वास्तव में भारत रत्न हैं. क्यों न उन्हें औपचारिक रूप से भारत रत्न दे दिया जाए?”

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नेहरू दूसरे कार्यकाल के पक्ष में नहीं थे
नेहरू नहीं चाहते थे कि राजेंद्र प्रसाद को दूसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुना जाए. इस पद के लिए डॉक्टर राधाकृष्णन उनके दिमाग में थे.
नेहरू का मानना था कि सात वर्ष तक इस पद पर रहने के बाद राजेंद्र प्रसाद स्वयं अवकाश ग्रहण करना चाहेंगे.
दुर्गा दास लिखते हैं, "मैं ये जानने के लिए मौलाना आज़ाद के पास गया कि राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार कौन होगा?"
आज़ाद का जवाब था, "मैं चाहता हूँ राजेंद्र प्रसाद दोबारा राष्ट्रपति बनें, जब मैंने प्रसाद से यही सवाल किया तो उन्होंने कहा कि इस मामले में हाई कमान के निर्देशों का पालन करूँगा. इससे उनका मतलब था कि नेहरू जैसा चाहेंगे वो वैसा ही करेंगे.”
आज़ाद के अलावा गोविंद वल्लभ पंत और कामराज भी राजेंद्र प्रसाद के समर्थन में उतर आए.
दुर्गा दास लिखते हैं, “नेहरू ने प्रसाद से मिलकर कहा कि आप आधा कार्यकाल पूरा करने के बाद रिटायर हो जाइए. प्रसाद का जवाब था कि ये मेरे स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, राधाकृष्णन को अपनी बारी के लिए पाँच साल इंतज़ार करना पड़ा.”

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प्रसाद की विदेश यात्राओं पर नेहरू की झिझक
राजेंद्र प्रसाद के दोबारा राष्ट्पति बनने से राधाकृष्णन को बहुत निराशा हुई.
एमओ मथाई लिखते हैं, “नेहरू ने उनको ख़ुश करने के लिए सरकार के वरीयता क्रम में परिवर्तन कर उप-राष्ट्रपति को सरकार में दूसरे नंबर पर रख दिया. इससे पहले उप-राष्ट्रपति वरीयता क्रम में तीसरे नंबर पर होता था. उन्होंने उप-राष्ट्रपति को देश के अंदर वायुसेना के विमान का इस्तेमाल करने की अनुमति भी दे दी.”
मथाई लिखते हैं, “राजेंद्र प्रसाद के विदेश जाने के किसी भी प्रस्ताव पर नेहरू बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं दिखाते थे. नेहरू का मानना था कि प्रसाद विदेश में भारत की आधुनिक धर्मनिरपेक्ष छवि नहीं प्रस्तुत करते.”
प्रसाद अपने पहले कार्यकाल में सिर्फ़ एक बार 1955 में नेपाल की सरकारी यात्रा पर गए. सन 1958 में वो बड़ी मुश्किल से उनकी जापान यात्रा के लिए राज़ी हुए.
दुर्गा दास लिखते हैं, “जापान मे सम्राट के भोज में सिर्फ़ शाकाहारी व्यंजन परोसे गए. हनोई में होली के दिन एक भोज के दौरान वहाँ के नेता हो ची मिन्ह ने उठकर राजेंद्र प्रसाद के चेहरे पर गुलाल लगा दिया. उन्होंने कहा हममें और भारत में कोई फ़र्क नहीं है. हम हर मामले में भारत का अनुसरण करते हैं.”
सन 1959 में भारत से लौटने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने डाक्टर राजेंद्र प्रसाद को अमेरिका यात्रा के लिए आमंत्रित किया. वो उन्हें अपने देश में खुद घुमाना चाहते थे.
दुर्गा दास लिखते हैं, “नेहरू और विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा को ये कहते हुए टाल दिया कि हम में से कई लोग अमेरिका की यात्रा पर हो आए हैं. आपका इस समय तुरंत वहाँ जाना ज़रूरी नहीं है.”
जब सेनाध्यक्ष जनरल थिमैय्या ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और नेहरू ने इसके बारे में राष्ट्रपति को नहीं बताया, ख़ास तौर पर ये देखते हुए कि वो सेना के सर्वोच्च कमांडर भी थे. बाद में रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने इसके लिए राजेंद्र प्रसाद से माफ़ी भी माँगी.
रिटायरमेंट के बाद राजेंद्र प्रसाद ने दिल्ली की जगह पटना में रहने का फ़ैसला किया.
28 फ़रवरी, 1963 को राजेंद्र प्रसाद का पटना में निधन हुआ. उस समय वो गंगा किनारे कांग्रेस के पुराने प्रदेश मुख्यालय सदाक़त आश्रम में रह रहे थे.
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