अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बंद होने के बाद क्या होगा?

कुछ ऐसा दिखता है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन.

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इमेज कैप्शन, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन 400 किलोमीटर की रफ़्तार से आसमान से टूट कर बिखरते हुए प्रशांत महासागर की गहराई में डूब जाएगा.

विज्ञान की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की एक सबसे बड़ी उपलब्धि, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी आईएसएस चंद सालों में अपने आख़िरी पड़ाव पर पहुंच जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन 400 किलोमीटर की रफ़्तार से आसमान से टूट कर बिखरते हुए प्रशांत महासागर की गहराई में डूब जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को 1998 में शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में अंतरिक्ष में भेजा गया था. इसे विश्व में कूटनीति और आपसी सहयोग की एक बड़ी मिसाल के तौर पर देखा जाता रहा है.

इसके अपने जीवन के अंत तक पहुंचने के साथ एक युग का अंत भी हो जाएगा.

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अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की मदद से चिकित्सा जगत में कई बीमारियों के इलाज खोजना और जलवायु परिवर्तन की निगरानी भी संभव हो पायी है.

लगभग तीस सालों से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की परिक्रमा करता रहा है. अब इसका ढांचा कमज़ोर पड़ने लगा है और 6 साल के भीतर इसे बंद कर दिया जाएगा.

इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यह जानने की कोशिश करेंगे कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बंद होने के बाद क्या होगा?

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वर्चस्व की लड़ाई

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

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इमेज कैप्शन, 1998 में रूस ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल बना कर कज़ाख़स्तान से अंतरिक्ष में लॉन्च किया था.

वॉशिंगटन डीसी में स्मिथ सोनियन इंस्टीट्यूशन के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूज़ियम की क्यूरेटर जेनिफ़र लेवासर बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन लगातार 17500 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से पृथ्वी का चक्कर लगाता रहता है और लगभग 93 मिनट में यह पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है.

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उन्होंने कहा, “यह काफ़ी चमकदार है. अगर सूर्य का एंगल सही हो, तो इसे देखा भी जा सकता है. यह लगातार एक रफ़्तार से चक्कर लगाता है.”

1942 में जर्मन इंजीनियरों ने अंतरिक्ष तक पहुंचने की क्षमता रखने वाली मिसाइल बनायी थी.

जेनिफ़र लेवासर बताती हैं कि वी- 2 रॉकेट दूर तक पहुंच सकते थे और यहीं से मनुष्य को पृथ्वी की कक्षा तक ले जाने के प्रयासों की शुरुआत हुई.

दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के बाद शीत युद्ध का दौर शुरू हुआ और इस दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की संभावना खटाई में पड़ गयी.

दरअसल, उस समय रूस और अमेरिका दोनों के बीच चांद पर मनुष्य को भेज कर अपनी टेक्नोलॉजी का वर्चस्व साबित करने की होड़ लग गयी, जिसमें 1959 में अमेरिका की जीत हुई.

1970 के दशक में दोनों देशों ने अपने अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की कक्षा में भेजे, लेकिन 1979 में अमेरिका के स्काईलैब को बंद किए जाने के बाद अमेरिका की महत्वाकांक्षा बढ़ गयी और 1984 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को एक नया अंतरिक्ष प्रोजेक्ट शुरू करने के निर्देश दिए.

राष्ट्रपति रीगन ने नासा को अन्य देशों के साथ मिल कर दस साल के भीतर अंतरिक्ष में ऐसा अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के निर्देश दिए, जहां रह कर मनुष्य शोधकार्य कर सकें.

उन्होंने कहा यह दुनिया में शांति और समृद्धि लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

फिर 1989 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और रूस भी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के काम में अमेरिका के साथ शामिल हो गया.

जेनिफ़र लेवासर का मानना है कि उस समय अगर अमेरिका ने रूस को इस प्रोजेक्ट में शामिल नहीं किया होता तो संभवत: रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम जारी नहीं रह पाता.

1994 में जो तकनीकी सहयोग शुरू हुआ, उसी ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को बनाने के प्रोजेक्ट को सफल बनाया.

इस अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को बनाने में अमेरिका और रूस के अलावा, यूरोप, कनाडा और जापान ने भी बड़ा सहयोग दिया.

जेनिफ़र लेवासर कहती हैं कि इस प्रकार का आपसी सहयोग पहले कभी नहीं हुआ था. नब्बे के दशक के मध्य में इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा बनना शुरू हो गयी.

यह तय हुआ कि इसमें अमेरिका और रूस की ऑरबिटल सिस्टम होंगी और साथ ही उसमें जापानी और यूरोपीय मॉड्यूल को भी जोड़ा जाएगा.

जेनिफ़र लेवासर ने बताया कि इसका मुख्य ढांचा एक नौका के समान है, जिसमें ऐसे दूसरे मोड्यूल जोड़ने की व्यवस्था की गयी, जहां मनुष्य रह सकें.

साथ ही बिजली के लिए सोलर पेनल लगाने की व्यवस्था की गयी. मगर, इसे अंतरिक्ष में भेजना बहुत महंगा काम था. इसे ज़मीन से संचालित करने के लिए विशाल ढांचागत व्यवस्थाओं की ज़रूरत थी.

1998 में रूस ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल बना कर कज़ाकस्तान से अंतरिक्ष में लॉन्च किया.

उसी साल 4 दिसंबर को अमेरिका ने अपना मॉड्यूल भी लॉन्च कर दिया. इसके बाद इसमें दूसरे मॉड्यूल जोड़े गए.

जेनिफ़र लेवासर बताती हैं कि इसे अंतिम रूप देने की प्रक्रिया 2011 तक चलती रही है और इसका साइज़ फ़ुटबाल के एक मैदान जितना बड़ा हो गया.

मगर, इस विशाल ढांचे में दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिकों और संसाधनों के बीच सहयोग और समन्वय कैसे होता है?

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अंतरिक्ष स्टेशन तक सैर

नासा.

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इमेज कैप्शन, 1984 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को एक नया अंतरिक्ष प्रोजेक्ट शुरू करने के निर्देश दिए थे.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर इस प्रोजेक्ट से जुड़े देशों यानि अमेरिका, रूस, कनाडा, जापान और यूरोपीय देशों के कम से कम सात वैज्ञानिक हमेशा तैनात रहते हैं.

उनका अभियान आम तौर पर छ: महीने का होता है. इस बारे में हमने बात की मार्क मैक्काकग्रीन से, जो जर्मनी के हाइडेलबर्ग शहर में स्थित मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट में खगोल विज्ञानी हैं.

उन्होंने कहा कि आइएसएस पर ज़्यादातर लोग जीव विज्ञानी, खगोल विज्ञानी या समुद्र विज्ञानी होते हैं.

पिछले बीस सालों में इन लोगों का चयन नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, जापानी अंतरिक्ष एजेंसी, रूसी अंतरिक्षि एजेंसी या दूसरी स्पेस एजेंसियों द्वारा किया जाता रहा है.

लेकिन, अब निजी पर्यटक भी अंतरिक्ष स्टेशन पर जा सकते हैं.

आम तौर पर अंतरिक्ष यात्री स्पेस एक्स के क्रू ड्रैगन या सोयूज़ कैप्सूल में बैठ कर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर जाते हैं.

मार्क मैक्काकग्रीन ने बताया कि इस यात्रा में बारह घंटे से लेकर चंद दिन भी लग सकते हैं.

यह सब पृथ्वी से स्पेस शटल के लॉन्च होने और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के साथ उसकी डॉकिंग या जुड़ने के लिए कितना समय लगता है, इस पर निर्भर है.

मगर, इस छोटे से अंतरिक्ष यान में बैठे अंतरिक्ष यात्रियों को पूरा समय अपनी सीट पर बैठे रहना पड़ता है, जो कि मुश्किल साबित हो सकता है.

लेकिन, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर छ: महीने तक एक तंग जगह में रहना भी कोई आसान बात नहीं है.

और दूसरे सहयोगियों के साथ मिलकर शांतिपूर्वक तरीके से काम करना भी अहम होता है.

मार्क मैक्काकग्रीन का कहना है, “जब अंतरिक्ष एजेंसियां वहां भेजने के लिए किसी का चयन करती हैं तो यह ज़रूर देखती हैं कि वह व्यक्ति शांत स्वभाव का हो और छोटी-मोटी बात से विचलित ना होता हो.”

“दूसरी बात यह भी है कि आईएसएस पर नहाने की कोई सुविधा नहीं है, इसलिए केवल गीले कपड़े से बदन पोंछ कर कर काम चलाना पड़ता है.”

“छ: महीने या कभी कभी, एक साल तक बिना नहाए रहना मुश्किल होता है. इसलिए, एक दूसरे के साथ मिलजुल कर काम करने की क्षमता बहुत ज़रूरी होती है.”

“आइएसएस पृथ्वी के नज़दीक है, इसलिए ताज़ा खाना अंतरिक्ष यात्रियों तक पहुंचता रहता है. यानि उन्हें सिर्फ़ पैकेज्ड फ़ूड पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.”

अंतरिक्ष यात्रियों को खाना खाते समय इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि बिस्कुट या ऐसी कोई चीज़ ना खाएं, जिसके टुक़ड़े गिर कर वहां हर जगह तैरने लगें.

इसी प्रकार सोने के लिए वो स्लीपींग बैग का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें दीवार के साथ बांध दिया जाता है, ताकि वो वहां तैरने ना लगें.

मगर, क्या लंबे अरसे तक अंतरिक्ष में रहने का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर भी पड़ता है?

मार्क मैक्काकग्रीन ने कहा, “असर तो निश्चित ही पड़ता है. मिसाल के तौर पर मांसपेशियों को क्षति होती है, हड्डियों का घनत्व कम होने लगता है.

“शरीर में द्रव्य का प्रवाह भी प्रभावित होता है, जिससे शरीर में दबाव बढ़ सकता है और अंतरिक्ष में मनुष्यों की दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है.”

मार्क मैक्काकग्रीन कहते हैं कि इनमें से कई समस्याएं दोबारा धरती पर लौटने के बाद ख़त्म तो हो जाती हैं, लेकिन इसमें छ: महीने तक का समय लग सकता है.

मगर, अंतरिक्ष में रेडिएशन से अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर क्या दूरगामी परिणाम होंगे? इसकी जांच अभी चल रही है.

चांद पर लंबे अरसे तक रहने या मंगल ग्रह की यात्रा, जिसमें काफ़ी अधिक समय लगेगा, तो उसका अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, यह जानने के लिए कई प्रयोग चल रहे हैं.

लेकिन, पृथ्वी पर इस अंतरिक्ष प्रोजेक्ट में भाग लेने वाले देशों के बीच राजनीतिक संघर्ष चल रहा है. भविष्य में अंतरिक्ष की पड़ताल पर इसका क्या असर पड़ेगा?

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अंतरिक्ष कूटनीति

डोनाल्ड ट्रंप के साथ एलन मस्क.

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इमेज कैप्शन, रूस के अतंरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन प्रोजेक्ट से बाहर होने के मद्देनज़र अमेरिका ने समस्या के समाधान के लिए एलन मस्क की स्पेस एक्स कंपनी के साथ सहयोग शुरू कर दिया है.

1998 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन प्रोजेक्ट की शुरुआत के समय जो अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ था, उसके तहत इसमें शामिल सभी देशों ने इसके रखरखाव, मरम्मत और वहां अंतरिक्ष यात्रियों को लाने ले जाने को लेकर सहयोग के लिए प्रतिबद्धता दोहरायी थी.

अमेरिका की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र की प्रोफ़ेसर माया क्रॉस कहती हैं कि इस समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद मॉड्यूलों पर, उसके भीतर के संसाधनों पर, उन्हें वहां ले जाने वाले देशों का पूरा अधिकार है.

उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के अमेरिकी मॉड्यूल पर अमेरिका का कानून लागू होता है और रूसी मॉड्यूल पर रूसी कानून लागू होता है. इसी के आधार पर आईएसएस पर समस्याओं का समाधान किया जाता है.”

मगर, फ़रवरी 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद उसके अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ संबंध ख़राब हो गए और एक समस्या खड़ी हो गयी.

माया क्रॉस ने कहा कि हमले के फ़ौरन बाद रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से अपने आपको अलग करके, वहां अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को उनके हाल पर छोड़ने की धमकी दी थी.

रूस ने अपने मॉड्यूल को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से अलग करने की बात भी की थी. उस समय आईएसएस के भविष्य को लेकर चिंता पैदा हो गयी थी. हालांकि, अंतत: रूस ने ऐसा नहीं किया.

माया क्रॉस कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद रूसी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने सहयोग जारी रखा और वहां काम पहले की तरह चलता रहा, क्योंकि उन वैज्ञानिकों के पास धरती से आदेश मिलने के बावजूद आईएसएस पर मौजूद संसाधनों और स्थिति को संभालने के पर्याप्त अधिकार थे.

यानी यहां कूटनीति दो अलग-अलग स्तर पर काम कर रही थी. इस प्रोजेक्ट से संबंधित रूस का कॉन्ट्रैक्ट 2028 में समाप्त हो जाएगा.

यानि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को अंतरिक्ष से हटाने से पहले वो कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म हो जाएगा.

अब सवाल उठता है कि उसके बाद क्या होगा? अमेरिका, चीन, रूस और भारत जैसे चंद देश अंतरिक्ष में अपनी जगह बनाने की होड़ में हैं.

माया क्रॉस कहती हैं, “कोई नहीं चाहेगा कि अंतरिक्ष में शोध के लिए दो अलग गुट बने, एक अमेरिकी नेतृत्व वाला गुट और दूसरा चीन के नेतृत्व वाला गुट, क्योंकि इससे संघर्ष बढ़ेगा और दशकों से जिस आपसी सहयोग के आधार पर यह अंतरिक्ष शोध कार्यक्रम चल रहे थे, उसकी मूल भावना ही नष्ट हो जाएगी.”

“जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए इस अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बड़ी आवश्यकता है.”

रूस के अतंरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन प्रोजेक्ट से बाहर होने के मद्देनज़र अमेरिका ने समस्या के समाधान के लिए निजी कंपनियों का रुख़ किया है और एलन मस्क की स्पेस एक्स कंपनी के साथ सहयोग शुरू कर दिया है.

स्पेस एक्स पिछले दस सालों से अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन ला ले जा रही है, मगर उसकी मंशा पर्यटकों को अंतरिक्ष में ले जाने की भी है.

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आईएसएस को पृथ्वी के वायुमंडल में लाना मुश्किल

स्पेस एक्स कंपनी

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इमेज कैप्शन, अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस स्टेशन पर लाने-ले जाने के लिए स्पेस एक्स कंपनी के शटल मॉड्यूल का इस्तेमाल पहले से शुरू हो चुका है.

अलाबामा में स्कूल ऑफ एडवांस्ड एयर एंड स्पेस स्टडीज़ में सुरक्षा और रणनीति संबंधी विषय की प्रोफ़ेसर वेंडी व्हिटमन कॉब कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का ढांचा 30 साल से अंतरिक्ष में रेडिएशन और कठोर स्थितियों की मार झेलते-झेलते कमज़ोर पड़ता जा रहा है.

अब अगला सवाल है कि इसे बंद कर के अंतरिक्ष से पृथ्वी पर कैसे लाया जाए?

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को चलाने वाले प्रोपल्शन इंजिन का हिस्सा रूसी है और रूस के सहयोग के बिना आईएसएस को पृथ्वी के वायुमंडल में लाना मुश्किल है.

उन्होंने कहा, “अगर रूस आईएसएस को अंतरिक्ष से हटाने के लिए अपने इंजिन का इस्तेमाल करने से इंकार कर देता है, तो अमेरिका को दूसरा विकल्प खोजना होगा.”

“इसके लिए उसने स्पेस एक्स कंपनी से एक प्रोपल्शन मॉड्यूल तैयार करने के लिए बात शुरू की है जो आइएसएस से जुड़ कर उसे पृथ्वी के वायुमंडल में लाएगा.”

दरअसल, यह सरकारों की अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी कंपनियों के साथ भागीदारी की शुरुआत मात्र है.

वेंडी व्हिटमन कॉब की राय है कि आइएसएस को डिकमिशन या बंद करने के बाद, सरकार किसी नए अंतरिक्ष स्टेशन को बनाने के लिए निजी कंपनियों के साथ मिल कर काम कर सकती हैं.

अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस स्टेशन पर लाने-ले जाने के लिए स्पेस एक्स कंपनी के शटल मॉड्यूल का इस्तेमाल पहले से शुरू हो चुका है.

उन्होंने कहा, “आगे निजी कंपनियों के सहयोग से अंतरिक्ष प्रोजेक्ट का व्यावसायिकरण शुरू हो सकता है.”

दिसंबर 2021 में नासा ने तीन अमेरिकी कंपनियों को वैकल्पिक अंतरिक्ष स्टेशन का डिज़ाइन तैयार करने के लिए ठेका दे दिया था.

इसमें से एक डिज़ाइन ‘ऑरिबिटल रीफ़’ को तैयार करने में अमेज़न कंपनी के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस की भागीदारी है. यहां अंतरिक्ष यात्रियों और पर्यटकों को लाया ले जाया सकेगा.

नासा, विमान निर्माण कंपनी एयरबस द्वारा तैयार किए जा रहे अंतरिक्ष स्टेशन ‘स्टारलैब’ को डिज़ाइन करने में भी मदद कर रहा है.

प्रोफेसर वेंडी कॉब का बयान

चीन की निजी अंतरिक्ष कंपनियां भी इस दिशा में काम कर रही हैं. इन सभी प्रयासों का उद्देश्य केवल नया अंतरिक्ष स्टेशन बनाना नहीं है, बल्कि मनुष्यों को अंतरिक्ष में बसाने के ज़रिए खोजना भी है.

वेंडी व्हिटमन कॉब ने कहा, “इन सबका उद्देश्य मनुष्यों के अस्तित्व का संरक्षण है. एलन मस्क और जेफ़ बेज़ोस साइंस फ़िक्शन से प्रेरित हैं.”

“स्पेस एक्स चाहती है कि अगर पृथ्वी पर कोई बड़ी आपदा आजाए तो मनुष्यों को अंतरिक्ष में बसाया जा सके.”

“वहीं, जेफ़ बेज़ोस अंतरिक्ष में विशाल इंडस्टियल पार्क या फैक्ट्रियां लगाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं जिससे पृथ्वी को प्रदूषण के प्रभाव से बचाया जा सकता है.”

“इन दोनों कंपनियों के प्रयास सिर्फ़ मुनाफ़े से नहीं बल्कि मनुष्यों के भविष्य को लेकर एक आदर्शवादी सोच से भी प्रेरित हैं.”

यह महत्वाकांक्षी सोच और योजनाएं हमारे मुख्य प्रश्न का जवाब भी हैं. नये अंतरिक्ष स्टेशनों के निर्माण और अंतरिक्ष यात्रा सस्ती होने से कई संभावनाएं सामने आ सकती हैं.

अंतरिक्ष स्टेशनों का इस्तेमाल वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए होगा, जिससे पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से निपटा जा सकेगा.

साथ ही अंतरिक्ष पर्यटन और भविष्य में अंतरिक्ष में मानव बस्तियां बसाने की तैयारियां भी की जा सकेंगी.

लेकिन, एक बात तो सच है कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को हटाने के साथ ही अंतरिक्ष विज्ञान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक युग समाप्त हो जाएगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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