क्या पृथ्वी का भीतरी हिस्सा विपरीत दिशा में घूमने लगा है?

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

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इमेज कैप्शन, पृथ्वी की आंतरिक संरचना (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, सिराज
    • पदनाम, बीबीसी तमिल

पिछले कुछ सालों में पृथ्वी की सतह और अंतरिक्ष को लेकर कई रिसर्च हुए हैं.

तकनीक के इस आधुनिक युग में चांद और मंगल ग्रह पर इंसानों को बसाने की बातें हो रही हैं लेकिन पृथ्वी के कोर (भीतर के हिस्से) के बारे में कई चीज़ें विज्ञान के अनसुलझे रहस्य बने हुए हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी का केंद्रबिन्दु लगभग 5000 किमी. गहराई में है और आज तक सिर्फ़ 12 किमी. के बारे जानकारी उपलब्ध है.

इस मामले में, कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी और चीनी विज्ञान अकादमी के वैज्ञानिकों की एक टीम ने पाया कि पृथ्वी की सतह की तुलना में पृथ्वी का कोर धीरे-धीरे विपरीत दिशा में घूमता है.

वैज्ञानिकों की टीम का कहना है कि अध्ययन के नतीजों के मुताबिक़, पृथ्वी के कोर के घूमने की गति 2010 से पिछले 14 सालों में कम हो रही है.

लेकिन 5000 किमी. तक गहरे सीधे कोर तक पहुंचे बिना वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे?

पृथ्वी के कोर के विपरीत दिशा में घूमने से पृथ्वी की सतह पर क्या असर पड़ता है?

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पृथ्वी की संरचना और परतें

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की संरचना को तीन अलग-अलग परतों में बांटा है: क्रस्ट, मेंटल (सतह और कोर के बीच चट्टानों की ठोस परत) और कोर.

अब तक इस कोर को लेकर कई धारणाएं बनाई गई हैं.

साथ ही कई काल्पनिक कहानियां भी हैं. कोर पर आधारित साल 1864 में प्रकाशित हुए उपन्यास 'जर्नी टू द सेंटर ऑफ द अर्थ' और उस पर बनी फ़िल्में काफ़ी लोकप्रिय हैं.

इसको आसान तरीके से समझने के लिए, हम पृथ्वी की तुलना अंडे से कर सकते हैं. इस तरह, अंडे का बाहरी आवरण पृथ्वी की सतह या क्रस्ट, अंडे के भीतर मौजूद सफ़ेद तरल पदार्थ पृथ्वी का मेंटल और अंडे की जर्दी (पीला हिस्सा) पृथ्वी का कोर होगा.

पृथ्वी का आंतरिक कोर लोहे और निकल से बना है और आकार में गोल है.

इसका रेडियस 1221 किमी. है. इसका तापमान 5400 डिग्री सेल्सियस है जो कि सूरज (5700 डिग्री सेल्सियस) के तापमान के लगभग बराबर है.

पृथ्वी

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इमेज कैप्शन, कोर पर आधारित साल 1864 में प्रकाशित हुए उपन्यास 'जर्नी टू द सेंटर ऑफ द अर्थ' और उस पर बनी फ़िल्में काफ़ी लोकप्रिय हैं.

अतीत में हुए अध्ययनों से पता चला है कि यह कोर पृथ्वी के बाक़ी हिस्सों से अलग है. यह एक धात्विक तरल पदार्थ के ज़रिए पृथ्वी के भीतर स्वतंत्र रूप से संचालित होता है.

यानी ऐसा कहा जाता है कि यह पृथ्वी के अंदर स्वतंत्र रूप से घूमता है और इस दौरान इसका पृथ्वी के बाक़ी हिस्सों से संबंध नहीं होता है.

लेकिन हाल ही में हुए अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि लगभग 40 सालों में पहली बार, कोर पृथ्वी की सतह के सापेक्ष विपरीत दिशा में घूम रहा है.

इस दौरान कोर पृथ्वी के मेंटल की तुलना में थोड़ी धीमी गति से घूम रहा है.

पृथ्वी की खुदाई के बिना कैसे मिलती है जानकारी

अंतरिक्ष

भूकंप के दौरान उत्पन्न भूकंपीय तरंगों के ज़रिए बिना खुदाई के भी पृथ्वी के कोर के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है.

जब पृथ्वी की सतह पर बड़े भूकंप आते हैं तो उथल-पुथल से उत्पन्न तरंगों की ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक कोर में जाती है और वापस सतह पर आ जाती है.

वैज्ञानिकों की एक टीम ने इन तरंगों से निकली ऊर्जा के रास्तों की जांच की जो पृथ्वी में गहराई तक जाती है और सतह पर लौट आती है.

इसके लिए वैज्ञानिकों ने साल 1991 से 2023 के बीच दक्षिण सैंडविच द्वीप समूह के आसपास दर्ज़ हुए 121 भूकंपों से आंकड़े जुटाए और विश्लेषण किया.

इतना ही नहीं, उन्होंने अध्ययन के लिए 1971 से 1974 के बीच सोवियत परमाणु परीक्षणों के डाटा के साथ-साथ फ्रांसीसी और अमेरिकी परमाणु परीक्षणों के डेटा का भी उपयोग किया.

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समाप्त

विपरीत के कोर से जुड़े सवालों पर बीबीसी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर-मोहाली) के प्रोफ़ेसर टीवी वेंकटेश्वरन से बातचीत की.

उन्होंने कहा, 'यह कहना वास्तव में संभव नहीं है कि पृथ्वी का कोर विपरीत दिशा में घूमता है. एक सरल उदाहरण के ज़रिए इसे समझाया जा सकता है.'

'आप एक कार में 100 किमी./घंटा की स्पीड से गाड़ी चला रहे हैं और आपका दोस्त भी अपनी कार में 100 किमी./घंटा की रफ़्तार से यात्रा कर रहा है. दोनों एक साथ यात्रा कर रहे हैं. अब अचानक वह दोस्त 20 किमी. की स्पीड कम करके 80 किमी./घंटा तक आ जाता है.'

'अब आपकी तरफ़ से देखा जाए तो वह दोस्त सड़क पर पीछे की ओर जाते हुए लगेगा क्योंकि आप अभी 100 किमी./घंटा की स्पीड से चल रहे हैं. इसी तरह, कोर पृथ्वी की कक्षीय गति की तुलना में धीमा हो रहा है, और इसे विपरीत दिशा में घूमना माना जाता है.'

प्रोफ़ेसर टीवी वेंकटेश्वरन का कहना है कि इस अध्ययन के नतीजे भी काल्पनिक हैं.

'हम अभी भी पृथ्वी के कोर को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं. शोध अभी भी जारी है. यहां तक ​​कि कोर के आकार का भी डेटा से अनुमान लगाया जाता है. इसका कारण यह है कि हम 5000 किमी की गहराई तक नहीं पहुंच सकते हैं. भूकंपीय डेटा के ज़रिए वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कोर की घूमने की गति कम हो गई है, जो भविष्य में बदल सकती है.'

क्या नतीजे सामने आए हैं?

पृथ्वी

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प्रोफेसर डी.वी.वेंकटेश्वरन का कहना है कि पृथ्वी के कोर की घूर्णन गति में कमी के कारण मैग्नेटोस्फीयर में बदलाव आएगा. मैग्नेटोस्फीयर किसी ग्रह के चारों ओर का क्षेत्र होता है, जिस पर ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र का प्रभुत्व होता है.

प्रोफ़ेसर वेंकटेश्वरन कहते हैं, 'कोर लोहे और निकल जैसी धातुओं से बना है. इसलिए जब इसका घूर्णन प्रभावित होता है, तो यह पृथ्वी की सतह में परिवर्तन का कारण बनता है.'

'इन बदलावों में मैग्नेटोस्फीयर एक महत्वपूर्ण कारक है. जब पृथ्वी ब्रह्मांड में अपनी कक्षा में घूम रही है, तो पृथ्वी के अंदर धातुओं से बनी इसकी कोर भी घूम रही है. इन दोनों गतियों के कारण एक चुंबकीय बल उत्पन्न होता है, यह पृथ्वी के चारों ओर निर्मित मैग्नेटोस्फीयर है.'

इस मैग्नेटोस्फीयर की रेडिएशन पृथ्वी को सूर्य से बचाने के लिए एक कवच के रूप में कार्य करती है. लेकिन साथ ही, यह मैग्नेटोस्फीयर पृथ्वी की कक्षा के समय में बदलाव का कारण भी बन सकता है. इसका मतलब है कि मैग्नेटोस्फीयर हमारे दिनों की लंबाई निर्धारित करने में भी भूमिका निभाता है.

वेंकटेश्वरन बताते हैं, 'लेकिन इसका प्रभाव बहुत ज़्यादा नहीं है. यह एक दिन के दौरान एक माइक्रोसेकेंड तक परिवर्तन का कारण बन सकता है. यह हमारे पास मौजूद डेटा पर आधारित है.''

प्रोफ़ेसर वेंकटेश्वरन का कहना है कि शायद परिवर्तन के लिए कोर की घूमने की स्पीड ज़्यादा ज़िम्मेदार है और हमें भविष्य में और अधिक रिसर्च करने की ज़रूरत है.

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