चांद पर बस्ती बसाने से इंसानों को क्या होगा फ़ायदा? – दुनिया जहान

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अगले कुछ सालों में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा क़रीब 50 साल बाद दोबारा मनुष्य को चांद पर भेजने की योजना बना रही है.
अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग और बज़ ऑल्ड्रिन 1969 में चांद पर क़दम रखने वाले पहले मनुष्य थे.
इसके बाद अपोलो मिशन ने कुल 12 लोगों को चांद पर उतारने में सफलता प्राप्त की. उसके बाद रूस, चीन, भारत और जापान ने चांद की सतह पर अपने अंतरिक्ष यान, लैंडर या रोवर्स को उतारने में सफलता प्राप्त की है. मगर इन अभियानों में मनुष्यों को चांद पर नहीं भेजा गया था.
अब अमेरिका अपने आर्टेमिस प्रोग्राम के तहत मनुष्यों की एक टीम को चांद पर भेजने की योजना बना रहा है.
ऐसी ही योजना चीन और भारत भी बना रहे हैं. इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि अगली बार कौन सबसे पहले चांद पर क़दम रखने में कामयाब होगा?
चंद्रमा की यात्रा पर

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अंतरिक्ष में जाने के लिए सबसे आवश्यक है रॉकेट टेक्नोलॉजी. शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ और अमेरिका के बीच इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से मनुष्य को अंतरिक्ष में सबसे पहले ले जाने के लिए स्पर्धा शुरू हो गयी. साल 1961 में सोवियत संघ ने यूरी गागरिन को अंतरिक्ष भेजने में कामयाबी हासिल की.
'द इकोनॉमिस्ट' के वरिष्ठ संपादक और 'दी मून ए हिस्ट्री फॉर दी फ़्यूचर' किताब के लेखक ऑलिवर मोर्टन की राय है कि मनुष्य को चांद या अंतरिक्ष में ले जाना एक ज़बरदस्त काम है. इससे दुनिया में उस देश की साख़ और ताकत बढ़ जाती है. ऐसे में सोवियत संघ की कामयाबी के बाद अमेरिका पर दबाव बढ़ गया था.
वो कहते हैं, ''उसके बाद अमेरिका कुछ ऐसा करना चाहता था जो सोवियत संघ की उपलब्धि से भी बेहतर हो. इससे बड़ी उपलब्धि इंसान को चांद पर उतारना हो सकती थी. इसके लिए अधिक शक्तिशाली रॉकेट की ज़रूरत थी. चांद पर क़दम रख कर वो पूरी दुनिया पर अपनी छाप छोड़ना चाहता था.''
1969 में अमेरिका ने अपोलो 11 अंतरिक्षयान से दो अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतारने में कामयाबी हासिल कर ली. उसके बाद वह दूसरे अपोलो अभियानों के ज़रिए दस और लोगों को चांद पर भेजने में सफल रहा. यह ना कि विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि थी बल्कि अमेरिका के लिए एक राजनीतिक उपलब्धि भी थी. दुनिया में दो मनुष्यों की चांद की सतह पर चलने की तस्वीरें फैल गईं. लेकिन लोगों को सबसे अधिक आकर्षित किया एक दूसरी तस्वीर ने.
ऑलिवर मोर्टन ने कहा कि, ''निश्चित ही चांद पर नील आर्मस्ट्रांग और बज़ ऑल्ड्रिन की तस्वीरें दुनियाभर में छा गईं. लेकिन जिस तस्वीर ने आम लोगों के दिलो दिमाग़ में घर कर लिया वह थी चांद से दिखाई देने वाली पृथ्वी के उदय की तस्वीर. यह एक ज़िंदा ग्रह की चमकदार तस्वीर थी जिसके पोस्टर लोगों ने अपने घरों में लगा लिए.''
सोवियत संघ कभी भी मनुष्य को चांद पर नहीं भेज पाया. मगर 1970 के दशक में मनुष्यों की अंतरिक्ष यात्रा का महत्व कम क्यों हो गया?
ऑलिवर मोर्टन का मानना है कि अमेरिका इसमें पहले ही जीत हासिल कर चुका था. एक-दो बार वहां मनुष्यों को भेज कर अध्ययन भी कर चुका था इसलिए उसके लिए इसका महत्व कम हो गया और उसने यह मिशन बंद कर दिए.
लेकिन अब लगता है कि अंतरिक्षयात्रियों के लिए दोबारा अपनी सीटबेल्ट बांधने का समय आ गया है. मगर इस बार अमेरिका के लिए अन्य देशों से पहले मनुष्य को चांद पर भेजने की रेस संभवत: कड़ी हो गई है क्योंकि इस बार दूसरे प्रतिस्पर्धियों के साथ कांटे का मुकाबला हो सकता है.
चांद तक की दौड़

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पिछले कई सालों से अमेरिका और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. मगर अब यह दोनों अपनी प्रतिद्वंदिता को धरती से आगे अंतरिक्ष में ले जा रहे हैं.
टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों की वेबसाइट आर्स टेक्निका के अंतरिक्ष मामलों के वरिष्ठ संपादक एरिक बर्गर बताते हैं कि अमेरिका और चीन आने वाले पांच दस सालों में मनुष्यों के मिशन को चांद पर भेजने की तैयारी कर रहे हैं जिसके लिए दोनों ने अंतरराष्ट्रीय भागीदारों से सहयोग शुरू कर दिया है और इसका सीधा संबंध राजनीति से है.
''चांद इसलिए एक व्याव्हारिक लक्ष्य है क्योंकि उसकी सतह पर गुरुत्वाकर्षण कम है. वह पृथ्वी के नज़दीक है. वहां पहुंचने में तीन दिन लगते हैं जबकि मंगल ग्रह तक पहुंचने में छह से आठ महीने लगते हैं. तो ज़ाहिर है कि चांद ही अगला लक्ष्य होगा.''
चांद पर पहुचने की इस रेस पर बात करने से पहले इसमें शामिल भारी तकनीकी मुश्किलों के बारे में बात करना ज़रूरी है. सबसे बड़ी चुनौती है रॉकेट को अंतरिक्ष में ले जाना, अंतरिक्षयात्रियों को रेडिएशन से बचाना और चांद की सतह पर सॉफ़्ट लैंडिंग कर पाना. एरिक कहते हैं कि इससे भी बड़ी मुश्किल है उस रॉकेट को पृथ्वी पर वापस लाने के लिए चांद से उसे लांच करना.
''हम जब धरती से रॉकेट का प्रक्षेपण होते हुए देखते हैं तो काउंटडाउन होता है फिर रॉकेट के नीचे लिक्विड ईंधन की आग निकलती है और अगर किसी ख़ामी का पता चले तो मिशन को रोक दिया जाता है. चांद पर सबकुछ स्वचालित होना पड़ेगा. साथ ही जब रॉकेट पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करता है तब उसकी गति कहीं अधिक होती है. उससे पैदा होने वाली गर्मी से रॉकेट की सुरक्षा के लिए अधिक मज़बूत हीट शील्ड की ज़रूरत होती है.''
इन मुश्किलों को देखते हुए कई अंतरिक्षयात्रियों की जान और जनता के अरबों डॉलर को दोबारा दांव पर लगाने की क्या ज़रूरत है? शायद इसलिए क्योंकि अब इस रेस का स्वरूप बदल गया है. अब बात यह नहीं है कि कौन सबसे पहले मनुष्य को चांद पर ले जा सकता है बल्कि यह है कि कौन सबसे पहले ऐसी टेक्नोलॉजी बना सकता है जिससे मनुष्य चांद पर रह भी सके और उसका फ़ायदा उठा सके. यानि यह लड़ाई इस बात की है कि कौन सबसे पहले चांद पर इंसानों की बस्ती बसाएगा.
एरिक बर्गर कहते हैं कि सबसे अधिक रुचि चांद के दक्षिण ध्रुव में है क्योंकि उस क्षेत्र के गढ्ढे हमेशा अंधेरे में रहते हैं. वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि वहां बर्फ़ हो सकती है. यह काफ़ी महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है.
शोधकर्ता इस सैकड़ों किलोमीटर क्षेत्रफल के इलाके में शोध केंद्र स्थापित करना चाहते हैं. यह एक छोटा इलाका है इसलिए इस पर नियंत्रण को लेकर विवाद हो सकता है? सवाल है कि इसका तकनीकी या राजनीतिक फ़ायदा क्या है? एरिक बर्गर की राय है कि यह लोगों के दिलोदिमाग़ पर छाप छोड़ने की होड़ है जिसमें चीन अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी है.
एरिक बर्गर के अनुसार पिछले बीस सालों में चीन ने इस दिशा में बहुत तरक्की की है. उसने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसा एक छोटा मॉड्यूल तैयार कर लिया है. चीन ने मंगल गृह पर अपने मिशन के दौरान केवल मंगल गृह की कक्षा की परिक्रमा ही नहीं की बल्कि उसकी सतह पर उतरने में भी सफलता प्राप्त की है जो कि एक बड़ी उपलब्धि है.
चीन 2030 तक चांद पर अपना बेस यानि अड्डा बनाना चाहता है. अमेरिका यही काम 2028 तक करना चाहता है मगर उसके इस मिशन में पहले ही देर हो गई है. वहीं अमेरिका इस मिशन की कामयाबी के लिए करिश्माती अरबपति एलन मस्क और उनकी कंपनी 'स्पेस एक्स' पर निर्भर है.
एरिक बर्गर कहते हैं कि स्पेस एक्स द्वारा नासा के लिए बनाए जा रहे स्टारशिप अंतरिक्षयान के बिना यह संभव नहीं होगा. अमेरिका और चीन अंतरिक्ष में खोज अभियान के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं.
चांद पर व्यापार की संभावनाएं

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मनुष्यों को चांद पर उतार कर वहां कुछ समय रुक कर शोध करने के लिए कई किस्म की टेक्नोलॉजी की ज़रूरत पड़ेगी. इसमें कई देशों की रुचि है. अमेरिका ने तीस से अधिक देशों के साथ मिल कर समझौता किया है कि चांद पर अनुसंधान और वहां मौजूद संसाधनों के इस्तेमाल के लिए सरकारों और निजी कंपनियों के लिए क्या नियम और नीतियां होनी चाहिए.
यूके की नॉर्थ उम्ब्रिया यूनिवर्सिटी में अंतरिक्ष संबंधी नीति और नियमों के प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र न्यूमन की राय है, ''दुनियाभर की कंपनियों को आशा है कि अमेरिका और उसका आर्टेमिस प्रोजेक्ट इस क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान करेगा.''
''कई देश और कंपनियां चांद पर विकास करके वहां उपलब्ध संसाधनों का दोहन करना चाहती हैं, इसलिए उन्होंने अमेरिका के साथ समझौता किया है. उसी प्रकार कई अन्य देश और वहां की निजी कंपनियां चीन के साथ इस क्षेत्र में सहयोग कर रही हैं ताकि चांद पर ढांचागत विकास करके पैसे कमाए जा सकें.''
चीन ने दस साल पहले अपने अंतरिक्ष उद्योग को निजी कंपनियों के लिए खोल कर काफ़ी सफलता प्राप्त की. लेकिन इस उद्योग के सबसे प्रमुख व्यक्ति अभी भी एलन मस्क ही हैं जिनकी कंपनी को नासा के 'आर्टेमिस मिशन' के लिए चांद पर उतरने वाले अंतरिक्षयान को बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. क्रिस्टोफ़र न्यूमन का कहना है कि एलन मस्क की महत्वाकांक्षा काफ़ी बड़ी है.
क्रिस्टोफ़र न्यूमन ने कहा, ''एलन मस्क अपने स्पेसशिप प्रोजेक्ट के ज़रिए यह दिखाना चाहते हैं कि वह मानव भविष्य की दिशा तय करने में शामिल हैं. दूसरे ग्रहों पर मनुष्यों की बस्तियां बसाने में एलन मस्क के स्पेसशिप की अहम भूमिका होगी. उनकी महत्वाकांक्षा केवल मुनाफ़ा कमाने तक सीमित नहीं है. यह उससे कहीं बड़ी है.''
निजी उद्योगों को अंतरिक्ष के खोजी अभियानों में शामिल करने से कई सवाल खड़े हो जाते हैं. क्रिस्टोफ़र न्यूमन कहते हैं कि अगर हम दूसरे ग्रहों की यात्रा करना चाहते हैं या वहां इंसानों को बसाना चाहते हैं तो वहां क्या नियम होंगे, अपराधों को कैसे परिभाषित किया जाएगा और क्या सज़ा होगी यह तय करना होगा. महत्वाकांक्षी निजी उद्योगों को उन नियमों के दायरे में रखना चुनौतिपूर्ण हो सकता है. ऐसे में अंतरिक्ष अभियानों में सरकारों के लिए निजी कंपनी पर निर्भरता चिंताजनक साबित हो सकती है.
क्रिस्टोफ़र न्यूमन कहते हैं, ''यही समस्या स्पेस एक्स के साथ है. एलन मस्क इतने शक्तिशाली बन जाएंगे कि उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा. फ़िलहाल हम पृथ्वी पर रहते हैं लेकिन कई लोग दूसरे ग्रहों पर बस्तियां बसाना चाहते हैं ताकि अगर पृथ्वी नष्ट होने की कगार पर आ जाए तो दूसरे ग्रहों पर जाया जा सके. इसके लिए दूसरे ग्रहों पर मानव जीवन का विस्तार करना, बस्तियां बसाना कई लोगों की महत्वाकांक्षा है और एलन मस्क उनमें से एक हैं.''
लेकिन दूसरे ग्रहों पर बस्तियां बसाने से पहले चांद पर मनुष्य को कुछ समय के लिए ठहराने के भी नज़दीकी भविष्य में क्या कुछ फ़ायदे होंगे?
चांद पर पानी है या नहीं?

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एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के थंडरबर्ड स्कूल ऑफ़ ग्लोबल मैनेजमेंट की प्रोफ़ेसर और अंतरिक्ष नीति की विशेषज्ञ नम्रता गोस्वामी कहती हैं कि आर्टेमिस समझौते का लक्ष्य चांद पर आर्टेमिस बेस कैंप बनाना है जिसके ज़रिए चांद पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सके और मंगल गृह पर पहुंचने की क्षमता को बढ़ाया जा सके. हाल में चांद पर लोहा, टाइटेनियम और अन्य काम के तत्वों की मौजूदगी का पता चला है.
''भारत का चंद्रयान 3 मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव से 600 किलोमीटर की दूरी पर उतरा और उसके ज़रिए चांद पर सल्फ़र, एल्यूमिनियम और अन्य तत्वों की मौजूदगी की पुष्टि हुई लेकिन पानी की बर्फ़ की पुष्टि नहीं हो पाई. चांद पर पानी की बर्फ़ का पता लगाने के लिए 2026 में भारत, जापान के साथ मिल कर एक और अभियान चांद पर भेजेगा. चांद पर मनुष्यों की बस्ती के लिए पानी की बर्फ़ ज़रूरी है क्योंकि उससे ऑक्सीजन बनाई जा सकती है.''
इन बातों से संकेत मिलता है कि अंतरिक्ष में आगे खोज के लिए चांद को बेस या अड्डे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.
नम्रता गोस्वामी का मानना है, ''चांद को बेस बना कर वहां से मंगल गृह के लिए अंतरिक्षयान भेजे जा सकते हैं. चीन 2036 तक चांद पर बेस बना लेना चाहता है. भारत ने भी ऐसे ही प्रोजेक्ट की घोषणा की है. अगर इसमें सफलता मिल गई तो चांद के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल कर के वहां से अंतरिक्ष में रॉकेट का प्रक्षेपण किया जा सकता है. पृथ्वी से रॉकेट का प्रक्षेपण काफ़ी महंगा होता है क्योंकि चांद की तुलना में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए काफ़ी ज्यादा ईंधन खर्च होता है. इसीलिए कई देश चांद को एक सामरिक संसाधन की तरह देख रहे हैं.''
लेकिन इसके अलावा क्या कोई ऐसे फ़ायदे भी हैं जो नज़दीकी भविष्य में चांद से लिए जा सकते हैं? मिसाल के तौर पर चांद का कुछ हिस्सा हमेशा सूरज की रौशनी में रहता है और वहां बादल या वायुमंडल नहीं है. यानि चांद की सतह का इस्तेमाल सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिए किया जा सकता है.
नम्रता गोस्वामी कहती हैं, ''चांद पर सौर ऊर्जा का उत्पादन कर के निचली कक्षा में बड़े उपग्रहों के ज़रिए सौर ऊर्जा या सोलर एनर्जी को माइक्रोवेव के ज़रिए पृथ्वी पर भेजा जा सकता है. पृथ्वी पर रात भी होती है मौसम के बदलाव भी होते हैं जिससे यहां सौर ऊर्जा का उत्पादन प्रभावित होता है. अंतरिक्ष में चौबीसों घंटे सोलर एनर्जी बनाई जा सकती है. इसके पीछे यह सोच भी है कि धरती पर जीवाश्म ईंधन कुछ समय बाद ख़त्म हो जाएगा. ऐसे में अंतरिक्ष से स्वच्छ सौर ऊर्जा एक अच्छा विकल्प बन सकती है.''
यह एक आकर्षक विकल्प तो है लेकिन सवाल उठता है कि इन संसाधनों का कौन कितना इस्तेमाल कर पाएगा. 1967 में हुए अंतरिक्ष समझौते के तहत यह सुनिश्चित किया गया था कि कोई भी देश अंतरिक्ष में सार्वभौमत्व का दावा नहीं कर पाएगा. यानी अगर अमेरिका या चीन चांद के डार्क साइड के क्षेत्र में बस्तियां बना भी लेते हैं तो वह यह नहीं कह पाएंगे कि यह उनका इलाका है.
मगर वास्तविकता इससे अलग भी हो सकती है. नम्रता गोस्वामी कहती हैं कि चांद के संसाधनों का समान रूप से इस्तेमाल हो इस बारे में कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है और चिंता का विषय यह है कि जो देश वहां सबसे पहले पहुंचेंगे उन्हें फ़ायदा होगा.
इसी से जुड़ा है हमारा सवाल कि अगली बार कौन सबसे पहले चांद पर कदम रखने में कामयाब होगा? अब चांद पर पहुंचना केवल वैज्ञानिक उपलब्धि के श्रेय की बात नहीं है, बल्कि यह चांद से सौर ऊर्जा प्राप्त करने और वहां बेस बना कर दूसरे ग्रहों की ओर खोजी मिशन भेजने के अवसर प्रदान कर सकता है.
वर्तमान स्थिति को देखते हुए लगता है अमेरिका 2028 में दोबारा चांद पर कदम रखेगा. उसके दो साल बाद चीन और उसके दस साल बाद भारत चांद पर कदम रखेगा.
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