वेनेज़ुएला से कच्चा तेल ख़रीदने के बारे में सोच रहा है भारत?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"भारत दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला से कच्चा तेल ख़रीदना चाहता है बशर्ते वह सस्ता उपलब्ध हो."
भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में ये बात कही थी.
साथ ही उन्होंने कहा था कि भारत की रिफाइनरियां अतीत में वेनेज़ुएला के तेल का इस्तेमाल करती रही हैं और अगर वेनेज़ुएला का तेल बाज़ार में आता है तो वैश्विक तेल की कीमतों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है और अपनी ज़रूरत का 80 फ़ीसदी से ज़्यादा तेल विदेशों से ख़रीदता है.
इसी निर्भरता को घटाने के लिए भारत लगातार अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है.
पुरी के मुताबिक़ भारत वर्तमान में 39 देशों से कच्चा तेल ख़रीद रहा है.

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वेनेज़ुएला की तेल बाज़ार में वापसी
साल 2019 में अमेरिका ने निकोलस मादुरो के 2018 के चुनावों में दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनकी सरकार को दंडित करने के मक़सद से वेनेज़ुएला पर सख़्त प्रतिबंध लगाए थे.
अमेरिका और कई पश्चिमी सरकारों ने मादुरो के दोबारा चुने जाने को एक दिखावा बताकर ख़ारिज कर दिया था.
अमेरिकी प्रतिबंधों के वजह से वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए को तेल निर्यात करने से रोक दिया गया था.
कुछ हफ़्ते पहले अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल व्यापार पर प्रतिबंधों में तब ढील दी जब वेनेज़ुएला में साल 2024 के चुनाव के लिए सरकार और विपक्षी दलों के बीच समझौता हो गया जिसके तहत ये फ़ैसला लिया गया कि ये चुनाव अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगरानी में होंगे.
इन पर्यवेक्षकों में यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी शामिल होंगे.
वेनेजुएला के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिबंधों के हटने से वेनेज़ुएला को अपने कच्चे तेल और गैस को बनाने, बेचने और निर्यात करने के लिए छह महीने की मोहलत मिली है.
इस अवधि में वो अपने उत्पाद जितने चाहे उतने ग्राहकों को बेच सकता है या जितनी चाहे उतनी जगह भेज सकता है.

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भू-राजनीतिक तनाव का तेल सप्लाई पर असर
कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है वैश्विक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और दूसरी तेल उत्पादक क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव.
अभी से चिंताएं जताई जा रही हैं कि इसराइल और हमास के बीच चल रहे संघर्ष की वजह से मध्य-पूर्व से आने वाले तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है.
ऐसी ही चुनौतियों से निपटने के लिए भारत आयातित तेल पर अपनी निर्भरता को संतुलित करने के लिए अपने ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने की कोशिशें कर रहा है.
हालांकि ये भी स्पष्ट है कि निकट भविष्य में कच्चे तेल का आयात भारत की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा.
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा कि "भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण आज ये चिंता है कि इससे सप्लाई चेन्स प्रभावित हो सकती हैं."
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि "ये सुनिश्चित किया जाएगा कि स्थिति ख़राब न हो."

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पर वेनेज़ुएला क्यों?
नरेंद्र तनेजा ऊर्जा नीति और भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों के जानकार हैं.
उनके मुताबिक़ ये कोई हैरानी की बात नहीं है कि भारत वेनेज़ुएला से कच्चा तेल ख़रीदने की सोच रहा है.
वे कहते हैं, "अतीत में वेनेज़ुएला भारत का बहुत बड़ा तेल सप्लायर रहा है. जब वेनेज़ुएला में तेल का भरपूर उत्पादन होता था तो भारतीय कम्पनियां वहां से भारी मात्रा में तेल ख़रीदती थीं. बाद में वहां उत्पादन ही कम हो गया और राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से उनके निर्यात न के बराबर रह गए. साथ ही अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वहां से तेल आना लगभग बंद हो गया."
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "अब वेनेज़ुएला फिर एक बार अपने तेल उद्योग को खोल रहा है. अमेरिकी प्रतिबन्ध काफ़ी हद तक नरम पड़ गए हैं और वो ख़ुद भी वेनेज़ुएला से बहुत तेल ख़रीद रहा है. तो वेनेज़ुएला का तेल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आ रहा है. और अगर वो उसे अच्छे दाम पर देता है तो भारत तेल ज़रूर लेगा."
वेनेज़ुएला के तेल भंडार दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक हैं.
तनेजा के मुताबिक़, वेनेज़ुएला का तेल थोड़ा भारी होता है और भारत में इस तरह के तेल को साफ़ और प्रोसेस करने के लिए सक्षम रिफाइनरियां है.

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कच्चे तेल पर भारत की रणनीति
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा था कि भारत कच्चे तेल की उपलब्धता पर पैनी नज़र रख रहा है.
साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है और जब बाज़ार में ज़्यादा ऊर्जा उपलब्ध होती है तो ये हमेशा अच्छी ख़बर होती है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि भारत की नीति बहुत स्पष्ट है- कच्चे तेल की आपूर्ति के विविध स्रोत हों और यह अच्छे दाम पर मिले.
वे कहते हैं, "एक तो ये है कि हम जो तेल ख़रीदते हैं उसे किसी एक भौगोलिक क्षेत्र से न ख़रीद कर तमाम उपलब्ध स्रोतों से लिया जाए चाहे वह मध्य-पूर्व, रूस या अमेरिका हो जिससे किसी एक देश या क्षेत्र पर आप निर्भर न रहे. विविध आपूर्ति रखना भारत की रणनीति है."
तनेजा यह भी कहते हैं, "आज जबकि भारत अपनी ज़रूरत का 87 प्रतिशत तेल आयात कर रहा है, तो सोच यही है किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भर न रहें."
वे कहते हैं, "इस मामले की भारत की नीति 'किसी से प्रेम नहीं और किसी से नफ़रत नहीं' की है. भारत वहीं से तेल लेना चाहेगा जहां से यह सस्ता या अच्छी शर्तों पर मिले."
तनेजा कहते हैं, "दूर देशों से कच्चा तेल ख़रीदते वक़्त कई बातों पर ध्यान दिया जाता है. जैसे- कच्चे तेल की क़ीमत, तेल बेचने वाले देश की भारत से भौगोलिक दूरी, जहाज़ से तेल लाने की कीमत और बीमा करने की कीमत, क्रेडिट के लिए कितना समय मिल रहा है और भुगतान की शर्तें क्या हैं."
वे कहते हैं, "इन सब चीज़ों को ध्यान में रखकर देखा जाता है कि अर्थशास्त्र क्या बनता है. अर्थशास्त्र ठीक बैठता है तभी दूर देशों से तेल ख़रीदा जाता है."
मिसाल के तौर पर तनेजा रूस की बात करते हुए कहते हैं, "भारत रूस से भारी मात्रा में तेल इसलिए ख़रीदता है क्योंकि वो सस्ते दाम पर देने के साथ-साथ इसे भारतीय बंदरगाहों तक भी पहुंचा देता है."
'सस्ते और अच्छी शर्तों पर तेल की दरकार'
सरकार का कहना है कि भारत फ़िलहाल 39 देशों से कच्चे तेल का आयत करता है और हर दिन देश में 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है.
इस वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में भारत ने सबसे ज़्यादा कच्चा तेल रूस से ख़रीदा. रूस के बाद इराक़ और सऊदी अरब वो देश हैं जहां से सबसे अधिक कच्चा तेल ख़रीदा गया.
जिन देशों से भारत लगातार कच्चा तेल ख़रीदता रहा है उनमें अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, नाइजीरिया, अंगोला, मेक्सिको और ओमान शामिल हैं.
भारत ने इस साल अप्रैल से सितंबर तक औसतन 1.76 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) रूसी तेल का आयात किया जो कि पिछले वित्त वर्ष के मुक़ाबले दोगुने से भी ज़्यादा था.
जहां अमेरिका के नेतृत्व में बहुत से पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर हमले के बाद से रूस से तेल ख़रीदना बंद कर दिया है, भारत वहां से लगातार कम कीमतों पर कच्चा तेल ख़रीदता रहा है.
जब पश्चिमी देशों ने इस बात पर सवाल उठाए तो भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा था कि "भारतीयों के लिए सर्वोत्तम सौदा सुनिश्चित करना उनका नैतिक कर्तव्य है, वो भारतीय जिनमें से ज़्यादातर ऊंची ऊर्जा कीमतें बर्दाश्त नहीं कर सकते."
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, "सोच ये रहती है कि पचास फ़ीसद तेल ऐसे देशों से लिया जाए जो नज़दीक हों. बाक़ी पचास फ़ीसद ऐसे देशों से लें जो सस्ता देने के साथ उसे अच्छी शर्तों पर भी देते हों."
वे कहते हैं, "सऊदी अरब सस्ता तेल नहीं देता लेकिन भरोसेमंद सप्लायर है तो आप उससे लेते हैं. अबू धाबी भी सस्ता नहीं देता लेकिन भरोसेमंद हैं क्योंकि वहां से केवल तीन दिन में तेल भारत पहुंच जाता है. इराक़ और कुवैत भी भरोसेमंद सप्लायर हैं. ये आपके पारम्परिक सप्लायर भी हैं, तो भले ही आप उनसे तेल लेना कम कर दें लेकिन बंद नहीं करेंगे."
तनेजा कहते हैं कि जब कोई देश इतने सारे देशों से तेल ख़रीदता है तो वो मोलभाव करने की बेहतर स्थिति में होता है.
वे कहते हैं, "मिसाल के तौर पर आप सऊदी अरब से कहते हैं कि रूस सस्ता तेल दे रहा है तो आप अच्छी शर्तों पर दो. तो सऊदी अरब तेल के दाम भले ही कम न करे लेकिन भुगतान के लिए ज़्यादा समय दे सकता है."
अंत में तनेजा कहते हैं, "ये ऐसा है मानो अगर आपका घर एक चीज़ से चलता है जो आपकी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम है तो आप ये चाहते हैं कि उस चीज़ की सप्लाई करने वाले सभी दस देशों से आप थोड़ा-थोड़ा लें, न कि किसी एक देश से."
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