वेनेज़ुएला संसदीय चुनाव के बारे में पाँच ख़ास बातें

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- Author, बीबीसी मॉनटरिंग
- पदनाम, मियामी
रविवार को वेनेज़ुएला अपनी संसद यानी राष्ट्रीय परिषद के 277 सदस्य चुनने के लिए मतदान करेगा.
ज़्यादातर विपक्षी पार्टियों ने इस चुनाव को "धोखा" बताकर इसका बहिष्कार किया है.
ये चुनाव राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और विपक्ष के नेता ख़्वान ग्वाइदो के बीच दो साल से चल रहे सत्ता संघर्ष के बीच हो रहा है.
साल 2018 के राष्ट्रपति चुनावों में मादुरो दोबारा राष्ट्रपति बने लेकिन कहा गया कि चुनाव ना तो स्वतंत्र थे और ना ही निष्पक्ष. इसके बाद ख़्वान ग्वाइदो को राष्ट्रीय परिषद और 50 दूसरे देशों ने अंतरिम राष्ट्रपति मान लिया.
राष्ट्रीय परिषद एकमात्र ऐसी संस्था है जिस पर मादुरो की सोशलिस्ट पीएसयूवी पार्टी का नियंत्रण नहीं है. लेकिन हो सकता है कि इन चुनावों के बाद स्थिति बदल जाए.
इन चुनावों के बारे में जानिए पाँच महत्वपूर्ण बातें-
1. एकतरफ़ा मुक़ाबला

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मादुरो फिर से राष्ट्रीय परिषद में बहुमत से जीतने के वादे के साथ चुनाव में उतरे हैं जो साल 2015 के चुनाव के बाद से उनके विरोधी सांसदों के नियंत्रण में है. मादुरो के पास देश के संसाधन हैं और सरकारी मीडिया है.
ऐसी संभावना है कि मादुरो बहुमत से जीतेंगे क्योंकि ग्वाइदो की समर्थक पार्टियाँ इस चुनाव का बहिष्कार कर रही हैं.
इन पार्टियों ने ये फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि चुनाव आयोग और वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट में मादुरो के वफ़ादार ज़्यादा हैं. उनका तर्क है कि अगर वे हिस्सा भी लें तो मादुरो के पक्ष में नतीजा मोड़ दिया जाएगा और इसलिए वे इस चुनाव में हिस्सा लेकर इसे वैध नहीं बनाना चाहते.
ग्वाइदो के नेतृत्व वाले विपक्ष के अलावा भी कुछ पार्टियाँ हैं जो चुनाव लड़ रही हैं. इनमें से कुछ के नेतृत्व को तो सुप्रीम कोर्ट ने बहिष्कार का समर्थन करने की वजह से हटा दिया. इन पार्टियों पर सरकार समर्थक नेतृत्व थोप दिया गया जिन्होंने चुनाव में हिस्सा लेने की घोषणा कर दी.
एक अन्य पार्टी एपीआर ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया था और गठबंधन से अलग हो गयी थी. इस चुनाव में पार्टी मादुरो के विरोध में लड़ रही है.
इस चुनाव का जो भी नतीजा हो, ग्वाइदो ने पहले ही एक रेफ़रेंडम की घोषणा की हुई है. वह वेनेज़ुएला के लोगों से राय लेंगे कि क्या वे राष्ट्रीय परिषद चुनाव के नतीजों को स्वीकार करते हैं या नहीं.
वेनेज़ुएला से मिल रही ख़बरों से लगता है कि इन चुनावों में मतदाताओं की दिलचस्पी कम है और इसका असर वोटिंग टर्नआउट में दिखेगा. हाल ही के एक ओपिनियन पोल के मुताबिक़ 62.2 फीसदी लोग ना तो मादुरो को समर्थन देते हैं और ना ग्वाइदो को.
2. चुनाव की वैधता पर सवाल

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यूरोपीय यूनियन, अमेरिका और ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ अमेरिकन स्टेट्स (ओएएस) सभी ने कहा है कि ये चुनाव लोकतांत्रिक पारदर्शिता के मानकों पर खरे नहीं उतरते. इसलिए वे इसके नतीजों को वैध भी नहीं मानते.
लातिन अमेरिकी और कैरिबियाई देशों के ग्रुप ने भी चुनाव के नतीजों को मानने से इनकार किया है. इस फ़ैसले में अमेरिका के सहयोगी ब्राज़ील और कोलंबिया भी शामिल हैं.
हालाँकि मादुरो समर्थक देश जैसे रूस, चीन, तुर्की, ईरान और क्यूबा मादुरो बहुमत वाली संसद को मान्यता दे सकते हैं.
अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने मादुरो को तानाशाह कहा है. ऐसी उम्मीद है कि बाइडन के शपथ लेने के बाद वे मादुरो सरकार पर दबाव बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने पर काम कर सकते हैं.
3. सत्ता को और मज़बूत करने की होगी कोशिश

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अगर मादुरो ये चुनाव जीत जाते हैं तो वे वेनेज़ुएला पर अपनी राजनीतिक और आर्थिक पकड़ को और मज़बूत करने के लिए क़ानून बना सकते हैं. मादुरो की पत्नी और बेटा भी उनके साथ चुनाव लड़ रहे हैं.
मादुरो सरकार में एक बड़े अधिकारी दीयसदादो काबेलो कहते आए हैं कि "छह दिसंबर की आंदोलनकारी जीत" के बाद नयी परिषद ऐसा क़ानून पास करेगी जो "ग़द्दारों" को सज़ा देगा. ग़द्दारों से उनका इशारा ग्वाइदो और अन्य विपक्षी नेताओं की तरफ़ है.
मादुरो ने भी अपनी जीत के भरोसे के साथ कहा है कि अगर विपक्ष को उनसे ज़्यादा वोट मिले तो वे राष्ट्रपति पद छोड़ देंगे.
4. विपक्ष में फूट

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हाल के महीनों में ग्वाइदो को मादुरो विरोधी आंदोलन के लोगों से ही उनकी रणनीति को लेकर सवालों का सामना करना पड़ा है. इसमें चुनाव बहिष्कार के फ़ैसले को लेकर भी सवाल उठे हैं.
राष्ट्रीय परिषद के नेता होने की वजह से उन्हें अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता मिली थी. उन्होंने और उनके समर्थकों ने राष्ट्रीय परिषद में संविधान के एक प्रावधान को उठाया था जिसके मुताबिक़ संसद का नेता राष्ट्रपति पद सम्भाल सकता है बशर्ते पद ख़ाली हो.
'मादुरो का चुनाव अवैध था और इसलिए राष्ट्रपति पद ख़ाली है', इस तर्क को सामने रखते हुए और राष्ट्रीय परिषद के समर्थन से जनवरी 2019 में ग्वाइदो ने अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ले ली.
लेकिन ये समर्थन पाँच जनवरी को ख़त्म होने जा रहा है जब नयी परिषद सत्ता में आएगी. लेकिन ग्वाइदो और उनके समर्थक कह रहे हैं कि चूँकि छह दिसंबर के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हैं, तो जीतने वाले को वैधता नहीं मिलेगी और इसलिए वो अपने पद पर बने रहेंगे. हालाँकि, उनके पद को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं.
5. राजनीतिक लड़ाई का हल नहीं

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अगर मादुरो और उनके समर्थक राष्ट्रीय परिषद का नियंत्रण ले लेते हैं तो उनकी वाम सरकार के पक्ष में भी और ख़िलाफ़ भी स्टैंड और सख़्त होगा. देश के भीतर भी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी.
देश के संस्थानों से बाहर रखे गए मादुरो के विरोधियों को भी उनके राष्ट्रपति कार्यकाल को ख़त्म करने के दूसरे विकल्प खोजने पड़ेंगे. इस वजह से तनाव अब और बढ़ेगा.
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