महाराष्ट्र चुनाव: मुख्यमंत्री पद को लेकर ठाकरे के बयान के क्या हैं मायने?

मुंबई में ईंडिया गठबंधन की बैठक की तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, मुंबई में इंडिया गठबंधन की बैठक में उद्धव ठाकरे (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, दीपाली जगताप
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

महाराष्ट्र सरकार का कार्यकाल 26 नवंबर को समाप्त होने जा रहा है.

बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच ये प्रदेश में पहला विधानसभा चुनाव है. इस कारण अगले तीन महीने महाविकास आघाड़ी (एमवीए) और महायुति दोनों के लिए बेहद ही महत्वपूर्ण रहने वाले हैं.

शिवसेना और एनसीपी में पार्टी पर अधिकार को लेकर बगावत और चुनाव चिन्ह के लिए क़ानूनी लड़ाई के बाद अब यह पहला मौक़ा होगा जब यह पता चलेगा कि जनता किसे असली शिव सेना और एनसीपी मानती है.

विधानसभा चुनाव को लेकर दोनों कैंपों में रणनीतियां बननी शुरू हो गई है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर दोनों तरफ अभी स्थिति साफ़ नहीं है.

बीबीसी हिंदी का व्हाट्सऐप चैनल
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जहां एक तरफ महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने अपने प्रभाव वाली सीटों पर काम करना शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ महायुति में बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच सीटों को लेकर अभी भी मतभेद है.

शिवसेना ठाकरे गुट के नेता उद्धव ठाकरे ने अघाड़ी के नेताओं और पदाधिकारियों की बैठक में मुख्यमंत्री पद के फ़ॉर्मूले को लेकर अपनी राय रखी.

दूसरी तरफ महायुति की तरफ भी कमोबेश वही हाल है. महायुति सरकार की तरफ से एकनाथ शिंदे भले ही मुख्यमंत्री हैं लेकिन यहाँ इस खेमे में भी अभी तक मुख्यमंत्री पद का चेहरा तय नहीं हुआ है.

ऐसे में भले ही दोनों तरफ से सियासी जंग जीतने का दावा किया जा रहा है लेकिन सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है.

कांग्रेस, एनसीपी की समस्या?

शरत पवार के साथ राहुल गांधी और उद्धव ठाकरे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, शरत पवार के साथ राहुल गांधी और उद्धव ठाकरे
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

शुक्रवार 16 अगस्त को मुंबई में महाविकास अघाड़ी की बैठक आयोजित की गई जिसमें लोकसभा चुनाव में सफलता और विधानसभा चुनाव में रणनीति के बारे में चर्चा की गई.

इस बैठक में राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गुट) के अध्यक्ष शरद पवार, शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के पार्टी नेता उद्धव ठाकरे, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले, सांसद सुप्रिया सुले, सांसद संजय राउत, विधायक आदित्य ठाकरे, बालासाहेब थोराट, पृथ्वीराज चव्हाण के साथ-साथ महाविकास अघाड़ी के सभी प्रमुख नेता मौजूद थे. साथ ही इस मौके़ पर सीपीआई, सीपीएम, शेकाप जैसे छोटे दलों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे.

इस बैठक में उद्धव ठाकरे ने न सिर्फ पदाधिकारियों को सहयोगी दलों के लिए काम करने की हिदायत दी बल्कि मुख्यमंत्री पद को लेकर भी अपनी राय भी रखी.

उद्धव ठाकरे ने कहा, "शरद पवार और पृथ्वीराज चव्हाण, आप मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा करें, मैं उनका समर्थन करता हूं. क्योंकि मैं यह चुनाव अपने लिए नहीं लड़ रहा हूं."

उद्धव ठाकरे इतने पर नहीं रुके. बीजेपी के साथ अपने गठबंधन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "हम वैसे गठबंधन में फिर से नहीं रहना चाहते जहां 'जिसकी संख्या ज़्यादा, उसका सीएम' की पॉलिसी के कारण लोग एकदूसरे की सीट को कम करने का काम करें. वो एक भारी ग़लती थी जिसमें हम फिर से नहीं जाना चाहते. इसलिए आप लोग सीएम का चेहरा तय करिए और आगे बढ़िए."

सीएम चेहरे को लेकर उद्धव ठाकरे की इस खुली राय के बाद शरद पवार और कांग्रेस नेताओं के सामने बड़ा सवाल खड़ा हो गया है.

इसके जबाब में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने अपने भाषण में कहा, "मुख्यमंत्री पद के चेहरे का फै़सला उच्चतम स्तर पर किया जाएगा."

वहीं पृथ्वीराज च्वहाण ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि "अब तक हम 'जिसकी संख्या ज़्यादा, उसका सीएम' के फ़ॉर्मूले पर अलम करते आए हैं, इस बार भी इसी पर अमल करेंगे."

किसी भी गठबंधन में सीएम पद के लिए जो फ़ॉर्मूला इस्तेमाल में लाया जाता था उसके अनुसार गठबंधन में जिसकी सीटें ज़्यादा हों, मुख्यमंत्री उसी का होता है.

महाविकास अघाड़ी में भी संभावना इसी फ़ॉर्मूले की थी लेकिन उद्धव ठाकरे के बयान के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि चुनाव परिणाम से पहले सीएम पद के चेहरे की घोषणा कैसे की जाए.

ठाकरे की चेतावनी?

मुंबई में एक पोस्टर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, मुंबई में सड़क किनारे लगा एक पोस्टर

अपने भाषण में उद्धव ठाकरे ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि अधिकारी उन्हें फ़ोन करके कहते हैं कि विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधाएं आ रही हैं.

हाल ही में शुरू हुई राज्य सरकार की लाडली बहन योजना को लेकर ठाकरे ने कहा, "लाडली बहन योजना की घोषणा हो चुकी है लेकिन इसके लिए पैसा कहां से आएगा? मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इस योजना की वजह से नाराज़ होते रहते हैं. इसी वजह से आईएएस अधिकारी मुझसे कह रहे हैं कि आपको जल्दी वापस आना चाहिए."

हालांकि, शरद पवार ने सीट आवंटन और मुख्यमंत्री पद दोनों पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया. अपने भाषण में उन्होंने संवैधानिक बदलाव के ख़तरे और सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक के दमनकारी प्रावधानों पर ज़ोर दिया. लेकिन उन्होंने कहीं भी मुख्यमंत्री पद के चेहरे का ज़िक्र नहीं किया.

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं, "ऐसा लगता है कि उद्धव ठाकरे ने सभा में यह टिप्पणी की है और सहयोगी दलों के सामने एक गुगली फेंकी है. उनका यह भी मानना होगा कि उनके चेहरे की वजह से ही महाविकास आघाड़ी को लोकसभा में इतनीं सीटें मिलीं. हो सकता है कि वह इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हों."

वहीं शरद पवार की राय है कि एकजुट होकर एक व्यक्ति नेतृत्व में चुनाव लड़ना चाहिए. इसीलिए उद्धव ठाकरे का दिल्ली दौरा अहम था. लेकिन ख़बरें हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने भी इस संबंध में कोई सकारात्मक राय नहीं दी है इसलिए बैठक में सबके सामने उद्धव ठाकरे ने यह टिप्पणी की.

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि आज कांग्रेस और एनसीपी दोनों पार्टियों के पास ऐसा कोई नहीं है जो मुख्यमंत्री पद का चेहरा बन सके या जिसके चेहरे पर चुनाव जीता जा सके. तभी उद्धव ठाकरे ने कहा कि अब मुख्यमंत्री पद का चेहरा स्पष्ट करें.

सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं, "इसका कारण ये है कि जैसी स्थिति शिवसेना के पास मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे के तौर पर उद्धव ठाकरे को उतारने की है, वैसी स्थिति बाकी दोनों पार्टियों की नहीं है. इसलिए उन्हें उद्धव ठाकरे के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए."

लेकिन लोकसभा में कांग्रेस और एनसीपी के प्रदर्शन को देखकर ऐसा लग रहा है कि वो समझौता करने को तैयार नहीं हैं. सूर्यवंशी कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे का मानना है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर बयान देकर उद्धव ठाकरे ने एक तरह से सहयोगी दलों को चेतावनी दी है कि उन्हें हल्के में न लिया जाए.

उन्होंने कहा, "उनके दिल्ली दौरे के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने प्रस्ताव दिया था कि उद्धव ठाकरे को प्रचार प्रमुख बनाया जाए लेकिन मुख्यमंत्री नहीं. इसी वजह से ठाकरे कह रहे है के अगर मैं मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं हूं तो कांग्रेस और एनसीपी उनके उम्मीदवार की घोषणा करें. मुझे लगता है कि ठाकरे ने एक तरह से चेतावनी दी है."

महाविकास अघाड़ी की सीटों का बंटवारा कैसे होगा?

ईंडिया ब्लॉक के प्रेस कॉफ्रेस में सवालों के जबाब देते उद्धव ठाकरे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इंडिया गठबंधन के प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जबाब देते उद्धव ठाकरे

महाविकास अघाड़ी में सहयोगी दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर अब तक कुछ ही बैठकें हुई हैं.

अब तक कांग्रेस और एनसीपी मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ते रहे हैं. लेकिन चूंकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ेगी, इसलिए सीटों का संतुलन कैसे बनाया जाए, ये बड़ी चुनौती होगी.

अब तक हुई बैठकों और मिली जानकारी के मुताबिक़ कांग्रेस राज्य विधानसभा की 288 सीटों में से क़रीब 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छुक है. माना जा रहा है कि शिवसेना ठाकरे गुट ने 120-130 सीटें मांगी हैं. हालांकि, यह भी पता चला है कि शरद पवार की ओर से अभी कोई आंकड़ा सामने नहीं रखा गया है.

2019 में कांग्रेस ने 147 सीटों पर चुनाव लड़ा और 43 सीटें जीतीं. वहीं एनसीपी ने 121 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें से 54 पर उसे जीत हासिल हुई.

2019 में बीजेपी के साथ गठबंधन में उद्धव ठाकरे ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ा और 56 सीटें जीतने में वो कामयाब रही.

पिछले दो साल में राज्य में दो पार्टियां आपस में बंटकर चार पार्टियां बन गई हैं. शिवसेना के 39 विधायक शिंदे की शिवसेना में हैं जबकि एनसीपी के 40 विधायक भी अजित पवार के साथ हैं. इसके चलते दोनों पार्टियों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों की जांच करनी होगी.

साथ ही लोकसभा नतीजों के गणित पर भी पार्टियां ग़ौर करेंगी. इसके चलते मविआ का जोर 2019 के नतीजे के बजाय मौजूदा स्थिति के मुताबिक सीट आवंटन तय करने पर है.

सुधीर सूर्यवंशी के मुताबिक़, "लोकसभा नतीजों के बाद कांग्रेस ज़्यादा या बराबर सीटों पर ज़ोर देगी. शरद पवार भी ऐसा ही करेंगे. इस वजह से शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी को बराबर सीटें या मतदाता मिलेंगे."

"फै़सले सीट के हिसाब से करने होंगे वरना आख़िरी वक्त तक कुछ सीटों पर रस्साकशी होती रहेगी."

अभय देशपांडे का कहना है कि "लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को करारी हार मिली. कांग्रेस को मुंबई, सांगली, भिवंडी, वर्धा जैसी सीटें शिवसेना के लिए छोड़नी पड़ीं. लेकिन नतीजों में कांग्रेस और एनसीपी के स्ट्राइक रेट को देखते हुए ऐसी कोई स्थिति नहीं है कि ये दोनों पार्टियां विधानसभा के लिए समझौता करेंगी."

उनके मुताबिक़, "शिवसेना और एनसीपी 2019 में अपनी सभी चुनी हुई सीटों पर ज़ोर देंगी. तीनों पार्टियां मिलकर 150 सीटें तय करेंगी. अब ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस क़रीब 138 सीटों पर मज़बूत होगी. इस बार कांग्रेस सीटों पर ज़ोर देगी. खास तौर पर मुंबई, कांग्रेस और शिवसेना के बीच रस्साकशी देखने को मिलेगी."

क्या है महायुति का गणित?

महायुति के नेता एक कार्यक्रम में

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, महायुति के नेता एक कार्यक्रम में एकनाथ शिंदे, अजित पवार, देवेन्द्र फडनवीस और राज ठाकरे

महाविकास अघाड़ी की तरह महायुति के नेताओं के लिए भी सीटों का संतोषजनक बंटवारा करना या उसके लिए कोई फ़ॉर्मूला तय करना इतना आसान नहीं है.

2019 में बीजेपी ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा और 105 सीटों पर जीती. शिवसेना और एनसीपी के बीच बगावत और पार्टी में फूट के बाद अब एकनाथ शिंदे और अजित पवार के पास विधायकों का बहुमत है, लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि सीटों के बंटवारे के दौरान कितने विधायक साथ रहते हैं.

विधानसभा में सीटों के बंटवारे को लेकर अब तक महायुति में शामिल दलों के बीच कई बैठकें हो चुकी हैं. इसके लिए देवेन्द्र फड़नवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार ने दिल्ली का अलग-अलग दौरा भी किया.

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़, शिवसेना शिंदे गुट ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी दिखाई है. पार्टी इसके लिए ज़ोर लगा रही है. जबकि बीजेपी 160-165 सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है.

शिव सेना के वर्षगांठ कार्यक्रम में पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने सार्वजनिक बयान दिया कि शिंदे की शिव सेना को कम से कम 100 सीटें मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हमें 100 में से 90 सीटें मिलेंगी.

वहीं अजित पवार ने पूरे राज्य में जनसम्मान यात्रा शुरू कर प्रचार का आगाज़ कर दिया है. अजित पवार गुट 80 से 90 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है. अजित पवार के साथ 40 विधायक हैं.

इस पर एनसीपी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि पार्टी को 80-90 सीटें मिलनी चाहिए. उनके साथ 105 बीजेपी विधायक समेत 115 विधायक (सहयोगी पार्टियों और स्वतंत्र विधायकों को मिलाकर) हैं.

वहीं, शिवसेना के पास अकेले 39 विधायक हैं और अन्य को मिलाकर क़रीब 50 विधायक हैं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे की राय है कि इससे महायुति को 200 सीटें देने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

उन्होंने कहा, "बाकी 80-90 सीटों के लिए सीटें महायुति को तय करनी हैं. चुनावी फ़ॉर्मूले के मुताबिक़ सीटें दी जा सकती हैं या फिर शिवसेना, एनसीपी को बराबर सीटें दी जा सकती हैं."

सुधीर सूर्यवंशी ने कहा, "महायुति में भी दरार आ गई है. अगर बीजेपी शिंदे के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को तैयार भी हो जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे. ऐसा पहले से ही देखा जा रहा है कि राज्य में बीजेपी के सांसदों की संख्या 23 से घटकर 9 रह गई है."

"ख़तरा यह भी है कि अगर वह मुख्यमंत्री नहीं बने तो फिर से छोटे भाई की भूमिका में आ जाएंगे. वहीं अजित पवार कई सालों से मुख्यमंत्री पद की चाहत रखते रहे हैं. अगर वह महायुति में किंगमेकर या अपने विधायकों की भूमिका में आते हैं तो अजित पवार भी शर्तें रखेंगे."

सूर्यवंशी के मुताबिक़, "सीट बंटवारे में भी बीजेपी दोनों सहयोगी दलों की सीटें तय करेगी. इसमें कोई शक़ नहीं है कि बीजेपी सबसे ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसके बाद महायुति कैसे चुनाव लड़ेगा यह इस पर निर्भर करेगा कि वो शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी को कितनी सीटें देते हैं."

"शिंदे की शिवसेना को लोकसभा में अच्छी सीटें मिलीं. लेकिन एनसीपी सिर्फ़ एक सीट ही जीत सकी. इसके चलते विधानसभा में सीटें देते वक्त बीजेपी नेता इस पर भी विचार करेंगे. हमें देखना होगा कि महायुति में किसे ज़्यादा समझौता करना पड़ता है."

इसके चलते अगले दो महीने एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बेहद अहम होंगे. हालांकि इस बीच कुछ दलबदल होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं कि विधानसभा का ये मुक़ाबला महाविकास अघाड़ी बनाम महायुति की तरह सीधा होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)