बीजेपी को नया अध्यक्ष चुनने में इतनी देर क्यों लग रही है

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- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय जनता पार्टी का नया अध्यक्ष कौन होगा? पार्टी अध्यक्ष के तौर पर जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल खत्म हो गया है.
यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में हर तरफ इस सवाल की चर्चा है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रविवार को दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के घर पर इसे लेकर गहन मंथन किया गया.
रिपोर्ट्स की मानें तो इस बैठक में राजनाथ सिंह के अलावा गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी महासचिव बीएल संतोष के साथ-साथ संघ की तरफ से महासचिव दत्तात्रेय होसबले और संयुक्त महासचिव अरुण कुमार मौजूद थे.
महीनों से इस पद के लिए कई नेताओं के नाम रेस में चल रहे हैं, बावजूद इसके घंटों चली इस अहम बैठक में भी किसी के नाम पर मुहर लगने की ख़बर नहीं आई है.

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ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी को अपना नया अध्यक्ष चुनने में इतनी देर क्यों लग रही है?
क्या एक बार फिर जेपी नड्डा का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है? क्या ओबीसी वर्ग से कोई नया चेहरा इस पद पर देखने को मिल सकता है?
चार राज्यों के चुनाव बने वजह?

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देश के चार राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री का मानना है कि चुनावों को देखते हुए बीजेपी अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखना चाहती है, क्योंकि जेपी नड्डा के साथ सरकार का कंफर्ट लेवल अच्छा है.
वे कहते हैं, "चुनावों में दो महीने का वक्त बचा है. ऐसे में अध्यक्ष पद पर किसी नए व्यक्ति को लाने से मुश्किलें बढ़ेंगी, क्योंकि उन्हें चीजों को समझने में बहुत वक्त लग जाएगा. ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास नाम नहीं हैं, बस वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और राज्यों के चुनाव निकाल लेना चाहते हैं."
वहीं दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि चार राज्यों के चुनावों का अध्यक्ष पद से खास लेना देना नहीं है.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पार्टी संविधान के मुताबिक कम से कम 15 साल से जो व्यक्ति पार्टी का सदस्य होगा वही अध्यक्ष बन सकता है. ऐसे में जो भी व्यक्ति आएगा, वह संगठन को पहले से जानता होगा. सिर्फ जिम्मेदारियां बदलती हैं. इसलिए नए व्यक्ति को संगठन समझने में बहुत वक्त नहीं लगेगा."
वे कहते हैं, "बीजेपी, क्षेत्रीय पार्टियों की तरह नहीं है. मायावती, अखिलेश यादव, स्टालिन जैसे नेताओं की पार्टियों में अध्यक्ष एक बॉस की तरह काम करते हैं, जो बीजेपी में नहीं है. यहां एक स्ट्रक्चर है जिसका मुखिया समय समय पर बदलता रहता है."
संघ का दखल बना वजह?

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साल 2014 में नरेंद्र मोदी ने पूर्ण बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई. तब अमित शाह को तीन साल के लिए पार्टी अध्यक्ष बनाया गया.
साल 2017 में फिर से तीन साल के लिए अमित शाह को इस पद के लिए चुना गया. इसके बाद साल 2020 में जेपी नड्डा, पार्टी अध्यक्ष बने.
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "पिछले दस साल में पीएम नरेंद्र मोदी ने मोटे तौर पर अपनी मर्जी से पार्टी अध्यक्ष तय किए हैं लेकिन अब स्थितियां बदलती हुई नजर आ रही हैं."
वे कहते हैं, "बैठक में संघ के सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले और सह सरकार्यवाहक अरुण कुमार की मौजूदगी में अगर अध्यक्ष पद को लेकर मंथन हो रहा है तो संघ अपने तरीके से नए अध्यक्ष को देखना चाहता है."
त्रिवेदी कहते हैं, "हालांकि आरएसएस कभी सीधे तौर पर अपनी तरफ से नाम नहीं देता, लेकिन जो नाम मिलते हैं उस पर वह अपनी राय जरूर देता है और यहां राय किसी आदेश से कम नहीं होती."

दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी का मानना है कि किसी एक नाम पर बीजेपी और संघ में सहमति नहीं बन पा रही है.
वे कहते हैं, "बीजेपी उस दौर में पहुंच गई है, जहां कभी इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस हुआ करती थी. बीजेपी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का वर्चस्व निर्विवाद रूप से है, जो 2024 चुनावी नतीजों के बाद थोड़ा कम हुआ है. ऐसा हो सकता है कि जिन्हें ये लोग पसंद ना कर रहे हों, वे संघ की मदद से दावेदारी पेश कर रहे हों और तभी यह देरी हो रही हो."
2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 282 सीटें और 2019 के आम चुनाव में 303 सीटें जीतने वाली वाली इस बार 240 पर सिमट गई है.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री का मानना है कि बीजेपी के घटते जनाधार की वजह से इस बार पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर वह दबाव बना रहा है, जो वह इससे पहले नहीं बना पाया था.
वे कहते हैं कि चार राज्यों के चुनाव नतीजे, बीजेपी अध्यक्ष पद के चुनाव में आरएसएस की भूमिका को भी तय करेंगे.
अत्री का मानना है, "अगर नतीजे अमित शाह और नरेंद्र मोदी के मुताबिक आए तो बीजेपी का अध्यक्ष अलग होगा और अगर उनके अनुकूल नहीं आए तो अलग होगा, जिसमें संघ का दखल होगा."
बीजेपी और संघ में मतभेद?

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राजनीति के जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी और संघ के बीच साल 2019 के बाद टकराव ज्यादा गहरा हुआ है, जिसके चलते स्थितियां पेचीदा हुई हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं, "बीजेपी मूलत: संघ की राजनीतिक इकाई है, संघ की सर्वोच्च संस्था है, लेकिन 2019 के बाद से उसकी सर्वोच्ता पर सवाल उठे हैं और इसे संघ फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है."
वे कहते हैं, "नरेंद्र मोदी को 2014 में अप्रत्याशित जनादेश मिला, जिसकी उम्मीद बीजेपी और संघ दोनों को नहीं थी. 2019 में और बड़ा बहुमत मिला, जिसे संघ को नेपत्थ में डाल दिया."
"अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर मूलत: संघ के एजेंडे हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी कर्ताधर्ता बन गए, क्योंकि हर जगह वे ही दिखाई दे रहे हैं. इनकी अधिकारवादी और अधिनायकवादी प्रवृत्ति संघ को काफी चुभी और 2019 के बाद ये और पीड़ा देने लगी."

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जोशी कहते हैं, "2014 के संघ ने राज्य और केंद्र में अपने प्रतिनिधि रखवाए. वे संघ का एजेंडा सरकार में रहकर चलाते थे. मैंने उत्तर प्रदेश में देखा कि विभिन्न विभागों में संघ के पुराने प्रचारकों को विशेष कार्यधिकारी बनाकर मंत्रियों के साथ लगाया गया. 2019 के बाद उन्हें हटाया तो नहीं गया, लेकिन उनका प्रभाव खत्म कर दिया गया. ये चीजें भी संघ को पसंद नहीं आई."
ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी भी कहते हैं. उनका कहना है कि संघ की तरफ से राज्य से लेकर केंद्र तक लोग जाते हैं.
वे कहते हैं, "आज की तारीख में बीएल संतोष संगठन महासचिव हैं, जो सरकार और संगठन दोनों में महत्वपूर्ण निभा रहे हैं. इसलिए मेरा मानना है कि संघ की सरकार में सीधी भूमिका है."
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का कहना है कि आपसी टकराव को खत्म करने के लिए समय-समय पर संघ और बीजेपी के बीच में समन्वय बैठक होती है.
वे कहते हैं, "नड्डा जी ने चुनाव के दौरान कहा था कि अब हम बड़े हो गए हैं. जब हम बचपन में थे तो हमें संघ की जरूरत पड़ती थी. अब बीजेपी अपने आप में इतनी बड़ी हो गई है कि उन्हें संघ की अनुमति या सहयोग की जरूरत नहीं होती. लेकिन ये सब कहने की बाते हैं, अगर ऐसी बात होती तो बीएल संतोष संगठन महासचिव नहीं होते."
अध्यक्ष की रेस में कौन-कौन

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भारतीय जनता पार्टी के संविधान के मुताबिक कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों में संगठन का चुनाव होने के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव किया जा सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी का कहना है कि पार्टी की राज्य इकाइयां लोकसभा चुनाव में व्यस्त थीं, इसलिए वहां चुनाव होने में देरी हुई जिसका सीधा असर अध्यक्ष पद के चुनाव पर पड़ा है."
वे कहते हैं, "भले संघ और बीजेपी में एक नाम पर सहमति ना बन पा रही हो, लेकिन उम्मीद है कि अगस्त के महीने के आखिर तक कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया जाएगा."
गुप्ता कहते हैं, "संघ, शिवराज सिंह चौहान को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहता था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन्हें मंत्रिमंडल में ले लिया. इसके अलावा विनोद तावड़े, देवेंद्र फडणवीस और सुनील बंसल में से किसी को यह बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है."
अध्यक्ष कौन होगा? इस सवाल के जवाब में हेमंत अत्री कहते हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में नाम पर बात करना ठीक नहीं है और इससे बचना चाहिए.
वे कहते हैं, "एक महीना पहले विनोद तावड़े का नाम चलाया गया था कि महाराष्ट्र में लाभ होगा, लेकिन इंटरनल सर्वे में ऐसा कुछ निकलकर नहीं आया. महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के नतीजे भी अच्छे नहीं आए. बीच में भूपेंद्र यादव का नाम भी चला और रह रहकर फडणवीस का भी जिक्र होता है."
वहीं नवीन जोशी कहते हैं, "तीसरी बार सरकार बनाने के बाद ये बात चल रही थी कि अमित शाह को फिर से अध्यक्ष बना दिया जाए, लेकिन उन्हें गृह मंत्रालय दे दिया गया."
इसके अलावा राजनीति के जानकार लोग इस रेस में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, धर्मेंद्र प्रधान, केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं का नाम भी लेते हैं.
अध्यक्ष के तौर पर जेपी नड्डा

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जून 2019 में जेपी नड्डा को बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष और जनवरी 2020 में पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाया गया. इस साल फरवरी में उनका कार्यकाल जून 2024 तक बढ़ाया गया था.
तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया. बीजेपी में एक व्यक्ति एक पद का नियम भी है जिसके चलते उन्हें अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ेगा.
उनके कार्यकाल में करीब एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में चुनाव हुए. इनमें कुछ राज्यों में बीजेपी जीती और कुछ में हारी.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "जेपी नड्डा के कार्यकाल में बीजेपी के पास सफलताएं कम और असफलताएं ज्यादा हैं. उनके आने के बाद पार्टी तमाम बड़े राज्य हारी है, जिसमें उनका गृह राज्य हिमाचल प्रदेश भी शामिल रहा. इसके अलावा बीजेपी को कर्नाटक में भी हार का सामना करना पड़ा."
वे कहते हैं, "जेपी नड्डा के कार्यकाल में ही बीजेपी केंद्र के अंदर 240 सीटों पर आ गई और उन्हें नीतीश और चंद्रबाबू नायडू का साथ लेना पड़ रहा है."
वहीं दूसरी तरफ विजय त्रिवेदी का मानना है कि कुछ चुनावों को हारने के बावजूद जेपी नड्डा का कार्यकाल काफी अच्छा रहा है.
वे कहते हैं, "जब सरकार और संगठन साथ चल रहे होते हैं, तो संगठन में बहुत लोग नाराज भी होते हैं, क्योंकि हर कोई संगठन से सरकार में जाना चाहता है. ऐसे में बैलेंस बनाकर रखना पड़ता है, जिसे जेपी नड्डा ने अच्छे से किया है. उनके समय में संगठन में कोई बड़ा विवाद भी सामने नहीं आया. जब कभी बीजेपी का इतिहास लिखा जाएगा तो उन्हें सफल अध्यक्ष के तौर पर दर्ज किया जाएगा."
लेकिन नवीन जोशी अलग राय रखते हैं.
उनका मानना है, "पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नड्डा जी का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहा. नड्डा जी एक तरह से अमित शाह और नरेंद्र मोदी की छाया में ही चलते थे."
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