जेलों में जाति के आधार पर काम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ख़फ़ा, ऐतिहासिक फ़ैसले की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट

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    • Author, भाग्यश्री राऊत
    • पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए

"नियम 158 में मैला ढोने के कर्तव्य का ज़िक्र है. यह मैला ढोने का कर्तव्य क्या है? इसमें मैला ढोने वालों की जाति का उल्लेख है. इसका क्या मतलब है?"

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने यह फटकार उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों को पिछले दिनों लगाई है.

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि यूपी की जेलों में क़ैदियों के साथ कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है.

इस दावे को सुनने के बाद डीवाई चंद्रचूड़ ने उत्तर प्रदेश की जेल नियमावली के कुछ प्रावधान पढ़ते हुए उन्हें फटकार लगाई.

सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत 17 राज्यों से जेल के अंदर जातिगत भेदभाव और जेलों में क़ैदियों को जाति के आधार पर काम दिए जाने पर जवाब मांगा है.

हालांकि छह महीने बीतने के बाद भी केवल उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने ही अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है.

दरअसल, यह पूरा मामला पत्रकार सुकन्या शांता के प्रयासों की वजह से सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा है और चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच सुनवाई कर रही है.

सुकन्या शांता मानवाधिकार क़ानून और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं.

उन्होंने अपनी ख़बरों के ज़रिए जेल में जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया. उन्होंने इस मुद्दे पर 2020 में शोधपरक रिपोर्ट तैयार की थी.

इसमें उन्होंने भारत के 17 राज्यों के लिए जेलों में जाति के आधार पर काम के विभाजन पर एक रिपोर्ट तैयार की.

और यह बताने की कोशिश की किस तरह से क़ैदियों में काम का वितरण उनकी जाति के आधार पर होता है. उनकी यह खोजी रिपोर्ट सिरीज़ 'द वायर' पर प्रकाशित हुई थी.

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जेलों में जाति के आधार पर काम

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सुकन्या शांता ने अपनी रिपोर्ट में राजस्थान की अलवर जेल के क़ैदी अजय कुमार की मुश्किलों को साझा करते हुए बताया था कि जेलों में जाति आधारित भेदभाव कैसे होता है.

जाति के अनुसार, काम का विभाजन कैसे किया जाता है? उन्होंने इस रिपोर्ट में कहा था कि अगर कोई नाई होगा तो जेल में उसे बाल और दाढ़ी बनाने का काम मिलेगा, ब्राह्मण क़ैदी खाना बनाते हैं और वाल्मीकि समाज के क़ैदी सफ़ाई करते हैं.

उन्होंने राजस्थान के अलावा कुछ अन्य राज्यों के जेल नियमों की भी जांच की और वहां जाति आधारित नियम देखे.

सुकन्या की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही राजस्थान हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को जेल के नियमों में बदलाव करने का आदेश दिया. इसी के तहत राजस्थान सरकार ने अपने जेल नियमों में बदलाव किया था.

सुकन्या को लगा कि राजस्थान में बदलाव के बाद अगर क़ानूनी रास्ता अपनाया जाए तो अन्य राज्यों में भी बदलाव लाया जा सकता है. इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

सुकन्या शांता ने दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की. याचिका दाख़िल करने से पहले उन्होंने 'क्या जेलों में कोई और भेदभाव हो रहा है' पर विस्तृत शोध किया और यह पाया कि वंचित और उपेक्षित समुदाय के क़ैदियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है.

कुछ राज्यों के जेल नियमों में अधिसूचित जनजातीय समुदाय के क़ैदियों को आदतन अपराधी कहा गया है.

सुकन्या की वकील दिशा वाडेकर ने बीबीसी मराठी से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ध्यान में तीन प्रमुख मुद्दे लाए गए हैं- जेल में जाति के आधार पर क़ैदियों का बँटवारा, यानी हर जाति के लिए अलग बैरक, जाति के हिसाब से काम का बँटवारा और अधिसूचित जनजातियों के प्रति भेदभाव.

'जेलों में जातिगत भेदभाव बंद होना चाहिए'

इस मामले में पहली सुनवाई जनवरी 2024 में हुई थी.

उस वक़्त सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जेलों में जातिगत भेदभाव बंद होना चाहिए.

इस मामले पर राज्यों के साथ केंद्र सरकार को भी जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया.

क़रीब छह महीने के बाद अभी तक सिर्फ़ उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल सरकार ने ही अपना जवाब दाख़िल किया है.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोर्ट को बताया था कि उसने राज्यों के जेल नियमों में बदलाव के निर्देश देते हुए कहा है कि राज्य की जेलों में जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए.

केंद्रीय गृह मंत्रालय का निर्देश

सुकन्या शांता, पत्रकार

केंद्र सरकार ने पिछले 26 फ़रवरी को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक अधिसूचना जारी की थी.

इसमें कहा गया है, "मंत्रालय के ध्यान में आया है कि कुछ राज्य के जेल मैनुअल क़ैदियों को जाति और धर्म के आधार पर बाँटते हैं और उसी आधार पर उन्हें काम सौंपते हैं. जाति, धर्म, नस्ल, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव होता है. यह भारत के संविधान के तहत ग़ैर-क़ानूनी है."

गृह मंत्रालय ने 2016 में एक मॉडल जेल मैनुअल तैयार किया है और इसे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक साथ वितरित किया है.

इसके मुताबिक, क़ैदियों को जाति और धर्म के आधार पर बांटने पर सख़्त पाबंदी है. साथ ही किसी जाति-धर्म के क़ैदी को विशेष सुविधाएं देने पर भी रोक है.

इसमें कहा गया है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके राज्य जेल नियमों में किसी तरह का कोई भेदभावपूर्ण प्रावधान नहीं हो.

यह बहुत दुखद है- सुप्रीम कोर्ट

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इस मामले में आख़िरी सुनवाई आठ जुलाई को हुई थी. सुकन्या का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुरलीधर ने कहा कि कुछ राज्यों ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है.

इसलिए उन्होंने दलील दी कि कोर्ट उन्हें जवाब दाखिल करने का आदेश दे. उन्होंने उत्तर प्रदेश जेल नियमावली के कुछ प्रावधानों को भी अदालत में पढ़ा.

इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि हमारी जेलों में कोई जातिगत भेदभाव नहीं है. लेकिन, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने जेल नियमों को भी पढ़ा और उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई.

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने पश्चिम बंगाल के वकीलों से जेल नियम भी पढ़ने को कहा. वहां भी जेल नियम में इसका ज़िक्र था कि सफाई कर्मचारी कौन होना चाहिए.

इसे पढ़ने के बाद बेंच ने पूछा कि क्या आपको इसमें कोई समस्या नज़र आती है? सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि जेल के ये नियम बेहद तकलीफ़देह हैं.

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने गृह मंत्रालय को भारत की जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को ख़त्म करने के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया.

इस मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है और फ़ैसला सुरक्षित रख लिया गया है.

ख़बर से व्यवस्था बदलने तक का सफ़र

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सुकन्या शांता को लगता है कि इस मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला होगा.

बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "जेलों में मुद्दों पर कई संगठन काम कर रहे हैं. लेकिन कोई भी जेलों में जाति-आधारित भेदभाव के बारे में बात करने को तैयार नहीं है."

"मैंने इस जाति-आधारित भेदभाव को उजागर करने के लिए विस्तृत रिपोर्टिंग की. राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा समाचार पर संज्ञान लेने के बाद, उम्मीद जगी कि इस मामले में क़ानूनी नियम बदल सकते हैं."

"वकीलों से बात करने और शोध करने पर पता चला कि जाति के आधार पर क़ैदियों के साथ भी भेदभाव किया जा रहा है. वहां मानवाधिकारों का भी उल्लंघन किया जा रहा है. इसलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. अब सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को ख़त्म करने के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने की बात कही है."

शांता इस मामले की सुनवाई से ख़ुश हैं.

उनका मानना ​​है, ''मुझे ख़ुशी है कि मेरी ख़बर से व्यवस्था बदल जाएगी, जेल के नियम बदल जाएंगे.''

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