सीरिया से वापस आने वाले भारतीय क्या कह रहे हैं

लेबनान में भारत के राजदूत नूर रहमान शेख़ सीरिया में लाए गए भारतीय नागरिकों के साथ. ये तस्वीर 11 दिसंबर की है.

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इमेज कैप्शन, लेबनान में भारत के राजदूत नूर रहमान शेख़ सीरिया से लाए गए भारतीय नागरिकों के साथ. ये तस्वीर 11 दिसंबर की है.
    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी, नई दिल्ली

"दो बार पहले भी मेरे पासपोर्ट पर सीरिया का वीज़ा लगा था. हालाँकि, कई कारणों से मैं जा नहीं पाया. इस बार जब वीज़ा लगा तो तय किया कि ज़रूर जाऊँगा. हालाँकि, वहाँ जाकर मैंने जो देखा और जिस हालत में वापस लौट पाया, अब कभी वहाँ नहीं जाना चाहूँगा.''

ये अल्फ़ाज़ 44 साल के व्यवसायी रवि भूषण के हैं. उनकी कंपनी बिजली उत्पादन के क्षेत्र में काम करती है.

कंपनी के काम से वे तीन दिसंबर को सीरिया पहुँचे थे. उथल-पुथल के बीच भारत सरकार की मदद से 12 दिसंबर को वापस देश लौट पाए.

सीरिया में 13 साल से जारी गृह युद्ध ने कम से कम एक करोड़ 20 लाख लोगों को विस्थापित किया है. संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया की स्थिति को विश्व का सबसे बड़ा विस्थापन संकट बताया है.

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वीडियो कैप्शन, सीरिया से वापस लौटे लोगों से बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने एयरपोर्ट पर बात की.

पिछले कुछ दिनों में वहाँ हालात तेज़ी से बदले हैं. विद्रोहियों ने राजधानी दमिश्क समेत कई बड़े शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया. पूर्व राष्ट्रपति बशर-अल-असद को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.

फ़िलहाल जहाँ एक तरफ़ विद्रोही गुट सरकार चलाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं पड़ोसी देश इसराइल भी सीरिया के अलग-अलग ठिकानों पर हमले कर रहा है. इन सबके बीच लूटपाट और हिंसा की ख़बरें भी आ रही हैं.

वहाँ के बिगड़ते हालात देख कर भारत ने छह दिसंबर को अपने नागरिकों से सीरिया न जाने की हिदायत दी थी. विदेश मंत्रालय के मुताबिक तब तक सीरिया में 90 भारतीय जा चुके थे.

दमिश्क के क्या हाल थे?

सुनील दत्त
इमेज कैप्शन, सुनील दत्त ने बताया कि असद सरकार के पतन के बाद दमिश्क में क्या हालात हो गए थे.
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ग्यारह दिसंबर को विदेश मंत्रालय ने बताया कि कई दिनों के प्रयासों के बाद उसे 75 भारतीय नागरिकों को सीरिया से निकालने में कामयाबी मिली है.

रवि भी उनमें से एक हैं. बीबीसी हिंदी ने उनसे उनके दफ़्तर में मुलाक़ात की. राजधानी दिल्ली के नज़दीक उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद ज़िले में उनका दफ़्तर है.

रवि ने बताया, ''जिस होटल में हम रुके थे, अचानक एक सुबह उसकी दीवारें हिलने लगीं. वह आठ दिसंबर का दिन था. भोर तीन बजे से शाम चार बजे तक विद्रोहियों ने गोलियाँ चलाईं. गाड़ियाँ तोड़ीं. सामान लूटा. दुकानों और बैंकों को भी लूटा."

"हम यह सब अपने कमरे के अंदर से देख रहे थे. हम बहुत डरे हुए थे. हमने तो रूम सर्विस स्टाफ़ के लिए भी दरवाज़ा नहीं खोला. रूम की रोशनी बंद कर दी और शांति से बैठे रहे."

उनचास साल के सुनील दत्त पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं. वे पिछले सात महीनों से दमिश्क के पास एक इलाके में 13 कर्मचारियों की टीम का नेतृत्व कर रहे थे.

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने बताया, ''उन सात महीनों में हम लोगों को किसी क़िस्म की तकलीफ़ नहीं हुई. हम तो रात को भी दमिश्क आते-जाते रहते थे. वहाँ जो हुआ और जितनी जल्दी हुआ, ऐसा होने की उम्मीद किसी को नहीं थी."

अपना अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा, ''जैसे ही दमिश्क पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा किया, लूटपाट मच गई. लेकिन वहाँ की सेना के जवान हमारे होटल के बाहर आ गए. उन्होंने हालात क़ाबू में किए. वहाँ तो छोटे-छोटे बच्चे भी बंदूक लेकर घूम रहे थे."

आठ दिसंबर को विद्रोही सीरिया की राजधानी पहुँच गए थे. इसके बाद राष्ट्रपति असद ने देश छोड़ा दिया था.

रवि भूषण बताते हैं, ''उसके पहले की रात तक दमिश्क में चीज़ें सामान्य थी.''

वे कहते हैं, ''सबको ऐसा लग रहा था कि दमिश्क में हम तक पहुँचने में विद्रोहियों को कम से कम एक हफ़्ता लगेगा. यह सब जब हुआ, उसके पहले वाली रात को हम लोग बाहर डिनर पर मिले. सब कुछ ठीक था. बाज़ार भी खुले थे.''

भारतीय दूतावास से लगातार संपर्क

व्यवसायी रवि भूषण
इमेज कैप्शन, व्यवसायी रवि भूषण

जैसे ही स्थिति बिगड़ने लगी, वैसे ही सीरिया में फँसे ये लोग भारतीय दूतावास के संपर्क में आ गए. कुछ लोगों को दूतावास की तरफ़ से कॉल आ गए तो कुछ लोगो ने ख़ुद संपर्क साधा.

वापस लौटे इन लोगों ने बताया कि उन सबको एक साथ रहने और अपना सामान अपने पास ही रखने की हिदायत दी गई. इसके अलावा यह भी कहा गया कि उन्हें कम समय की नोटिस पर यहाँ से निकलना पड़ सकता है.

फिर 10 दिसंबर को निकलने का संदेश आ गया.

रवि भूषण याद करते हैं, ''सुबह 11 बजे उनका कॉल आया कि किसी भी समय वह हमें यहाँ से निकालेंगे. आख़िर में हम दो बजे निकल पाए. पहले हम भारतीय दूतावास गए. बाक़ी लोगों का इंतज़ार किया.

"वहाँ से वे हमें लेबनान के बॉर्डर पर ले गए. वहाँ सीरिया वाले दूतावास ने हमें लेबनान के भारतीय दूतावास के हवाले किया. वहीं हमने खाना भी खाया. इसका इंतज़ाम हमारे अधिकारियों ने किया था."

"वहाँ का तापमान चार या पाँच डिग्री के आसापास था. बाक़ी देशों के लोग ख़ुद ही अपना काम कर रहे थे लेकिन हमारे साथ भारतीय दूतावास के लोग थे. उन्होंने ही सब काम कराए. वीज़ा लगवाये.

"इसके बाद हम बस बदल कर बेरूत के लिए रवाना हुए. यहाँ उन्होंने हमें एक होटल में ठहराया. इन अधिकारियों ने हम सबका हौसला बढ़ाया. उन्होंने यह भी बताया कि अगले दो-तीन दिनों में वह हमें भारत वापस भेज देंगे.''

क्या सारे भारतीय वापस आ गए हैं?

रचित कपूर
इमेज कैप्शन, रचित कपूर ने बताया कि भारतीय दूतावास ने उन लोगों को सही समय पर बाहर निकाल लिया था.

ग्रेटर नोएडा के रहने वाले 42 साल के रचित कपूर भी सीरिया में काम करते थे. वे भी 14 दिसंबर को कुछ लोगों के साथ दिल्ली पहुँचे.

वे बताते हैं, "वहाँ कई बॉर्डर बंद हो चुके थे. ऐसे में हमें सीरिया से बाहर निकालने का एक ही रास्ता था. हमारे दूतावास के अधिकारियों ने हमें वहाँ से ठीक समय पर निकाला. इसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ."

उनसे हमने पूछा कि उनके लिए सबसे बड़ी सीख क्या थी?

वे कहते हैं, "मैंने यह सीखा कि आप बाहर जहाँ भी जाएँ, आपको अपने देश के दूतावास के संपर्क में रहना ही चाहिए, भले वहाँ शांति हो. न जाने हालत कब बिगड़ जाए.''

क्या सारे भारतीय सीरिया से वापस आ गए हैं? इसका जवाब है - नहीं.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया, ''कई भारतीय सीरिया में ही बस गए हैं. वे वहाँ शादी कर चुके हैं या फिर कोई व्यवसाय कर रहे हैं. वे अभी भी वहीं हैं. अगर वे वापस लौटना चाहेंगे तो हम उनकी भी मदद करेंगे.''

जिन लोगों को सीरिया से निकाला गया, उनमें लगभग 40 लोग जम्मू-कश्मीर के रहने वाले हैं. जायसवाल ने बताया, ''उनमें से कई लोग तीर्थयात्रा पर निकले थे. वे अब दूसरी जगहों के दौरे पर हैं.''

सीरिया को कैसे याद करते हैं?

वापस लौटे भारतीय नागरिकों से हमने जानना चाहा कि सीरिया के लोगों और वहाँ के हालात के बारे में उनकी क्या राय है?

सुनील दत्त ने बताया, ''हमें तो वहाँ के लोग वापस आने ही नहीं दे रहे थे. वे कह रहे थे कि वे हमारी सुरक्षा करेंगे. जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. दरअसल असद की सरकार वहाँ पिछले 50 साल से राज कर रही थी लेकिन हालात बहुत ख़राब थे. लोग भूखे मर रहे थे. सरकार ने उनकी किसी क़िस्म की मदद नहीं की. लोगों में नाराज़गी बहुत थी. मैं कहूँगा कि जो अब हुआ है, यह तो एक दिन होना ही था.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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