सीरिया : जब एचटीएस के लड़ाके ने बीबीसी संवाददाता को स्कार्फ पहनने को कहा

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इमेज कैप्शन, रिपोर्टिंग करने सीरिया पहुंचीं बीबीसी की वरिष्ठ मध्य पूर्व संवाददाता नफीशे कोहानवार्ड
    • Author, नफीशे कोहानवार्ड
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दमिश्क में

जब मैं सीरिया की राजधानी दमिश्क के मुख्य चौराहे से गुज़र रही थी तभी मेरा सामना हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) के एक सशस्त्र सदस्य अबु हम्माम और उनके चचेरे भाई मोहम्मद से हुआ.

दोनों एक-दूसरे को कसकर गले लगा रहे थे, क्योंकि हम्माम अपने चचेरे भाई से 15 साल के लंबे अंतराल के बाद मिल रहे थे.

30 साल के हम्माम ने बताया कि वो सीरियाई क्रांति के शुरुआती सालों में अलेप्पो में कई साल लड़े और यहीं वो हयात तहरीर अल-शाम में शामिल हुए. यही नहीं कुछ साल उन्होंने अज़रबैज़ान में भी गुज़ारे.

मैंने उनसे कुछ देर बात की.

हम्माम ने मुझसे पूछा, "आपका नाम अरबी है, लेकिन आप अरब नहीं हो, आप कहां की रहने वाली हो?"

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मैंने कुछ संभलकर जवाब दिया कि मैं मूल रूप से ईरान में पश्चिमी अज़रबैज़ान से ताल्लुक रखती हूँ.

वह (हम्माम) थोड़ा मुस्कुराए और कहा, "हमारे कई पूर्वज बाल्कन से और ईरान के नजदीक पूर्व सोवियत संघ के देशों से थे. मुझे ईरानी लोग पसंद हैं, लेकिन मुझे ईरान की सरकार पसंद नहीं है. हम तो उनसे हथियारों से लड़े हैं."

उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं ईसाई हूँ?- मैं थोड़ा मुस्कुराई और बात को मजहब से इतर ले जाने की कोशिश की.

लेकिन उन्होंने बातचीत के सिलसिले को बनाए रखा, हम्माम बोले, "क्या मैं आपको एक सलाह दे सकता हूँ? क्या आपके पास हेडस्कार्फ है?"

मैंने कहा- हां, बिल्कुल. मेरे पास अभी भी है.

वो बोले, "मुझे लगता है मुस्लिम महिला होने के नाते अगर आप इसे पहनेंगी तो ज़्यादा सुंदर लगेंगीं."

'अचानक से मुझे लगा कि मैं बचपन में लौट गई हूँ'

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कुछ उनके प्रति सम्मान और कुछ सुरक्षा वजहों से मैंने अपना हेडस्कार्फ निकाला और अपना सिर का कुछ हिस्सा ढक लिया जैसा मैं ईरान में किया करती थी.

हम्माम बोले, "और अच्छा होगा अगर आप इसे थोड़ा और आगे लाएं और पूरे बाल ढक लें."

ईरानी महिला होने के नाते मैं इस तरह की सलाह से परिचित हूँ. मेरी परवरिश ईरान के इस्लामिक क़ानूनों में हुई थी,जहाँ मुझे जबरन हेडस्कार्फ़ पहनना पड़ता था.

वहीं, दमिश्क में एक और शख्स से सामना हुआ नाम था वायेल. वायेल का कहना था कि उनकी तीन बेटियां हैं, लेकिन उन्होंने उन्हें कभी नहीं बताया कि मजहब का किस तरह पालन करना है.

कुछ ऐसी ही राय हमारे गाइड माजद की भी थी. माजद का कहना था, "मेरी गर्लफ्रेंड ईसाई है, मुझे उसे लेकर चिंता हो रही है. हम खुश हैं कि असद चले गए हैं, लेकिन अब इन मुद्दों को लेकर चिंतित भी हैं."

अचानक से मुझे लगा कि मैं अपने बचपन में लौट गई हूँ.

क्या सीरिया में शरिया कानून लागू करने वाली सरकार बनेगी?

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मैं तब छह साल की थी, जब मैं उरमिया में एक फ्रेंच स्कूल में पढ़ती थी और तभी स्कूलों में हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया था.

मुझे याद है कि कैसे गुलाबी पोशाकें रातोंरात काली हो गईं थीं और हिजाब पहनने को मजबूर किया जाने लगा था.

अभी तक तो सीरिया की अंतरिम सरकार का ये कहना है कि वह बिना किसी मजहबी भेदभाव के सीरिया के लोगों के लिए सरकार बनाना चाहती है.

हालाँकि याद दिला दूं कि ईरानी क्रांति के शुरू में कुछ ऐसा ही हुआ था और अधिकतर लोगों ने तब ये उम्मीद नहीं की थी कि ये इस्लामिक गणराज्य (ईरान) शरिया क़ानून लागू करेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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