ज़ंग खाता एक जहाज़ जो समुद्र के एक हिस्से की जागीरदारी के झगड़े को दिखाता है - दुनिया जहान

इमेज स्रोत, Getty Images
इस साल 17 जून को विवादित साउथ चाइना सी यानी दक्षिण चीन सागर में चीन के एक जहाज़ ने जानबूझ कर फिलीपींस के जहाज़ को टक्कर मार दी.
फिलीपींस की सेना ने एक वीडियो जारी किया जिसमें दिखाई दे रहा है कि चीनी कोस्ट गार्ड हाथों में छुरे, तलवार और भाले लेकर फिलीपींस के जहाज़ पर चढ़ रहे हैं.
दावा किया जा रहा है कि इस हिंसा में फिलीपींस का एक नाविक बुरी तरह घायल हो गया. चीन ने कहा कि इसमें उसके तटरक्षक बल की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि उन्हें रोका जा रहा था.
पिछले कुछ सालों में यह साउथ चाइना सी में हुई ताज़ा मुठभेड़ है. इससे पहले आरोप लग रहे थे कि चीनी तटरक्षक बलों ने सिएरा माद्रे नाम के जहाज़ को रसद पहुंचाने जा रहे फिलीपींस के नाविकों को परेशान करने के लिए उन पर वॉटर कैनन से पानी की बौछार की और लेज़र का इस्तेमाल किया.

सिएरा माद्रे जहाज़ को फिलीपींस ने जानबूझ कर 1999 में वहां खड़ा कर दिया था. यह जहाज़ ख़स्ता हालत में है मगर उस पर कुछ नौसैनिक तैनात हैं.
सिएरा माद्रे इस विवाद का प्रतीक बन गया है कि साउथ चाइना सी के किस हिस्से पर किसका अधिकार है.
इस क्षेत्र में समुद्री चट्टानें हैं, कुछ छोटे द्वीप और कोरल रीफ़ हैं. कई टापू तो पानी में डूबे हुए हैं.
लेकिन इसके बावजूद यह क्षेत्र एक अंतरराष्ट्रीय चिंता का मुद्दा बन गया है. इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही समझने की कोशिश करेंगे कि एक ज़ंग खाते युद्धपोत से साउथ चाइना सी के तनाव के बारे में क्या पता चलता है?
विवादित जल क्षेत्र

इमेज स्रोत, Getty Images
दक्षिण चीन सागर प्रशांत महासागर और हिंद महासागर को जोड़ता है. यह चीन के दक्षिण और पश्चिम से ताइवान और आगे फिलीपींस, विएतनाम होते हुए मलेशिया तक फैला हुआ है.
साउथ चाइना सी के तट पर बसे सभी देशों के लिए यह जलमार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल एशिया ही नहीं बल्कि पश्चिम में स्थित देशों से व्यापार का भी यह बड़ा जलमार्ग है.
इस्तांबुल स्थित स्वतंत्र शोधकर्ता हशीम टर्कर कहते हैं कि केवल इस सागर के तट पर बसे देश ही नहीं बल्कि जापान और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था भी साउथ चाइना सी से जुड़ी हुई है. लेकिन सबसे अधिक चीन के हित इस समुद्र से जुड़े हुए हैं.
वो कहते हैं, “चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जलमार्ग से होने वाला उसका 60 प्रतिशत व्यापार साउथ चाइना सी से होता है जिसकी वजह से यह क्षेत्र विश्व सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से काफ़ी अहम है.”
डॉ. हशीम टर्कर बताते हैं कि इस क्षेत्र में दो बड़ी खाड़ियां हैं. मलक्का खाड़ी और लूज़ॉन खाड़ी.
मलक्का खाड़ी साउथ चाइना सी के दक्षिण में है और यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है. मलक्का खाड़ी इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप और मलेशिया के बीच स्थित है.
इस क्षेत्र में लगभग 40 बंदरगाह हैं और दुनिया का एक तिहाई व्यापार इसी मार्ग के ज़रिए होता है.
इस खाड़ी की सबसे संकरी जगह महज़ 65 किलोमीटर चौड़ी है, इसलिए यहां पर जहाज़ों का ट्रैफ़िक जाम और उनमें टक्कर होने का ख़तरा बना रहता है.
वैश्विक व्यापार के लिए कितना अहम है यह क्षेत्र

इमेज स्रोत, Getty Images
डॉ. हशीम टर्कर के अनुसार, यहां से दुनिया का 3.5 खरब डॉलर का माल गुज़रता है. आर्किटक जलमार्ग दूसरा विकल्प हो सकता है लेकिन वो जलमार्ग केवल गर्मियों में ही खुला रहता है.
यह एक महत्वपूर्ण जलमार्ग तो है ही मगर साउथ चाइना सी के तट पर बसे मलेशिया, इंडोनेशिया, ताइवान और फिलीपींस के लिए यह खनिज संपदा प्राप्त करने और मछली पकड़ने का मुख्य स्रोत है.
डॉ. टर्कर कहते हैं कि एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में नैचुरल गैस और लगभग 11 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार हो सकता है. यहां मछलियां भी प्रचुर मात्रा में हैं.
साउथ चाइना सी में 250 से ज़्यादा द्वीप, रीफ़ यानि चट्टानें हैं जो तट से सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं. इस क्षेत्र पर दावा ठोकने वाले देशों के लिए इनका सामरिक महत्व है.
डॉ. हशीम टर्कर ने कहा कि यह टापू तनाव का केंद्र बन गए हैं. कई द्वीपों पर कुछ देश सैनिक अड्डे और हवाई अड्डे बना रहे हैं. इस वजह से यह मसला पेचीदा हो चला है क्योंकि यहां संप्रभुता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.
इस क्षेत्र पर विभिन्न देशों के दावे बहुत पुराने हैं जिन्हें जानने के लिए इतिहास पर नज़र डालना ज़रूरी है.
पिछली सदी की शुरुआत में ताइवान यानी रिपब्लिक ऑफ़ चाइना जापानी साम्राज्य का हिस्सा था और जापान ने साउथ चाइना सी के अधिकांश हिस्से पर दावा कर दिया था. दूसरे महायुद्ध में जापान की हार के बाद स्थिति बदल गई.
डॉ. हशीम टर्कर कहते हैं कि 1951 में जापान ने क्षेत्र से अपना दावा तो छोड़ दिया लेकिन जो पहले इसके मालिक थे उन्हें यह क्षेत्र नहीं लौटाया जिसकी वजह से यह मुद्दा जटिल हो गया.
चीन इस पूरे क्षेत्र पर दावा करता है. अगर चीन ताइवान को अपने अधीन कर ले तो साउथ चाइन सी के बड़े हिस्से पर उसका वर्चस्व हो सकता है. लेकिन चीन का दावा इससे कहीं अधिक है.
चीन का दावा
लंदन स्थित सोआस चाइना इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रोफ़ेसर स्टीव सांग का मानना है कि व्यापारिक और सामरिक दृष्टि के साउथ चाइना सी का चीन के लिए बड़ा महत्व है.
“चीन का दावा उसके सामरिक, राजनीतिक और व्यापारिक हितों को दिखाता है. उसका आधिकारिक दावा इतिहास पर आधारित है. और वहां ऐतिहासिक तथ्य चीन की कम्युनिस्ट पार्टी तय करती है. उसकी सोच यह है कि इतिहास वही है जो चीन के राष्ट्रीय हित में है.”
चीन के नेता माओ के नेतृत्व के दौरान देश उथल पुथल से गुज़र रहा था लेकिन 1976 में माओ की मृत्यु के बाद देंग ज़ियोपिंग ने नेतृत्व संभाला और देश में व्यापक आर्थिक विकास का दौर शुरू हुआ जिसके साथ चीन की व्यापारिक महत्वाकांक्षा भी बढ़ गई.
प्रोफ़ेसर स्टीव सांग ने बताया कि सत्तर के दशक में उन्होंने पुराने नक़्शे के आधार पर साउथ चाइना सी पर अपना दावा करना शुरू कर दिया क्योंकि चीन का कहना है कि यह शुरू से ही उसका हिस्सा रहा है.
दूसरे महायुद्ध के अंत के बाद से अमेरिकी नौसेना साउथ चाइना सी की निगरानी करती रही है. उस समय चीन के पास उसे चुनौती देने की क्षमता नहीं थी.
प्रोफ़ेसर स्टीव सांग कहते हैं कि अब चीन ने ताकतवर नौसेना बना ली है जिसमें न्यूक्लियर सबमरीन या परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां भी शामिल हैं.
इसलिए अब वो इस क्षेत्र पर अधिकार जता रहा है.
दूसरी बात यह है कि अगर साउथ चाइना सी पर उसका कब्ज़ा हो जाए तो उसकी न्यूक्लियर सबमरीन पर नज़र रखना पश्चिमी देशों के लिए मुश्किल हो जाएगा. इसलिए चीन के लिए इस क्षेत्र का विशेष सामरिक महत्व है.
मगर चीन के अलावा दूसरे देश भी साउथ चाइना सी पर दावा कर रहे हैं.
2016 में दी हेग अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने चीन के दावे को ख़ारिज कर दिया मगर चीन ने उसके फ़ैसले को नज़रअंदाज़ कर दिया और साथ ही यह भी दावा किया कि ताइवान चीन का हिस्सा है.
प्रोफ़ेसर स्टीव सांग कहते हैं, “साउथ चाइना सी के ताइपींग द्वीपों पर ताइवान का नियंत्रण है और ताइवान पर अपना दावा कर के चीन पूरे साउथ चाइना सी पर अपना दावा मज़बूत करना चाहता है. मगर ताइवान भी विवादित द्वीपों पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं है.”
ये सभी दावे अब अदालती फ़ैसलों और नक्शों से आगे निकल गए हैं और एक ख़तरनाक संघर्ष की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.
सिएरा माद्रे जहाज़
फिलीपींस साउथ चाइना सी के स्पार्टली आयलैंड द्वीपसमूहों सहित कई द्वीपों पर अपना दावा करता है और वो उस क्षेत्र को वेस्ट फिलीपींस सी यानि पश्चिम फिलीपींस सागर कहता है.
अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार, किसी देश के तट से 200 नॉटिकल मील तक के इलाके को उस देश का हिस्सा माना जाता है.
2022 में फिलीपींस में सरकार बदल गई. उसके पहले के नेता रोड्रिगो दूतार्ते ने चीन के साथ संबंधों के मद्देनज़र इस मुद्दे को तूल नहीं दिया था.
लेकिन जब नए नेता फ़र्डिनंड मार्कोस ने सत्ता संभाली तो उन्होंने अलग नीति अपनाई.
फिलीपींस यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर मैरिटाइम अफ़ेयर्स एंड लॉ ऑफ़ दी सी के निदेशक जय बोटांगबकाल कहते हैं कि पूर्व नेता दूतार्ते चीन के साथ संघर्ष नहीं चाहते थे इसलिए चीन बिना रोकटोक साउथ चाइना सी में अपना नियंत्रण स्थापित करने की कार्यवाहियां करता रहा.
“फिलीपींस साउथ चाइना सी के ज़रिए शेष पूर्व एशिया से जुड़ा हुआ है. उसका माल इसी सागर के रास्ते बाहर जाता है और उसका हवाई यातायात भी साउथ चाइना सी के ऊपर से गुज़रता है. अगर किसी एक देश का इस समुद्र पर नियंत्रण हो जाएगा तो फिलीपींस को उस पर निर्भर होना पड़ेगा.”
“यह फिलीपींस की खाद्य सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी 27 प्रतिशत मछलियां इसी क्षेत्र से पकड़ी जाती हैं. ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से भी क्षेत्र फिलीपींस के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुमान है कि वहां तेल और गैस के बड़े भंडार हैं.”
फिलीपींस आने वाली सभी केबल साउथ चाइना सी में बिछी हुई हैं मतलब फिलीपींस में इंटरनेट की सुविधा के लिए भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि जब फिलीपींस के कूटनीतिक प्रयास चीन की धमकियों और ज़बरदस्ती को रोकने में नाकामयाब रहे तो उसने चीन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का रास्ता चुन लिया है.
चीन की आक्रामकता

इमेज स्रोत, Getty Images
जय बोटांगबकाल ने कहा कि, “दुर्भाग्यवश पिछले 20 सालों के दौरान चीन ने साउथ चाइना सी पर अपनी दावेदारी को लेकर आक्रामकता दिखानी शुरू कर दी है. नतीजतन 2012 में चीन और फिलीपींस के बीच संघर्ष हुआ जिसके चलते फिलीपींस ने चीन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में गुहार लगाई.”
2012 में चीन द्वारा स्कारबरा शोल नाम के एक रीफ़ या समुद्री चट्टान पर कब्ज़े की वजह से संघर्ष शुरू हुआ था क्योंकि फिलीपींस इस रीफ़ को अपना हिस्सा मानता रहा है.
लेकिन दो देशों के बीच गतिरोध की शुरुआत लगभग 20 साल पहले हो चुकी थी जिसकी वजह थी एक जंग खाता युद्धपोत - सिएरा माद्रे.
1999 में फिलीपींस ने इस जहाज़ को अपने तट से लगभग 100 किलोमीटर दूर सेकंड थॉमस शोल नाम के रीफ़ के पास खड़ा कर दिया था.
इस कार्यवाही का मक़सद साउथ चाइना सी पर फ़िलीपींस की दावेदारी पेश करना था और यह एक जवाबी कार्यवाही भी थी क्योंकि इसके पास ही चीन ने अपना नौसैनिक अड्डा स्थापित कर दिया था.
जय बोटांगबकाल ने कहा कि, “सिएरा माद्रे साउथ चाइना सी पर चीन के दावे को फिलीपींस द्वारा दी जा रही चुनौती का प्रतीक बन गया है. अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सेकंड थॉमस शोल पर फिलीपींस का अधिकार माना गया था. इसलिए इस रीफ़ और क्षेत्र पर चीन का दावा जायज़ नहीं है.”
सिएरा माद्रे को वहां खड़े लगभग 25 साल हो गए हैं और उसकी हालत इतनी ख़स्ता है कि बहुत जल्द वह रहने लायक नहीं रहेगा. मगर जहाज़ पर मौजूद कर्मचारियों की छोटी सी टीम को फिलीपींस से नौकाओं के ज़रिए आवश्यक सामग्री की सप्लाई होती है.
लेकिन पिछले कुछ समय से चीन उन नौकाओं पर वॉटर कैनन और लेज़र से हमले कर रहा है और उसकी तटरक्षक नौकाएं फिलीपींस की सप्लाइ नौकाओं को टक्कर मारने की कोशिश भी करती हैं.
जय बोटांगबकाल का कहना है कि अगर सिएरा माद्रे को सहायता बंद हो गई तो उस पर तैनात कर्मचारियों को जहाज़ छोड़ना पड़ेगा और बाद में चीन उसे ध्वस्त करके वहां अपना अड्डा बना लेगा और फिलीपींस को दोबारा वहां नहीं आने देगा.
समुद्र की निगरानी
अमेरिका स्थित सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के साउथ ईस्ट एशिया प्रोग्राम के निदेशक ग्रेगरी पोलिंग मानते हैं कि समुद्र के बड़े हिस्से पर किसी एक देश का दावा नाजायज़ माना जाता है.
समुद्र में खुली आवाजाही अमेरिका के सामरिक और आर्थिक हितों के लिए बेहद ज़रूरी है.
फिलीपींस और अमेरिका के बीच रक्षा समझौता कायम है और ऐसे में चीन और फिलीपींस के बीच संघर्ष से अमेरिका और चीन दोनों के लिए एक असहज स्थिति पैदा हो जाएगी.
“अमेरिका साउथ चाइना सी के तनाव पर पैनी नज़र रख रहा है मगर वो क्षेत्र पर दावों के विवाद में सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहता लेकिन फिलीपींस के साथ रक्षा समझौते के चलते अगर चीन ने बल प्रयोग किया तो वो फिलीपींस की सहायता करने को बाध्य हो जाएगा.”
अमेरिका के लिए इस विवाद का समाधान कितना महत्वपूर्ण है?
ग्रेगरी पोलिंग ने जवाब दिया कि, “मुझे नहीं लगता कि यह विवाद अमेरिका या फिलीपींस का इस मुद्दे पर खुल कर समर्थन करने वाले दूसरे देशों के लिए आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन अगर चीन अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करके अपनी ताक़त के बल पर मनमानी करेगा तो वो ज़रूर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय है.”
फ़िलहाल दुनिया में यह चिंता ज़्यादा है कि चीन ताइवान को मुख्य भूमि में मिलाने के लिए उस पर हमला कर सकता है.
ग्रेगरी पोलिंग मानते हैं कि फ़िलहाल चीन की ताइवान संबंधी महत्वाकांक्षा से भी बड़ी चिंता का विषय साउथ चाइना सी में सीधा संघर्ष छिड़ जाने की संभावना है.
इस क्षेत्र में सैन्य संघर्ष भड़कने का ख़तरा बढ़ता जा रहा है. यह ख़तरा ताइवान के साथ संघर्ष से अधिक बड़ा है.
उनके अनुसार, “युद्ध की बजाय यह ज़रूर हो सकता है कि साउथ चाइना सी में चीन और फिलीपींस या चीन और अमेरिका के बीच छोटी सैनिक झड़पें हों जिससे दोनों पक्षों का रुख़ और कड़ा हो जाएगा. लेकिन फ़िलहाल वो स्थिति को नियंत्रित कर रहे हैं.”
और अब हम लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर. चीन साउथ चाइना सी के बड़े हिस्से पर दावा कर रहा है और ऐसा ही दावा दूसरे देश भी कर रहे हैं.
हालांकि चीन ने पिछली सदी के मध्य से यह दावा करना शुरू कर दिया था लेकिन अब वो इसे लेकर आक्रामक हो रहा है.
चीन के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नौसेना है. इस क्षेत्र में उसने तीन नौसैनिक अड्डे बना रखे हैं और आसानी से इस क्षेत्र में गश्त कर सकता है और दूसरे देश के जहाज़ों के लिए दिक्कतें खड़ी कर सकता है.
क्षेत्र के दूसरे देश चीन का मुकाबला नहीं कर सकते इसलिए साउथ चाइना सी को सबके लिए खुला रखने के लिए इसमें अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)





















