चीन के आगे फ़ंड की कमी से विदेश नीति में कमज़ोर पड़ रहा भारत?

आईएनएस केसरी

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    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

दक्षिण हिंद महासागर के ख़राब मौसम में 55 दिन का लंबा सफ़र करके एक अकेला युद्धक जहाज़ खाद्य सामग्री और दवाइयाँ पहुँचा रहा है.

संक्षेप में, ये भारत के जहाज़ आईएनएस केसरी की कहानी है जो भारत सरकार के 'मिशन सागर' के तहत मालदीव, मॉरीशस, कोमरोज़ द्वीप और सेशल्स द्वीपों पर कोविड राहत सामग्री पहुँचाने में लगा रहा.

महामारी के शुरुआती दिनों में 6 मई से 28 जून के बीच किये गए भारतीय नौसेना के इस प्रयास को बहुत सुर्खियाँ नहीं मिलीं.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि 'ये अभियान भारत के हिंद महासागर में अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता का प्रतिबिंब है.'

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ये प्रयास बहुत बड़ा लग सकता है और इसका समय बेहद अहम है, लेकिन ये अपने आप में नया नहीं था.

अधिकतर विश्लेषक जिनसे मैंने बात की, उनका कहना है कि 'भारत हमेशा ही अपने पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देता रहा है.'

21 अगस्त तक भारत का विदेश मंत्रालय कुल 25 प्रेस विज्ञप्तियां जारी कर चुका है जिनमें से नौ का संदर्भ भारत और उसके पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों से है.

जुलाई में 31 प्रेस विज्ञप्तियां जारी की गई थीं जिनमें से चार का ही संदर्भ पड़ोसी देशों से था. वहीं जून में 36 विज्ञप्तियों में से सिर्फ़ दो ही पड़ोसी देशों से जुड़ीं थीं.

यदि इससे पिछले दो महीनों का विश्लेषण किया जाये तो ये दर और भी कम है.

लेकिन क्या प्रेस विज्ञप्तियां ही भारत के पड़ोसी देशों से रिश्तों को मापने का एकमात्र तरीका हैं? जवाब है- नहीं.

भारत और पड़ोसी देश

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कितना महत्व दिया गया, इसके भी मायने हैं

अगस्त 18: भारत के विदेश सचिव हर्ष वर्धन सिंघला भारत के बाहर अपने पहले दौरे पर गये. वो ढाका पहुँचे जहाँ उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय प्रसारक डीडी न्यूज़ के मुताबिक़ 'प्रधानमंत्री शेख हसीने के साथ सुरक्षा और साझा हितों के मुद्दों पर चर्चा की.'

15 अगस्तः नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ़ोन किया. ये कॉल ऐसे माहौल में हुई जब सीमा-विवाद को लेकर भारत और नेपाल के बीच दोनों देश एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे. नेपाल के पीएम ने तो यहाँ तक कह दिया था कि भारत उन्हें सत्ता से बाहर करने की साज़िश रच रहा है.

अगस्त 13: भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर ने मालदीव में सबसे बड़े सिवीलियन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में पैसा लगाने की घोषणा की. भारत मालदीव को वित्तीय पैकेज दे रहा है जिसमें 10 करोड़ अमरीकी डॉलर की ग्रांट और 40 करोड़ अमरीकी डॉलर का क़र्ज़ शामिल है. इसके अलावा भारत ने मालदीव से उड़ाने शुरू करने के लिए एयर बबल बनाने और मालवाहक फ़ेरी सेवा शुरू करने की भी घोषणा की है.

अगस्त 6: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को चुनाव जीतने पर मुबारक़बाद दी.

अगस्त 3: ईद उल-अज़हा के मौके़ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान के प्रधानमंत्री अशरफ़ ग़नी से बात की. दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा और साझा हितों के अन्य मुद्दों पर भी चर्चा की.

भारत-चीन

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अब इससे क्या समझा जाये?

क्या ऊपर जिन घटनाक्रमों का ब्यौरा दिया गया, वो भारत और चीन के बीच मौजूदा सीमा तनाव से पैदा हुई स्थितियों की वजह से हैं? या भारत महामारी की वजह से अचानक अपने पड़ोसी देशों का ध्यान रखने लगा है? या फिर इसके पीछे कुछ और है?

इन सवालों पर विश्लेषकों की राय एकमत है. अचानक पड़ोसी देशों से शुरू हुआ ये हाई प्रोफ़ाइल मेल-मिलाप किसी एक घटना की वजह से नहीं हो रहा.

मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि 'इन घटनाक्रमों को अलग-अलग करके नहीं, बल्कि एक बड़ी तस्वीर के हिस्से के तौर पर देखना होगा. और ये बहुत स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में हम अकेले नहीं हैं, दूसरा खिलाड़ी तेज़ चालें चल रहा है और हमें उसका ध्यान रखना होगा.'

पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त और चीन और भूटान में भारत के पूर्व राजदूत गौतम बंबावाले कहते हैं कि 'ये असामान्य साल है, संभवतः मई के बाद से ही चीज़ों ने रफ़्तार पकड़ी है और अब अचानक ये लग रहा है हम एक ही क्षेत्र पर ध्यान दे रहे हैं. ये ऐसे मुद्दे हैं जिनपर सरकार काम करने का सोच रही होगी और अब ही चीज़ों ने धीरे-धीरे कुछ रफ़्तार पकड़ी है और वो पैटर्न बना है जिनपर उन्हें होना चाहिए था.'

हमने बंबावाले से पूछा कि इस समय चीन के दिमाग़ में क्या चल रहा होगा?

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इस पर उन्होंने कहा, 'कोविड-19 महामारी ने चीन को पहले से ज़्यादा आक्रामक बना दिया है और अब चीन क़दम उठा रहा है और वो अब दक्षिण एशिया में भी वही कर रहा है जो वो दक्षिण अमरीका, अफ्रीका और लातिन अमरीका या दुनिया के दूसरे हिस्सों में कर रहा है. जहाँ भी कोई जगह खाली होगी, चीन उसे भरने की कोशिश करेगा. अफ़ग़ानिस्तान को ही ले लीजिए, अमरीका की मौजूदगी कम हो रही है और चीन अधिक सक्रिय हो रहा है. चीन ने पिछले महीने ही चार देशों की बैठक बुलाई जिसमें नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान शामिल हुए. मुझे लगता है कि चीन जो सार्वजनिक तौर पर दिखा रहा है, वो उसकी सक्रियता की एक झलक भर है.'

बीबीसी के लिए दुनियाभर की ख़बरों और मीडिया पर नज़र रखने वाले 'बीबीसी मॉनीटरिंग' से जुड़ीं उपासना भट्ट चीन के हाल के क़दमों पर कहती हैं कि 'चीन दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी है और इसी वजह से यहाँ उसकी हरक़तों पर नज़र रखना भारत के लिए अहम है. भारत-चीन सीमा पर तो हाल के दिनों में कुछ ख़ास गतिविधियाँ नहीं हुईं, लेकिन चीन भारत के पड़ोसी देशों की ओर हाथ बढ़ा रहा है.'

उपासना कहती हैं, 'नेपाल में हाल के दिनों में जो हुआ है उसे देखना दिलचस्प है. चीन की राजदूत हुआ यानक़ी ने सत्ताधारी नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी में उठ रहे संकट का समाधान करने की कोशिश की. इसे सबने देखा. चीन बांग्लादेश को भी रिझाने की कोशिश कर रहा है. द हिंदू अख़बार की एक रिपोर्ट है कि चीन तीस्ता नदी पर सिंचाई परियोजना विकसित करने के लिए बांग्लादेश को एक अरब डॉलर तक की मदद मुहैया करा सकता है.'

'नदी विवाद पर भारत और बांग्लादेश की बातचीत पहले से ही चल रही है. श्रीलंका में राजपक्षे बंधू फिर से सत्ता में है. महिंदा राजपक्षा जब राष्ट्रपति थे तो उनके चीन के साथ नज़दीकी संबंध थे. और पाकिस्तान तो चीन का हर मौसम का साथी है ही.'

भारत-चीन

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भारत को अपने दांव कैसे चलने चाहिए?

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़ साल 2019 के अंत में चीन की जीडीपी 14.34 ट्रिलियन डॉलर थी. इसकी तुलना में भारत की जीजीपी 2.87 ट्रिलियन डॉलर थी.

और इसके क्या मायने हैं ये समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है.

बंबावाले कहते हैं, 'भारत ये जानता है कि उसके पास चीन जितना पैसा नहीं है, और ना ही वो उसकी तरह योजनाओं का क्रियान्वयन कर सकता है. ऐसे में भारत क्या करे? भारत को अपनी ताक़तों का अधिक इस्तेमाल करना होगा जो हमें अपने पड़ोस में ख़ास बढ़त दे और हमें अधिक सक्रियता और कार्यदक्षता दे. यहाँ कार्यदक्षता का मतलब सिर्फ़ प्रोजेक्ट लागू करना है, इसका मतलब ये भी है कि पूरा रवैया ही कुशल हो.'

वे समझाते हैं कि 'एक कुशल दृष्टिकोण के तहत, ये नेपाल के साथ जो नक़्शा विवाद हुआ, नेपाल ने नया नक्शा ही प्रकाशित कर दिया, बात यहाँ तक पहुँचती ही नहीं.'

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क्षेत्रीय प्रोजेक्ट के लिए क्षेत्र के बाहर की ताक़तों के साथ सहयोग भारत के हाल के दृष्टिकोण का एक और पक्ष है.

बंबावाले कोलंबो के बंदरगाह के विकास में भारत और जापान के बीच सहयोग का उदाहरण देते हैं.

एक बात और भी है.

एक अन्य सरकारी अधिकारी ने अपना नाम ना ज़ाहिर करते हुए कहा, "हमने देखा है कि कई देश ऐसे हैं जिन्होंने चीन की शर्तों पर या तो चिंताएं ज़ाहिर की हैं या चीन के साथ संबंधों की गति धीमी की है. लेकिन कई देश ऐसे भी हैं जो निवेश के भूखे हैं. भारत ने सक्रियता बढ़ाकर, देशों को क़र्ज़ सुविधा देकर अच्छा काम किया है, लेकिन भारत योजना लागू करने और नतीजे देने में पिछड़ रहा है."

वे कहते हैं, 'हमारे सभी प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं और जब ये पूरे हो जाएंगे तब भी बहुत कुछ करना बाकी रह जाएगा. हम ये बात समझते हैं कि अब निगरानी की मज़बूत व्यवस्था है जो भारत का प्रदर्शन सुधारने के लिए विकसित की जा रही है.'

...और मंदी

पूर्व राजनयिक और भारत के विदेश सचिव श्माय शरण कहते हैं, 'एक के बाद एक विदेश सचिव ये कहते रहे हैं कि भारत की कूटनीति को अधिक संसाधनों की ज़रूरत है. इसमें राजनयिकों की संख्या और उन्हें दिया जाने वाला प्रशिक्षण भी शामिल है. भारत जो भूमिका निभाना चाहता है उसे प्रभावी रूप से निभाने के लिए ये ज़रूरी भी है.'

मार्च 2018 में केंद्रीय कैबिनेट ने 18 देशों में भारत के नये मिशन स्थापित करने को मंज़ूरी दी थी, इनमें से नौ अब खुल चुके हैं.

भारत नये मिशन खोल रहा है और उन देशों में राजनयिक भेज रहा है जहाँ पहले भारत की मौजूदगी नहीं थी.

हालांकि, अभी भी दुनिया में 60 देश ऐसे हैं जहाँ अभी भारत का रेज़िडेंट मिशन नहीं हैं.

अब अधिक संसाधन मिलने की बात तो छोड़ ही दीजिए, भारत की कूटनीति को कम से कम ख़र्च पर काम चलाना सीखना पड़ रहा है क्योंकि विदेश मंत्रालय का बजट लगातार कम हो रहा है.

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ज़रा इस पर नज़र डालिए-

"...समिति ने पड़ोसी देशों के लिए 'तकनीकी और आर्थिक सहयोग' के लिए मिलने वाले फंड में कमी देखी है. बांग्लादेश के लिए मदद, और नेपाल के लिए मदद को छोड़कर दक्षिण एशिया के देशों के साथ सहयोग के मद के फंड में कटौती की गई है. चीन की बढ़ती मौजूदगी की रोशनी में ये स्थिति और भी चिंताजनक है."

"…भूटान, मालदीव, म्यांमार, श्रीलंका, अफ़्रीकी देशों और आसपास के दूसरे विकासशील देशों के लिए भारत ने मदद कम की है."

"...भारत सरकार के कुल बजट की तुलना में विदेश मंत्रालय का जो साल 20-21 के लिए हिस्सा है वो बीते तीन सालों में सबसे कम है."

ये कुछ बिंदू हैं जो विदेश मामलों पर संसदीय समिति के समक्ष पेश किये गए थे और जिन्हें 3 मार्च 2020 को राज्यसभा में पेश किया गया था.

भारत के सांसद विदेश मंत्रालय का बजट बढ़ाने की माँग कर रहे हैं लेकिन बंबावाले का कहना है कि 'समस्या गहरी और बढ़ी है.'

वे समझाते हैं, 'मैं इस बात से हैरत में नहीं हूँ कि विदेश मंत्रालय का अपना बजट कम हो रहा है और इसी के साथ भारत की अपने पड़ोसी देशों को मदद करने की वास्तविक क्षमता भी कम हो रही है. दरअसल ये बड़ी तस्वीर से जुड़ा है. ये है भारत के जीडीपी का विकास और हमें वास्तव में इसकी चिंता करनी चाहिए. ये कारण है, कई सालों से, पड़ोसी देशों के लिए भारत का मूल फ़ायदा ये था कि बढ़ते हुए भारत से वो भी फ़ायदा उठा रहे थे. और इसके लिए हमें बाहर नहीं अपने भीतर देखना है और उस आर्थिक सुस्ती को रोकना है जो कोविड महामारी से पहले ही आनी शुरू हो गई थी.'

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