क्या सावरकर ने गांधी के कहने पर अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी?

विनायक दामोदर सावरकर

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पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी की हाल ही में एक किताब आई है. इस किताब का नाम है- 'द न्यू आइकॉन– सावरकर एंड द फैक्ट्स'.

अपनी इस किताब में अरुण शौरी ने विनायक दामोदर सावरकर के काम और किरदार की बारीकी से समीक्षा की है.

अरुण शौरी ने ये किताब सावरकर के लिखे दस्तावेज़ों और ब्रितानी रिकार्ड्स के आधार पर लिखी है.

शौरी की इस किताब पर बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने उनसे खास बातचीत की. पेश है ख़ास अंश.

सावरकर की सराहना और उन पर उठने वाले सवाल

सावरकर

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विनायक दामोदर सावरकर को लेकर लोगों की राय बँटी हुई है. बीजेपी सावरकर को देशभक्त और राष्ट्रवादी कहती है, वहीं कांग्रेस कई तरह के सवाल उठाती रही है.

'द न्यू आइकॉन– सावरकर एंड द फैक्ट्स' को लिखने वाले अरुण शौरी कहते हैं कि सावरकर एक बहुत बड़े तर्कवादी थे, जिसकी वो सराहना करते हैं.

वह कहते हैं, ''सावरकर ने कई कर्मकांडों पर सवाल उठाया, जिसकी मैं प्रशंसा करता हूँ, लेकिन सावरकर ने अंग्रेज़ों को मदद की थी.''

अरुण शौरी कहते हैं, "जब राष्ट्रीय स्तर पर आज़ादी के लिए आंदोलन चल रहा था, उस समय सावरकर अंग्रेज़ों की मदद कर रहे थे. सावरकर ने अंग्रेज़ों को वादा किया था कि वो राजनीतिक रूप से उनके काम आएंगे."

अरुण शौरी बताते हैं, "सावरकर ने अंग्रेज़ों की कई ऐसी शर्तें मानीं, जो उनकी (जेल से) रिहाई की शर्त भी नहीं थी. अंग्रेज़ों ने वो शर्तें उनके सामने नहीं रखी थीं. सावरकर की जब वायसराय लिनलिथगो से मुलाकात होती थी तो लिनलिथगो उस मीटिंग का पूरा रिकॉर्ड लंदन भेजते थे. उन रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ पहली मीटिंग में ही लिनलिथगो दो बार कहते हैं, 'एंड देन ही बेग्ड मी' (और फिर सावरकर ने मुझसे विनती की)."

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सावरकर के माफ़ीनामे

अरुण शौरी
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सावरकर के लिखे जो माफ़ीनामे हैं, उनको लेकर कई तरह की बातें होती हैं. दरअसल, सावरकर को नासिक के एक कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने का दोषी पाया गया था और 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गई थीं.

सजा काटने के लिए उन्हें अंडमान यानी 'काला पानी' भेजा गया था. जेल जाने के बाद सावरकर ने अंग्रेज़ों को कई माफ़ीनामे लिखे. इसे लेकर सावरकर की कई लोग आलोचना करते हैं.

वहीं, सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं. अरुण शौरी ने भी अपनी किताब में सावरकर की ओर से दिए गए इस स्पष्टीकरण का ज़िक्र किया है.

हालांकि, अरुण शौरी सावरकर के माफ़ीनामे को शिवाजी जैसी रणनीति नहीं मानते हैं.

वो कहते हैं, "शिवाजी जब भी किसी चीज़ में फंस जाते थे (औरंगजेब के कारण या उसकी सेना के कारण), तो ऐसी चिट्ठी देते थे कि वो औरंगजेब को दक्षिण जीतने में मदद करेंगे. और जैसे ही वो वहाँ से निकल जाते थे, फिर से अपनी चीज़ें शुरू कर देते थे. लेकिन जब सावरकर निकले तो क्या उन्होंने शिवाजी जैसी कोई चीज़ की? बिल्कुल नहीं. वो तो अंग्रेज़ों की मदद करते रहे."

क्या गांधी जी ने सावरकर को माफ़ीनामा लिखने को कहा था?

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इमेज कैप्शन, 13 मार्च, 1910 के दिन विक्टोरिया स्टेशन पर गिरफ़्तारी के बाद ली गई सावरकर की तस्वीर

साल 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक पब्लिक फोरम पर कहा था कि सावरकर दुष्प्रचार का शिकार हुए. उन्होंने कहा था कि सावरकर ने माफ़ीनामे गांधी जी के कहने पर लिखे थे.

अरुण शौरी इस पर कहते हैं, "शायद उनको (राजनाथ सिंह) भी ये पता नहीं होगा कि सावरकर को 1910 में दोषी ठहराया गया था. इसके बाद उन्हें जेल की सजा काटने के लिए अंडमान भेजा गया. इसके दो महीने के अंदर ही उन्होंने एक माफ़ीनामा दायर किया था. उसके बाद सावरकर ने कई माफ़ी पत्र दिए. जबकि 1910-1911 में गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे. गांधी 1915 में वापस हिंदुस्तान आए थे. तब तक सावरकर को जेल में चार साल हो गए थे. वो पांच माफ़ीनामे भी दायर कर चुके थे."

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शौरी बताते हैं, ''जब सभी राजनीतिक कैदियों के लिए एक जनरल एमनेस्टी की घोषणा हुई थी, तब उसमें सावरकर को शामिल नहीं किया गया था. इसे लेकर तब सावरकर के छोटे भाई नारायण, जो जेल में नहीं थे, उन्होंने गांधी से सलाह मांगी थी. इस पर गांधी जी ने कहा था कि सावरकर अपनी याचिका में लिखें कि वो राजनीतिक कैदी हैं, इसलिए वो एमनेस्टी के दायरे में आते हैं. सावरकर ने ऐसा ही किया था, साथ ही भरोसा दिया था कि वो और जेल में बंद उनके दूसरे भाई भारत का जो ब्रिटिश शासन है, उसके ख़िलाफ़ नहीं हैं.''

क्या सावरकर गांधी जी के मित्र थे?

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साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठवें दिन विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. हालांकि, उन्हें फ़रवरी 1949 में बरी कर दिया गया था.

सावरकर के मुताबिक एक समय में वे गांधी जी के मित्र थे. आखिर सावरकर का गांधी जी से कैसा संबंध था, वो उनके मित्र थे या नहीं?

अरुण शौरी इस सवाल का जवाब देते हैं, "बिल्कुल नहीं, असल में वो गांधी जी से घृणा करते थे. वो खुद गांधी जी के बारे में कहते थे कि ये मूर्ख, पागल है, इसको मिर्गी के दौरे आते हैं और उसमें ये कुछ भी बकवास कर देता है. ये एक चलता-फिरता प्लेग है."

हिंदू धर्म को 'हिंदुत्व' से बचाने की बात क्यों करते हैं शौरी?

सावरकर

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सावरकर ने 1923 में एक किताब लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?'. इसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया. अरुण शौरी सावरकर की इसी किताब का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "हिंदुत्व पर सावरकर की जो मूल किताब है, उसमें सावरकर ने खुद लिखा है कि 'हिंदुत्व' और 'हिंदुइज़्म' बहुत अलग-अलग हैं."

शौरी ने अपनी किताब 'द न्यू आइकॉन– सावरकर एंड द फैक्ट्स' में 'हिंदुइज़्म' को 'हिंदुत्व' से बचाने की अपील की है.

अरुण शौरी कहते हैं, "अगर सावरकर का 'हिंदुत्व' आ जाएगा तो हिंदुस्तान हिंदुस्तान नहीं रहेगा. हिंदुस्तान एक पाकिस्तान बन जाएगा. 'इस्लामिक स्टेट इन सैफरॉन' बन जाएगा."

वो कहते हैं, ''सावरकर का हिंदुत्व क्रूरता और घृणा सिखाता है.अगर ऐसे मूल्य एक समाज अपने अंदर समाहित करेगा, तो 'हिंदुइज़्म' कहां रहेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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