गांधी स्मृति की पत्रिका में सावरकर की 'तारीफ़' से उपजा विवाद

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- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महात्मा गांधी के जीवन और विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए गठित गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' का ताज़ा अंक विनायक दामोदर सावरकर पर केंद्रित है जिसमें सावरकर के योगदान को गांधी के बराबर बताया गया है.
कई बुद्धिजीवी और गांधीवादी इसकी आलोचना कर रहे हैं. विनायक दामोदर सावरकर का नाम हमेशा विवादों से जुड़ता रहा है. देश का एक तबका उन्हें स्वातंत्र्य वीर कहकर पुकारता है तो कुछ लोग उन्हें उग्र और कट्टर हिंदुत्व का जनक मानते हैं.
गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति को आड़े हाथों लेते हुए महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने कहा, "ये बेहद अफ़सोस की बात है कि जिनका नाम गांधी जी हत्या की साज़िश में आया हो, उन्हीं का उनका महिमा मंडन किया जा रहा है."
साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छह दिन बाद विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया था. हालाँकि उन्हें फ़रवरी 1949 में उहें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था.
पत्रिका में समिति के उपाध्यक्ष ने संदेश लिखा है, "सावरकर का इतिहास में स्थान और स्वतंत्रता आंदोलन में उनका सम्मान महात्मा गांधी से कम नहीं है."
गांधी स्मृति और दर्शन के उपाध्यक्ष विजय गोयल हैं, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं और भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष पद पर भी रह चुके हैं. प्रधानमंत्री गांधी स्मृति दर्शन समिति के अध्यक्ष होते हैं और वे ही उपाध्यक्ष को नियुक्त करते हैं.

गांधी स्मृति दर्शन समिति के उपाध्यक्ष विजय गोयल का लेख

"ये देखकर दुख होता है कि जिन लोगों ने एक दिन जेल नहीं काटी, यातनाएँ नहीं सहीं, देश-समाज के लिए कुछ कार्य नहीं किया, वे सावरकर जैसे बलिदानी की आलोचना करते हैं."
"भारत की स्वतंत्रता में वीर सावरकर का योगदान अमूल्य रहा है. उन्होंने देश के भीतर और बाहर रहते हुए आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों को चलाया. उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान छेड़कर, ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया. कई बार उन्हें पकड़ने की नाकाम कोशिशें हुईं. लेकिन वे हर बार सरकार को चकमा दे जाते. सावरकर को घबराकर अंग्रेज़ी सरकार ने 1910 में आजीवन कारावास की सज़ा दी और फिर 1911 में दोबारा आजीवन कारावास दिया गया. विश्व इतिहास में ये पहली घटना है जब किसी को दो-दो बार आजीवन कारावास की सज़ा दी गई हो."

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उन्होंने अपने संदेश के आख़िर में लिखा है कि देश इन दिनों आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और इस अवसर पर सावरकर जैसे महान सेनानियों की स्मृतियों को भी याद करना चाहिए. संदेश में गोयल ने नासिक के तत्कालीन कलेक्टर की हत्या के लिए सावरकर को हुई कालापानी की सज़ा का भी ज़िक्र किया है.
पत्रिका में "एक चिंगारी थे सावरकर", "गांधी और सावरकर का संबंध", "वीर सावरकर और महात्मा गांधी", "देश भक्त सावरकर" सहित कुल 12 आलेख छपे हैं, जिसमें विनायक दामोदर सावरकर के जीवन के बारे में बताया गया है.
बीबीसी ने इस अंक के संबंध में विजय गोयल से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक उनसे बात नहीं हो सकी है.
पत्रिका में सावरकर पर लेख लिखने वाले डॉक्टर कन्हैया त्रिपाठी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "आलोचना बहुत चीज़ों की हो रही है इस देश में. इसलिए मेरा मानना है कि वीर सावरकर या किसी भी महापुरुष को हम तटस्थ भाव से देखें. आलोचना करने वालों का भी स्वागत होना चाहिए."
सावरकर पर विशेषांक निकालने के लिए, गांधी के विचारों का प्रचार-प्रसार के लिए बने मंच को क्यों चुना गया, इस सवाल पर डॉक्टर त्रिपाठी कहते हैं, "अंतिम जन एक ऐसी पत्रिका है जो गांधी जी के बारे में बहुत सी सामग्रियां छापती रही है. चूंकि बहस के केंद्र में सावरकर भी हैं, इसलिए जो नया अंक आया है, वो निश्चित रूप से गांधीवादी धड़े के लिए भी सावरकर को जानने हेतु ज़रूरी है. गांधी और सावरकर दो ध्रुव नहीं हैं. दोनों का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवाद था और दोनों राष्ट्र की ही लड़ाई लड़ रहे थे."

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महात्मा गांधी की हत्या के अभियुक्तों में सावरकर का नाम जुड़ने के सवाल पर डॉक्टर त्रिपाठी कहते हैं, "अगर ऐसा होता तो उन्हें फाँसी पर लटकाया जाता. नाथूराम गोडसे को तो आख़िर फांसी दी गई न. सावरकर जी ने कभी स्वीकार नहीं किया कि वो गांधी की हत्या में शामिल थे और न तो ये अभी तक किसी ने सिद्ध किया है. आज़ादी के परिप्रेक्ष्य में गांधी और सावरकर का उद्देश्य एक ही रहा है. हम धर्म के खांचे में नहीं रख रहे उन्हें."
गांधी स्मृति दर्शन समिति की पत्रिका के सावरकर पर छपे अंक को लेकर महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी का कहना है कि उन्हें "कोई ताज्जुब नहीं है."


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बापू के पड़पोते तुषार गांधी की प्रतिक्रिया

"जो सरकार सत्ता में है, उसी का नियंत्रण गांधी संस्थानों पर भी आ गया है. ये होना ही था. सरकार के विचार अब संस्थानों पर दिखते हैं."
"अब सरकार का पूरा अंकुश हो गया है क्योंकि संस्थानों में अधिकतर लोग उन्हीं की विचारधारा के भरे हैं इसलिए मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ. उनकी विडंबना ये है कि बापू के खून के साथ जो स्मारक जुड़ा है, उसी स्मारक को चलाने वाली संस्था की पत्रिका में उनको, बापू के खून में जो एक अभियुक्त था...उसका महिमांडन करना पड़ता है. यानी बापू के सिवा उनके पास कोई पर्याय नहीं है. सावरकर का भी महिमामंडन करना है तो उसके लिए उन्हें बापू के प्रमाणपत्र की ज़रूरत है."
"मैं समझता हूँ कि ऐसे प्रयत्न और बढ़ते जाएँगे, जब तक वो लोग पूरा-पूरा उस संस्था को, उस विचार को अपने चोले में रंग न लें, तब तक ये होता रहेगा और ये बहुत दुखद है इसलिए बाकी जो संस्थाएं हैं उन्हें बचाए रखना बहुत ज़रूरी हो गया है."
"इसके बारे में प्रतिक्रिया तो ज़रूर दूंगा और जो गांधीवादी मंच हैं, जो अभी तक सरकार से प्रभावित नहीं हुए हैं...उन जगहों पर तो इस विचार को बुलंद करना ही होगा. मैं मानता हूँ कि सबके पास विचार और मत दर्शाने का संवैधानिक अधिकार है और इसे रोकने का मैं हिमायती भी नहीं हूँ लेकिन इसका प्रतिरोध-प्रतिकार ज़रूर होना चाहिए और वो करेंगे."
"सावरकर का सत्य भी सामने लाना ज़रूरी है. अगर वो समझते हैं कि सावरकर स्वतंत्रता संग्राम के बापू जितने महान नेता थे तो वे ये भी समझाएं कि जेल से छूटने के लिए माफ़ी के लिए इतने पत्र क्यों लिखे गए और छूटने के बाद सावरकर ने अंग्रेज़ों से आजीवन पेंशन क्यों ली. कोई और स्वतंत्रता सेनानी या क्रांतिकारी, जो शहीद हुए उनके परिवार, किसी ने पेंशन तो नहीं लिया. फिर सावरकर को क्या ज़रूरत पड़ी कि इतने बड़े देशभक्त होने के बाद भी उन्हें सरकार के सामने घुटने टेकने पड़े."
आलोचना करने वालों का क्या है कहना?
राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रोफ़ेसर सुबोध कुमार मेहता लिखते हैं, "आज गांधी जी की आत्मा स्वर्ग में तड़प रही होगी. गांधी जी की अहिंसावादी विरासत को सँजोने के उद्देश्य से बनी गांधी दर्शन और स्मृति समिति ने पत्रिका 'अंतिम जन' का सावरकर पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित कर निश्चित ही गांधीजी के अहिंसा जैसे मूल्य का क्रूर परिहास बनाया है."
सिलसिलेवार ट्वीट में कुमार लिखते हैं, "अब भी ज़रा सी भी शर्म या खेद हो तो अब भी समस्त पदाधिकारी त्यागपत्र सहित समस्त राष्ट्र से क्षमायाचना की प्रस्तावना करें.अन्यथा आश्चर्य नहीं होगा कि इस प्रख्यात पत्रिका का अगला विशेषांक गांधी जी के हत्यारे गोडसे का ही निकल जाए, या हिटलर या मुसोलिनी का ही महिमामंडन कर दिया जाए."
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वरिष्ठ पत्रकार रहे ओम थानवी ने पत्रिका के कुछ पन्नों को साझा करते हुए ट्वीट किया है, "गांधी जी की जाँच के सिलसिले में गठित जस्टिस कपूर आयोग ने अपने अंतिम निष्कर्ष में "सावरकर और उनकी मंडली (ग्रुप)" को गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचने का गुनहगार ठहराया था. तमाशा देखिए कि गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति सावरकर को गांधीजी की ही ओट देकर इज़्ज़त दिलाने की कोशिश कर रही है."
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महात्मा गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने के मक़सद से ही बने एक अन्य संस्थान गांधी पीस फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "हर आदमी को झूठ बोलने और इतिहास के गलत इस्तेमाल करने का अधिकार है. भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार दोनों इस अधिकार का पूरा इस्तेमाल करती है, जिसका एक अच्छा उदाहरण अंतिम जन का ये अंक भी है."
सावरकर पर समिति के नए अंक को लेकर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बीबीसी से कहा, "विजय गोयल साहब अपना राजनैतिक वनवास समाप्त करना चाहते हैं, यह अच्छी बात है लेकिन ऐसा करने के लिए तथ्यों को क्यों वनवास दे रहे हैं? सावरकर की दृष्टि में पहला और अंतिम संघर्ष धार्मिक संघर्ष था. अंग्रेज़ों से भारत को स्वतंत्र करवाना उनके लिए क़तई आवश्यक नहीं था."

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सावरकर पर किताब लिख चुके लेखक अशोक कुमार पांडे ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह मज़ेदार है कि सावरकर पर अंक निकालने के लिए महात्मा गांधी के नाम पर बनी संस्था को चुना गया. ज़ाहिर है कि सावरकर को वैलिडेट करने के लिए भी गांधी की ज़रूरत पड़ रही है. कभी गणेश सावरकर अपने भाई को छुड़ाने के लिए विनती करने गांधीजी के पास गए थे, तब भी बापू ने उपकृत कर दिया था."
उन्होंने कहा, "जिस पत्रिका के पहले पन्नों पर उपाध्यक्ष विजय गोयल पाँच सौ शब्दों के लेख में इतनी ग़लतियाँ करें कि 1906 में सावरकर की मुलाक़ात श्यामा प्रसाद मुखर्जी से करवा दें, जो तब पाँच साल के बालक थे, उसकी गुणवत्ता पर बात करना बेकार है. गांधी हत्या की बात करते हुए जानना चाहिए कि उन्हें पुष्ट करने वाले साक्ष्यों के अभाव में छोड़ा गया था, बाद में कपूर कमीशन की जाँच में पता चला कि ये गवाहियाँ सावरकर के सचिव और अंगरक्षक की गवाहियों के रूप में सदा उपलब्ध थीं, लेकिन अदालत में पेश नहीं की गईं."
इसी साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विनायक दामोदर सावरकर की जयंती पर ट्वीट किया और उन्हें 'माँ भारती का कर्मठ सपूत' बताया था. पीएम मोदी ने कहा था कि वीर सावरकर ओजस्वी कवि और समाज-सुधारक थे.
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इससे पहले बीते साल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी दावा किया था कि विनयाक दामोदर सावरकर के 'दया याचिका' दायर करने को एक ख़ास वर्ग ने ग़लत तरीक़े से फैलाया. उन्होंने दावा किया था कि सावरकर ने जेल में सज़ा काटते हुए अंग्रेज़ों के सामने दया याचिका महात्मा गांधी के कहने पर दाखिल की थी. इस दावे पर काफ़ी समय तक बहस छिड़ी रही थी.
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