पुतिन जाएंगे उत्तर कोरिया, जानिए क्या हैं इसके मायने

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रूस पर नज़र रखने वालों को पिछले कई महीनों से मालूम था कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन उत्तर कोरिया के दौरे पर जाने वाले हैं.
जब किंग जोंग उन की हरे रंग की विशाल बुलेट ट्रेन, रूस के सुदूर पूर्व इलाक़े से गुज़री थी, तब किम ने पुतिन को अपने देश का दौरा करने का न्यौता दिया था. पुतिन ने उनका न्यौता ख़ुशी से स्वीकार कर लिया था.
लेकिन, अब कहा जा रहा है कि पुतिन के जिस उत्तर कोरिया दौरे का लंबे समय से इंतज़ार हो रहा है, वो अब बस होने ही वाली है.
दक्षिण कोरिया के सूत्रों का कहना है कि पुतिन इसी मंगलवार को उत्तर कोरिया के दौरे पर जा सकते हैं. सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों ने भी उत्तर कोरिया में पुतिन के दौरे के लिए चल रही तैयारियों की जासूसी की है.
एक बात तो तय है: इस दौरे को लेकर रूस ही नहीं, पूरी दुनिया के पत्रकार ख़बर हासिल करने के लिए होड़ लगा रहे हैं.
रूसी राष्ट्रपति के कार्यालय क्रेमलिन ने कहा है कि पुतिन के दौरे की जानकारी सही समय पर सामने आएगी. फिर भी, अटकलों का बाज़ार गर्म है.
पर, सवाल ये है कि पुतिन का दौरा क्यों अहम है और वो इसी वक़्त क्यों उत्तर कोरिया जा रहे हैं?
पहली बात तो ये है कि पुतिन चूंकि सिर्फ़ दूसरी बार उत्तर कोरिया जाने वाले हैं, तो उनके दौरे को लेकर उत्सुकता होना लाज़मी है.
इससे पहले वो साल 2000 में तब उत्तर कोरिया के दौरे पर गए थे, जब उन्होंने पहली बार राष्ट्रपति का पद संभाला था. उस समय किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल, उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता थे.
लेकिन, इससे इतर दोनों देशों के बीच एक ऐसा रिश्ता है, जो एक दूसरे के प्रति दोस्ती जताने से आगे बढ़कर अब एक दूसरे के फ़ायदे वाला हो गया है और इससे पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ गई है. हालांकि अभी भी रूस और उत्तर कोरिया के संबंध उस स्तर के नहीं हैं, जैसे सोवियत संघ के ज़माने में थे.

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रूस और उत्तर कोरिया में क़रीबी के मायने

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क्रेमलिन ने कहा है कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच ‘बहुत गहरे संबंध’ विकसित करने की संभावनाएं हैं. वैसे तो ये कहा जाता है कि इससे किसी को फ़िक्र नहीं होनी चाहिए.
लेकिन, रूस का कहना है कि जो लोग दोनों देशों के रिश्तों को चुनौती देने की सोच रहे हैं, वो एक बार फिर सोच लें.
इस बात को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि रूस और उत्तर कोरिया एक दूसरे से क्या चाहते हैं. ऐसा लगता है कि ये सारा मामला हथियारों की आपूर्ति पर जाकर रुक जाता है.
राजनीति शास्त्र के जानकार और पुतिन के सहयोगी सर्गेई मार्कोव का कहना है कि रूस, उत्तर कोरिया से गोला बारूद, निर्माण कार्यों के लिए मज़दूर और यहां तक कि अपनी मर्ज़ी से जंग के मोर्चे पर जाने की इच्छा रखने वालों को हासिल करना चाहता है.
सर्जेई मार्कोव कहते हैं कि इसके एवज़ में उत्तर कोरिया को रूस के उत्पाद मिल सकते हैं और अपने सैन्य साज़-ओ-सामान बढ़ाने की तकनीक भी हासिल हो सकती है.
इसमें, उत्तर कोरिया के लंबी दूरी के मिसाइल कार्यक्रम के लिए रूसी तकनीक हासिल करना शामिल है. अब उत्तर कोरिया की मिसाइलें अमेरिका तक मार करने की क्षमता हासिल करने के क़रीब पहुंच गई हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि यूक्रेन में अपना युद्ध जारी रखने के लिए रूस को हथियारों और गोला बारूद की दरकार है.
दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से ब्लूमबर्ग की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तर कोरिया ने तोप के लगभग पचास लाख गोले रूस भेजे हैं.
रूस के लिए एक ऐसा साझीदार तलाशना काफ़ी महत्वपूर्ण है जो उसी की तरह पश्चिमी देशों और उनके प्रतिबंधों से नफ़रत करता हो और इसी वजह से रूस के साथ कारोबार करने के लिए राज़ी हो.
आख़िर रूस और उत्तर कोरिया, दुनिया में प्रतिबंधों की सबसे ज़्यादा मार झेलने वाले देश जो ठहरे. उत्तर कोरिया पर ये पाबंदियां, परमाणु हथियार विकसित करने और बार-बार परीक्षण करने के नाम पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग़ने की वजह से लगे हैं.
इसी साल की शुरुआत में रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था, जिसमें उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले पैनल को विस्तार दिया जाना था. रूस के इस क़दम से उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को गहरी चोट पहुंची थी.
एक दोस्ताना कूटनीतिक क़दम

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हो सकता है कि दोनों देशों के नेताओं के बीच सच्ची दोस्ती हो. भले ही ये सावधानी भरी और कारोबारी मक़सद वाली क्यों न हो. फ़रवरी महीने में पुतिन ने किम जोंग उन को एक लग्ज़री कार तोहफ़े में दी थी (जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ था).
राष्ट्रपति पुतिन को हाल ही में भेजे गए संदेश में किम जोंग उन ने कहा था कि उत्तर कोरिया, रूस का ‘अजेय साथी’ है.
लेकिन, ये भी हो सकता है कि दोनों देशों का नज़दीक आना महज़ कारोबारी और उनके पास कोई और विकल्प न होने का नतीजा भी हो.
सपाट लफ़्ज़ों में कहें तो, दुनिया से अलग-थलग पड़ चुके रूस के लिए आज उत्तर कोरिया की अहमियत बहुत बढ़ गई है और उत्तर कोरिया को ये पता है कि रूस को दोस्तों की ज़रूरत है.
उत्तर कोरिया का दौरा करके राष्ट्रपति पुतिन अपने विरोधियों को ये दिखा सकते हैं कि वो जो चाहे वो कर सकते हैं, और करेंगे.
बात अगर रूस पर लगे पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने का रास्ता निकालने की हो, तो हां अब भी तो वो ये ज़रूर कर सकते हैं.
लेकिन, इसके पीछे एक मक़सद ये भी हो सकता है कि वो दूसरे देशों को भी पश्चिम के प्रतिबंधों का उल्लंघन करने और रूस को हथियार बेचने के लिए राज़ी कर सकें. ऊपरी तौर पर तो ऐसा ही लगता है.
एक सवाल ये भी है कि क्या यूक्रेन में अपने तथाकथित ‘विशेष सैन्य अभियान’ के बावजूद, पुतिन पूरी दुनिया में नए-नए देशों के साथ रिश्ते क़ायम करने की कोशिश कर रहे हैं? तो इसका जवाब है कि हां वो निश्चित रूप से ऐसी कोशिश कर रहे हैं.
जब से पुतिन ने अपनी सेना को यूक्रेन पर धावा बोलने का हुक्म दिया है, तब से ही वो इस बात को प्रचारित करते रहे हैं कि पश्चिमी देशों के दबदबे का दौर ख़त्म हो रहा है. उन्होंने उन देशों को रिझाने की कोशिश की है, जो उनकी बात से सहमत हैं. या फिर, कम से कम इस विचार से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं.

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ये महज़ संयोग नहीं था कि हाल ही में सेंट पीटर्सबर्ग में एक आर्थिक सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति पुतिन के प्रमुख मेहमानों में ज़िम्बॉब्वे के राष्ट्रपति भी शामिल थे. ज़िम्बॉब्वे भी प्रतिबंधों की मार से जूझ रहा है.
रूस इन दिनों ये दिखाने के लिए बेताब हो रहा है कि दुनिया में उसके ऐसे बहुत से दोस्त देश हैं, जो उसी के सुर में सुर मिलाते हैं. एशिया से लेकर लैटिन अमेरिका और अफ्रीका तक, अमेरिका की अगुवाई वाली दुनिया से बेज़ार हर देश का रूस स्वागत करता है.
निश्चित रूप से जब ज़िम्बॉब्वे के राष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा मंच पर पहुंचे तो उनकी ज़ुबान से पुतिन के मशहूर जुमले फूट रहे थे और वो किसी भी क़ीमत पर दुनिया में अपनी दादागीरी क़ायम करने पर आमादा पश्चिमी देशों के उलट एक नई ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ बनाने के गीत गा रहे थे.
पुतिन ने ईरान के साथ भी दोस्ती बढ़ाने की कोशिश की है. ईरान भी बरसों से पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की मार झेल रहा है और वो भी अपने हथियार और गोला-बारूद बेचने को बेक़रार है. रूस को ईरान से ड्रोन मिल रहे हैं और अगर इससे पश्चिमी देशों में हलचल मचती है, तो और भी अच्छा है.
इसीलिए, जब राष्ट्रपति पुतिन उत्तर कोरिया जाने के लिए अपने विमान में सवार होंगे, तो उन्हें पता है कि उनकी तस्वीरें पूरी दुनिया को लुभाएंगी और इस बात में कोई शक नहीं रह जाएगा कि वो अपनी पसंद के दोस्तों और साझीदारों के साथ कारोबार और सियासत दोनों के लिए तैयार हैं.
और, हो सकता है कि उत्तर कोरिया से दोस्ती बढ़ाने की रूस की कोशिशों को लेकर चीन की अपनी आशंकाएं हों. लेकिन, तय है कि जब पांचवीं बार राष्ट्रपति बनने के बाद पुतिन अपने पहले विदेश दौरे में चीन गए थे, तब शी के साथ उनकी मुलाक़ात के दौरान, उत्तर कोरिया के साथ उनकी दोस्ती की लक्ष्मण रेखाएं तय हो गई होंगी.
चीन के साथ रूस की नज़दीकी अपने आप में रूस के घोषित रूप से पूरब का रुख़ करने का प्रतीक है.
जिस तरह रूस अपने यहां के ताक़तवरर नेता की शान-ओ-शौकत दिखाता है, वैसा करने वाले दूसरे देश बहुत कम ही हैं.
लेकिन, इस मामले में उत्तर कोरिया निश्चित रूप से रूस को कड़ी टक्कर दे सकता है. रूस के पारंपरिक लोकतंत्र से दूरी बनाने की वजह से दोनों देशों के नेतृत्व के बीच का फ़ासला भी सिमटता दिख रहा है.

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ज़रूरी नहीं है कि पुतिन और किम जोंग उन की दोस्ती से आम रूसी नागरिक भी ख़ुश हैं और दोनों देशों के नज़दीकी रिश्ते का स्वागत करते हैं.
क्योंकि, रूस के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध तो यूरोप और पश्चिमी देशों के ज़्यादा नज़दीक रहे हैं.
और, दोनों देशों के नेताओं की मुलाक़ात के बाद पुतिन के लिए एक और ख़तरा पैदा हो सकता है- पश्चिमी देश रूस और उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ कुछ नए क़दम उठा सकते हैं. पर, पुतिन को तो इसका जोखिम उठाना ही होगा.
आख़िर में, इस बात की संभावना अधिक है कि दुनिया को पता ही न चले कि रूस और उत्तर कोरिया के बीच किन बातों पर रज़ामंदी हुई. हमें तो तब भी कुछ नहीं पता चला था जब किम जोंग उन पिछले साल रूस के दौरे पर गए थे.
लेकिन, हम ये तय मान सकते हैं कि जब पुतिन दुनिया के सबसे अलग-थलग देश के दौरे पर जाएंगे, तो सधे हुए तमाशे और संदेश के साथ पुतिन की बेख़ौफ़ क़दमताल के लिए मंच सज़ा होगा. और वो एलान करेंगे: ‘हां, मैं ऐसा कर सकता हूं. देखो मुझे’
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