एक अग्निवीर की मां का दर्द, 'अग्निपथ' पर सवाल और अब तक कितनी मिली मदद- ग्राउंड रिपोर्ट

अग्निवीर जितेंद्र की मां उनकी तस्वीर के साथ

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    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, अलवर के नवलपुरा गाँव से

"सरकार की ओर से मुझे कुछ नहीं मिला, मेरे बेटे के शव के अलावा कुछ नहीं आया मेरे पास. दो महीने बीत जाने के बाद भी उसका सामान और मोबाइल फ़ोन तक अभी नहीं आया."

21 साल के जितेंद्र सिंह की मां सरोज देवी रोते हुए कुछ ऐसे अपना दर्द बयां कर रही हैं.

भारतीय संसद में अग्निवीर के मुद्दे पर राहुल गांधी के सवाल और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के जवाब के बाद हमने इस परिवार के पास पहुंचकर उनका हाल जानने की कोशिश की है.

पांच जुलाई को जब जितेंद्र सिंह की मां हमसे बात कर रही थीं, उससे कुछ घंटे पहले ही परिवार को जानकारी मिली कि परिवार को 48 लाख रुपये का भुगतान किया जा रहा है.

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रक्षा मंत्रालय की ओर से आए फ़ोन के कुछ घंटे बाद परिवार के खाते में चार जुलाई को 48 लाख रुपये जमा हुए. अग्रिपथ योजना में अग्रिवीरों के लिए 48 लाख रुपये के जीवन बीमा की सुविधा का प्रावधान है.

जितेंद्र सिंह तंवर बतौर अग्निवीर (पैरा कमांडो) भारतीय सेना का हिस्सा थे. क़रीब दो महीने पहले 9 मई को जम्मू कश्मीर के पुंछ में एक मुठभेड़ के बाद हुए सर्च अभियान के दौरान सिर में गोली लगने से उनकी मौत हो गई थी.

अलवर ज़िले के मालाखेड़ा तहसील के नवलपुरा गांव के रहने वाले 21 साल के जितेंद्र सिंह तंवर जान गंवाने वाले राजस्थान के पहले अग्निवीर हैं.

साल 2022 में भारतीय सेना में बतौर अग्निवीर भर्ती हुए जितेंद्र सिंह की पंद्रह महीने की ही नौकरी हुई थी.

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जितेंद्र सिंह का परिवार निराश है

जितेंद्र के भाई और गांव वाले

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लोकसभा के पहले सत्र के दौरान दो जुलाई को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच अग्निवीर को लेकर हुई बहस के बाद फिर एक बार अग्निवीर का मुद्दा चर्चा में आ गया है.

जितेंद्र सिंह तंवर का परिवार इस बात से निराश है कि घटना के क़रीब दो महीने बीत जाने तक किसी ने सुध नहीं ली. देशभर में फिर यह मुद्दा चर्चा में आने के बाद परिवार की सुध ली जा रही है.

जितेंद्र के ताऊ के बेटे हेमंत बीबीसी से कहते हैं, ''अब तीन दिन से ही कई लोगों के फ़ोन आ रहे हैं. अग्निवीर का मुद्दा चल रहा है यह उसका ही असर है कि अब हमारे पास फ़ोन आ रहे हैं."

जितेंद्र सिंह

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हेमंत कहते हैं, "अगर मुद्दा उठने से पहले हमारा साथ दिया जाता तो उससे परिवार को संबल मिलता, परिवार से लगातार संपर्क में रहते और जुड़ते तो अच्छा लगता. लेकिन, बहस और मुद्दा बनने के बाद यह सब हुआ है."

जितेंद्र सिंह की मां सरोज देवी हाथों में जितेंद्र सिंह की तस्वीर थामे हैं.

वो रोते हुए कहती हैं, "जितेंद्र सिंह का सामान तक अभी हमारे पास नहीं आया है."

दो महीने बाद भी परिवार को नहीं मिला बेटे का सामान

क़रीब दो महीने बीत जाने के बावजूद परिवार को सामान भी नहीं मिला है. इस सवाल पर राजस्थान सैनिक कल्याण विभाग के निदेशक ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) वीरेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं, "अमूमन इतना समय नहीं लगता है. हम उनकी यूनिट के कमांडिंग ऑफ़िसर से बात करेंगे कि जल्दी ही सामान मंगवाया जाए."

परिवार के परिचित और पूर्व सैनिक बख्तावर सिंह कहते हैं, "लोकसभा में अग्निवीर का मुद्दा हलचल में आने के बाद से ही अचानक परिवार से ज़्यादा संपर्क किया जा रहा है. दिल्ली से कई नेताओं के फ़ोन आए हैं और पैरा यूनिट से भी फोन आए हैं."

"मुद्दा हाईलाइट होने के बाद से ही लोगों ने संपर्क बढ़ाया है, पहले से किसी ने संपर्क नहीं किया. राजनीतिक मुद्दा बनने के बाद काम होना ग़लत है. एक शहीद को सही तरह से सम्मान मिलना चाहिए."

वे दावा करते हैं, "पहले हमने प्रदेश और केंद्र के नेताओं से भी संपर्क किया और शहीद का दर्जा और आर्थिक सहायता के लिए मांग रखी लेकिन सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई."

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संसद में बहस के बाद मिले 48 लाख रुपए

48 लाख का मैसेज दिखाते जितेंद्र के भाई सुनील

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जितेंद्र के बड़े भाई सुनील अपने फ़ोन में एक मैसेज दिखाते हुए कहते हैं, "नौ (मई) तारीख को मेरा भाई शहीद हुआ था. तब से लेकर आज पांच (जुलाई) तारीख़ तक कोई पूछने नहीं आया."

"लेकिन, चार तारीख़ की शाम सवा छह बजे एक मैसेज आया कि हमारे खाते में 48 लाख रुपए जमा हुए हैं. अभी बैंक जाकर मालूम नहीं किया कि पैसा कहां से आया है."

जितेंद्र के ताऊ के बेटे हेमंत कहते हैं, "डेढ़ महीने से ज्यादा का समय हो गया है लेकिन किसी तरह की कोई सरकारी सहायता नहीं मिली है. जब हम नेताओं के पास मांगों को लेकर जाते हैं तो वो समय नहीं देते हैं."

वो कहते हैं, "डेढ़ महीने बाद भी हम इंतज़ार कर रहे हैं कि हमारे भाई को सम्मान मिले.''

जितेंद्र सिंह के ही गांव के बख्तावर सिंह सत्रह साल सेना में सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए थे. वह जितेंद्र की मौत के बाद से ही सरकार, सेना और परिवार के बीच बातचीत कर मदद करवाने में लगे हुए हैं.

वे जितेंद्र के घर पर बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, "चार तारीख़ को मेरे पास रक्षा मंत्रालय से फ़ोन आया था कि आज शाम या कल तक परिवार के खाते में 48 लाख रुपए जमा किए जाएंगे."

'जवान की शहादत में भेदभाव क्यों?'

अग्निवीर जितेंद्र सिंह

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राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली बीबीसी से बातचीत में अग्निपथ योजना पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं, "एक ही सरहद पर दो जवान शहीद होते हैं तो एक को शहीद का दर्जा दिया जाता है, पेंशन दी जाती है, परिवार में नौकरी दी जाती है और आश्रितों की मदद की जाती है."

"जबकि, दूसरी तरफ़ अग्निवीर के नाम पर सरकार कोई मदद नहीं करती है. अलवर में राजस्थान का पहला अग्निवीर शहीद हुआ, लेकिन सरकार ने शहीद नहीं माना. लेकिन, जनता ने शहीद माना है और हमने शहीद माना है."

जितेंद्र की मां सरोज देवी बेटे की मृत्यु के बाद से बीमार हैं. कई दिनों तक अस्पताल में इलाज के बाद भी वो पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुई हैं.

वह कहती हैं, "मेरे बेटे ने देश के लिए अपनी जान दी है तो उसे शहीद का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए?"

जितेंद्र सिंह

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जितेंद्र के भाई हेमंत गुस्से में कहते हैं, "एक सैनिक, सैनिक ही होता है. सैनिकों की वजह से ही हम आज अपने घरों में और सरकारों के नुमाइंदे भी अपने घरों में सुकून से बैठे हुए हैं."

"लेकिन, मैं सरकार को कहना चाहूंगा कि जो सैनिक बनकर देश सेवा में चला गया है, सरकार उसको अग्निवीर जैसी चीज़ों से जोड़कर उसके सम्मान में कमी ना लाए."

वे अपनी मांग रखते हुए कहते हैं, "मेरा भाई चला गया, उसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती है. लेकिन, मेरे भाई को शहीद का दर्जा मिले. हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान जितेंद्र के लिए शहीद का दर्जा है."

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संसद में बहस के बाद लिखा गया पत्र

अलवर का ज़िला सैनिक कार्यालय

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अलवर ज़िला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल रणजीत सिंह बीबीसी से कहते हैं, "अभी तक हमारे पास जितेंद्र सिंह से जुड़े डॉक्यूमेंट नहीं आए हैं. ऐसे में हम फ़िलहाल कुछ नहीं कह सकते हैं."

जितेंद्र सिंह थ्री बी पैरा कमांडो यूनिट में तैनात थे, जिसका मुख्यालय जयपुर है. यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) कर्नल तरुराज देव बीबीसी हिंदी से फ़ोन पर हुई बातचीत में कहते हैं कि वह अभी बाहर हैं और आने पर संपर्क करेंगे. (सीओ तरुराज देव से सेना का पक्ष मिलने पर छापा जाएगा)

राजस्थान सरकार के सैनिक कल्याण विभाग निदेशक ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) वीरेंद्र सिंह राठौड़ बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "हमने दिल्ली में आर्मी के एडीजी मैन पॉवर (पॉलिसी एंड प्लानिंग) को पत्र लिखा है कि जितेंद्र सिंह का बैटल कैज़ुअल्टी प्रमाणपत्र भेजा जाए, जिससे उनके परिवार को राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाएं दिलाई जा सकें."

वे कहते हैं, "कैजु़अल्टी सर्टिफिकेट आने में क़रीब दो से तीन महीने लगते हैं."

9 मई को जितेंद्र सिंह की मृत्यु होने के चार दिन बाद ही राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने मुख्यमंत्री भजन लाल सरकार को पत्र लिख कर परिवार की मांगों को दोहराया था. लेकिन, संसद में दो जुलाई को हुई बहस के बाद उनके पत्र का जवाब मिला.

टीकाराम जूली बीबीसी से कहते हैं, "सरकार की मदद के लिए 14 मई को ही मैंने राज्य की भाजपा सरकार को पत्र लिखा था. लेकिन, उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई."

"जब दो जुलाई को संसद में राहुल गांधी ने अग्निवीर का मामला उठाया तब तीन तारीख को मेरे पत्र का रिप्लाई आया है. दिल्ली से जितेंद्र सिंह तंवर के दस्तावेज़ मांगे गए हैं. राहुल गांधी के मुद्दा उठाने के बाद परिवार को कुछ राहत राशि भेजी गई है."

दिल्ली पत्र लिखकर कैजु़अल्टी प्रमाणपत्र मंगाने पर ब्रिगेडियर वीरेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं, "नॉर्मल केस में हम पत्र नहीं लिखते हैं क्योंकि प्रमाणपत्र आना सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है तो हम संबंधित अधिकारी को पत्र लिखने के लिए बाउंड हैं."

वह कहते हैं, "इस पत्र का कोई पॉलिटिकल कनेक्शन नहीं है, जो जवान शहादत देते हैं उनके सर्टिफ़िकेशन में समय लगता है. हमने पत्र भेजा है यदि जल्दी सर्टिफ़िकेट आ जाता है तो परिवार को जल्दी सुविधाएं मिल जाती हैं. जैसे ही हमारे या परिवार के पास सर्टिफिकेट आ जाता है हम सुविधाएं देने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं."

अग्निपथ योजना के तहत क्या सुविधाएं मिलती हैं?

तिरंगे में भेजा गया जितेंद्र का शव

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अग्निपथ योजना के तहत मध्य प्रदेश में अग्निवीरों की भर्ती 2024-25 के लिए जारी हुए एक विज्ञापन में अग्निवीरों को मिलने वाले भत्तों और सुविधाओं का विवरण दिया गया है.

विज्ञापन के मुताबिक़ अग्निवीर भर्ती होने के बाद अग्निवीर पैकेज के तहत निर्धारित सालाना इनक्रिमेंट, रिस्क और हार्डशिप अलाउंस भी देय होगा.

विज्ञापन में बताया गया है कि चार साल की नौकरी में पहले साल से लेकर चार साल तक कितना मासिक वेतन मिलेगा और कितना पैसा कंट्रीब्यूशन के तहत कॉर्पस फंड में जमा होगा.

इंश्योरेंस, मृत्यु और डिसेबिलिटी कंपनसेशन का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि अग्निवीर को भारतीय सेना में इंगेजमेंट पीरियड के दौरान 48 लाख रुपए का नॉन कंट्रीब्यूटरी लाइफ इंश्योरेंस कवर मिलेगा.

अग्निवीर पैरा कमांडो जितेंद्र के परिवार को क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी?

बीबीसी के इस सवाल पर राजस्थान सैनिक कल्याण विभाग के निदेशक ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) वीरेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं, "इस पर निर्भर करता है कि डेथ को क्या क्लासिफ़ाइ किया जाता है."

"यदि बैटल कैजु़अल्टी (फेटल) होगा तो राजस्थान सरकार की ओर से इनके परिवार को पचास लाख रुपए का पैकेज है. इसमें 25 बीघा ज़मीन या एमआईजी हाउसिंग बोर्ड का मकान या टोटल पचास लाख कैश और परिवार को एक नौकरी."

अग्निवीर को केंद्र सरकार की ओर से क्या सुविधाएं और आर्थिक पैकेज मिलता है. इस सवाल पर कहते हैं, "ग्रेच्युटी और पेंशन नहीं मिलेगी लेकिन क़रीब 95 लाख रुपए का कुल सहयोग पैकेज मिलता है."

वे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली अलग-अलग स्कीम हैं.

अब परिवार को है इंतज़ार

अग्निवीर जितेंद्र का घर

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सूबे की राजधानी जयपुर से क़रीब 170 किलोमीटर दूर अलवर ज़िले की मालाखेड़ा तहसील के नवलपुरा गांव में प्रवेश करते ही मुख्य सड़क से कुछ ही दूरी पर है जितेंद्र सिंह का घर है. पुराने बने तीन कमरों के इसी मकान के बाहर एक बैनर लगा है जिस पर लिखा है -अमर शहीद जितेंद्र सिंह तंवर.

मकान के भीतर दो भैंस बंधी हुई हैं. सरोज देवी अपने सैनिक बेटे के वियोग में गुमसुम बैठी हैं.

सरोज देवी अपने बेटे जितेंद्र को याद कर रोने लगती हैं, आंसू साफ़ करते हुए वे बीबीसी से कहती हैं, "सात साल पहले उसके पिता ख़त्म हो गए, उनके बाद कमाने वाला जितेंद्र ही था. अब उसके बाद मेरे पास कुछ नहीं बचा."

"बड़ा बेटा भी बीमार रहता है. पिता जी ख़त्म हो गए तो मुझे लगा जितेंद्र गृहस्थी चलाएगा, लेकिन मेरा जितेंद्र छोड़ गया, अब कौन चलाए मेरी गृहस्थी."

परिवार के पास क़रीब डेढ़ बीघा ज़मीन है, जिस पर इतनी खेती नहीं होती कि परिवार का खर्च चलाया जा सके. घर में भी दैनिक जीवन से जुड़े सामान के अलावा कुछ नहीं है.

सुनील कहते हैं, "पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार के हालात ख़राब हो गए थे. हम दोनों भाई मज़दूरी कर परिवार को पाल रहे थे. जितेंद्र के सेना में भर्ती होने के बाद परिवार की स्थिति कुछ संभली थी."

'हमेशा कहता था एक दिन नाम करूंगा'

साथी अग्निवीर सैनिकों के साथ जितेंद्र सिंह

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साल 2018 में पिता की मृत्यु और घर की माली हालत ने उस समय पंद्रह साल के जितेंद्र के कंधे पर ज़िम्मेदारियों का बोझ ला दिया था. लेकिन, सेना में जाने का जज्बा कम नहीं हुआ.

उनके भाई सुनील कहते हैं, "जितेंद्र अलवर से दिसंबर 2022 में सेना में भर्ती हुए थे. छह महीने की ट्रेनिंग के लिए बेंगलुरु गए. वहां से फिर जयपुर आए और वहां से तीन दिन की छुट्टी लेकर घर आए थे."

''वह कुछ समय बाद जयपुर से स्पेशल ट्रेनिंग के लिए आगरा चले गए थे जिसके बाद जयपुर आने पर घर भी आए थे और फिर जयपुर से उनकी तैनाती जम्मू कश्मीर की गई."

अग्निवीर मुद्दे से जुड़ीं कहानियां पढ़ें..

अग्निवीर जितेंद्र के भाई सुनील राजस्थान

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अब सरोज देवी की सरकार से मांग है, "मेरे बेटे की शहादत को शहीद का दर्जा क्यों नहीं दिया जा रहा है. मेरे बेटे ने देश के लिए अपनी जान दी है. मुझे पेंशन मिले जिससे मैं अपनी गृहस्थी चला सकूं और एक नौकरी मिले."

घर के प्रवेश द्वार के पास बने एक कमरे की टेबल पर जितेंद्र की तस्वीर रखी हुई है. वहीं नज़दीक में बैठे उनके बड़े भाई सुनील नम आंखों से बीबीसी से कहते हैं, "जिस घर से बच्चा जाता है, वो दुख उस परिवार को ही पता होता है. उसकी कमी किसी भी चीज़ से पूरी नहीं हो सकती है."

वे कहते हैं, "हमारी मांग है कि मेरे भाई जितेंद्र को शहीद का दर्जा दिया जाए. हमारे गांव के सरकारी स्कूल का नाम अमर शहीद जितेंद्र सिंह के नाम से हो."

"हमारे घर से दस किलोमीटर दूर मालाखेड़ा-लक्ष्मणगढ़ चौक है जिसका नाम अमर शहीद जितेंद्र सिंह के नाम पर रखा जाए और परिवार की स्थिति देखते हुए एक नौकरी मिले."

परिवार की इन सभी मांगों के समर्थन में राज्य सरकार से मांग करते हुए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और अलवर से विधायक टीकाराम जूली ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को पत्र भी लिखा है.

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