नए आपराधिक क़ानूनों के लागू होने पर पुलिसकर्मियों का क्या कहना है

- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक जुलाई से तीन आपराधिक क़ानून- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य संहिता पूरे भारत में लागू हो गए हैं.
इन तीन क़ानूनों ने देश के मौलिक आपराधिक क़ानून यानी भारतीय दंड संहिता 1860, दंड प्रक्रिया संहिता,1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की जगह ली है.
ऐसे में बीबीसी हिंदी ने दिल्ली और नोएडा के चार पुलिस स्टेशनों का दौरा किया और नए क़ानूनों को लागू करने से जुड़ी चीज़ों पर 15 पुलिसकर्मियों से बातचीत की.
आम समझ ये थी कि नए क़ानूनों के प्रभाव का आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी.
कई लोगों का ये कहना था कि नए क़ानूनों ने जांच एजेंसियों की ज़िम्मेदारी बढ़ा दी है, जैसे कि तलाशी के दौरान वीडियो रिकॉर्ड करना और सात साल से अधिक की सज़ा के प्रावधान वाले जघन्य अपराधों के लिए फॉरेंसिक एनालिसिस.
उनका मानना था कि अगर कर्मचारियों की संख्या को नहीं बढ़ाया गया तो जांच में देरी हो सकती है.
जिन लोगों से हमने बातचीत की, उनमें से ज़्यादातर का कहना था कि उन्हें ट्रेनिंग दी गई है, हालांकि कुछ ने ये भी आरोप लगाया कि ये ट्रेनिंग बहुत ही संक्षिप्त थी.
उनका कहना था कि काम के दौरान ही वो इसे सीखेंगे क्योंकि नए क़ानून अब लागू हो चुके हैं.

नए क़ानूनों को लागू करने के लिए पुलिस ट्रेनिंग

एक जुलाई को गृहमंत्री अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि कई इंस्टीट्यूशंस को अधिकृत करके 23 हज़ार से अधिक मास्टर ट्रेनर्स का प्रशिक्षण किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि 22.5 लाख पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग के लिए 12 हज़ार मास्टर ट्रेनर्स तैयार करने का लक्ष्य था.
उन्होंने आगे कहा, "ज्यूडिशरी में 21 हज़ार सबॉर्डिनेट ज्यूडिशरी की ट्रेनिंग हो चुकी है, साथ ही 20 हज़ार पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को ट्रेंड किया गया है."
ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के मुताबिक़, गृह मंत्रालय ने पुलिसकर्मियों के लिए कई ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किए हैं. लेकिन जिन पुलिसकर्मियों से हमने बातचीत की है, उनकी कुछ आशंकाएं थीं.
जहां एक कॉन्स्टेबल का कहना था कि उन्हें सिर्फ़ एक दिन की ही ट्रेनिंग मिली है, वहीं एक सब-इंस्पेक्टर का कहना है कि उन्हें पांच दिन की ट्रेनिंग मिली है.
ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की वेबसाइट पर जो कॉन्टेंट अपलोड किया गया है, उसमें जो ट्रेनिंग मॉड्यूल दिखाए गए हैं, उनमें बताया गया है कि ट्रेनिंग 2 से 5 दिन तक की हो सकती है, जो पुलिसकर्मियों की वरिष्ठता के आधार पर तय की गई है.
हालांकि, बातचीत में सभी पुलिसकर्मियों ने कहा कि वो काम के दौरान ही नए क़ानून सीखेंगे.
नोएडा फेज-1 के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) अमित कुमार भदाना ने बीबीसी से कहा, "हम चीज़ें पढ़ रहे है, समझ रहे हैं. 1 से 3 दिन की ट्रेनिंग हुई है, जो कि पर्याप्त नहीं है."
उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में काम करते हुए 20 साल हो गए हैं, इसलिए नए क़ानूनों को सही से समझने में वक्त लगेगा.
हालांकि, वो ये भी कहते हैं कि अपराध एक जैसे हैं, इसलिए उन्हें क़ानून लागू करने में ज़्यादा दिक्कत नहीं होगी. एसएचओ अमित कुमार भदाना कहते हैं, "काम तो हो जाएगा, कुछ दिक्कतें आईं तो हम पूछ कर उसे कर लेंगे."
एक अन्य पुलिसकर्मी ने अफ़सोस जताते हुए कहा, "पहले आम आदमी भी आईपीसी के प्रावधानों को जानता था. अगर आपने 302, 420 जैसी धाराओं का इस्तेमाल किया तो सभी को समझ में आ जाता था. अब ये सब बदल जाएगा."
नाम ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर दिल्ली के कम से कम तीन पुलिस कर्मियों ने बीबीसी हिंदी को बताया कि उन्हें अभी तक ट्रेनिंग नहीं मिली है.
एक सब-इंस्पेक्टर ने बताया कि उन्हें नए क़ानूनों पर क़िताबें नहीं दी गई हैं, ये कहा गया है कि क़िताबें नहीं उपलब्ध होने तक ऑनलाइन कंटेंट का इस्तेमाल किया जाए.
क़ानूनों में भ्रम की स्थिति

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पुलिसकर्मियों से बातचीत में ये बात सामने आई कि क़ानूनों को लागू करने पर अभी भ्रम की स्थिति है.
जब ये पूछा गया कि अगर कोई अपराध 1 जुलाई से पहले हुआ हो लेकिन व्यक्ति अपराध की रिपोर्ट दर्ज़ कराने नए क़ानून के लागू होने के बाद आया हो, तो इस स्थिति में क्या होगा? पुराना क़ानून लागू होगा या नया? जवाब अलग-अलग थे.
दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर बबीता का कहना है, "ये चीज़ तो हमें पूछना होगा, इसकी जानकारी नहीं हैं."
नोएडा सेक्टर 20 में एक इंस्पेक्टर और कॉन्स्टेबल ने उलट जवाब दिया.
वहीं, ग्रेटर नोएडा के डिप्टी कमिश्नर एसएम ख़ान के मुताबिक़, "एफ़आईआर जिस दिन दर्ज़ हुई, उस दिन के हिसाब से क़ानून लगेगा. तो अगर 1 जुलाई के बाद एफ़आईआर दर्ज़ हुआ तो नया क़ानून लगेगा."
ये राय हमने कई दूसरे पुलिस अधिकारियों से साझा की, जो नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे.
नोएडा फेज़-1 के पुलिसकर्मियों की राय अलग-अलग थी.
गृह मंत्री अमित शाह ने बीते सोमवार को की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि अगर 1 जुलाई से पहले अपराध हुआ है तो पुराने क़ानून ही लागू होंगे.
वीडियो साक्ष्य

इन सबके अलावा भी कई ऐसी चीज़ें हैं, जिसके बारे में पुलिसकर्मियों में भ्रम की स्थिति है.
भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता के तहत कई मामलों में पुलिकर्मियों को क्राइम सीन को रिकॉर्ड करना पड़ता है.
उदाहरण के लिए, सेक्शन 105 और 185 के तहत पुलिस की तलाशी और ज़ब्ती प्रक्रिया के दौरान रिकॉर्ड करने का प्रावधान है.
हालांकि, ये किया कैसे जाए, इस पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
निज़ामुद्दीन पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर एमएल मीना कहते हैं कि "हमें बेल्ट दी जाएगी जिसमें कैमरे लगे होंगे."
ये कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसा पश्चिमी देशों में पुलिसकर्मियों को बॉडी कैमरों से लैस किया जाता है. हालांकि, दूसरे पुलिसकर्मियों का कहना है कि उन्हें इसके बारे में नहीं पता है.
वहीं एक इंस्पेक्टर का कहना है कि उन्हें मोबाइल टैबलेट दिए जाएंगे. इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं दिखी.
नोएडा फेज़-1 पुलिस स्टेशन में चार पुलिस अधिकारियों के एक समूह की राय थी कि उन्हें क्राइम सीन को अपने निजी फ़ोन पर रिकॉर्ड करना होगा.
हालांकि, एक अधिकारी का कहना था एक नया ऐप 'साक्ष्य' है जिसका इस्तेमाल उन्हें रिकॉर्डिंग के लिए करना होगा.
काम का बोझ बढ़ेगा

ऐसी भी लग रहा है कि नए क़ानूनों के लागू होने के बाद काम का बोझ बढ़ेगा.
नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर एक पुलिसकर्मी ने बताया, "पहले जहां एक पुलिसकर्मी की ज़रूरत होती थी, अब वीडियोग्राफी और दूसरी चीजों के लिए तीन पुलिसकर्मियों की ज़रूरत होगी."
उन्होंने पूछा, "इतने लोग कहां से आएंगे."
इसके अलावा, उन्होंने उस प्रावधान पर भी शंका जताई जिसमें गंभीर अपराध में जहां सज़ा सात साल से अधिक है, ऐसी स्थिति में फॉरेंसिक एनालिसिस का प्रावधान है.
पुलिसकर्मी ने कहा, "हमारे पास पिछले 2-3 साल में कई ऐसे मामले हैं जो बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि इनमें फॉरेंसिक एनालिसिस बाकी है."
वो कहते हैं, "अब ट्रायल धीमी गति से होंगे, जब तक कि कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ जाती."
उन्हें डर है कि नए हालात में पुराने और नए क़ानून वाला दो सिस्टम साथ-साथ चलेगा, जिससे काम का बोझ बढ़ जाएगा.
गृह मंत्री अमित शाह ने 1 जुलाई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सरकार ने " साल 2020 में ही नेशनल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी बना दी थी."
उन्होंने कहा था कि इसके लिए ट्रेंड मैनपावर की ज़रूरत होगी और तीन साल के बाद देश में हर साल 40 हज़ार से ज्यादा ट्रेंड मैनपावर हमारी न्यायिक प्रणाली की सेवा में उपलब्ध होगा.
उन्होंने आगे कहा था कि "केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि 9 राज्यों में फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी के कैंपस खोले जाएंगे और 6 सेंट्रल फॉरेंसिक लैबोरेट्रीज भी स्थापित की जाएंगी."
गृह मंत्री का कहना है, "इस पूरी प्रक्रिया के क्रियान्वित होने में और टेक्नोलॉजी के अपग्रेड होने में तीन या चार साल लगेंगे."


















